कुछ पुरानी यादें, कुछ दोस्तों से मुलाकात

दूसरे देशों की किताबें 

विश्व पुस्तक मेले में शनिवार का मेरा दिन कुछ अलग तरह से शुरू हुआ. आम तौर पर मेट्रो से आता था मैं, लेकिन शनिवार को बस से आया. इसके बहुत फायदे हुए. इन दिनों मैं सिर्फ हॉल नंबर बारह ही घूम पा रहा था, बाकी के हॉल के स्टाल देख ही नहीं पाया था. हाँ, सोमवार को जरूर सुशील भैया के साथ घूमा था लेकिन कुछ भी ध्यान से नहीं देख पाया था. शनिवार के दिन की शुरुआत मैंने हॉल नंबर छः से की, जो कि  गेट नंबर तीन के ठीक सामने था. गेट नंबर तीन के पास बस स्टॉप भी है, तो मुझे बड़ी आसानी हो गयी आने में. इस हॉल में ज़्यादातर कम्पटीशन की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स की किताबें थीं. अमेज़न ने भी किंडल के लिए एक अलग स्टाल लगाया हुआ था. इस हॉल में ज्यादातर कॉलेज स्टूडेंट्स की भीड़ दिखी. हॉल नंबर छः से निकलने पर ही सामने हॉल नंबर सात था, जहाँ अतिथि देश चीन और बाकी के देशों की किताबें लगायी गयी थी. 

चीन के सांस्कृतिक धरोहर 
थीम प्रस्तुति में सांस्कृतिक कार्यक्रम 

हॉल नंबर सात के तीन भाग थें, एक में जहाँ सिर्फ और सिर्फ चीन का साहित्य देखा जा सकता था. कुछ चीनी भाषा की किताबें जो हिंदी में अनुवाद होकर आई थी वो भी यहाँ लगाईं गयी थीं. इन किताबों की बिक्री भी हो रही थी या सिर्फ प्रदर्शनी के लिए लगायी गयी थी ये मालूम नहीं चल सका. चीन के कुछ प्राचीन धरोहर भी यहाँ प्रदर्शनी के लिए लगाये गए थे जिनमें टाइपसेटिंग और वहां के कुछ पांडुलिपियाँ प्रमुख थे. इन्हें देखना और समझना सच में अच्छा लगा. दूसरे भाग के फॉरेन पेविलन में बाकी देशों के स्टाल लगे थे जिनमें पोलैंड, जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, यूऐई और इंडोनेशिया के स्टाल प्रमुख थे. लेकिन हॉल नंबर सात का मुख्य आकर्षण जो यहाँ का था वो विविध भारती द्वारा आयोजित थीम प्रस्तुति था. यहाँ भारत के हर एक क्षेत्र जैसे दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और पूर्व क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासत प्रदर्शनी में संजोये  गए थे. हर क्षेत्र के कुछ प्रमुख साहित्यिक किताबें भी लगाईं गयी थीं. इस हॉल के बीचो-बीच एक स्टेज भी बना था जिसमें लगातार कोई न कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे थे. दो दिन में मैंने कुछ बेहतरीन संगीत कार्यक्रम का आनंद लिया यहाँ. आज दोपहर में बंगाल का लोक संगीत का एक लाजवाब कार्यक्रम था. इस हॉल में हर क्षेत्र के साहित्यिक मैनुस्क्रिप्ट भी प्रदर्शनी में लगायी गयी थीं. महाभारत और रामायण की  हस्तलिखित प्रति भी यहाँ देखने को मिली. आज कल के ‘सेल्फी’ के चलन को देखते हुए यहाँ एक ‘सेल्फी’ कोर्नर भी बनाया गया था और एक सेल्फी स्टाल भी, जहाँ आप कीओस्क के सामने खड़े होकर अपनी सेल्फी खींच कर उसे उसी समय फेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट कर सकते हैं.

