Indian Procrastination(Postal) Service

एक समय था जब डाकखाने पर लगभग सब कुछ निर्भर करता  था. पहले के दिनों में पोस्ट ऑफिस के अलावा शायद ही कोई ऐसी संस्था हो जिसने लोगों को इस कदर जोड़ रखा था. आज भले ही मोबाइल, फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्विटर है लेकिन पुराने दिनों में तो लोग सिर्फ पोस्ट ऑफिस के ही भरोसे रहते थे. घर घर खुशियाँ पहुँचाती थी डाक सेवा. पहले डाक-सेवा सिर्फ एक `मोड ऑफ़ कम्यूनिकेशन’ नहीं था बल्कि इसके अलावा भी डाक सेवा बहुत सेवाएँ मुहैया करवाती थी . पहले जगह जगह डाक-बंगले और सराय बनाये गए थे. पुराने दिनों में जब चिट्ठियाँ पहुँचाने का काम रेलगाड़ी, घोड़ों और नाव के मदद से होता था उस समय यात्रियों को भी एक जगह से दूसरी  जगह ले जाने में पोस्ट-ऑफिस मदद करती थी.लोग पालकियों में या नाव में या घोड़े गाड़ियों में अपनी बुकिंग करवाते थे और यात्रा करते थे. रास्ते में मिले किसी  किसी डाक बंगले में आराम भी करते थे. पहले लोग डाक मिलने का कितनी तत्परता से इंतजार करते थे. कितने काम थे जो सिर्फ और सिर्फ डाक के भरोसे होते थे. पहले डाकिये भी ये  सुनिश्चित करते थे कि जिसकी डाक है उसे सही समय पर वो डाक मिल जाए. उन्नीसवीं शताब्दी से लेकर कुछ पंद्रह साल पहले तक डाक-सेवा से बड़ा कोई साधन नहीं था संदेसा या चिट्ठी-पत्री पहुँचाने का.

मेरे लिए तो डाक सेवा हमेशा से ख़ास इसलिए भी रहा कि मेरे दादाजी इससे जुड़े थे. वो हमारे गाँव के पहले पोस्ट मास्टर तो थे ही, साथ ही साथ हमारे गाँव में पहला डाक-खाना उन्होंने ही खोला था. इसके अलावा डाक से मेरा जुड़ाव चिट्ठियों के वजह से रहा है जो की बेहद आब्वीअस है. लोग उन दिनों खूब चिट्ठियाँ लिखते थे. चिट्ठी लिखने की मेरी आदत भी बचपन से ही रही है और मैं बहुत सालों तक चिट्ठी लिखते रहा था और मुझे चिट्ठियाँ मिलती भी थी. ठीक से याद करूँ तो कॉलेज के तीसरे साल तक मैंने चिट्ठियाँ लिखी हैं. तब तक मोबाइल की शुरुआत हो गयी थी लेकिन फिर भी मैं कुछ ख़ास दोस्तों को चिट्ठियाँ लिखता था और उनकी चिट्ठियाँ भी मुझे लगातार मिलती रहती थी.

लेकिन उन दिनों की बातें और थीं. तब की लिखी चिट्ठियाँ मिल भी जाया करती थी. चाहे साधारण डाक से भी लोगों ने चिट्ठियाँ भेजी हों, डाक-घर अपना काम बखूबी करती थी..हाँ, कभी कभी चिट्ठी मिलने में थोड़ी देर हो जाया करती थी लेकिन चिट्ठियाँ मिलती जरूर थी. आज के समय में बात एकदम उलटी हो गयी है. चिट्ठियाँ मिलना तो बस भाग्य की बात होकर रह गयी है. इस साल की शुरुआत हुई तो मैंने सोचा सभी जान पहचान वालों को और नजदीकी मित्रों को चिट्ठी लिखी जाए और साथ ही साथ नए साल की ग्रीटिंग्स भी भेज दी जाए. बहुत सी चिट्ठियाँ लिखीं मैंने लेकिन उसमे से आधी चिट्ठियाँ मिली ही नहीं. दिल से लिखी थी मैंने वो चिट्ठियाँ और लगभग महीने डेढ़ महीने तक इंतजार करता रहा, कि शायद देर सवेर चिट्ठी मिल ही जाए, लेकिन चिट्ठियाँ नहीं मिली. बेहद निराश हो गया था मैं…गुस्सा भी बहुत आया  पोस्ट ऑफिस पे. साथ ही साथ खुद पे भी गुस्सा आया कि मैंने रजिस्टर्ड या स्पीडपोस्ट से चिट्ठी क्यों नहीं भेजी. जब चिट्ठियाँ मैं पोस्ट कर रहा था, तब एक दोस्त ने मुझे मना भी किया था कि ऐसे चिट्ठियाँ नहीं भेजो, वरना नहीं मिलेंगी. मैंने उसकी बात को ये कहकर अनसुना कर दिया कि  आखिर क्यों नहीं मिलेंगी चिट्ठियाँ? पहले भी तो हम भेजते थे..जरूर मिलेंगी.” बाद में जब उस दोस्त को बताया, कि तुम्हारी बात सच थी.आधी चिट्ठियाँ मिली ही नहीं, तो उसे आश्चर्य हुआ. इस बात  पे नहीं कि चिट्ठियाँ नहीं मिली बल्कि उसे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि जो आधी चिट्ठियाँ सही पते पर पहुँच गयी वो कैसे पहुँची? ये हाल है आज की हमारी डाक-व्यवस्था की और लोगों का विश्वास अब इस कदर उठ गया है.

