शीशे पर जमी धूल और बदलता चेहरा


दो दिन पहले की एक घटना के बाद बिहार के बारे में काफी कुछ पढ़ने के बाद खुद भी कुछ लिखने की इच्छा हुई. हालांकि बहुत सी बातें हैं जो इस पोस्ट में मैं कवर नहीं कर पाऊंगा और बहुत कुछ फिर भी कहना बाकी रहेगा. लेकिन फिर भी इसे आप मेरी इंस्टेंट प्रतिक्रिया कह सकते हैं.

सबसे बड़ा सवाल आता है कि बिहार की ऐसी ख़राब छवि क्यों है? क्या सच में इतना भयानक है बिहार कि यहाँ आने से लोग डरे? क्या यहाँ सिर्फ लॉ-ब्रेकर्स ही भरे पड़े हैं? क्या सिर्फ पूरा जंगलराज है बिहार में? नहीं.. ऐसा कुछ नहीं. बिहार के बारे में कुछ निगेटिव बातें पढ़कर, कुछ लोगों की गलत हरकतें देखकर पूरे बिहार के लिए ये राय बना लेना कि बिहार का मतलब सिर्फ अपराध और जंगलराज है, उतना ही गलत है जितना `स्लमडॉग मिलानिअर’ देखकर बाहरी मुल्कों के कुछ लोगों का भारत के प्रति ये राय बनाना कि भारत में सिर्फ स्लम एरिया हैं. असल में बिहार उतना भी ख़राब या भयानक नहीं है जिस तरह की छवि उसकी बनाई गयी है. जिस तरह से किसी प्रदेश के किसी शहर में होती अपराध की घटनाओं से वो पूरा प्रदेश अपराधी नहीं हो जाता ठीक वैसे ही बिहार के लिए कह सकते हैं न. हमारे प्रदेश में भी कुछ अपराधी और गलत लोग हैं लेकिन यकीन मानिए उनसे कहीं ज्यादा तादाद में अच्छे लोग भरे पड़े हैं. लेकिन अच्छे लोगों की अच्छाई के परवाह किसे है? मीडिया भी कहाँ अच्छाई दिखाती है? बुराई जो कहीं भी हो उसे तो बहुत तवज्जो देकर दिखा देती है और अच्छाई दबी रहती है. बिहार के बारे में भी जाने कितने ऐसे भ्रम हैं लोगों में.

एक सबसे बड़ी वजह है जिससे लोग बिहार को भयानक बताते हैं, वो है यहाँ पर अपराध की घटनाएं. सबसे पहले यहाँ पर एक बात मैं क्लियर कर दूँ, कि बिहार सभी राज्यों में क्राइम रेट के मामले में चौबीसवें स्थान पर हैं. इसे यहाँ देखें. हाँ मैं मानता हूँ, बेशक यहाँ पर अपराध एक सबसे बड़ी चिंता की वजह है लेकिन क्या ये सिर्फ बिहार की समस्या है? बाकी सारे प्रदेश क्या पूरी तरह से शान्तिप्रिय हैं? सच तो ये है कि जितने क्रूर और जघन्य अपराधिक घटनाएँ  दूसरे प्रदेशों में होती रही हैं उतना शायद बिहार में कभी नहीं हुआ है. कुछ साल पहले तक बिहार में सही मायने में अपराध की घटनाएं बहुत ज्यादा थीं लेकिन इन पंद्रह बीस सालों में बहुत बदलाव आया है. लेकिन अब भी बहुत से लोग समझते हैं कि बिहार में वही बातें होती हैं. मीडिया के साथ साथ इस दुष्प्रचार में  बिहार के लोग भी शामिल हैं जो पंद्रह बीस साल पहले बिहार छोड़ कर दूसरी  जगह रहने चले गए हैं और मुड़ के देखा भी नहीं है बिहार की तरफ, लेकिन सोचते यही हैं आज भी कि बिहार में अब तक सिर्फ जंगलराज है. अरे सालों पहले तो हमारे भारत को भी जाने क्या क्या कहा जाता था..”लैंड ऑफ़ स्नेक चार्मर्स और न जाने क्या क्या. लेकिन बदलाव आया या नहीं आया? वैसे ही बिहार में भी  धीरे धीरे बदलाव आ रहा है और हालात तो पिछले कई सालों में काफी सुधर गए हैं. लेकिन लोग अभी भी वही पुराना बिहार  देखते हैं, कुछ कुछ ठीक वैसे ही जैसे `नमस्ते लन्दन’ फिल्म में उस  अँगरेज़ के जेहन में वही पहले वाला भारत था.

मीडिया या किसी फिल्म में दिखाए जाने वाले अपराध सिक्के का सिर्फ एक पहलू है, जो हर जगह पर लागू होता है. पर अगर पूरी और सच्ची तस्वीर देखनी है तो सिक्के के दोनों पहलू देखे जाने बेहद ज़रूरी हैं. कभी कभी मुझे लगता है बिहार के मामले में `बद अच्छा, बदनाम बुरा’ की कहावत बिलकुल सटीक बैठती है. हम खुद पर मज़ाक बहुत अच्छे से लेते हैं, और शायद यही वजह है कि अपने इस `सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ के चलते हम खुद की कमियों पर सबके साथ हँसते हुए अपनी अच्छाइयों को जताना-दिखाना भूल जाते हैं. हम बिहार के पिछड़ेपन की बात करने वालों को कभी ये नहीं बता पाते कि बिहार में भी कितना कुछ नया हो रहा है या हो चुका है.