महाभारत, मेघदूत, श्रीमद भगवद

हॉल नंबर सात के ठीक सामने झील थी. मुझे पुराने दिन याद हो आये पुस्तक मेले के. पुराने दिन से मेरा मतलब २०१२ का पुस्तक मेला था, जब मैं दिल्ली में नया आया था. दो ख़ास दोस्तों के साथ अधिकतर दिन यहाँ बीते थे. वरुण और अनिल. पूरे दिन यहाँ बैठकर हमारी महफ़िल जमती थी. दोस्तों के साथ कितने यादगार पल बीते थे यहाँ. सलिल चचा की भी याद आई. उस साल पुस्तक मेले में पहला दिन उनके साथ ही तो बीता था. राजेश उत्साही जी के किताब के विमोचन में शामिल होने मैं यहाँ आया था. वैसे तो इस पुस्तक मेले में बहुत से दोस्त मिले लेकिन साथ घूमने वाले दोस्त में सुशील भैया के अलावा और कोई दूसरा नहीं मिला. यहाँ सोचा भी कि अगर सलिल चचा आज दिल्ली में होते तब तो उन्हें जबरदस्ती हर रोज़ खींच कर यहाँ ले आता. एक किताब तो उन्होंने मुझे तोहफे में दी थी, वो होते तो जितने किताबें खरीदता बिल उनको थमाते जाता. शिखा दीदी को भी बहुत ज्यादा मिस किया. पिछले साल लगभग तीन-चार दिन यहाँ आया था, और उनके साथ ही आवारागर्दी की थी. 

हॉल नंबर सात के आगे झील के पास आज बहुत देर तक बैठा रहा. मुझे बहुत पुराने दिन भी याद हो आये थे. पटना के पुस्तक मेले के पुराने दिन. वे दिन भी जब हम छोटे थे, और पापा के साथ जाया करते थे पुस्तक मेले में. और बाद में दोस्तों के साथ. मुझे अब तक याद है, अपने पहले पुस्तक मेले में मैंने टैगोर की और प्रेमचंद की कहानियां खरीदी थी. पटना के गांधी मैदान में पुस्तक मेले का आयोजन होता था. जब दसवीं में गया तब पहली बार पुस्तक मेले में अकेले गया था. जो किताब मैंने खुद से खरीदी थी वो थी अटल बिहारी वाजपेयी की `मेरी इक्यावन  कवितायें’. तब ज्यादा साहित्य का ज्ञान नहीं था. ज्ञान तो ज्यादा अब भी नहीं लेकिन उस समय बहुत लेखकों के नाम से भी मैं अनजान था. तो सेल्फ हेल्प, कैरिअर की किताबें ज्यादा आकर्षित किया करती थीं. हाँ गुलज़ार साहब के नज्मों से मोहब्बत उसी समय के आसपास हुई थी  और उनकी एक किताब खरीदी भी थी मैंने. दसवीं के बाद दो तीन साल तक दोस्तों के साथ पटना के पुस्तक मेले में जाता रहा था, वे सबसे मधुर याद हैं पुस्तक मेले के. उसके बाद इंजीनियरिंग में दाखिला हो गया. इंजीनियरिंग के बाद बैंगलोर में ही रहा. दिल्ली सीधे आया था 2012 में तो करीब तेरह-चौदह साल बाद मैं किसी भी पुस्तक मेले में गया था. शायद इसलिए भी 2012 का पुस्तक मेला सबसे यादगार रहेगा मेरे लिए. इत्तेफाक की बात ये भी रही कि वे सारे दोस्त जिनके साथ पटना में पुस्तक मेला जाया करता था, २०१२ के पुस्तक मेले में भी उन्हीं का साथ रहा था. 