ये हाल सिर्फ साधारण डाक की नहीं बल्कि स्पीड पोस्ट और रजिस्टर्ड पोस्ट की भी है. इस साल रक्षाबंधन पर मुझे वो राखियाँ भी नहीं मिली जो स्पीडपोस्ट से भेजी गयी थी. चार शहरों से राखी मिलने वाली थी मुझे लेकिन दो हफ्ते बाद भी मुझे राखी नहीं मिली. पिछले रक्षाबंधन पर भी रक्षाबंधन से आठ दस दिन पहले मेरी बहनों ने स्पीडपोस्ट के माध्यम से मुझे राखियाँ भेजी थी लेकिन पिछले साल तो शुक्र था कि पोस्टमैन ने राखी के दिन सुबह सुबह मुझे राखी पहुंचा दी थी. इस साल भी यही उम्मीद थी कि शायद पिछले साल जैसा ही कुछ हो और रक्षाबंधन  के सुबह राखियाँ मिल जाए, पर नहीं मिली राखियाँ मुझे. रक्षाबंधन के एक दो दिन पहले पोस्ट ऑफिस जाकर पता भी किया था मैंने लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ. बाद में अफ़सोस हुआ कि हम बेकार ही डाक-सेवा के भरोसे बैठते हैं अब. उससे बेहतर होता कि मैं अपनी बहनों से ये कह देता की डाक-सेवा की जगह कूरियर सेवा इस्तेमाल कर लो.

अभी कुछ दिन पहले मेरी दीदी, अनु दीदी ने मुझे चिट्ठी लिखी थी. पिछले सप्ताह उन्होंने मुझसे पूछा था कि तुम्हे कोई चिट्ठी नहीं मिली क्या? लिखे हुए काफी दिन हो गए. मैंने कहा..मैं डाक-खाने में जाकर पता  करता हूँ. डाक खाने गया भी मैं लेकिन वहां तो अब कर्मचारियों में गज़ब की अकड़  दिखने को मिलती  है. एक बेहद सीधा और रुखा सा जवाब मुझे मिला कि “कोई चिट्ठी नहीं आपके नाम की”. मैं भी बुझे मन से वापस आ गया. उधर दीदी को ये अफ़सोस था कि इतने मन से उन्होंने चिट्ठी लिखी थी उन्होंने वो चिट्ठी कहीं गुम हो गयी. कुछ महीने पहले मेरी बड़ी बहन प्रियंका दीदी ने भी मुझे चिट्ठी भेजी थी और उस चिट्ठी का हाल भी कुछ ऐसा ही हुआ था. चिट्ठी न मिलने की तो निराशा होती  ही है साथ ही साथ मन इस वजह से भी उदास होता है कि कितने दिल से वो चिट्ठियाँ लिखी गयी थी.

