अंजुरी भर

भीतर कहीं कुछ ‘झन्न’ से टूट गया...शायद दिल...। जैसे कोई शीशा हो...। हाथ से कोई सिरा छूट कर यथार्थ की ज़मीन से टकराया और अब उसकी नन्हीं-नन्हीं अदृश्य सी किरचें तन के साथ आत्मा तक में चुभ कर उसे लहुलुहान कर रही थी। तड़प कर उसने यादों के तहखाने में छुपने की कोशिश की पर वहाँ तो रोशनी की एक हल्की-सी किरन भी नहीं थी...। सुराखों से आती धूप की पतली-सी लकीर को भी घने अन्धेरे ने अपनी गिरफ़्त में ले रखा था। 

- [ झील में तैरती बत्तखें, अंजुरी भर | प्रेम गुप्ता 'मानी' ]

प्रेम गुप्ता ' मानी ' की किताब अंजुरी भर का कवर

“अँजुरी भर” एक बेहद संवेदनशील कहानियों का संग्रह है जिसे लिखा है ‘प्रेम गुप्ता मानी’ ने. लेखिका मेरी आंटी भी हैं तो स्वाभाविक है मैं उनका नाम लेने की बजाये इस पोस्ट में उन्हें आंटी कह कर ही संबोधित करूँगा. वो मेरी आंटी हैं इसका मतलब ये नहीं कि आप पोस्ट पढ़ने के पहले ही समझ जाएँ कि मैं बायस्ड  होकर किताब के बारे में लिखूंगा..और इस पोस्ट को आप किताब की समीक्षा भी न समझे. समीक्षा करना मुझे आता नहीं. बस जितनी कहानियाँ इस किताब में हैं उन्हें पढ़कर समझने की ये मेरी कोशिश है और हर कहानी  के बारे में मेरी पहली प्रतिक्रिया क्या रही वही इस पोस्ट के जरिये मैं बताने की कोशिश करूँगा. किताब के कहानियों के ज्यादा राज़ नहीं खोलूँगा मैं..कुछ तो मज़ा और उत्सुकता बनी रहनी चाहिए जब आप किताब पढ़ें...सब कुछ इसी पोस्ट में बता दूंगा तो मज़ा ही किरकिरा हो जाएगा.

एनीवे, आपको अपनी बातों में और ज्यादा देर तक मैं घेरे नहीं रहूँगा, वरना बातें लम्बी होती जायेंगी. तो चलिए सीधा रुख करते हैं किताब की ओर.. -

इस किताब की हर कहानी बेहद संवेदनशील है, जो जाने कितना कुछ कहती है. समाज और लोगों को आईना दिखाती है. हर तरह के संघर्ष की कहानी है इस किताब में. जाने कितने घरों का सच भी दिखता है हमें इन कहानियों में. फेयरीटेल, रूमानियत और दिलकश बातों से दूर, ज़िन्दगी की क्रूर सच्चाइयों से नज़दीक मिलेगी इस किताब की कहानियां, जो ज़िन्दगी की उन तल्ख़ हकीकतों से हमें रूबरू करवाती है जिसे हम शायद कभी न कभी अनुभव कर चुके हैं या ना भी किया हो अनुभव तो अपने किसी नजदीकी को, आसपड़ोस में लोगों को देख चुके हैं जो जाने क्या कुछ सहते आये हैं अपनी ज़िन्दगी में. इस किताब की कहानियों के पात्रों के अकेलेपन को हम बेहद अच्छे से महसूस कर सकते हैं....कभी कभी लगता है कि पात्रों के दर्द को हम जानते हैं, वे हमारे अपने दर्द हैं...हम समझ सकते हैं उनके आँसुओं को. उनकी विवशता और तकलीफ हमें अपनी सी लगती हैं..


मैंने किताब की पहली कहानी पढ़ी थी “खुला हुआ आकाश”, जो एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे अपने शहर की गंदगी से नफरत है. उसे हर कुछ से नफरत है. शहर की गंदगी से लेकर मौसम से लेकर सरकार और यहाँ तक कि अपनी पत्नी और बच्चों से भी.. वो अपनी बीवी के फूहड़पन से नफरत करता है. वो चाहता है कि उसकी बीवी सलीके से रहे जबकि वो बिलकुल अस्त-व्यस्त सी रहती है. वहीँ वो अपने दफ्तर में काम करने वाली एक महिला के प्रति काफी आकर्षित है. लेकिन एक दिन जब उसकी बीवी सलीके से सज धज के उसके सामने आती है, तो वो उसपर निहाल हो उठता है और फिर बाद में जब वो अपने उसी फूहड़ रूप में आती है तो उसके प्रति उसका मन खीज से भर उठता है. यह शायद एक आम इंसानी प्रवृति है. शायद इसलिए भी होता है कि कुछ लोग दफ्तर में काम करने वाले खूब सज संवर के आने वाली स्त्रियों के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं, वहीँ अपनी बीवी को वो भाव नहीं देते. बेहद सीधी सादी सी ये कहानी जो हम अक्सर अपने आस पास देखते हैं या फिर हम खुद ऐसा अनुभव कभी न कभी करते ही हैं.