लोगों में एक और भय होता है कि बिहार में ट्रेन से यात्रा करना “सेफ” नहीं है. सही में समझ नहीं आता ऐसा क्यों है आखिर? हो सकता है लोगों को ये लगता हो कि बिहार में ट्रेन पर सफ़र करते समय कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है कभी भी. लोग जबरदस्ती रिजर्व्ड बोगी में घुस कर आपकी  सीट आपसे हथिया लेंगे और आपको डब्बे के बाहर फेंक देंगे. करीब पिछले पंद्रह सालों से मैं ट्रेन पर सफ़र कर रहा हूँ लेकिन कभी इस तरह की बातें ना ही तो मेरे मन में आई और नाहीं मुझे दिखाई दी हैं. बहुत पहले अगर कभी होता रहा होगा ऐसा तो उसकी जानकारी मुझे नहीं है. वैसे शुरू शुरू में मुझे याद है, मुझे घर वालों से और जान पहचान के लोगों से ये हिदायत उत्तर प्रदेश के लिए मिलती थी, कि रात में सोना तो खिड़की बंद कर के सोना.. हाथ में घड़ी पहन कर मत सोना. खासकर पटना-सिकंदराबाद ट्रेन में मिलती थी ये हिदायत..कि बक्सर से लेकर कटनी तक सावधान रहना. मैं भी शुरू में एक दो बार इन बातों का ध्यान रखता था फिर बाद में खुद ही लगने लगा ये क्या बेवकूफी है? हम थोड़े कोई डाकुओं के इलाकों के बीच से गुज़र रहे हैं.

कुछ लोगों को ये भी अखरता है कि जब बिहार से ट्रेन गुज़रती है तो यहाँ ट्रेन के डब्बों में लोकल पैसेंजर घुस जाते हैं. लेकिन इनमें से भी कोई लड़ाई-झगड़ा करने वाला व्यक्ति नहीं होता है. सभी ऑफिस जाने वाले कामकाजी व्यक्ति होते हैं जो डेली ट्रेन के माध्यम से ही ऑफिस आते जाते हैं. बिहार में लोकल ट्रेन लगभग नहीं होने की वजह से और ऑफिस समय पर पहुचने की जल्दबाजी की वजह से लोग ऐसा करते हैं, लेकिन ये भी आपसे मार पीट नहीं करते. ना ही आपकी सीट छीन कर वहाँ खुद बैठ जाते हैं. अक्सर बिहार जाते समय बक्सर से डेली पैसेंजर ट्रेन पर चढ़ना शुरू कर देते हैं. पर्सनली मैं अपनी बात करूँ तो मुझे आज तक कभी कोई दिक्कत नज़र नहीं आई इसमें. बल्कि अगर मैं सीट पर पैर पसार कर लेटा भी रहता हूँ और सामने से कोई डेली पैसंजर इधर उधर सीट खोजता नज़र आता है तो अपने पैर समेट लेता हूँ ताकि वो बैठ सके. ये मैं इसलिए नहीं करता कि मैं भी बिहार का हूँ और ये चढ़ने वाले भी वहीँ के, या मैं डरता हूँ, बल्कि इसलिए ऐसा करता हूँ कि मुझे भी लोगों ने पहले मदद की है सीट देकर. वैसे देखा जाए तो अक्सर तो ये डेली पैसेंजर जो बेहद पढ़े लिखे और अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं और काम के सिलसिले में जो हर रोज़ ट्रेन में सफ़र करते हैं उन्हें बाहरी प्रदेश के लोग किस तरह से ट्रेन में ट्रीट करते हैं, इसपर कोई शिकायत नहीं करता. खुद वे डेली पैसेंजर्स  भी नहीं शिकायत करते जिनके साथ बदसुलूकी होती है. यकीन मानिए आप जितना उदाहरण दे पाएंगे बिहार के लोगों के बदसुलूकी की, उससे ज्यादा मैं उदहारण दे सकता हूँ कि ट्रेन पर सो-काल्ड अनुशासित लोगों का क्या व्यवहार होता है. लेकिन क्या जरूरत है एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की? हाँ बहुत बार परीक्षार्थी हँगामा भी कर देते हैं, और कभी कभी एक्जाम के सीजन में स्टूडेंट्स बोगी में घुस कर जबरदस्ती सीट पर बैठ भी जाते हैं, लेकिन क्या ऐसा सिर्फ यहीं के परीक्षार्थी करते हैं? अगर आप ऐसा सोचते हैं तो बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है आपकी. एक बार बैंगलोर से मुम्बई जाने के क्रम में मैंने पूरी रात सीट पर बैठ कर बिताई थी, जबकि रिजर्व्ड सीट थी मेरी. ये महज एक उधाहरण है. आपको और चाहिए?