ये सब तो हमारे आज के पोस्टल-सर्विस की बातें हो गयीं, लेकिन इससे इतर कल एक बड़ी ही अच्छी और प्यारी खबर पढने को मिली, दूसरे देश के डाक सेवा के बारे में. कुछ टूरिस्ट थे जो Búðardalur(Iceland में कोई  जगह) घूमने गए थे और वहां उनकी मुलाकात किसी परिवार से हुई जो Búðardalur में ही रहते थे. टूरिस्ट को उस परिवार में किसी का नाम भी मालूम नहीं था, उन्होंने उस परिवार को चिट्ठी लिखने की सोची और नाम-पते की जगह  सिर्फ ये लिखा – “A horse farm with an Icelandic/Danish couple and three kids and a lot of sheep! The Danish woman works in a supermarket in Búðardalur.” . और इसके साथ ही  उन्होंने उस जगह का एक मैप जैसा बना दिया लिफ़ाफ़े  के ऊपर. बेहद आश्चर्य की बात है कि ये चिट्ठी बस इतने डिटेल से ही सही जगह पहुँच गयी. मेरे लिए तो ये सुखद आश्चर्य वाली खबर थी. ये खबर पढ़ने के बाद अनजाने ही मन वहाँ के डाक सेवा की तुलना यहाँ के डाक सेवा से करने लगा. फिर ये भी सोचा काश हमारे यहाँ भी डाकिये ऐसी लगन दिखाते. नीचे दिए गए उस लिफ़ाफ़े की तस्वीर देखिये जिससे ये चिट्ठी सही जगह पहुँच गयी..

ऐसे कई उदाहरण हैं जिसे देखकर आप हैरान रह जायेंगे कि चिट्ठियाँ ऐसे भी मिल जाया करती हैं. कुछ उदाहरण देखिये  –

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ये सब बातें  पढ़ सुन के अपने डाक-व्यवस्था  पर बेहद निराशा होती है. विस्तार से सही  पता लिखने के बाद भी, साधारण डाक हो या स्पीड पोस्ट या रजिस्टर्ड पोस्ट, वो ना तो समय पर मिलती है न ही ये भरोसा होता है कि चिट्ठियाँ मिलेंगी ही  हमें. मेरा तो अब लगभग पूरा भरोसा उठ चुका है डाक-सेवा से. चिट्ठी अब भेजनी भी होगी कहीं तो सीधे तौर पे कूरियर  सेवा का इस्तेमाल करूँगा. कम से कम इत्मिनान तो रहेगा न कि चिट्ठियाँ मिल गयी हैं. हाँ वो डाकिये द्वारा चिट्ठी मिलने पर और चिट्ठियों के ऊपर लगे  स्टैम्प जो फीलिंग दिलाते थे वो नहीं मिलेंगी.लेकिन कम से कम हम ये तो इत्मिनान रख सकेंगे  कि इतने दिल से जिसे चिट्ठी लिखी है उस तक वो चिट्ठी पहुँची.

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  1. सच…..चिट्ठी न मिलने का ग़म ताज़ा हो गया|
    पहले तो न जाने कितने मौक़े होते थे कि चिट्ठी नहीं मिली का दुःख मानना शुरू किया नहीं कि दरवाज़े के नीचे से लिफ़ाफ़ा सरक आता था !!
    खैर जब तक डाक सेवा चल रही है चिट्ठियां लिखी जाती रहेंगी…अपने गंतव्यों पर पहुँचती रहेंगी|
    उम्मीद भी कोई चीज़ है या नहीं…[बस अब post करने के पहले ख़त की तस्वीर मोबाइल से ले लेना चाहिए…ख़त न मिले तो वो pic whats app कर दी जाए]
    🙂

    – अनु

  2. मेरे दादा जी भी पोस्ट ऑफिस में थे और उन्होंने अंतिम साँस भी पोस्ट ऑफिस में ही ली. इसलिए जिस प्रकार रेलगाड़ी हमें पापा के कारण आकर्षित करती है, पोस्ट ऑफिस हमें सदा से दादा जी के लिये आकर्षित करता रहा है. पत्रों से जुड़े कई कायदे उन्होंने हमें सिखाए, जैसे लिफ़ाफ़े पर टिकट कहाँ लगाना चाहिए, भेजने वाले का नाम कहाँ और पाने वाले का कहाँ लिखना है, इन सबा का तार्किक कारण हमें समझाते थे.
    मगर जो नायाब कहानियाँ तुमने यहाँ प्रस्तुत की हैं उन्हें पढकर एक बार फिर सिर श्रद्धा से झुक गया. हमारे यहाँ पोस्ट ऑफिस डिजिटल हो गया, लेकिन जो उदाहरण तुमने दिए जिस दिन वो हो जाएगा, यह सेवा फिर से जीवित हो उठेगी. कमाल की पोस्ट लिखी है तुमने. जीते रहो!!

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