इवनिंग डायरी ५ – ब्लॉगर नास्टैल्जीआ

आज से नौ साल पहले जब मैंने हिन्दी में ब्लॉग लेखन की शुरुआत की थी तब ये सोचना भी नामुमकिन था कि इस ब्लॉगिंग के चलते हम कभी इतने नॉस्टैल्जिक हो सकेंगे जैसे अब हो जाते हैं. महज एक हैशटैग( हिन्दी ब्लॉगिंग) के ट्रेंड करने से और लोगों के उत्साह को देखकर ब्लॉगिंग के वे पुराने दिन ठीक वैसे ही याद आ जाते हैं जैसे हम अपने बचपन या कॉलेज के दिनों को याद करते हैं. बाकी लोगों के साथ ये होता होगा या नहीं, मुझे नहीं पता लेकिन ब्लॉगिंग के उन सुनहरे दिनों को याद करने से मुझे वैसी ही ख़ुशी मिलती है जैसे अपने बीते हुए सबसे प्यारे दिनों को याद कर के ख़ुशी मिलती है.

Blog Nostalgia Blogging Nostalgia

मेरे लिए तो खास तौर पर ब्लॉगिंग के वे सुनहरे दिन बहुत अहम रहे हैं. जाने कितने रिश्ते बने हैं यहाँ. कुछ बेहद अच्छे दोस्त मिले तो कुछ ऐसे नए रिश्ते बने जिन्होंने मेरी ज़िन्दगी को ही बदल के रख दिया. उन दिनों मेरी बुरी हालत थी, दोस्त कुछ अजीब से वजह से दूर हो गए थे, तब मैंने ब्लॉगिंग का रुख किया था. मुझे मालूम भी नहीं था कि ये ब्लॉगिंग मेरी ज़िन्दगी बदलने वाला है. बहुत लोगों को ये विश्वास करना मुश्किल होगा कि महज ब्लॉगिंग कैसे किसी की भी ज़िन्दगी बदल सकता है? ब्लॉग पर तो लोग अपनी राय  लिखते हैं, अपने सामाजिक और पोलिटिकल ओपिनियन लिखते हैं, कवितायेँ और कहानियाँ लिखते हैं. लेकिन इन सब के इतर ब्लॉगिंग मेरे लिए हमेशा से बेहद पर्सनल चीज़ रही है, ये मेरे लिए एक बड़े घर जैसा रहा है, किसी जॉइंट परिवार की तरह जहाँ मेरे दोस्त, दीदियाँ, भाई, भाभी, चाचा, चाची, बुआ रहते हैं और मैं बेझिझक अपने मन की वो सब बातें यहाँ कह डालता हूँ जिसे शायद किसी से भी नहीं कहा था कभी. तभी तो जितने भी संस्मरण मैंने यहाँ लिखे हैं उन सब को लिखने के पहले मैंने किसी को वो सारी बातें कभी नहीं सुनाये थे. किसके पास इतना वक़्त है कि बैठकर पुराने किस्से कहानियाँ सुनाता रहे. 
मैं अगर खुद की बात करूँ तो मुझे संस्मरण लिखना बहुत अच्छा लगता है, शायद इसलिए कि इस भागती दौड़ती दुनिया में मैं शिद्दत से चाहता हूँ कि वक़्त का पहिया ज़रा पीछे घूम जाए और उन दिनों में हम वापस पहुँच जाएँ जहाँ सुकून और चैन था. मुझे लगता है कि तब की ज़िन्दगी कितनी आसान और खूबसूरत थी. कोई कोम्प्लेक्सिटी थी ही नहीं. शायद इसलिए मुझे उन बीते दिनों की बातें लिखना खूब पसंद है. बीते दिनों के किस्सों की बात करूँ तो मैंने अपने से बड़े लोगों के पुराने दिनों के किस्से बहुत कम सुने हैं. मतलब परिवार में या तो पापा या माँ या फिर कभी कभी नानी, यही तीन ऐसे थे जो अपने पुराने दिनों के किस्से मुझे सुनाते थे और मुझे बेहद मज़ा आता था उनकी यादों को सुनकर, लेकिन इनके अलावा ना तो मेरे रिश्तेदार कोई, न मोहल्ले में और ना जान पहचान में किसी से मैंने उनके बीते दिनों की बातें सुनी हैं. और जब भी मैं फिल्मों में देखता था ऐसा कोई सीन जहाँ किसी लड़के को कोई अपने बीते दिनों की कहानियाँ सुना रहा है तो मैं बड़ा मिस करता था कि यार मेरी ज़िन्दगी में ऐसा कोई क्यों नहीं है जो मुझे ऐसी कहानियाँ सुनाये. ये बातें थोड़ी वीयर्ड लग रही हैं न आपको? मेरी ऐसी विश?हैं भी वीयर्ड.  शायद ही कोई नार्मल इंसान इस तरह से सोचता हो. 
खैर, यहाँ ब्लॉग पर मुझे नए रिश्ते मिले, मुझे दीदियाँ मिलीं, खूब सारे बड़े और छोटे भाई मिले, चाचा और चाचियाँ मिलीं, बुआ मिलीं और एक बेहद प्यारी भाभी मिलीं. इन सब की बातों को पढ़कर, इनके बीते दिनों की यादें पढ़कर, इनके संस्मरण पढ़कर मुझे अच्छा लगने लगा. जब ये कोई हैप्पी मोमेंट शेयर करते, मुझे लगता इनके साथ साथ मैं भी इनके उस मोमेंट से जुड़ा हूँ. जब ये अपने पोस्ट में किसी अपने को याद करते तो लगता मैं भी साथ साथ उनके अपनों को याद कर रहा हूँ. मुझे ऐसा लगने लगा कि जिस चीज़ को मैं मिस करता था वो शायद अब पूरी होने लगी है. मुझे लगा कि इस ब्लॉग के अलावा और कहाँ कोई दूसरा माध्यम ऐसा है जहाँ मैं लोगों के ऐसे अनुभव, उनके बीते दिनों की कहानियाँ सुन पाता?