हाँ मुझे भी बहुत परेशानी भी हुई है खुद अपने ही प्रदेश के लोगों से, लेकिन अक्सर मदद भी मिली है. लेकिन मैं उन परेशानियों को क्यों याद रखूं? अच्छे लोगों ने जो मदद दी उन्हें क्यों नहीं याद करूँ? और मदद भी ऐसी वैसी नहीं. मुझे और मेरी बहन को हैदराबाद से हावड़ा जाना था. हमारे पास तत्काल का वेटिंग टिकट था जो कि अंतिम समय तक कन्फर्म नहीं हुआ था. जाना जरूरी था तो हम चढ़ गए ट्रेन पर. बैठते कहाँ लेकिन? इधर उधर जगह देख ही रहे थे कि कहाँ कुछ देर बैठा जाए, पूरा सफ़र तो फिर जागते हुए ही पूरा करना है, कि तभी सामने बैठे तीन लड़के जो बिहार के थे और देखने से आवारा किस्म के लग रहे थे, मुझसे पूछ बैठे..कौन सा नंबर बर्थ है आपका? मैंने हिचकते हुए कहा वेटिंग में है कन्फर्म नहीं है. उनमें से एक ने कहा तो बैठ जाइए न इधर ही. वहां आसपास के दूसरे सहयात्री जो थे, उन्होंने इस पर ऐतराज़ भी किया..लेकिन वे तीनों अड़े रहे हमारे लिए कि वेटिंग में टिकट है, थोड़ा मदद कर दीजिये. उन तीनों के तीन बर्थ नहीं थे बल्कि दो बर्थ थे और उन तीनों ने अपना एक बर्थ हमें दे दिया था, और बोले आप दोनों इस बर्थ पर आराम से सो जाइए . हमें सुलाकर वे तीनों एक बर्थ पर पूरी रात जाग कर बातें करते आये. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं मेरे पास, जैसे एक और कि जब हम पढाई करते थे और लगभग सभी दोस्तों का वेटिंग टिकट था, तब पूरे एक डब्बे के यात्रियों ने ना सिर्फ हमारे सामान का ख्याल रखा बल्कि जगह भी दी बैठने और सोने के लिए.

बहुत ज्यादा ट्रेन यात्राएं की हैं मैंने, बहुत से लोग तो ऐसे भी मिले हैं जो अपने सीट पर से टस से मस नहीं होते. ज़रा सा उनके सीट पर बैठ कर तो देखिये, ऐसा लगता है जैसे कितना बड़ा खजाना उनका लुट गया हो. ऐसी शक्ल बनाते हैं जैसे आपने उनके सीट पर बैठकर कितना बड़ा अपराध कर दिया हो. एक ख़ास राज्य है जहाँ के प्रति मुझे शुरू में ये लगता था कि लोग बहुत ज्यादा सेल्फिश और हद दर्जे के बदतमीज़ होते हैं इस मामलें में और सच में सिर्फ इस एक वजह से मैं उस पूरे राज्य से बहुत नफरत करने लगा था. दो इतने बुरे अनुभव मिले हैं मुझे, ऐसा सुलूक कि आज तक नहीं भूल पाता. और उनमें से एक बार तो मुझे और मेरे दोस्त सुदीप को उसी राज्य के लोगों की वजह से रात भर टॉयलेट के पास चादर बिछा के बैठ के आना पड़ा था. फिर बाद में जब सफ़र के दौरान कुछ अच्छे लोगों के अनुभव मिले तो बात समझ आई, कि हो सकता है ऐसा इत्तेफाक रहा हो मेरा कि जब भी सफ़र किया है अधिकतर उस राज्य के वैसे ख़राब यात्रियों से पाला पड़ा है. इसका मतलब ये तो नहीं कि पूरा राज्य ही वैसा है.

छोटी सी बात है, कभी अगर मेरी बात होगी किसी से, तो मैं अपने अनुभव में वो बुरे अनुभव को शामिल क्यों करूँगा? मैं तो अपने अच्छे अनुभव ही शेयर करूँगा लोगों से. हाँ, बुरे अनुभव की बातें बाद में भी होती रह सकती हैं लेकिन वो भी पोजिटिव तरीके में.. सिर्फ ये नहीं कि फलां जगह सिर्फ बुराइयां ही हैं. जाने क्यों लोग आज भी ज्यादा जोर देकर बुरे अनुभव शेयर करते हैं. क्या सच में जो बिहार में रहे हैं या कुछ दिनों के लिए थे यहाँ उन्हें सिर्फ बुरे अनुभव ही हुए हैं? कभी कोई अच्छा अनुभव नहीं हुआ? एक छोटी सी बात बताता हूँ.  जब शुरू शुरू में मैं  दिल्ली आया था, मुझे दिल्ली बिलकुल पसंद नहीं था. बैंगलोर से दिल्ली जब मुझे आना था, तो मेरे दो तीन बैंगलोर के दोस्तों ने मुझे ताकीद किया था, अरे दिल्ली जा रहे हो यार, बड़े “कमीने” किस्म के लोग रहते हैं दिल्ली में. बिलकुल यही  शब्द इस्तेमाल किया था उस लड़के ने जिसकी वजह से उस दिन मेरी बहुत बड़ी बहस हो गयी थी उससे. वो कभी दिल्ली आया नहीं तो सिर्फ सुनी सुनाई बातों पर ऐसे कैसे बोल सकता है दिल्लीवासियों के लिए? हाँ दिल्ली आने के बाद मुझे भी यहाँ के लोगों से  बहुत दिक्कतें हुई  थीं, बहुत शिकायतें भी मैं करता था शुरू में लेकिन बाद में रहते रहते यहाँ की अच्छाइयाँ भी दिखने लगीं और यहाँ ऐसे लोग भी मिलने लगे जिनका व्यवहार मेरे प्रति बहुत ज्यादा अच्छा रहा. मदद भी मिली उनसे. तो अब कभी अगर कोई बाहरवाला यहाँ आकर मुझसे दिल्ली की बातें करेगा , तो मैं उसे दिल्ली के बारे में बताने के क्रम में यहाँ की बुराइयाँ क्यों गिनाऊंगा?(जबकि दुनिया की हर जगह की तरह यहाँ भी लाखो बुराइयां हैं) बल्कि उसे यहाँ की अच्छी बातें बताऊंगा. यहाँ जो भी मुझे बुरे लोग मिले हैं उनकी बातें ही क्यों करूँगा मैं? यहाँ जो अच्छे लोग मुझे मिले हैं उनकी बातें सब से कहूँगा. अच्छाई और बुराई हर जगह, हर शहर, हर देश में होती हैं. हम उस निगेटिविटी में जाएँ ही क्यों कि सिर्फ बुराइयां ही हाईलाइट करें हम और अछाइयाँ छोड़ दें? जब आप देश से बाहर जाते हैं तो क्या जोर  देकर देश की बुराइयाँ गिनाते हैं, या यहाँ की जो अच्छाइयाँ हैं, वो गिनाते हैं?

