कुछ झलकियाँ पुस्तक मेले की

हर साल के तरह इस साल भी दिल्ली में पुस्तक मेला लगा हुआ है. हजारों की संख्या में पाठक देश के हर कोने से इस पुस्तक मेले में हिस्सा लेने आ रहे हैं. कई प्रकाशक, लेखक इस पुस्तक मेला का हिस्सा बने हैं. इस बार के पुस्तक मेले में अतिथि देश चीन है. मैं वैसे तो दिल्ली के पुस्तक मेले में चार साल से आ रहा हूँ, लेकिन इस साल मुझे कुछ भीड़ ज्यादा दिखी. खासकर पहले दो दिन. पुस्तक मेला पिछले शनिवार से दिल्ली के प्रगति मैदान में लगा हुआ है. शुरुआत के दो दिन वीकेंड होने के वजह से भीड़ बहुत जबरदस्त रही थी. भीड़ का हाल ऐसा था कि पहले दिन मुझे गेट नंबर दस से प्रवेश करने में ही आधे घंटे से ऊपर का वक़्त लग गया था. इस बार सुरक्षा व्यवस्था भी कुछ बढाई गयी है जो कि अच्छी बात है. पुस्तक मेले के पहले दिन तो भीड़ इतनी थी कि पुस्तकों के स्टाल पर ज्यादा रुक पाना संभव नहीं था. हर पुस्तक मेले में किताबें देखने और खरीदने का काम मैं हमेशा वीकडे में करता हूँ, ताकि भीड़ कम रहे और मैं इत्मिनान से किताबें देख सकूँ. इस बार भी पहले दो दिन बस कुछ दोस्तों से मुलाकात कर के वापस चला आया था मैं.

लेखक मंच जहाँ कुछ ख्वाब कुछ ख्वाहिशों का विमोचन हो रहा है 

दिल्ली के पुस्तक मेले में मैं 2012 से लगातार आ रहा हूँ. लेकिन इस पुस्तक मेले में पहले से ज्यादा भीड़ दिखाई दे रही थी. पहले भी भीड़ होते रही है, लेकिन इधर दो तीन सालों से सोशल मीडिया पर लगातार हो रही दिल्ली पुस्तक मेले की चर्चा ने लोगों को और आकर्षित किया है. दिल्ली के बाहर से भी कई सारे लोग पुस्तक मेले में आये हैं. पुस्तक मेले में किताबें तो एक आकर्षण होती ही है, साथ में रोजाना जो कार्यक्रम चलते हैं वो भी एक मुख्य आकर्षण होता है. इधर कुछ सालों से पुस्तक मेले में किताबों से ज्यादा हलचल किताबों के विमोचन में देखने को मिलती है. सभी लेखक और प्रकाशक भी चाहते हैं कि उनके किताबों का विमोचन इस पुस्तक मेले में हो. अलग अलग प्रकाशकों के स्टाल पर आपको हर दिन किसी न किसी किताब का लोकार्पण होता दिख जाएगा. एक तरह से अब पुस्तक मेला विमोचन स्थल भी बनता जा रहा है. ये ठीक भी तो है. लोगों को नए किताबों के बारे में पता चल जाता है. लेखकों को भी अपने किताब के बारे में लोगों को बताने का एक अच्छा मौका मिलता है. एक बड़ा ऑडियंस मिल जाता है लेखकों और प्रकाशकों को.

बहुत से जाने पहचाने चेहरे भी दिख जाते हैं पुस्तक मेले में…चाहे आपके कोई दोस्त हों जो अचानक ही किसी स्टाल पर किताबें पसंद करते दिखा  हों या किसी प्रकाशक के स्टाल पर कोई आपके पसंदीदा लेखक या कवि. ये पुस्तक मेला लोगों को अपने प्रिय लेखक या कवि से भी मिलने का एक जरिया बनते जा रहा है.