मुझे अक्सर लगता है ऐसा कि ब्लॉग हमारा कोई मोहल्ला जैसा ही है. पहले के ज़माने में मोहल्ला हुआ करता था न(अब के समय में तो सिर्फ कॉलोनियां होती हैं, मोहल्ले तो खत्म हो गए). शाम में दफ्तर से घर वापस आने के बाद कैसे लोगों की टोलियाँ जमा हो जाती थीं एक दुसरे के घर के सामने या मोहल्ले के किसी चाय दुकान पर. औरतों की महफ़िल अलग लगती थीं. मुझे ब्लॉगिंग के वे सुनहरे दिन कुछ कुछ वैसे ही लगते हैं. दिन भर की परेशानियों को भूल कर हम शाम में ब्लॉग पर अपने दिल की सभी बातें बिनाझिझक लिख जाते थे..ऐसे कि जैसे बाकी साथी दोस्त को अपने दिल की वे बातें सुनानी हैं. दोस्त भी ब्लॉग पर आने में ज्यादा देर नहीं लगाते थे, यहाँ पोस्ट लिखी गयी नहीं कि दोस्तों की महफ़िल उस पोस्ट पर लगनी शुरू हो गयी.  लोगों को कुछ दिक्कत भी हुई, तो दुसरे लोग तुरंत समस्या का समाधान लेकर ब्लॉग पर ही उपलब्ध हो जाते थे. किसी को किसी की बात पर कोई अपनी बात याद आई, तो वो उसके पोस्ट के जवाब में अपने कुछ पुराने किस्से लिख देते थे, ठीक वैसे ही जैसे हम परिवार में एक दुसरे से बात करने के दौरान किस्सों के जवाब में किस्से सुनाते हैं. हँसी-मजाक भी खूब हुई ब्लॉग पर और लड़ाई-झगड़े भी खूब हुए, जैसे कि अक्सर परिवार में होता है, लेकिन फिर भी सब एक दुसरे के साथ रहे. इन सब के अलावा ख़ास कर उन लोगों के लिए ब्लॉगिंग बहुत अहम रहा है जो अकेलेपन के शिकार रहे हैं. उन्हें उनके डिप्रेसिव मूड से बाहर निकलने में ब्लॉग ने बड़ी मदद की है. ब्लॉग के माध्यम से ही सही, उन्हें भी ये लगा कि शायद उन्हें एक परिवार मिल गया है, एक ऐसी जगह मिली है जहाँ वे अपने मन की बातें कह सकते हैं और लोग उनकी बातें सुनेंगे. शायद इन्हीं सब वजहों से हम हमेशा ‘हिंदी-ब्लॉग’ में एक शब्द और जोड़ देते हैं और कहते हैं इसे हिंदी ब्लॉग परिवार. 
ये ब्लॉगर मेरे लिए उसी पुराने मोहल्ले जैसा था कि जहाँ कुछ देर घूम कर, दोस्तों से बातें कर के, उनकी बातें सुन कर..उनके किस्से पढ़कर..तस्वीरें देखकर, विचलित मन भी एकदम शांत हो जाता था. इन सब के अलावा  ब्लॉग के वजह से ही किताब पढ़ने की मेरी आदत बढ़ गयी. किताबें मैं पहले भी पढ़ता था लेकिन समय के साथ साथ किताबें पढ़ना मेरा कम होता गया. ब्लॉगिंग में आने के बाद, यहाँ दोस्तों ने लेखकों की, उनकी कहानियों की, उपन्यासों की बातें करनी शुरू की..उनकी बातें इतनी दिलचस्प लगने लगीं कि मेरा भी मन करने लगा फिर से किताबों के प्रति रुख करने का, और शायद इसलिए ब्लॉगिंग शुरू करने के बाद बड़े तेज़ रफ़्तार से मैंने कई किताबें निपटाई हैं.  
लेकिन समय के साथ साथ जैसे जैसे दुसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स का चलन शुरू हुआ, लोग अपने इसी परिवार के प्रति उदासीन होते चले गए. ठीक वैसे ही जैसे नयी मॉडर्न कॉलोनी में शिफ्ट होने के बाद लोग अपने पुराने मोहल्ले को भूल जाते हैं. 
इधर दो दिनों से फेसबुक और ट्विटर पर दोस्तों ने हिन्दी ब्लॉगिंग के हैशटैग को ट्रेंड करवाने का काम शुरू किया है और इस वजह से आज सभी पुराने ब्लॉगर अपने ब्लॉग पर लगा ताला खोल कर उसे फिर से शुरू करने में लगे हैं. जहाँ कुछ लोग अभी भी हैं जो ब्लॉगिंग लगातार कर रहे हैं वहीँ बाकी लोग लगभग ब्लॉगिंग छोड़ चुके हैं. ऐसे में यहाँ ये देखना होगा कि इस हैशटैग के ट्रेंड करने के बाद क्या लोग वाकई ब्लॉगिंग के तरफ फिर से आते हैं या ये बस एक दिन की बात बन के रह जायेगी.
आज जबकि लोग आज  हिंदी ब्लॉग दिवस मना रहे हैं, ऐसे में एक गाना मैं यहाँ शेयर कर रहा हूँ, “आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम..गुज़रा ज़माना बचपन का” आप इस गाने में थोड़ा बचपना कर के देखिये, ‘बचपन’ की ‘ब्लॉगिंग’ गा के देखिये. बड़ा अच्छा लगेगा 🙂 