मैं ये नहीं कहता कि मेरा बिहार सबसे अच्छा है, बहुत सी कमियां हैं हमारे प्रदेश में लेकिन कमियां कहाँ नहीं होती? लेकिन सिर्फ कमियों को ही क्यों उजागर करना? आज बिहार की एक ख़राब प्रदेश की जो ये छवि है , सच मानिए तो इसमें चार तरह के लोगों का बहुत हाथ है. पहला तो वे राजनेता जो अपनी घटिया राजनीति से बाज नहीं आते, दूसरा वो मीडिया जो पाजिटिविटी  के बजाये अक्सर निगेटिविटी  पर जोर देता है, तीसरा वे बिहारी जिनकी हरकतों से बिहार बदनाम होता है और चौथा वे बिहारी जो बिहार के तो हैं लेकिन बिहार के सन्दर्भ में हमेशा बुरी बातें ही करते हैं. उनके मुँह  से आप हमेशा शिकायत सुनेंगे यहाँ के प्रति. शिकायत तो फिर भी ठीक है, हमेशा तरह तरह की अफवाहें फैलाते भी रहते हैं यहीं के लोग. अपनी बात स्पष्ट करने के लिए एक छोटा सा उदाहरण  देता हूँ -इंजीनियरिंग के दिनों में जहाँ रहता था वहां शिल्पा सीडी स्टोर के नाम से एक दुकान थी . दो भाई चलाते थे दुकान. उन दोनों ने एक दिन यूँ हीं मुझसे पूछा “अच्छा भैया, आपके घर में कितनी  बन्दूकें रखते हैं आप लोग?” मैं एकदम हतप्रभ रह गया. ये कैसा सवाल था? मैंने कहा..आप ये क्या पूछ  रहे हैं भैया? उन्होंने कहा…हाँ बिहार में  तो लोग रखते हैं न बन्दूक घर में? मैंने थोड़ा तीखा जवाब दिया “बन्दूक घर में क्यों रखेंगे लोग? हम क्या डाकुओं से घिरे रहते हैं हमेशा? ये कहा किसने आपसे?”. उनका जवाब था, कि “मुझे आपके वे दोनों दोस्त (मेरे दो मित्र जिनका नाम मैं पब्लिक नहीं करना चाहता) बता रहे थे जब उनसे मैंने पूछा.. कहने लगे हाँ…हमारे घर में तो खूब बंदूकें हैं, सबके घर में रहना जरूरी है”. मैंने उसे आशवस्त किया कि ऐसा कुछ भी नहीं है, वे दोनों सिर्फ मजाक कर रहे थे. लेकिन बाद में मैं सोचने लगा क्या इमेज बना दी है इन दोनों ने बिहार के प्रति इस आदमी के मन  में. एक और बेहद अच्छे मित्र थे मेरे जो बिहार के ही थे लेकिन बचपन से बैंगलोर में ही रह रहे थे. उन्होंने मुझसे एक दिन पूछा था…अच्छा अब पटना के रोड कैसे हैं? अब तो दिक्कत नहीं होती न अब तो सड़कें भी बन गयी हैं? मेरा जवाब था…”अब कैसे हैं मतलब? ख़राब कब थे? पिछले पंद्रह सालों में एक बार भी गए हैं पटना आप? वहां जाकर देखिये फिर बातें कीजिये पटना के बारे में.