अगली कहानी किताब की जो मैंने पढ़ी उसका शीर्षक है “किस्सा बांके बाबु के जाने का” . जाने क्यों शीर्षक पढ़ कर शुरू में मैं इस उम्मीद में था कहानी कुछ नोस्टालजिक सी होगी और शायद पुरानी यादों के ऊपर लिखी होगी ये कहानी. मेरे इस उम्मीद की वजह एक दूसरी कहानी थी जो मैंने कई साल पहले पढ़ी थी जिसका शीर्षक कुछ इसी तरह का था. हालाँकि मेरी उम्मीद से उलट इस कहानी ने अन्दर तक झकझोर कर रख दिया मुझे. ये कहानी बाँकेबाबु नाम के एक ऐसे व्यक्ति के अंतिम समय की कहानी है जिसकी कोई औलाद नहीं है..उसने एक लड़के को अपना बेटा मान लिया है. भाई बहनों से उनकी कभी बनी नहीं..हमेशा ताव में रहने वाले बाँकेबाबु अपने अंतिम समय में इस कदर विवश थे कि उनके मरने की और जायदाद हड़पने की प्रतीक्षा करने वाले उनके भाई बहनों को वो कुछ कह भी नहीं सकते थे. कहानी की ये चंद लाइन कहानी के साथ साथ शायद हर इंसान की हकीकत बयां करती है – “अन्तिम समय में क्या हर आदमी इसी तरह अवश हो जाता है? अभी वे स्वस्थ होते तो क्या मज़ाल थी कि कोई उनकी किसी चीज को हाथ लगा पाता...” पैसे और जायदाद के लिए लोग किस तरह निर्दयी और जानवर सामान हो जाते हैं, ये कहानी वही बातें हमें सुनाती है.. ये एक सच्चाई है जो जाने कितने बाँकेलाल की हकीकत होगी. चुन्नीलाल जो भाई है बांकेलाल का, वो किस बेदर्दी से मृत्यु शय्या पर पड़े अपने भाई बाँकेलाल के उँगलियों से अँगूठी उतारता है. किस तरह से बाँकेलाल के मरने का बाद उनके शव को रखा जाता है और नरेश जिसे बाँकेलाल अपने बेटे की तरह मानते थे, वो ये सब देखता है और बेबस सा खड़ा रहता है एक कोने में. आखिर किस अधिकार से वो विरोध दर्ज करवाता...और बाँकेलाल के लालची भाई बहन क्या उसके विरोध को स्वीकार करते? इन्हीं सब अजीब रिश्तों की उलझन और लालच के ऊपर है ये कहानी. कहानी का अंत क्या होता है, बाँकेलाल के शव को, नरेश को और क्या क्या झेलना पड़ता है ये सब बातें कहानी खत्म होने के बाद भी आपको हांट करती हैं. नि:संदेह ये कहानी इस किताब की एक सशक्त कहानी है. कहानी का हर एक फ्रेम आपको जकड़ कर रखता है और थोड़ा डराता भी है.