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  1. हमको लगा कहीं नामों का जिक्र हो तो हम भी अपना नाम खोजें लेकिन आपने तो सबको एक साथ ही शुक्रिया टाइप वाली पोस्ट लिख दी है… उदास हों या खुशफहमी में निकल लें यहाँ से कि शायद लिखते हुए आपने हमारे बारे में सोचा हो…

    • शेखर बाबु…बिलकुल आपका नाम मन में था, कैसे नहीं होगा आपका नाम? आप भी हद करते हैं! 🙂

  2. तुम तो हमें भी नॉस्टेल्जिया दिए ।
    सारे पुराने दिन नज़रों के सामने घूम गए ।
    वे दिन लौटने तो मुश्किल हैं, उन दिनों की चर्चा ही सही।
    दीदियों की तो फौज है तुम्हारे पास :)स्
    तुन्हें तंग करते हमें भी पुराने दिन याद आ जाते हैं 🙂

  3. 🙂

    लिखते रहिये यूँ ही प्यारी प्यारी बातें… बस कुछ सिरे छुट जाते हैं… अंतराल आ जाता है… पर समय आने पर चीज़ों को पूर्ववत होते देर नहीं लगती…
    May the good ol'days of blogging flourish with its full potential,again !!

  4. ब्लॉग मोहल्ला ही था, सब पडोसी थे … कितना कुछ लिखना-पढ़ना सबको जोड़े हुए था। अब जुड़कर रहने की सोचें, किसने टिप्पणी की, नहीं की – उससे ऊपर उठकर

  5. ब्लॉग ने अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले और आत्मविश्वास को नई ऊंचाइयां भी दीं। उम्मीद करते हैं कि फिर से पुराने दिन लौटेंगे।

  6. आह नोस्टैल्जिया… क्या तो दिन थे वो.. जब ब्लॉग लिखने से ज़्यादा पढ़ने में मज़ा आता था और उससे भी ज़्यादा कमेंट्स के ज़रिये बतियाने में… ऐसे कमेंट्स जो ब्लॉग के एक्सटेंशन जैसे होते थे… एक के बाद एक कितने लोग एक ही विषय पर कितना कुछ नया जोड़ जाते थे… हम उन डिस्कशन्स को मिस करते हैं… फेसबुक के डिस्कशन्स कभी उनकी जगह नहीं ले सकते जहाँ हर किसी को अपने ही बात को सही प्रूव करने की होड़ लगी रहती है… उम्मीद है ब्लॉगिंग और कमेंट्स के वो दिन वापस लौटेंगे… हाँ वो सुन्दर अभिव्यक्ति, मारक पोस्ट, साधुवाद, nice, और वो क्या था आपकी पोस्ट फलाना चर्चा में दिनांक — को शामिल की गयी है (जहाँ चर्चा के नाम पर सिर्फ़ ब्लॉग लिंक्स चिपकाये जाते थे) … ऐसे कमेंट्स और चर्चाओं से भगवान दूर ही रखे तो अच्छा… 🙂

