दिदु की कवितायें

पत्थर से जो टूट जाए, वो शीशा हम नहीं
माना कुछ ख़ास हो तुम पर हम भी कम नहीं – प्रियंका गुप्ता 

किसी भी इंसान के लिए एक बड़ी बहन बहुत बड़ा सहारा होती है. मेरे लिए मेरा वो सहारा है मेरी दीदी प्रियंका गुप्ता, जो कि एक लेखिका भी है. वैसे बहुत गंभीर लेखन करने वाले मेरी ये दीदी अन्दर से बिलकुल बच्ची है. मेरी बाकी बहनों के साथ मिलकर ये मुझे सताने का कोई मौका नहीं छोड़ती. मेरी सभी बदमाश बहनों की ये ग्रुप लीडर है. वैसे इसके बारे में पहले से भी इस ब्लॉग पर काफी कुछ लिखा है मैने जिसे आप पढ़ सकते हैं. आज मेरी दीदी का जन्मदिन है. उसके जन्मदिन पर सोचा मैंने कि उसकी एक ऐसी कविता इस ब्लॉग पर लगाऊं जो  कहीं प्रकाशित नहीं हुई है, खुद उसके ब्लॉग पर भी नहीं. एक बाल कविता है जो दीदी ने लिखी है. आज यहाँ वही बाल कविता और उसके साथ साथ कुछ और कवितायें दीदी की पेश कर रहा हूँ. 

बन्दर मामा पहन पजामा 
जा पहुँचे कलकत्ता 
इतने बड़े शहर  में जाने कैसे 
भूल गए वो रास्ता
जल्दी से फिर घबराहट में
फोन किया  मामी को 
फोन भी कमबख्त झूठा निकला
लग गया टॉमी को 
गुर्राहट सुन कर टॉमी की
बंध गई उनकी घिग्घी 
बैठे जिसपर घूम रहे थे
भागे छोड़ वो बग्घी 
डर गए वो, मामी  ने  क्या 
दूजा ब्याह रचाया 
गुस्सा हो गयी शायद मुझसे 
उनको छोड़ के जो आया 
ऐसी गलती अब न करूँगा
कान पकड़े मामा ने 
जल्दी से फिर घर को भागे 
वैसे ही पजामा में 
******
एक बचपन की प्यारी कविता और पढ़िए – 

हर बार
स्कूल खुलने पर
जब मैं
किताबों के ढेर में खो जाती हूँ
तब
मुझे लगता है कि जैसे
इन किताबों के नीचे
दबा है मेरा बचपन
और मैं ” मैं ” नहीं
सिर्फ़ एक किताब हूँ
जो
हर वर्ष
कैलेण्डर बदलने के साथ
खुद भी
अंक दहलीज़ पार करती
बदलती जाएगी
और फिर
एक दिन अचानक
जब आँगन में खिलेगी धूप
तब चौंक कर
खोजेगी अपना बचपन
पीली…बदरंग…अधफटी
किताबों के बीच…।

दीदी जहाँ इतनी प्यारी बच्चों की कवितायें लिखती हैं वहीँ बेहद गंभीर कवितायें भी लिखती है. कवितायें ही नहीं वो जाने कौन कौन सी विधा में लिखती है, चोका, तांका, रुबाइयाँ और हाइकु जैसी विधाओं में वो माहिर है. दीदी की एक ख़ास कविता है जिसे उसने नानी के लिए लिखा था.  नानी के बेहद करीब थी दीदी और ये कविता जो दीदी ने करीब सत्रह साल पहले लिखी थी, और जो शायद अब तक कहीं प्रकाशित नहीं हुई है वो पढ़िए. दीदी की डायरी में मुझे ये कविता मिली थ. मुझे ये कविता बेहद पसंद है.  
अक्सर ज़िन्दगी 
हमसे
मायने पूछती है ज़िन्दगी के 
बुलाती है पास अपने 
पर किसे है फुर्सत 
वक़्त किसके पास है 
जो रुके  ज़िन्दगी के पास 
और समझाए / मायने ज़िन्दगी  के 
वक़्त चलता है अपनी रफ़्तार से 
और हम अपनी 
इस रेलमपेल, धक्कम-धक्की में 
सहमी-सी ज़िन्दगी 
खड़ी रहती है किसी कोने में 
तलाशती / मायने ज़िन्दगी  के 
और फिर 
किसी उदास पल में 
जब हम रुकते हैं 
ज़िन्दगी के पास 
तो ज़िन्दगी को फुर्सत नहीं होती 
क्यूंकि ज़िन्दगी तो  
वक़्त का हाथ  थाम  
भाग लेती है मौत के पास 
समझाने  मायने ज़िन्दगी के.
वैसे तो दीदी की लिखी अधिकतर कवितायें गंभीर और दर्द लिए होती हैं, लेकिन मुझे दीदी की प्यार भरी मीठी कवितायें ज्यादा पसंद हैं. एक बड़ी प्यारी  प्रेम कविता है जो मेरे दिल के बेहद करीब है, आज उसे भी यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ – 
तुमने कभी किसी को मुस्कराते सुना है?


मैंने सुना है

जब तुम फोन पर अचानक

चुप हो जाते हो

मेरी किसी बचकानी सी ख्वाहिश पर

या फिर जब

तुम्हारी किसी बात पर

रोते रोते मैं हँस पड़ती हूँ

तुम मुस्कराते हो

और वो मुस्कराहट

धीमे से मेरे कानों में 

गुनगुनाती है…

गुलज़ार की कोई नज़्म सी

मेरी चाय में घुलती है मुस्कराहट

रुई के नर्म फाहे सी

सहला जाती है मेरे गालों को

चुपके से

और फिर रात ढले

जब मेरी बंद पलकों पर

बिलकुल खामोशी से रख जाते हो 

अपनी मुस्कराहट

वो एक ख्वाब बन

मेरे दिल में उतर जाती है

और एक बार फिर

ख़्वाब में ही सही

पर मैं सुन लेती हूँ

तुम्हारी मुस्कराहट…।

और आखिर में कुछ प्यारे से हाइकू भी पढ़िए – 
तुम्हारा प्यार 
गुनगुनी धूप-सा 
सहला जाता ।

तुम्हारा प्यार 

अलाव बन तापे 
सर्द रातों में ।

तुम्हारा प्यार 
सर्द रातों में जैसे 
नर्म लिहाफ ।

तुम्हारा प्यार 
आँखों पर रखे हुए 
नींद के फाहे ।

हैप्पी बर्थडे दिदु 

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    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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