“जंगल” एक ऐसी लड़की की कहानी है जो खुद के ही अँधेरे से लड़ रही है. अपने मन के अँधेरे के साथ साथ वह अपने चारो ओर की मुसीबतों, जिसमें उसके घरवाले भी शामिल हैं, सबसे अकेले लड़ रही है. उसकी दादी जो अब इस दुनिया में नहीं है, उनकी बातें ही उसका सबसे बड़ा सहारा है. वो अक्सर हैरान होती कि जो बातें दूसरे नहीं समझ पाते वो बातें दादी कैसे इतने अच्छे से समझ लेती है. दादी उसे हमेशा कहती “बेटा, किसी को डराने के लिए तो जंगल का बहाना चल जाता है, पर बेटा...किस-किस से डरोगी...? अब तो ये जंगल पूरी दुनिया में फैल गया है...अपने झाड़-झंखाड़ और काँटों के साथ...। जंगली जानवर भी यहाँ-वहाँ पसरे पड़े हैं...। फ़र्क सिर्फ़ इतना ही है कि मानव-खोल में उनका असली चेहरा छिप गया है। अब ये तुम्हारे ऊपर है कि उनके बीच रह कर तुम अपने को कितना सुरक्षित कर सकती हो..." वह लड़की हर पल इस कोशिश में है कि इस जंगल से वो बच सके, लेकिन एक ऐसे समाज में जहाँ हर तरफ जंगल पसरा हुआ है क्या ये संभव है? इस कहानी का अंत स्तब्ध करने वाला और थोड़ा डराने वाला भी. कहानी पढ़ते हुए आप जिस अंत को एक्स्पेक्ट करते हैं वो तो आता नहीं बल्कि इस जंगल रूपी समाज का एक बेहद क्रूर सच और एक गन्दा चेहरा आपके सामने आ जाता है जिससे आपको एकाएक घृणा होने लगती है. ये भी आप सोचने लगते  हैं जाने कितनी लड़कियां इस जंगल में फंसी हुई हैं और हर समय इस जंगल से निकलने की कोशिश करती हैं, क्या वो सफल हो पाती हैं या इसी जंगल में कहीं खो कर रह जाती हैं?

इस किताब की शीर्षक कहानी “अंजुरी भर” एक रिटायर व्यक्ति की कहानी है. यह रामदास की कहानी है जिसकी ज़िन्दगी एक समय सुख से कट रही थी और फिर बीवी के मरनें के बाद और उनके रिटायर होने के बाद वही सुखमय ज़िन्दगी अब नरक समान बन गयी है. रामदास रिटायर होने के बाद घर में अपनी बेटे बहुओं और पोतों के साथ रहता है. पहले की जो ठाट बाट थी उनकी, वो अब नहीं रही. रिटायर होने के बाद वही बेटे, बहुएं और पोते जो उनके आसपास मंडराते रहते थे और उनका खूब ख्याल रखते थे अब उन्हें बिलकुल नज़रंदाज़ कर एक कोने में पड़े रहने देते हैं...जो बहुएं कभी उनके हर छोटी से छोटी जरूरतों का ख्याल रखती थी वो अब उनके दर्द पर झाँकना तो दूर, और खरी खोटी सुना कर चल देती हैं. बद से बद्दतर ज़िन्दगी बन गयी थी उनकी. यह कहानी शायद बड़ी आम सी कहानी है जो न जाने कितने घरों की हकीकत है, कितने रामदास हैं जो ऐसी परस्थिति से आज भीं गुज़रते हैं. लेकिन इस कहानी में रामदास का दर्द जब असहनीय हो जाता है और हर तरफ से वो निराश और पस्त हो जाते हैं कि तभी अचानक से एक आशा की किरण बन कर उनके ज़िन्दगी में पूनम आती है. ये पूनम कौन है? और क्या होता है उसके आने के बाद? कहानी में इसी सवाल का जवाब आपको  मिलेगा. रामदास को यहाँ तो एक नयी आस मिलती है ज़िन्दगी में, लेकिन हमारे आसपास हमनें और आपने कितने ही ऐसे रामदास देखे हैं जिसे अंत तक कोई सहारा नहीं मिलता और वे अपने इसी दर्द, तकलीफ और अपनों की बेरुखी से घिर कर दुनिय से चले जाते हैं.

“अंजुरी भर” के अलावा “झील में तैरती बत्तखें” भी एक ऐसी कहानी है जिसे आप सुखान्त कह सकते हैं. ये ‘राजी’ की कहानी है जो अपने पति के गुजरने के बाद एक मकान में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहती है. कहने को तो उसके दो बेटे भी हैं लेकिन वो उनसे अलग रहती है. उसके रिश्ते उसके बेटों के साथ अच्छे नहीं हैं. अपने बेटों के साथ उसके रिश्ते में कैसी तल्खियत है और क्यों है ये तल्खियत, इसका जवाब तो आपको कहानी में ही मिलेगा. हाँ, एक दोस्त भी है राजी का, जो उसके निर्दयी पति के गुजरने के बाद उसकी ज़िन्दगी में किसी ताजे हवा की झोंके की तरह आया. समाज हालाँकि उन दोनों की नजदीकियों को बेहद गंदे नज़रों से देखता है..समाज वैसे भी काफी चीज़ों को गंदगी भरे नज़रों से ही देखता है. रमाकांत जो उसका दोस्त है, वो उसे समझाता है - “जानती हो, इस छोटी झील के जैसे ही एक और बड़ी सी झील और है...जिसे हम दुनिया कहते हैं...। हम सब इसी झील में तैरने वाली बत्तखें हैं। लोगों द्वारा आरोपों-आक्षेपों का कंकड़ फेंकने के बावजूद हमें रुकने की कोई ज़रूरत नहीं...बिल्कुल इन बत्तखों की तरह...। देखोऽऽऽ...ये कैसे बस पल भर ठहर कर फिर आगे बढ़ गई...बग़ैर कुछ परवाह किए...।" इन्हीं उलझे रिश्तों की और उसे सुलझाने की कहानी है “झील में तैरती बत्तखें..” इस कहानी के अंत को आप सुखान्त कह सकते हैं, वैसे अंत इस कहानी का कोई अंत नहीं बल्कि एक नयी शुरुआत है राजी के लिए.. 