खैर, मैं सामने अंग्रेजी किताबों वाले हॉल के सामने देखने लगा. और सोचने लगा कि यही सब पुरानी बातें याद करते रहूँगा तो शाम  हो जायेगी और कुछ भी घूम नहीं पाऊंगा. इंग्लिश वाले हॉल में वैसे तो सुशील भैया के साथ आया था लेकिन इत्मिनान से कुछ भी देख नहीं पाया था. लगभग सभी पब्लिकेशन के स्टाल यहाँ लगे हुए थे. इंग्लिश किताबों के हॉल में हिंदी वाले से ज्यादा भीड़ हमेशा रहती है. वैसे भी आज के समय में हिंदी से कहीं बड़ा पाठक वर्ग इंग्लिश का है. मैं यहाँ स्टाल देखकर बड़ा खुश हुआ. बड़े अच्छे और यूनिक तरीके से स्टाल सजाये हुए थे. कुछ स्टाल पर लोगों की मदद के लिए टच स्क्रीन कंप्यूटर या टैबलेट भी लगाये गए थे जहाँ से उस पब्लिकेशन का कैटलोग लोग देख सकें और अपनी मनपसंद किताब सर्च कर सकें. ये सच में एक बेहतरीन तरीका लगा मुझे. इंग्लिश वाले हॉल में आकर तो आँखें  जैसे चौंधिया सी जा रही थीं. हर तरफ बड़े आकर्षक कवर और रंग वाली किताबें थीं. यहाँ से कुछ खरीदना तो था नहीं, बजट की समस्या थी. लेकिन एक बात जो मैं लगभग हर पुस्तक मेले में सोचता हूँ वो कि इंग्लिश साहित्य के बारे में मुझे बहुत ही कम मालूम है. मैंने ज्यादा पढ़ी नहीं किताबें. हाँ, जो कॉलेज के समय में पढ़ी थी बस वही लेकिन उसमें भी जेफ्री आर्चर, सिडनी शेल्डन. डैन ब्राउन और मिल्स एंड बूंस टाइप किताबें ही अधिकतर पढ़ी हैं. क्लासिक शायद चार-पांच ही. हर बार पुस्तक मेले में सोचता हूँ कि  अब अंग्रेजी के किताबों की तरफ भी रुख करना चाहिए. पढ़ना चाहिए इन्हें भी. लेकिन हर बार बस सोचते ही रह जाता हूँ. हिंदी में तो लगभग सभी लेखकों के बारे में पता है, जो अभी लिख रहे हैं और पुराने लेखक भी. सभी का लिखा कैसा होता है, क्या लिखते हैं इसकी समझ है, लेकिन वो समझ अंग्रेजी की किताबों की नहीं है. देखता हूँ, इस साल सोच तो रहा हूँ कि अंग्रेजी की कुछ अच्छी किताबें पढ़ा जाएँ, लेकिन शुरुआत कहाँ से करूं ये प्रश्न है. 

मुझे हैचेट पब्लिकेशन का भी बड़ा सा स्टाल दिखा तो अन्दर जाने की इच्छा हुई. एक तरह से थोड़ा पुराना नाता जुड़ा हुआ है इस पब्लिकेशन हाउस से. बैंगलोर में शुरुआत के कुछ दिन, डेढ़ दो महीने इसी ग्रुप के लिए काम किया है. कुछ ख़ास बच्चों के मैगजीन ढूँढने थे, लेकिन वे मिले नहीं. शायद अब नहीं आते होंगे. इस हॉल में मुझे इंजीनियरिंग किताबों के भी स्टाल दिखे जिसमें जाने से खुद को नहीं रोक पाया. कॉलेज की लगभग सभी किताबें मिल गयी जिसको पढ़ा करते थे. एक हल्का नोस्टाल्जिया सा फील हुआ उन किताबों को दोबारा हाथ में लेते हुए.आज शायद नोस्ताल्जियाने का ही दिन है. एक तो पुराने किस्से याद आये वो अलग, हैचेट पब्लिकेशन ने भी कुछ याद दिलाया और अब इंजीनियरिंग के टेक्स्ट बुक देखकर कॉलेज के पुराने दिन याद आ गए थे. 

हॉल नंबर ग्यारह जिसमें अंग्रेजी किताबों के स्टाल थे, वहां से निकलने के बाद मैं सीधा हॉल नंबर चौदह की तरफ चला गया. सामने तो वैसे हॉल नंबर बारह था लेकिन वहां जाने का मतलब था पूरा समय वहीँ बीत जाना. हर कोने पर कोई न कोई जान पहचान का मिल ही जाता था हॉल नंबर बारह में. चौदह नंबर हॉल में सिर्फ बच्चों की किताबें थीं. यहाँ सच पूछिये तो मुझे ज्यादा आनंद आया. बच्चों के लिए टैगोर, भगत सिंह, लाल बहादुर शास्त्री  की किताबें थीं. इनके अलावा नर्सरी से लेकर दसवीं तक के बच्चों के लिए किताबें, सॉफ्टवेयर और सीडीज दिखीं. यहाँ भी एक मंच था, अंग्रेजी या हिंदी के हॉल में जो लेखक मंच था उससे अलग यहाँ बच्चों के लिए एक मंच था, जहाँ बच्चों के कार्यक्रम का आयोजन हो रहा था. मुझे बाकी हॉल के लेखक मंच के कार्यक्रम ने ज्यादा आकर्षित नहीं किया लेकिन यहाँ के मंच पर हो रहे कार्यक्रम में तो आनंद आ गया. शनिवार और आज के दिन भी मैं यहाँ एक बार चक्कर लगाने गया था. 

