1965 के जंग के दौरान ली गयी लाल बहादुर शास्त्री की कुछ तस्वीरें

जय जवान जय किसान का नारा देने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की आज 114वीं जयंती है. लाल बहादुर शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए भी ईमानदारी और सादगी की नयी परिभाषा गढ़ी. वो करोड़ो भारतवासियों के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं और ईमानदारी के प्रतिक हैं. आज शास्त्री जी के जन्मदिन पर कुछ ख़ास तस्वीरें पोस्ट कर रहा हूँ जो कि 1965 के भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान ली गयी थीं(जिसे दो साल पहले दिल्ली में एक प्रदर्शनी में लगाया गया था) और साथ ही उनके सादगी और ईमानदारी के कुछ किस्से. 1965 की जंग में भारत ने पाकिस्तान को बहुत ज़बरदस्त मात दी थी. भारत के उस जीत का सबसे बड़ा श्रेय लाल बहादुर शास्त्री को जाता है.

लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय सेना का जबरदस्त नेतृत्व किया और उनके मनोबल को बढ़ाया. उनकी बातों ने भारतीय सैनिकों को एक नयी प्रेरणा दी  

लड़ाई के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री 11Corps गए तो वहाँ पाकिस्तान  के Paton Tank पर चढ़कर तस्वीर खींचवाने की तमन्ना जाहिर की उन्होंने. लेफ्टिनेंट जेनरल जे.एस.ढिल्लोन ने शास्त्री जी की मदद की टैंक पर चढ़ने में..
लाल बहादुर शास्त्री  64 Air Defense के पोस्ट पर..
लेफ्टिनेंट जेनरल जे.एस.ढिल्लोन के साथ प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री 

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री लाहोर सेक्टर में सैनिकों का हौंसला बढ़ाते हुए 

पाकिस्तान के पैटन टैंक के कब्रगाह को देखकर लाल बहादूर शास्त्री ने कहा: “मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी इतनी टूटी हुई बैलगाड़ियाँ नहीं देखी”
प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में सैनिकों का हाल चाल लेते हुए 

ताशकेंत समझौता जिसके बाद शास्त्री जी का देहांत हो गया था 
चलते चलते लाल बहादुर शास्त्री के कुछ किस्से जो कि उनके सादे व्यक्तित्व की कहानी बयां करते हैं – 
  • भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. पैसे की भी दिक्कत थी और खाने पीने के सामान की भी दिक्कत थी. लाल बहादुर शास्त्री ने लोगों से अपील की कि वह हफ्ते में एक बार व्रत रखें. लोगों से अपील करने के पहले उन्होंने खुद व्रत रखना शुरु कर दिया था.
  • आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए शास्त्री जी ने लोगों से अपील की कि वह खर्च कम कर दे. शास्त्री जी ने खुद के खर्चों में भी बेहद कमी कर दी थी. उन्होंने घर में आने वाली बाई को आने से मना कर दिया और खुद ही कपड़े धोने शुरू कर दी है. यही नहीं, वह घर की सफाई भी खुद ही करते थे. शास्त्री जी ने उस समय अपना वेतन लेना भी बंद कर दिया था. एक बार शास्त्री जी को खुद के लिए एक धोती खरीदने की जरूरत पड़ी तो उन्होंने धोती खरीदने से इंकार कर दिया और अपनी पत्नी से कहा कि वह उनकी फटी हुई धोती को सिल दे.  
  • जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तो उनके परिवार ने उन्हें गाड़ी खरीदने की सलाह दी. गाड़ी थी फिएट की जो उस समय 12000 रुपए में आती थी. शास्त्री जी के पास ₹7000 थे और इतने में गाड़ी आती नहीं, इसलिए उन्होंने गाड़ी खरीदने के लिए ₹5000 का बैंक लोन अप्लाई किया था पंजाब नेशनल बैंक से. वह गाड़ी आज भी शास्त्री मेमोरियल, नई दिल्ली में रखी हुई है.
  • ऑफिस के कामकाज के लिए शास्त्री जी के पास शेवरले की इंपाला गाड़ी थ. एक बार उनके बेटे उस गाड़ी से कहीं चले गए. जब शास्त्री जी को ये बात पता चली तो उन्होंने पहले ये पता लगाया की गाड़ी कितनी दूर चली है और उतना किराया उन्होंने सरकारी अकाउंट में जमा करवा दिया. 
  • एक बार श्री लाल बहादुर शास्त्री ट्रेन में सफर कर रहे थे. वह उस वक्त रेल मंत्री थे. उन्होंने प्रथम श्रेणी के डब्बे में टिकट लिया. उन्होंने वहाँ देखा कि उनके जैसे ही कद-काठी का एक मरीज था. उस मरीज को उन्होंने अपनी सीट पर लिटा दिया और खुद उस मरीज की सीट पर चले गए जो कि तृतीय श्रेणी में था और वह चादर ओढ़ कर सो गए.  कुछ देर के बाद टी.टी आया और वहां उसने मरीज को सोता हुआ देखा उसे बुरा भला कहने लगा. शोर सुनकर शास्त्री जी की नींद खुल गई. उन्होंने टीटी को अपना परिचय पत्र दिया, तब टी.टी हक्का बक्का रह गया. उसनें घबरा कर कहा कि सर आप यहां क्यों बैठे हैं? चलिए मैं आपको आपकी सीट पर पहुंचा देता हूं. शास्त्री जी ने मुस्कुराते हुए उससे कहा उन्होंने कि भैया मुझे नींद आ रही है. तुम क्यों मेरी मीठी नींद में खलल डाल रहे हो?  इतना कहकर वह चादर ओढ़ कर फिर से सो गए. 
  • बात उन दिनों की है जब शास्त्रीजी लोक सेवा मंडल के सदस्य बने थे. वह थोड़े संकोची स्वाभाव के थे. अखबारों और मैगजीन में अपना नाम छपवा कर प्रशंसा पाने के इच्छुक वो बिलकुल नहीं थे. एक दिन किसी मित्र ने उनसे पूछा कि आप अखबारों में अपना नाम छपवाने से से परहेज क्यों करते हैं? उनकी बात सुनकर शास्त्री जी बोले – लाला लाजपत राय ने लोक सेवा मंडल के कार्य की सीख देते हुए मुझसे कहा था कि ताज महल में दो तरह के पत्थर लगे हुए हैं एक संगमरमर के जिसकी सभी लोग प्रशंसा करते हैं और दूसरे पत्थर वह हैं जो ताज महल की नीव में लगे हुए हैं और वही पत्थर ताजमहल का असली आधार है. उनके वह सीख मुझे आज भी याद है इसलिए मैं नीव का पत्थर रहने में ही खुश हूं. 

Recent Articles

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर : शिक्षक दिवस पर खास

सुदर्शन पटनायक द्वारा बनाया गया, चित्र उनके ट्विटर से लिया गया आज शिक्षक दिवस है, यह दिन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ....

तीज की कुछ यादें, कुछ अभी की बातें और एक आधुनिक समस्या

इस साल के तीज पर बने पेड़कियेबचपन से ही तीज का पर्व मेरे लिए एक ख़ास पर्व रहा है. सच कहूँ तो उन दिनों इस...

एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना..

बारिश हो रही हो, मौसम सुहाना हो गया हो और ऐसे में अगर कुछ पुराना याद आ जाए तो जाने क्या हो जाता है...

बंद हो गयी भारत की सबसे आइकोनिक कार, जानिये क्यों थी खास और क्या था इतिहास

Photo: CarToqपिछले सप्ताह, अचानक एक खबर आँखों के सामने आई, कि मारुती अपनी गाड़ी जिप्सी का प्रोडक्शन बंद कर रही है. एक लम्बे समय...

आईये, बंद दरवाजों का शहर से एक मुलाकात कीजिये

यूँ तो साल का सबसे खूबसूरत महिना होता है फरवरी, लेकिन जाने क्यों अजीब व्यस्तताओं और उलझनों में ये महिना बीता. पुस्तक मेला जो...

Related Stories

  1. आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं

  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सादगी और त्याग की प्रतिमूर्ति राजमाता : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है…. आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी….. आभार…

  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन
    http://bulletinofblog.blogspot.in/2017/10/blog-post_12.html
    सादगी और त्याग की प्रतिमूर्ति राजमाता : ब्लॉग बुलेटिन
    में शामिल किया गया है…. आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी….. आभार…

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

नयी प्रकाशित पोस्ट और आलेखों को ईमेल के द्वारा प्राप्त करें