हम बिहारी बेहद मेहनती और ईमानदार लोग हैं. फिर चाहे वो दिल्ली और पंजाब में रिक्शा चलाने वाला या सब्जी बेचने वाला हो या फिर बैंगलोर में बैठा कोई सॉफ्टवेर इंजिनियर या फिर कोई आईएएस… हम चोरी चकारी कर के पेट नहीं भरते बल्कि मेहनत करते हैं, जहाँ भी जिस पोजीशन पर रहे. आप इस सोच से भी बाहर आईये कि बिहार सिर्फ गुंडे मवालियों का प्रदेश है..साहब हमारे यहाँ एंटी-सोशल एलिमेंट्स हैं ठीक वैसे ही जैसे विश्व के दूसरे जगह होते हैं, प्लीज इस बात के लिए हमें स्टीरियोटाइप मत कीजिये बल्कि इस बात को अब मान भी लीजिये कि बिहार एक तरह से भारत का टैलेंट कैपिटल है. शायद सबसे ज्यादा संख्या में IAS. IIT, IIM में बिहार के छात्र रहते हैं. बड़े कंपनियों में भी बड़े पोजीशन पर अक्सर बिहारियों को आप पाएंगे. ये किसी से छुपा नहीं है कि बिहार के लोग बहुत मेहनती होते हैं. कुछ एंटी-बिहारी को छोड़ कर, आप कर्णाटक या उधर के क्षेत्रों में पूछ कर देखिये बिहार के बारे में, लोगों की राय होती है कि बिहारी एक इंटेलिजेंट कम्युनिटी है. हम किसी भी माहौल में ढल जाते हैं. नए जगह जाकर वहाँ की बुराइयां नहीं करते. वापस घर आते हैं तो उस जगह की अनगिनत अच्छी बातें हम अपने परिवार वालों से, दोस्तों से करते हैं. हाँ, रोज़गार के सिलसिले में पढ़े लिखे से लेकर गाँव देहात में रहने वाले लोग पलायन कर के दूसरे शहरों में रहने आते हैं. लेकिन क्या ये स्थिति पहले भारत की नहीं थी? जाने कितने लोग पलायन कर के भारत के बाहर काम के सिलसिले में गए थे. फिर देश की हालत सुधरी या नहीं? ठीक वैसे ही अब बिहार में भी रोज़गार के अवसर मिल रहे हैं. वहाँ के लोग वहीँ रह कर अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं. धीरे धीरे ही सही अच्छा बदलाव आ तो रहा है. लेकिन आज के संचार क्रान्ति के युग में भी लोग बिहार की  इस बदलती छवि से अनजान हैं, या ये कहें वो जानना ही नहीं चाहते बिहार के इस बदलते रूप के बारे में

हम बिहारी बेहद मिलनसार और आत्मीय होते हैं. हम रिश्ते बनाना जानते हैं. शायद पूरी दुनिया में बिहारी लोग ही आपको ऐसे मिलेंगे जो कुछ दिनों के…और कई बार एक-दो बार के ही किसी आत्मीय से व्यवहार को एक रिश्ते की डोर में पूरी सहजता से बाँध लेंगे. हमें कोई हमसे बड़ा या छोटा दीखता है तो हमें उन्हें “जी” कहकर बुलाना अजीब लगता है. हम इसके बजाये उन्हें रिश्तों (दीदी, भैया, चाचा, चाची) में बाँध लेते हैं और हम सिर्फ़ रिश्तों की ऐसी डोर बाँधते ही नहीं है, बल्कि खुद को उसमे लपेट भी लेते हैं…कुछ इस तरह कि एक-दो हल्के-फुल्के झटकों से ये बँधन टूटने की बात तो छोडिये, ढीले भी नहीं होते. हमारे यहाँ रिश्तों में फोर्मलिटी नहीं होती, बेहद सिम्पल और सहज रिश्ते होते हैं. हमारे यहाँ दोस्तों को भी परिवार का दर्जा मिलता है. कॉलोनी में लोग आज भी एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल होते हैं. एक परिवार के तरह रहते हैं आज भी. मेरे घर के आसपास रहने वाले लोग पड़ोसी कम और परिवार ज्यादा लगते हैं. लोग अक्सर बिहारियों का मजाक उड़ाते हैं कि हममें तमीज नहीं होती. बहुत लोग ये सोचते हैं कि बिहारी सिर्फ गाली देकर बात करते हैं. तो उन्हें ये बताना चाहूँगा, नहीं साहब, हमनें कभी कोई गाली इन्वेंट नहीं की है. हैं लोग जो गुस्से में गाली देकर बात करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे दूसरे शहरों में. हाँ ये गलत है लेकिन सिर्फ बिहार के लोगों के प्रति ऐसा पक्षपात की सोच क्यों राखी जाती है? ऐसी सोच रखने वाले लोगों को ये भी बताना चाहूँगा, आज भी हमारे तरफ हम बड़ों के नमस्ते का जवाब उनके पावँ छू कर देते हैं. इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाला व्यक्ति रिश्तेदार है या कोई पड़ोसी या पापा के ऑफिस में काम करने वाला कोई साथी, बड़े बुजुर्ग के हम पावँ छूते हैं. इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि आप कहाँ हैं, भीड़-भाड़ वाली जगह में भी हम पाँव छूने में कभी शर्म महसूस नहीं करते बल्कि फख्र महसूस होता है कि हम ऐसा करते हैं.

लोग अक्सर बिहारियों की भाषा पर भी हँसते हैं, मजाक भी बनाते हैं. लेकिन सबकी अपनी अपनी अक्सेन्ट हैं..तमिल, पंजाबी और मलयाली..लेकिन फिर भी मजाक सिर्फ बिहारी भाषा का ही क्यों बनाया जाता है? जितनी कॉमेडी बिहार के भाषा की की जाती है, उतनी किसी और भाषा की नहीं होती. लोग ये नहीं समझते ये अक्सेन्ट एक प्रदेश का प्रतीनिथित्व करती है. हाँ, हमारा अक्सेन्ट थोड़ा अलग जरूर है लेकिन बुरा नहीं. हर किसी का अपना अक्सेन्ट अलग होता है, फिर चाहे वो मद्रासी हो, बंगाली या गुजराती.. कोई भी हिंदी बोले तो गौर कीजिएगा  उसके अक्सेन्ट पर. लेकिन मजाक सिर्फ बिहारियों का ज्यादा उड़ाया जाता है. मैं मानता हूँ कि बिहारी “मैं” नहीं बल्कि “हम’ कह कर बात करते हैं, “करो” की जगह “कीजियेगा” बोलते हैं. लेकिन ये सुनने में ज्यादा अच्छा नहीं लगता? एक पंजाबी या बंगाली अपने अक्सेन्ट में हिंदी कहता है तो किसी को तकलीफ नहीं होती लेकिन वहीँ अगर एक बिहारी अपने अक्सेन्ट में हिंदी कहता है तो वो वीयर्ड और फनी हो जाता है. क्यों? कैसे? यकीन मानिए बिहार के लोग हिंदी भी बहुत अच्छी बोलते हैं और अंग्रेजी भी. लेकिन अफ़सोस लोग आज भी समझते हैं भाषा के मामले में भी हम बिहारी पिछड़े हुए हैं. बड़े अफ़सोस की बात है कि हमारे देश में बिहार के लोगों को आज भी बड़े गंदे नज़रों से देखा जाता है. बिहारियों को लॉ-ब्रेकरेस कहने वाले लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि जाने कितने सालों से आज तक सबसे ज्यादा रेसिज़म का शिकार बिहारी कम्युनिटी ही होती है. फिर चाहे वो मुंबई में बिहारियों के प्रति गुंडागर्दी हो या दिल्ली में बिहारियों के लिए “बिहारी” शब्द को गाली के रूप में इस्तेमाल करने की बात हो.

लेकिन दोस्तों बिहार के बारे में सुनी सुनाई धारणाओं से बाहर निकालिए. यकीन मानी, बिहार बहुत ही अच्छा प्रदेश है, और जैसा की मीडिया या कुछ लोगों ने फैला रखा है, उसके विपरीत रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम लोग बहुत ख़ुशी ख़ुशी और सुरक्षा से रहते हैं. आपको एक आश्चर्यजनक सच बताऊँ? बिहार में रहना आपके लिए शायद दिल्ली, नॉएडा, गुडगाँव से ज्यादा सुरक्षित है. यकीन नहीं आता आपको? आँकड़े यही बताते हैं. आपको ये लगता होगा अगर कि हम बिहार के लोग डरे दुबके से घर में बैठे रहते हैं. बाहर सड़कों पर गुंडाराज चलते रहता है तो इस धारणा को  तोड़िए. यहाँ दिन तो क्या रात में भी गोलियां नहीं चलती रहती हैं. कम से कम मैंने तो नहीं देखा है ऐसा. न पहले कभी नज़र आया और अब तो खैर पहले से काफी डेवेलपमेंट हुआ है बिहार में. खैर, ये बातें सब भी व्यर्थ जाने वाली हैं.. लेकिन बिहार के बारे में बातें करना जरूरी हैं. मन में और भी जाने बहुत सी बातें हैं…वो फिर कभी. .

फ़िलहाल एक बेहद अच्छा आर्टिकल जो मैंने कुछ महीने पहले Quora पे पढ़ा था, मुझे बड़ा पसंद आया. उसके कुछ भाग मैं शेयर कर रहा हूँ. समझने की कोशिश कीजियेगा इस आर्टिकल को और रिलेट करने की कोशिश कीजियेगा.

Ever heard people saying, “Bihari jaisi baat mat kar”? All the rickshawallah, Chaiwallah, Autowallah in Delhi has a generic name: “Bihari”. It’s a fashion in our country to abuse Bihar and Biharis. We have seen how Mumbai handled bhaiyas in recent times. In many parts of the country, people don’t have good reputation about Bihar and it is shown in their attitude. Ever thought why is it so? And more importantly, do Indians deserve to have such feeling about one state of their country. Let’s analyse few of the typical feelings about Bihar and Biharis: Bihar is poor, backward land of the cow belt Yes, Bihar is poor. It is a part of BIMARU states. But does India deserve to raise a finger? 

India has the largest number of people below poverty line in this world. India is at 127th place among all the countries in terms of HDI. We are better off than few countries in Sub Saharan Africa. The status of Bihar in India is somewhat comparable to the status of India in the world. Isn’t it? 

Ever seen the local trains passing through Bihar, it’s dirty. Most village and town in Bihar is dirty and unhygienic. But does India deserve to raise a finger? The cleanliness at Patna railway station is not worse than that at Delhi station. The civic sense of people in Pune is not better than that of people in Purnea. The road and traffic condition in Kolkata is even worse than that at Dhanbad. Collectively we Indians are worst in civic sense. We are good at claiming our rights but bad at exercising our duties.

The status of Bihar in India is somewhat comparable to the status of India in the world. Isn’t it? 

While in Germany, once I encountered a person, who actually felt good in making fun of India. Suddenly I recalled how people feel good in making fun of Bihar back there in India. They are poor. They are backward. They don’t work at home but once outside, they work hard. They are very intelligent individually, but collectively they are dumb. They always look for short cuts. They are arrogant. They don’t have civic sense. They don’t know how to behave….. Now try to replace “They” with “Indians” once and then with “Biharis”. You will be amazed.

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  1. बहुत अच्छा लिखा है, अभिषेक और पढ़ कर पता चल रहा है तुम्हारा दिल कितना दुखा है ।लोगों ने ऐसी ही धारणाएं बना ली हैं सच बात तो ये है कि वे ऐसी ही धारणा बनाए रखना चाहते हैं ताकि मजाक उड़ा सकें ।बिहार बदल रहा है, बिहार के लोग देश विदेश हर जगह अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं ।उच्च पदों पर आसीन हैं पर लोग सिर्फ मजाक का निशाना बनाये रखना चाहते हैं ।
    बहुत दुखद है सबकुछ ।

  2. मेरी नानी पटना से ही थीं। इस कारण कई बार आना जाना हुआ वहां। ये बहुत साल पहले की बात है। फिर जब नौकरी लगी तो कई बार टूर पे भी गया बिहार। उस समय भी लोग बिहार को ऐसी ही नज़रों से देखते थे। पर मुझे कभी भी कुछ ऐसा नहीं लगा।

    ये सब एक सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा लगता है जिससे वहां के लोगों को कही और कोई रोज़गार न मिले।जबकि उनके बगैर कहीं काम भी नहीं चलता। मुम्बई में तो हैं यहां के निवासी पर कोई एक जगह भारत में नहीं है जहाँ ये लोग न हों। यहाँ तक की सुदूर दक्षिण में केरल तक में हैं और शांति से रह रहें हैं।

    ये लेख कई भ्रांतिया दूर करेगा बिहार के बारें में। वैसे भी बहुत अच्छा लिखा है आपने, अभिषेक जी।

  3. वाह अभिषेक, बहुत अच्छी पोस्ट बनाई|दो दिनों से फेसबुक पर सुनी सुनाई बातों के आधार पर बिहार के बारे में पढ़कर मन बहुत व्यथित था| शायद दूर हो सके कुछ गलतफहमियाँ…बिहारियों का यह बड़ा अवगुण है कि गुणी रहते हुए भी अपने गुण नहीं बखानते…बहुत अच्छी पहल|

  4. एक बहुत जरुरी पोस्ट सी है ये। मैं बिहारी नहीं हूँ लेकिन लंबा समय मैंने पटना में बिताया है । हर साल की गर्मियां मेरी दीदी के घर पटना में ही गुज़रती थीं। मुझे तो कभी कोई ख़राब अनुभव नहीं हुआ। बल्कि जितने सज्जन बिहार के लोग हैं उतने शायद ही किसी और प्रदेश के हों। ऐसे दरिंदे कहाँ नहीं होते? अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश का ग्राफ़ ज्यादा बड़ा है। दरिंदगी के मामले में भी। बिहार को जानबूझ के बदनाम करने और पीछे रखने की राजनीति तो हमेशा से चल रही यही वजह है कि वहां की हर छोटी बड़ी खबर को भी ऐसे छापा जाता है जैसे ऐसी घटना पहले कभी हुई ही नहीं। सो बिहार से बाहर वालों के मन में डर बैठ जाता है। लेकिन जो बिहार हो आया है वो उसे कभी भूल नहीं सकता।

  5. लेख बहुत ही अच्छा है. मैं एक बार बिहार गयी हूँ और वहां मेरी बहुत ही अच्छे से मेहमाननवाजी हुयी है. हाँ, जब गयी थी तो बरसात थी और पटना की सड़कों पर गड्ढे थे 🙂 बंदूक वाली बात मज़ेदार लगी, लेकिन तुम सही कहते हो कि खुद वहीं के कुछ लोग इस विषय में बढ़-बढ़कर डींगें हांकते हैं.
    दिल्ली में तो सामान्यतः बिहार के लोगों की वैसी ही छवि है जैसी तुमने बताई, लेकिन हमारे मुहल्ले में ऐसा नहीं है क्योंकि यहाँ बिहार के लोग अच्छी-खासी तादात में हैं और लोकल्स उनको शान्तिप्रिय और पढ़ने-लिखने में ध्यान देने वाला मानते हैं. यहाँ बिहार के लोगों से ज्यादा खराब छवि हरियाणवी छात्रों की है, जबकि मुझे लगता है कि कहीं के भी सभी लोग न अच्छे होते हैं और न बुरे. लेकिन बिहार के बारे में यह आश्चर्य ज़रूर होता है कि इतना ज़बरदस्त मानव संसाधन होने के बावजूद बिहार का उस तरह से विकास क्यों नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए था. और राज्यों से बिहार की तुलना नहीं हो सकती. बिहार सदियों तक उत्तर भारत का प्रमुख राजनैतिक केंद्र और कई साम्राज्यों की राजधानी रह चुका है, तो अब क्यों नहीं हो सकता. इस बात पर वहां के पढ़े-लिखे वर्ग को ध्यान देना चाहिए, जो अपनी मातृभूमि पर गर्व तो करते हैं, लेकिन उसके लिए कुछ करते नहीं.
    कुल मिलाकर, भले ही बिहार का भौतिक विकास न हुआ हो, लेकिन मानव संसाधन के मामले में तो बेशक बिहार का कोई जवाब नहीं.