झलकियाँ 

मैंने किताबें देखने का और खरीदने का(अगर पॉकेट की अनुमति मिले तो) प्रोग्राम बनाया सोमवार को. उस दिन मुझे सुशील भैया की कंपनी मिल गयी थी. उनके साथ होने का एक फायदा ये होता है कि हम लगातार किताबों और लेखकों पर चर्चा भी करते रहते हैं. बहुत कुछ जानने समझने का मौका मिलता है उनके साथ. पुस्तक मेले में किताबें देखने की मेरी शुरुआत नेशनल बुक ट्रस्ट के स्टाल से हुई, जहाँ काफी भीड़ थी. बच्चों के लिए काफी किताबें एन.बी.टी ने निकाले थे. मुझे उन किताबों को देखकर अपना बचपन भी याद आया, जब पटना के पुस्तक मेले में जाते थे तो वैसी ही किताबें पहली पसंद होती थी हमारी. हम बड़े खुश होते थे उन किताबों को खरीद कर. राज कॉमिक्स का भी स्टाल सामने ही दिखा. उस स्टाल को देखते ही प्रशांत की याद आई. सुशील भैया ने कहा भी कि ये स्टाल प्रशांत के लिए है. मैंने झट से स्टाल की एक फोटो खींच ली प्रशांत को भेजने के लिए. राज कॉमिक्स के ठीक सामने किताबघर प्रकाशन का स्टाल था, उनकी प्रतिनिधि कहानियां और कवितायें की काफी सीरिज मेरे पास हैं. पेपरबैक में उन्होंने ये सीरिज निकाली है जिसमें आपको काफी लेखकों की कुछ चर्चित कहानियां और कवितायेँ मिल जायेंगी. मूल्य भी ज्यादा नहीं किताबों का. साहित्य अकादमी के स्टाल पर भी हम गए लेकिन निराशा हुई, उनके स्टाल पर कोई भी ऐसी किताबें नहीं दिखीं जिनको देखकर खरीदने का मन करे. जो थे भी वो काफी महंगे, और सभी हार्डबाउंड में. हार्डबाउंड की किताबें देखकर ही हम दूर से नमस्कार करते हैं. हमारी पहली कोशिश हर बार पपेरबैक किताबें खरीदने की होती है, इससे पॉकेट पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ता.

वैसे इस साल बहुत से स्टाल पर पेपरबैक किताबें उपलब्ध थी, जो कि  एक बहुत अच्छी बात है. ज्ञानपीठ, वाणी प्रकाशन, राजकमल, और राजपाल प्रकाशन पर भी कई सारी किताबें दिखीं जिन्हें खरीदने की इच्छा थी. कुछ तो खरीदने का मन है, जिसे आखिरी दो दिनों में खरीदने का इरादा है.. वहीँ कुछ बेहद मनपसंद किताबें जिन्हें खरीदने का बड़े दिन से मन था, उन्हें फिर से टालना पड़ रहा है. बजट भी देखना पड़ता है न. किताबें भी अब इतनी महंगी हो गयी हैं कि उन्हें आप लक्जरी के श्रेणी में रख सकते हैं. बड़े बड़े प्रकाशकों के स्टाल के अलावा मुझे छोटे स्टाल पर भी घूमने में अच्छा लगता है. कई बार आपको काम की किताबें अफोर्डेबल दामों में मिल जाते हैं. कुछ ऐसे स्टाल भी थे जो चर्चित उपन्यास या कहानियों की श्रृंखला को कम दामों के पेपरबैक संस्करण में लेकर आये थे. वाग्देवी प्रकशन भी एक ऐसा ही स्टाल है जहाँ से हर बार किताबें लेता हूँ. पॉकेट बुक के साइज़ में काफी सारी अच्छी किताबें इन्होने अपने स्टाल पर रखी हैं जिसमें निर्मल वर्मा के निबंध से लेकर रघुवीर सहाय, निदा फाजली जैसे शायरों की किताब भी है. दाम भी बहुत कम. तीस से साठ रुपये तक में सभी किताबें यहाँ उपलब्ध थीं. डायमंड बुक्स का भी स्टाल दिखा, हर साल दीखता है. और हम हर साल जाते हैं बस ये देखने की शिखा वार्ष्णेय दीदी की किताब लगी तो नहीं है. पता रहता है ये बात कि उनकी किताब आउट ऑफ़ स्टॉक है. और उस किताब का नया संस्करण ला भी नहीं रहे प्रकाशक, इसके बावजूद भी हर बार जाकर जरूर पूछ लेता हूँ.. स्मृतियों में रूस है? और ना का जवाब सुनकर हमेशा ये सुना कर आ जाता हूँ, अच्छी किताबें रखा कीजिये. डायमंड बुक्स में तो मैनेज़मेंट, सेल्फ़ हेल्फ़ और मोटिवेशनल  किताबों की भरमार होती है, लेकिन और भी कई सारे स्टाल ऐसे हैं जो ये किताबें रखते हैं. लोगों को भी पसंद आते हैं ये किताबें. भीड़ रहती है ऐसे स्टाल पर. इस तरह की किताबों में कुछ किताबें तो वाकई बेहद अच्छी होती हैं, लेकिन अधिकतर बकवास. बिहार से जुड़े भी दो स्टाल थें, लेकिन मुझे निराश ही किया. खासकर एक स्टाल ने. बिहार परिषद् से कुछ पुरानी किताबें खरीदने की इच्छा थी. जिसे सिर्फ इसलिए नहीं खरीद पाया कि ना तो मेरे पास ना ही स्टाल पर बैठे लोगों के पास खुल्ले पैसे थे. बिहार परिषद के स्टाल पर बैठे लोगों का बर्ताव भी मुझे अच्छा नहीं लगा.