अगली कहानी “कब्रिस्तान”, कान्तिलाल की कहानी है जो एक दिन स्कूटर खराब होने की वजह से ऑफिस बस से जाने को मजबूर होता है. बस में उसके साथ झकझोर देने वाली एक घटना होती है जिससे उसके सोचने समझने का पूरा नजरिया ही बदल जाता है. उस एक घटना की वजह से बहुत उथल पुथल उसके मन में होने लगती है. एक सवाल उसे रह रह कर कचोटने लगती है कि क्या सच में हमारे सामाज में लोग बिलकुल संवेदनहीन हो गए हैं? उसकी बेटी जो शहर में हो रहे दंगों के वजह से कोचिंग से सही वक़्त पर घर नहीं पहुचती वो उसकी खोज में निकल पड़ते हैं, और खुद को बेहद बेबस महसूस करते हैं इन सब हालात के सामने. रास्ते भर उनको उनकी बेटी की चिंता सताती है और बेहद बुरे बुरे ख्याल मन में आते हैं. अपने बेटी को खोजने निकले कान्तिलाल रास्ते में अपने इस शहर की तुलना कब्रिस्तान से करने लगते हैं. वो सोचते हैं कि एक दिन ये पूरा शहर एक कब्रिस्तान में तब्दील हो जाएगा. “इस क़ब्रिस्तान के आसपास कुछ भी घटित हो...कितने भी लोग गुज़रें...या एक्सीडेण्ट में गुज़र जाएँ...वाहनों का कितना भी शोर हो...दंगे भड़क जाएँ...पर यह क़ब्रिस्तान ऐसे ही शान्त रहेगा...। मुर्दों को दूसरों से क्या लेना-देना...? वे तो अपनी-अपनी क़ब्रों में चैन की नींद सो रहे हैं...। एक ऐसी नींद जो ज़िन्दगी की सारी मुसीबतों से मुक्त करके सकून देती है...।  बहुत सारे सवाल ये कहानी खड़ा करती है आपके सामने. वे सवाल क्या हैं और आखिर क्या हुआ था बस में ऐसा कान्तिलाल के साथ जिससे उनकी सोच इस कदर बदल गयी, उनकी बेटी कहाँ फंसी रह गयी और क्या हुआ उनकी बेटी के साथ...ये सारे रहस्यों से भरे सवालों का जवाब कहानी में ढूँढिये और सोचिये क्या हमारा शहर सच में एक कब्रिस्तान में तब्दील होते जा रहा है?


“खाई” एक ऐसी औरत की कहानी है जो अपने एक सपने की वजह से बेहद डरी हुई है. वो डरावना सपना जिसमें वो किसी सुनसान सी पहाड़ी पर अकेले खड़ी है और नीचे उतरने का रास्ता नहीं तलाश पा रही, खाई में गिरने का डर उसे बेतरह बेचैन किये हुए है. वो अपना यह डर साझा करना चाहती है ताकि उसका मन हल्का हो सके, लेकिन किससे साझा करे वो यह डर? अपने पति से, अपने बेटे से या अपनी बहु से? लेकिन क्या वे सारे उनके अपने हैं? आखिर क्यों वो एक भरे पुरे घर में भी असहाय और अकेलापन सा महसूस करती है..? आखिर वो क्यों ऐसा सोचती है कि उस भयानक सपने में तो धक्का देने वाला सिर्फ़ एक ही हाथ था, पर यहाँ तो कई हाथ हैं क्या है बेचैनी उस औरत की, और क्या सच में अधिकतर औरत इसी तरह से अपने अकेलेपन और और मन की बेचैनियों में घिरी निःसहाय सी होती हैं? “खाई” जाने और क्या क्या सवाल पूछती है हमसे.