  7. अभि, तुम्हारी पोस्ट तो बार बार पढ़ने जैसी है….कितनी बार लगता है कि जैसे ये मैंने ही तो नहीं लिखा|
    ब्लॉग वाकई परिवार जैसा है…बहुत प्यारे दोस्त पाए|पता है, मैं अपनी ज़िन्दगी में पहली बार अकेली यात्रा पर निकली और जाकर एक ब्लॉग मित्र के घर रुकी….मैं खुद हैरान थी….
    तुम जानते ही हो किसकी बात कर रही हूँ|
    तो अब पक्का वादा कि ब्लॉग से रिश्ता बनाये रखेंगे….
    खूब सा प्यार तुम्हें और तुम्हारे लिखे को…

    • जानता हूँ दीदी, आप किसकी बात कर रही हैं ! 🙂
      उनके घर हम भी रुके हैं !

  8. वाह भतीजे! यादें, तुम्हारे गुज़रे ज़माने की, गीत हमारे गुज़रे ज़माने का!

  9. बुआ में शायद मैं शामिल हूँ, ऐसे लग रहा है जैसे हम ने कोई त्यौहार मनाया और सब शामिल हुए , अपने अपने ब्लॉग पर तो सब थे ।पढ़ते भी थे सबको बीच बीच में ,लेकिन कहते नहीं थे पढ़ा ।
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग टैग से लगा कि सब मिलने के समय जय श्री कृष्ण कह रहे हों, तुम तो सदा अच्छा ही लिखते हो ,ये याद भी बढ़िया से उकेरी ।स्नेह।

    • बिलकुल बुआ! वो आपका ही जिक्र था, और आपके साथ साथ गिरिजा बुआ का ! 🙂

  10. अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस पर आपका योगदान सराहनीय है. हम आपका अभिनन्दन करते हैं. हिन्दी ब्लॉग जगत आबाद रहे. अनंत शुभकामनायें. नियमित लिखें. साधुवाद..
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

  11. बहुत खूब , एक लेख सेहत संकल्प पर भी हो जाए
    हिन्दी ब्लॉगिंग में आपका लेखन अपने चिन्ह छोड़ने में कामयाब है , आप लिख रहे हैं क्योंकि आपके पास भावनाएं और मजबूत अभिव्यक्ति है , इस आत्म अभिव्यक्ति से जो संतुष्टि मिलेगी वह सैकड़ों तालियों से अधिक होगी !
    मानते हैं न ?
    मंगलकामनाएं आपको !
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

  12. अच्छा है अब फिर कुछ सहजता से समेटा लेखन एको पढ़ने मिलेगा 🙂 आपके संस्मरण वाले लेख भूले नहीं है | वैसे हमें इच्च्शक्ति बनाकर लौटने की कोशिश करनी होगी | आसान नहीं है घर (ब्लॉग) वापसी |

  13. क्या बात है… पूरा दिल खोलकर बिखेर दिया है तुमने… तुम्हारी यही बात मुझे तुमसे जोडती है… जोड़े रखती है. मेरी परिस्थितियाँ तुमसे छिपी नहीं हैं. बहुत कुछ छूट गया. लेकिन इस कोशिश ने पुराने दिनों को फिर से ज़िंदा कर दिया है. अभी कमेंट कर रहा हूँ और पुराने लोग याद आ रहे हैं. जारी रखो!!

  14. सारगर्भित बातें लिखीं हैं !! सभी का प्रयास हो तो सफलता आवश्यम्भावी है !! लिखते रहो ….

  15. यादें लिखने में तो तुम्हारा कोई सानी नहीं. यहाँ लाइक का आप्शन नहीं है वरना शेखर का कमेन्ट लाइक करने का मन था 😛
    वो क्या है न …तुम्हारी ऐसी पोस्ट्स में अपना नाम देखने की आदत सी पढ़ गई है हे हे हे.

  16. ठीक वैसे ही जैसे नयी मॉडर्न कॉलोनी में शिफ्ट होने के बाद लोग अपने पुराने मोहल्ले को भूल जाते हैं एकदम सही कहा अभी भाई आपने लेकिन ये भी सही है ब्लॉग परिवार से बहुत से आभासी रिश्ते मिले माँ ,मासी बुआ ताई दीदी बड़े भाई छोटे भाई ढेरों प्यारे दोस्त पाए…आपने भी खूब दिल खोलकर लिखा है भाई अभी भी उम्मीद करते हैं कि फिर से पुराने दिन लौटेंगे।

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