उर्दू किताबें के स्टाल भी कई सारे दिखे इस साल, और मन में फिर मलाल हुआ कि काश उर्दू आनी चाहिए थी मुझे. कितनी बार सोचा है कि उर्दू सीखूं, लेकिन टालता आया हर बार. धर्मगुरुओं के भी कई सारे स्टाल दिखें, जिन्हें बस दूर से ही देखकर निकल आया मैं. बस एक स्वामी विवेकानंद से जुडी किताबों के स्टाल पर चक्कर लगा आया. जाने क्यों हर बार स्वामी जी से जुड़े किसी भी स्टाल पर जाने से खुद को रोक नहीं पाता. पता रहता है मुझे कुछ लेना नहीं लेकिन फिर भी. वैसे स्वामी विवेकानंद की कई किताबें मेरे पास पहले से है. इस बार पुस्तक मेले में गार्गी प्रकाशन के स्टाल पर बहुत सारे अच्छे पोस्टर्स भी दिखें. फैज़, मुक्तिबोध, नेरुदा, चार्ली चैपलिन वगैरह के पोस्टर्स उनके कुछ कोट्स और कविताओं के साथ  मिल रहे थे. मैंने भी दो पोस्टर्स लिए उनमें से.

हिन्दयुग्म के स्टाल पर किताबें 

हम लोगों के लिए जो स्टाल उत्साह और हलचल से भरा रहा वो था हिन्दयुग्म प्रकाशन का स्टाल. हिन्दयुग्म के शैलेश जी ने कुछ दिन पहले अपने फेसबुक वाल पर एक तस्वीर के साथ ये लिखा था कि इस स्टाल पर खरीद-बिक्री से ज्यादा फोटोग्राफी होती रहती है. लेकिन अब क्या करें, हिन्दयुग्म के दोस्त ही इतने सारे हैं कि सभी उनसे मुलाकात करने पहुँचते रहते हैं. इधर कुछ सालों से हिन्दयुग्म ने हिंदी किताबों के दुनिया में बेहतरीन काम किया है. कितने नए लेखकों को और कितनी नयी किताबों को वे लेकर आये हैं. शैलेश जी और हिन्दयुग्म के माध्यम से मुझे भी जाने कितने नए लेखकों को पढ़ने का और जानने का मौका मिला. काफी सारी और हर विधा की किताबें आपको हिन्दयुग्म में मिल जायेंगी, फिर वो कहानियों की किताबें हों, कविताओं की, या नॉवेल.

इस पुस्तक मेले में जहाँ एक तरफ अपने मनपसंद किताबें लेने अगर बड़े प्रकाशकों के पास आप जाएँ तो किताबें दो सौ से लेकर तीन-साढ़े तीन सौ रुपये तक की मिलती हैं, वहीँ हिन्दयुग्म से निकल रही लगभग सभी किताबें जो कि काफी बेहतरीन किताबें हैं, बहुत ही अफोर्डेबल दामों पर उपलब्ध हैं. इस स्टाल पर किताबों के लेखक भी मौजूद रहते हैं, लोगों को उनसे बातें करने का, उनकी किताबों के बारे में और जानने का अवसर भी मिल जाता है. हिन्दयुग्म के शैलेश भारतवासी और अंजनी भाई की मौजूदगी तो रहती है. पिछले दो तीन सालों से पुस्तक मेले में मेरा भी यह  प्रिय अड्डा बन गया है.