  6. अभिषेक बेटा, शायद बहुत देर से तुमने यह पोस्ट लिखी. मेरे साथ तो जो कुछ हुआ बिहार को लेकर वो मेरा अपना भोगा हुआ अनुभव रहा है. लेकिन जितना मुझे सुनने को मिला, मेरा बिहार प्रेम उतना ही गहरा होता गया. जबकि अमूमन लोग बिहार से बाहर निकलते ही मैं बोलकर अपनी पहचान छिपाने लगते हैं, मैंने कभी नहीं किया. मेरी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी सुनकर जब भी किसी ने कभी पूछा है कि आप कहाँ से हैं तो मेरा जवाब कभी ये नहीं हुआ कि बिहार से… मेरा जवाब होता है – मैं बिहारी हूँ.
    ख़ैर जिस घटना का ज़िक्र मंने कल किया था वो ये थी कि हम एक शादी में गये थे किसी स्टाफ की और वहाँ बातों बातों में मेरे बॉस ने कहा कि बिहारी सब चोर होते हैं. और मेरा छूटते ही यह जवाब था कि टॉप पाँच क्रिमिनल्स की लिस्ट अगर आप बनाएँगे तो उसमें एक भी बिहारी नहीं दिखाई देगा, जबकि आपके उस छोटे से अंचल के जहाँ से आप आते हैं, पाँच के पाँच मिलेंगे. उनका चेहरा सफ़ेद हो गया और अगले दिन मेरा ट्रांसफर ऑर्डर मेरे हाथ में थमा दिया गया.
    लेकिन उनके प्रदेश/अंचल के प्रति मेरा रिसर्च चलता रहा और अपने दोस्त चैतन्य को मैंने हज़ारों सबूत दिये. मैं किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, प्रदेश के प्रति कभी दुर्भावना नहीं रखता, लेकिन इस विशेष अंचल के प्रति (भारत के मानचित्र पर एक बहुत छोटा सा स्थान रखता है) मेरे मन में नफ़रत भरी है. और अभी हाल में टॉप पाँच की लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है और इत्तेफाक़न वो भी वहीं से आते हैं.
    आज अगर मेरे वो बॉस ज़िन्दा होते (हो सकता हों भी) और मेरे सामने होते तो उनसे पूछता कि बॉस अब बताओ कौन सा बिहारी चोर है! बिहारियों को चोर बताने का कारण सिर्फ इतना था कि गया स्टेशन पर उनका जूता चोरी हो गया था ट्रेन में. अगर ऐसा होता तो सारे विजयवाड़ा वाले चोर हो जाते, क्योंकि वहाँ तो ट्रेन के घुसते ही मैंने सारे लोगों को कहते सुना कि अपनी चप्पल और जूते सम्भाल लें विजयवाड़ा स्टेशन आ रहा है!!
    अच्छी पोस्ट है बेटा. यही कारण था कि मैंने अपने ब्लॉग की भाषा ही बिहारी चुनी और एक पाठक के यह कहने पर कि आप हिन्दी में लिखिये तो समझने में आसानी होगी, मैंने कहा था कि यह भाषा ही आत्मा है मेरे ब्लॉग की, इसे निकालकर तो ब्लॉग ही नहीं बचेगा. बहुत कुछ इग्नाइट कर दिया है तुमने, इस विषय पर लिखना पड़ेगा, तुम्हारे इस लेख के सिक्वेल के रूप में! बधाई वत्स!!

  7. बिहार की सही छवि देखना,एक विस्तृत नजरिये की बात है जो हर किसी में नहीं है। हमारी राजनीति, हमारा सामाजिक सौहार्द, हमारी सहिष्णुता, हमारा सामाजिक जागरण, अनेक विषम परिस्थितियों से जूझते हुए भी अन्य कई अतिवादी राज्यों से बेहतर परिस्थिति में है। कम से कम हमारे यहाँ शिक्षा माफिया, राधे माँ, आसाराम, डेराबाबा पैदा नहीं होते। ए आइ पी एम टी जैसे पेपर हमारे यहाँ से लीक नहीं होती। राजनीति से जुड़ी महिलाओं का अपमान नहीं होता, बिहार से झारखंड बनने के क्रम में दंगा फसाद नहीं होता, हमारे यहाँ बंगाली,गुजराती,पंजाबी का भेदभाव नहीं होता, यहाँ तक कि अपने अपमान का प्रतिकार तक नहीं करते बिहारी, इसी लिये कई दूरंत ट्रेन बड़ी सुचारु रूप से हमारे राज्य से सुरक्षित गुजर जाती हैं। बिहार के लोग मूलतः मेहनती और षड्यंत्र विहीन हैं,और यही हमारी ताकत है कि इतने सौतेलेपन के बावजूद हमें बुलंदियों तक पहुंचने से कोई रोक नहीं पाया है। – मेरे एक मित्र ने उपरोक्त टिपण्णी मेरे ही एक पोस्ट पर की थी !

    बिहार को समझना, हर किसी के वश की बात नहीं,
    अभिषेक आपको बहुत बहुत आभार, हमारे भावों को पूर्ण रूप में शब्दों में ढालने के लिए

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