इस पुस्तक मेले में किताबों के अलावा बहुत दोस्तों से भी मिलना हुआ. पुस्तक मेले के पहले दिन ही अंजुले से मुलाकात हुई. वो जब भी दिल्ली आते हैं उनसे मुलाकात होती ही है. असल में पहले दिन उन्होंने ही फ़ोन कर के मेले में बुलाया था. पहले दिन तो अंजुले के अलावा कोई और दोस्त मिला नहीं था, हाँ पूजा उपाध्याय से एक छोटी मुलाकात जरूर हुई थी. संतोष त्रिवेदी जी से भी एक नमस्ते वाली मुलाकात हुई थी. उसके अलावा अपने दोस्त प्रकाशक शैलेश जी से और अंजनी जी से मुलाकात हुई. अंजनी जी की और मेरी खूब जमी इस पुस्तक मेले में. दूसरे दिन हमारे प्रिय मित्र सुशील भैया से मिलने का प्लान बना. मिलने का क्या, साथ पुस्तक मेले में घूमने का प्लान बना. सुशील भैया के साथ इधर दो तीन सालों से मैं पुस्तक मेले में घूम रहा हूँ. उनके साथ घूमने का एक सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि उनके साहित्य की समझ और किताबों की जानकारी का लाभ मुझे मिल जाता है. और मेले में घूमते हुए अपनी बातें लगातार होती रहती हैं सो अलग. सुशील भैया के साथ ही घूमते हुए मुलाकात हुई गौतम राजरिशी भैया से. इनसे मुलाकात तो एक सुखद आश्चर्य था. एकदम अचनाक से ही मुलाकात हो गयी भैया से. हालाँकि बस दस मिनट ही उनसे बात हो पायी, लेकिन बड़ा अच्छा लगा उनसे यूं अचानक मिल जाना. उन्होंने भी अब वादा किया है दिल्ली आने पर मिलेंगे मुझसे. 
यादगार दिन 

जो दिन पुस्तक मेले का मेरे लिए ख़ास था वो था तेरह जनवरी का दिन, जब प्रियंका दीदी और आंटी(प्रेम गुप्ता मानी) की किताबें आने वाली थी और अमित भैया-निवेदिता भाभी की पहली युगल-कविता संग्रह का विमोचन होना था. इस दिन कई दोस्तों से मुलाकात हुई. पूरे दिन तो भैया और भाभी के साथ ही बीता और इस बीच लगातार दोस्तों से मिलना होता रहा था. भैया-भाभी, आशीष राय जी के साथ आये थे. उनसे इसके पहले भी पिछले साल के पुस्तक मेले में मिलना हुआ था. भैया-भाभी के साथ बहुत ही मधुर और यादगार समय बीता. भाभी को तो बहुत कहा एक दिन और रुक जाईये लेकिन वो मानी ही नहीं. हम हिन्दयुग्म के स्टाल पर ही अड्डा जमाये बैठ गए थे. वहीँ दोस्त आते गए और मुलाकात होती गयी. निशांत मिश्रा  भैया से भी उसी दिन, वहीँ पर अचानक मुलाकात हुई. निशांत भैया से तो मुलाकात का ऐसा है कि पहले के पुस्तक मेले में कभी भी तय प्लान के मुताबिक मुलाकात नहीं हो पायी, जब भी मुलाकात हुई ऐसे ही अचानक मुलाकत हुई है. उनसे बात करना हमेशा बड़ा सुखद होता है. राजेश उत्साही जी भी उसी दिन अचानक ही मुलाकात हो गयी. वे हिन्दयुग्म के स्टाल पर कुछ किताबें देख रहे थे और मैंने उन्हें तुरंत पहचान लिया. राजेश उत्साही जी से जब से जान पहचान हुई है, हमारे मिलने का प्रोग्राम कभी नहीं बन पाया, और इस पुस्तक मेले में अचानक ही मिलना हो गया. वंदना अवस्थी जी से भी मिलना वैसा ही सुखद अनुभव था. वो एक दिन पहले पुस्तक मेले में आयीं थीं, ये बात मुझे रश्मि दीदी से मालूम चली थी. लेकिन उस दिन एक काम में फंसे होने की वजह से मैं पुस्तक मेले में जा नहीं पाया था. मुझे तो उम्मीद भी नहीं थी कि उनसे मुलाकात होगी, लगा था वो वापस चली गयी होंगी. लेकिन कुछ देर के लिए उनसे मुलाकात की. एक यादगार मुलाकात रही वो. रचना जी से भी तेरह तारीख को ही पहली बार मिलना हुआ था. ब्लॉग के माध्यम से ही उनको जानते आया था लेकिन मुलाकात या बातचीत कभी नहीं हुई थी. पहली बार रचना जी से मिलना काफी सुखद रहा. मुकेश कुमार सिन्हा भैया से भी उस दिन मुलाकात हुई. मुकेश भैया से तो वैसे किसी न किसी कार्यक्रम में मुलाकात इधर होते ही रही है. एक नए मित्र भी मिले तेरह तारीख को, गणेश राव जी. उनसे आज फिर एक छोटी सी मुलाकात हुई. उसी दिन शाम में एक यादगार मुलाकात व्योमा दीदी से हुई. उन्हें हालाँकि दोपहर में ही आना था, लेकिन वो देर शाम पुस्तक मेले में पहुंची. व्योमा दीदी से बड़े दिन से मिलने का मन था. आख़िरकार इस पुस्तक मेले में उनसे मिलना हुआ. काफी देर हमनें बात की, और बड़ा अच्छा वक़्त बीता उनके साथ. इन सब के अलावा भी बहुत से लोगों से उस दिन पहली मुलाकात हुई. शाम में प्रियंका दीदी और आंटी की किताबें आ जाने से और भैया-भाभी की किताब का विमोचन होने से शाम और यादगार बन गयी थी. इस पुस्तक मेले में तेरह तारीख सच में एक ख़ास दिन रहेगा मेरे लिए. 

किशोर जी से हर पुस्तक मेले में मुलाकात होती है, इस पुस्तक मेले में शुरुआत के दिनों में उनसे मुलाकात नहीं हो पायी थी. वो आये ही नहीं थे. शनिवार को उनसे मुलाकात हुई. उनसे मिलना हमेशा बड़ा अच्छा होता है. अच्छी बातें होती हैं हमारी. लेकिन इस बार ज्यादा बातें नहीं हो पायीं उनसे. आज भी एक छोटी सी मुलाकात हुई किशोर जी से. इन सब के अलावा, एक पुराने दोस्त नितीश से भी एक छोटी मुलाकात हुई. पहले दिल्ली में एक वो भी शामिल होता था हमारे दोस्तों की महफ़िलों में, लेकिन आजकल थोड़ा व्यस्त हो गया है. अनु दीदी से भी मिलना हुआ, लेकिन बातें उनसे भी ज्यादा नहीं हो पायीं. शिखा दीपक, जिनके नाम से पहले से वाकिफ तो था, लेकीन उनसे कोई पहचान नहीं थी. वो बड़ी देर तक हिन्दयुग्म के स्टाल पर बैठी थीं. उन्हें शुरू में पहचान नहीं पाया था मैं. बहुत थोड़ी सी बात उनसे भी हुई. 

आज पुस्तक मेले के आखिरी दिन एक बेहद खूबसूरत मुलाकात सोनरूपा जी से हुई. बहुत समय से उनसे परिचित हूँ, उनके गजलों और कवितायें हमेशा पसंद आती हैं, लेकिन कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई थी. एक छोटी लेकिन बेहद अच्छी मुलाकात उनसे भी हुई. पुस्तक मेले में आखिरी तस्वीर आज की हिन्दयुग्म के अंजनी जी के साथ ली. इस बार के पुस्तक मेले में इनसे काफी बात हुई और काफी अच्छा लगा इनके साथ वक़्त बिताना. 

कुल मिलकर ये पुस्तक मेले की ख़ास बातें मेरे लिए यही चंद यादें हैं. लेकिन सबसे ख़ास बातें इस पुस्तक मेले की प्रियंका दीदी और आंटी की किताबों का मेले में आना रहा. `अंजुरी भर’ और `बुरी लड़की’ ने खासतौर पर ये पुस्तक मेला मेरे लिए बहुत ख़ास कर दिया है. 

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  1. वाह……हम तो न जाकर भी पुस्तक मेला घूम आये……
    पता है अभि,तुम्हारी पोस्ट वो बीते दिनों के बाईस्कोप की तरह होती है……बड़ी देर तक आँखों के आगे से चित्र गुज़रते रहते हैं……और मन के भीतर तो ठहर ही जाते हैं….
    ढेर सा प्यार….
    अनु

  2. अरे वाह…. शानदार विवरण.तमाम स्टॉल जो मैं नहीं देख पाई, आपकी नज़रों से देख लिये. मुलाकात सचमुच बहुत मज़ेदार थी. इस तरह सबसे मिलना रोमांचक तो होता ही है.

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