किताब की आखिरी कहानी अक्शीरा है. यह कहानी हिन्दू और मुस्लिम दंगे पर आधारित है. ये इस किताब की सबसे सशक्त कहानी है. लोगों को ये बात भी बता दूँ, कि इस किताब का नाम भी पहले “अक्शीरा” सोचा गया था जिसे बाद में कुछ कारणों से “अंजुरी भर” कर दिया गया. एक दंगा किसी के लिए कितना भयावह  हो सकता है कि वो उसके पूरे वजूद को ही बदल दे और उसके विश्वास को बिलकुल नेस्तानाबुत  कर रख देता है. दंगे में अपने परिवार को तबाह होते देख ‘अरशद’ कब वहशी हो जाता है वो ये जान भी नहीं पाता. अरशद चाहता है वो उन सब दंगाईयों से बदला ले जिन्होंने उसके पूरे परिवार को तबाह किया. आस पड़ोस के कितने लोगों से उसे और उसके परिवार को आशा थी कि वो उसे दंगों में मदद करेंगे..लेकिन क्या उनकी वो उम्मीद पर खरे  उतरे? क्या सच में अरशद इस भयानक दंगे का शिकार होकर पूरी तरह वहशी बन जाता है या अभी भी इतना कुछ सहने के बावजूद इंसानियत बाकी है उसमें? दंगो के बहुत से पहलु ये कहानी उठाती है. दंगों का दर्द और लोगों की कराहट आपको एक टीस सी देकर जाती है..लेकिन कहानी एक पॉजिटिव नोट पर खत्म होती है जो भरोसा दिलाती है हमें कि शायद अब भी बहुत कुछ बचा हुआ इंसानियत के रूप में लोगों में..

ये सभी कहानियाँ कितना कुछ कहती हैं हमसे, समाज को उसका ही एक गन्दा चेहरा भी दिखलाती हैं. सभी कहानियां आपके साथ लम्बे समय तक रहती हैं और कुछ कहानियां तो आपको हांट भी करती हैं. ये एक बेहतरीन कहानियों का संग्रह है. वैसे आंटी की किताब के ऊपर मैं किसी भी तरह की टिप्पणी  करूँ, मैं इसके लिए खुद को काबिल नहीं मानता. हाँ, लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि ये सभी कहानियां ख़ास हैं. मैं अपनी बात करूँ तो मुझे इस किताब की वैसे तो हर कहानियां बहुत अच्छी लगी लेकिन "किस्सा बाँकेबाबु के जाने का", "अक्शीरा" और "झील में तैरती बत्तखें" मेरी सबसे प्रिय कहानियां हैं. 

और हाँ, अंत में जाते जाते एक बात और कह दूँ, इस किताब के ऊपर लिखी गयी ये शायद पहली पोस्ट( या आर्टिकल कह लें या समीक्षा कह ले) है. और इसके लिए मुझे आंटी ने डंडे का डर नहीं दिखाया - कि लिखो तुम मेरी किताब की समीक्षा.बल्कि किताब पढ़ने के बाद मैंने खुद से ये पोस्ट लिखी है. देर हो गयी बहुत ये मानता हूँ, लेकिन वो कहावत है न - देर आये दुरुस्त आये..बस वही !
और हाँ, आंटी चाहे तो इस पोस्ट के बदले मुझे एक फाइवस्टार इनाम के रूप में दे सकती हैं. :) 

फ़िलहाल तो आप इस किताब को अपने अलमारी से निकालिए और पढ़िए. और यदि आपने अभी तक किताब नहीं खरीदा है (क्या सच में? ) तो जल्दी से नीचे दिए गए दोनों लिंक में से किसी एक पर जाकर किताब बुक करवाइए और पढ़िए और पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया बताइये....






P.S : इस साल के शुरुआत में और भी कई किताबें मैंने खरीदी हैं जो बेहतरीन हैं. उनके बारे में भी लिखना है, लेकिन धीरे धीरे. सभी किताबों के बारे में यहाँ बातें करूँगा. तब तक के लिए...Stay Tuned ! :) 

Comments

  1. गज़ब भैय्यू...!!! तुम कैसे कह सकते हो कि तुमको समीक्षा करना नहीं आता :/
    अब ये बताओ, मेरे लिखने के लिए कुछ छोड़े भी हो 😎
    और रही फाइव स्टार की बात, तो वो हम लेकर खा पी कर तुमको उसका रेपर दिखा देंगे, उतने से संतोष कर लेना...:D बाकी बातें फिर कभी :)

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया