सलिल वर्मा की कवितायें – भाग १

आज सलिल वर्मा जो मेरे सलिल चाचा हैं, उनका जन्मदिन है. उनके जन्मदिन पर इस ब्लॉग पर पेश कर रहा हूँ उनके कुछ नज़म, कुछ कवितायें जो उन्होंने इधर उधर लिख कर रख दी थीं. दो तीन कवितायें उनके ब्लॉग से ली गयी है.

मेरी बहना

कबीर रोए थे चलती चाकी देख
खुश हूँ मैं, खुश होता हूँ हमेशा
इसलिए नहीं
कि चाकी पर गढे जाते हैं अनगिनत शिल्प,
इसलिए कि इसमें मुझे अपना परिवार दिखता है
एक धुरी
उसके गिर्द घूमता सारा कुटुंब
और बनते हुए खूबसूरत रिश्ते.
बहन है मेरी
दो भाइयों से छोटी और दो से बड़ी
एक धुरी की तरह बीच में
हम सब विस्थापित हो गए
बस वो टिकी है वहीं
कहीं नहीं जाती, बस इंतज़ार करती है
होली में, गर्मी की छुट्टी में, छठ में
सब आयेंगे तो बैठेंगे,
मिलकर शिकायत-शिकायत खेलेंगे.
फोन पर बात करते ही
समझ जाती है सिर्फ हेलो कहते ही
कि मैं आज बहुत उदास हूँ,
कि मैं आज बहुत खुश हूँ,
कि आज बहुत याद कर रहा हूँ उसे
बात करते करते रो देती है
और रोते रोते हंसने लगती है!
अब तो उम्र के साथ पीली पड़ गयी है
हमारे परिवार के रिश्तों की किताब
मगर उसमें आज भी खुशबू है उससे…
जब भी पलटता हूँ सफहे उस किताब के
उसका चेहरा दिखता है
बहनें ऐसी ही होती हैं!!


धूप छाँव का चक्कर 

ये धूप-छाँव का चक्कर भी अजब चक्कर है!
धूप सर्दी की बड़ी खुशनुमा होती है दोस्त
और गरमी में सुकूँ देता है साया-ए-दरख़्त
ग़मों को देखके डरना, ख़ुशी से इतराना
सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारी नज़र का फेर है दोस्त
भूल जाओ कि खुशी साया है और दुःख है धूप
दोनों बस एक ही सिक्के के हैं जुड़वाँ पहलू
बात मेरी सुनो और ज़िन्दगी को जमके जियो

ये धूप-छाँव का चक्कर भी अजब चक्कर है!!


रस्साकस्सी 

देख लेना रात में कल मैच इक,
रस्साकसी का,
दर्मियाँ दो टीम के
सन् बीस दस और बीस ग्यारह साल की.
बात इक पक्की है लेकिन देख लेना
एक और एक मिलके जो होते हैं ग्यारह
जीत जाएँगे वही यह मैच
क्योंकि फिक्स है यह!!

चंदा मामा कोई कहता है जो तुझको
चाँद सी महबूबा कोई बतलाता है
मर्द है तू या औरत है अब तो बतला दे!!

कितनी सर्दी है 

दिन चढ आया
बाहर फिर भी अंधेरा था.
सूरज बाबू कहीं दिखाई नहीं दे रहे.
छत पर चढ़कर मैंने जब आवाज़ लगाकर उनसे पूछा
वो बोले, मैं लेटा हूँ बादल की तोशक के अंदर
चुपचाप दुबककर,
मुझको मत डिस्टर्ब करो तुम
जाकर तुम भी सो जाओ.
बाहर तो देखो,
बाहर कितनी सर्दी है!!

ख़्वाब सुबह के

ख़्वाब सुबह के सच होते हैं.
जग जाते हैं लोग मगर
सुबह को अक्सर
ख़्वाबों के आने से पहले.
मेरी आँखों में तो कोई सुबह नहीं
बस इक तवील सी रात पड़ी है
फैली है तारीक़ी सदियों से सदियों तक.
आओ मिलकर ख़्वाबों के सच होने का क़ानून बदल दें!!

की होल 

रात के स्याह अंधेरों के पीछे क्या है
इक दूर तलक ख़ामोश ख़लाओं के उस पार कहीं
दरवाज़ा है अंधियारे का,
चट्ख़नी लगाकर बंद किया.
“की होल” पे आज इस चाँद के आँख जमाकर देखो
हमसा कोई दिखता है उस पार कहीं?


डाउरी 

ब्याह बेटी का रचाने,
या अदा करने को कर्जा कोई
रात इस आसमाँ के गुल्लक में
चाँद के सिक्के जमा करती है
और फिर दिन के निकलते ही वो
भाग जाती है परबतों के परे.
कितना ग़ुस्सैल है सूरज
वो छीन लेगा सब!


मैच 
जाने कब हैं मैच की सब तारीखें पक्की 
जाने किसके बीच मैच खेला जाएगा टस किया है 
किसने ये आकाश की जानिब चाँद का सिक्का 
गिरे ज़मीं पर तभी तो कुछ मालूम पड़ेगा!!
चाँद की दुल्हन 

चाँद की दुल्हन,
जड़े हुये तारों की, सुरमयी चादर ओढे
घूँघट में शर्माती, झुककर आई ज़मीं पर
बर्फ के उजले बालों वाले
पेड़ों और पर्बत से मिलकर
पैरों को छूकर
लेने आशीष बुज़ुर्गों का धरती पर!

स्माईली

ये स्माईली भी बड़ी सख़्त जान है कम्बख़्त
ऐसा लगता है किसी शख्स ने कटोरे में
नम से दो क़तरे सजाकर उँडेल रक्खे हों…
अश्क़ हैं या जमी हुई शबनम??


ताजमहल
तेरी ये ज़िद थी इसे सिल के ही दम लेगी तू
बूढ़ी आँखों से दिखाई तुझे कम देता था
सुई कितनी दफा उंगली में चुभी थी तेरी
उंगलियों से तेरी कितनी दफा बहा था ख़ून
कौन सा इसमें ख़ज़ाना था गिरा जाता था
कौन सी दुनिया की दौलत थी लुटी जाती थी.
आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल
दौलत-ए-दो जहाँ से बढके पोटली है मेरी
संगेमरमर की नहीं यादगार, क्या ग़म है
सोई पैबंद के पीछे मेरी मुमताज़ महल.
पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

रेलगाड़ी 

यही गाड़ी मुझे परिवार से अपने मिलाती है,
यही गाड़ी मुझे परिवार से फिर दूर करती है.
कभी अच्छा नहीं लगता है उनको छोड़कर आना
मगर ये नौकरी भी क्या करें मजबूर करती है!

और एक त्रिवेणी.. 

बातें करती आँखें 
चुप तुम थीं, चुप मैं भी तहस, दोनों चुप थे. 
झगडा था, और ख़ामोशी की शर्त लगी थी
उफ़, कितनी बातें करती हैं आँखें तेरी!
चलते चलते एक खूबसूरत शेर 

ज़ुबानें भी फिसल जाती हैं देखो देखकर उनको,
कोई ‘सो स्वीट’ कहता है, कोई ‘नमकीन’ कहता है!


जन्मदिन मुबारक हो चचा…हैप्पी बर्थडे !!

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  3. चाचा जी को भतीजे की ओर से सुन्दर उपहार है ये नज़्में और कवितायेँ .. बहुत अच्छी लगी प्रस्तुति
    सलिल वर्मा जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं!

  4. मेरी लिखी हर कविता/ अकविता का कॉपीराइट बस तुम्हारे पास है. जिन्हें मैंने बिखेर दिया, उन्हें तुमने समेटकर ही नहीं, सहेजकर भी रखा है! क्या कहूँ, बस
    तुममें ख़ुद को तलाश करता हूँ/
    तुममें ही ख़ुद को पाता हूँ अक्सर!

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