अंजुरी भर और बुरी लड़की के यादगार पल 

मेरे लिए इस साल पुस्तक मेला का एक दिन काफी यादगार दिन रहा. १३ जनवरी का दिन था वो. इस दिन मेरी दो किताबें प्रकाशित होकर आने वाली थीं. मेरी किताबें से ये न समझिएगा कि मेरी लिखी किताबें. मेरी लिखी किताबें मिलने में तो अभी बहुत वक़्त बाकी है. मेरी किताबें से मेरा मतलब मेरी दीदी(प्रियंका गुप्ता) और आंटी(प्रेम गुप्ता मानी) की किताब से था. अंजुरी भर और बुरी लड़की, जिसपर मेरा हक़ ज्यादा है. इसी दिन हमारे प्यारे अमित भैया और निवेदिता भाभी की किताब का विमोचन होना था. उनकी किताब कुछ ख्वाब-कुछ ख्वाहिशें एक युगल कविता संग्रह है. भैया-भाभी की मौजूदगी में ही अंजुरी भर और बुरी लड़की प्रकाशित होकर आ गयी, इससे अच्छा भला और क्या हो सकता था. प्रियंका दीदी और आंटी को इस दिन बहुत मिस किया. उन्हें होना चाहिए था इस पुस्तक मेले में. लेकिन कुछ परिस्तिथियाँ ऐसी थीं कि वे दोनों दिल्ली आ नहीं पायीं.

हाथों में है बुरी लड़की और अंजुरी भर

अंजुरी भर और बुरी लड़की का आना पिछले डेढ़ दो सालों से प्लान हो रहा था. जहाँ एक तरफ अंजुरी भर, आंटी की नौवीं किताब है वहीँ बुरी लड़की प्रियंका दीदी की छठी किताब है. आंटी(प्रेम गुप्ता मानी) साहित्य के क्षेत्र में एक जानी मानी हस्ती हैं वहीँ प्रियंका दीदी को भी अब तक इनके तीन किताबों के लिए पुरुस्कार मिल चूका है. इस किताब के आने में हिन्दयुग्म के प्रकाशक शैलेश भारतवासी का भी बहुत अहम योगदान है. बिना उनके ये संभव नहीं था. इन दोनों किताबों में ज़िन्दगी के अनेक रंग देखने को मिलेंगे. अगर आप सहज शैली में लिखी गयी अच्छी कहानियां,  ऐसी कहानियां जो आपको अन्दर तक छू जाए, पढ़ना पसंद करते हैं तो ये दोनों किताबें आपके लिए हैं. अभी दो दिन बाकी हैं पुस्तक मेले में, आज का दिन और कल का दिन. नयी वाली हिंदी,  हिन्दयुग्म के स्टाल पर अवश्य जाए और दोनों किताबें खरीद कर पढ़ें. इन दोनों किताबों के बारे में इत्मिनान से कुछ समय बाद लिखूंगा. फ़िलहाल तो आप पुस्तक मेले के बाकी दो दिनों का आनंद लें, किताबों में डूब जाएँ और अपने दोस्तों, प्रिय लेखकों और कवि से मिलने प्रगति मैदान पहुंचें. आज का भी मेरा दिन और कल का दिन उधर ही बीतने वाला है. तो मिलते हैं नयी वाली हिंदी, हिन्दयुग्म के स्टाल पर. कल इस ब्लॉग पर हिंदी के अलावा बाकी दूसरे स्टाल की हलचल की छोटी सी रिपोर्ट के साथ ये भी बताऊंगा किन दोस्तों से इस पुस्तक मेले में मुलाकात हुई.

`अंजुरी भर’  और `बुरी लड़की’ के अलावा, मेरे कुछ अपनों की कुछ और बेहतरीन किताबें जो इस साल हिन्दयुग्म के स्टाल पर मिल रही हैं वो हैं…

कांच के शामियाने – रश्मि रविजा 
कुछ ख्वाब कुछ ख्वाहिशें – अमित-निवेदिता 
इश्क तुम्हें हो जाएगा – अनुलता राज नैयर 

हिन्दयुग्म स्टाल का पता :
हॉल संख्या – 12
स्टाल संख्या – 216

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  1. आपके माध्यम से हम भी पुस्तक मेले की सैर कर आये …बहुत अच्छा लगा …
    अंजुरी भर' और `बुरी लड़की" के प्रकाशन की हार्दिक बधाई!

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