बीते साल की कुछ बातें और नए साल पर की गयी एक पुरानी आदत की शुरुआत

इस साल ब्लॉग के पहले पोस्ट की शुरुआत पापा की कुछ बातों से करना चाहूँगा जो उन्होंने नए साल के मौके पर अपने फेसबुक वाल पर लिखा था..

“वर्ष 2015 तो समाप्त हो गया है। हर आदमी अपने बीते हुये समय को जब याद करता है तो उसकी तस्वीर सामने आ जाती है जिसमे आदमी अपने बीते अच्छे और बुरे दिनों को देख कर अपने आगे के समय को सुधारता है। मैं भी 2015 के बीते वर्ष को जब देखता हूँ तो मिला जुला सा लगता है।जीवन है और उसे जीना है तो अच्छी और खट्टी दोनों स्वादों का आनंद तो लेना बनता है। ऐसा थोड़े होता है कि केवल जीवन में अच्छा ही हो या खराब ही।हर चीज संयोग पर निर्भर है। हम प्रयास करते हैं क्योकि प्रयास करना हमारे हाथ में है।परंतु प्रयास का फल किस प्रकार, कब और कितना मिलता है ये हमारे हाथ में नही होता है। जब जो वस्तु हमारे वश में नही है या मेरा उसपर कोई जोर नही रहता ऐसे में उस के बारे में सोचने से क्या लाभ।ऐसे में तो उचित यह होगा कि पीछे को बिसर कर आगे की सुधि ले। जीवन निरंतता और आगे बढ़ने का ही नाम है। सफलता असफलता तो जीवन के वह उबड़-खाबड़ पथ है जिस पर हर आदमी को एक न एक दिन चलना ही होता है। यह अलग बात है कि हर इंसान एक सा रास्ता तय नही करता है। लेकिन यह भी निश्चित है कि जो ऐसे उबड़-खाबड़ रास्ते पर जितना चलता रहेगा, उसे सफलता अंततः मिलेगी ही। 2016 में हमलोगों को भी 2015 की कमियों को भुलाकर आगे बढ़ना होगा। बढ़ना ही चाहिए । बढ़ना ही होगा ।”

पापा की बातें सच है, जो भी बीते साल में कमियां रह गयी हैं उसे भूल कर हमें इस साल फिर से नए जोश और नयी उम्मीद के साथ आगे बढ़ना होगा. वैसे मैं जब मुड़ कर बीते साल को देखता हूँ तो लगता है मेरे लिए बुरा साल नहीं था ये..सच कहूँ तो एक तरह से मैं इसे अच्छा साल कहूँगा. काफी अच्छे पल दिए हैं इस साल ने. शुरुआत फरवरी में पुस्तक मेले में हुई थी जब शिखा दीदी आई थीं और फिर इतने लोगों से मुलाकतें हुईं जो हमेशा याद रह जायेगी. फिर अगले महीने ही लखनऊ का वो ना भूलने वाला ट्रिप, प्रियंका दी, शिखा दी के साथ अमित भैया-भाभी के घर पर बीते वे बेहद खूबसूरत पल जो की मन में हमेशा हमेशा के लिए फ्रिज होकर रह गयी हैं. उसके अगले ही महीने, मेरा वो बैंगलोर का ट्रिप जिसे प्रियंका दीदी की मौजूदगी ने और यादगार बना दिया. फिर पापा, माँ, मोना और अयांश का दिल्ली ट्रिप जो की शायद सबसे यादगार पल रहा इस साल का. पहली बार ऐसा हुआ है जब हम सब एक साथ दिल्ली घूमें हों. खूब मज़ा आया था. भांजे अयांश की बदमाशियों ने तो इस ट्रिप में और चार चाँद लगा दिए थे. इस साल लगभग पूरे परिवार वालों का दिल्ली आना लगा रहा, और सभी मेरे घर पर रुके थे. मेरे लिए ये एक बड़ी अच्छी बात थी. इतने अरसे से दुसरे शहर में रह रहा हूँ लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं कि परिवार वालों का आना लगा रहा हो या कोई मेरे घर पर रुका हो. साल के आखिर में एक अच्छा सगुन और हुआ..छोटी बहन सोना की शादी हुई. इनके अलावा भी साल भर के कितने ही खूबसूरत मोमेंट्स रहें हैं. लेकिन इन खूबसूरत और यादगार पलों के बीच कुछ ऐसे काम भी शुरू हुए इस साल जो एक अरसे से रुके पड़े थे, या ये कहिये कि एक ही जगह अटके पड़े थे. उन्हें अभी भले पूरी रफ़्तार नहीं मिल पायी हो लेकिन सही दिशा में उन कामों की शुरुआत तो हो ही चुकी है.उम्मीद है इस साल उन सब काम को अच्छी रफ़्तार मिलेगी.

इस साल से तो वैसे बहुत सी उम्मीदें हैं. हर नए साल से होती हैं. अब तो ये वक्त ही बताएगा कि कितनी उम्मीदें पूरी होती हैं और कितनी नहीं पूरी हो पाती. जो भी हो इस साल खुद से तो एक वादा करना ही है, कि कम से कम अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़नी है. इस साल की शुरुआत मैंने अपनी एक बहुत पुरानी आदत से की है. सभी परिवार के सदस्यों को नए साल के ग्रीटिंग्स कार्ड और खत भेज कर. मुझे याद नहीं लेकिन शायद एक अरसे से मैंने किसी को कार्ड नहीं भेजा था. जिन जिन लोगों के पते मिल पाए मुझे, सभी को इस साल कार्ड भेजे हैं. हाँ कार्ड भेजने में देरी जरूर हो गयी लेकिन ना भेजने से तो देर भली न. सभी कार्ड के साथ एक ख़त भी भेजा है मैंने, और हर कार्ड के साथ कुछ सन्देश लिखे हैं. बता नहीं सकता कितनी ख़ुशी हुई थी सभी को कार्ड भेज कर. एक जनवरी को मैंने सभी कार्ड पोस्ट की थी(यहाँ पोस्ट का मतलब डाक से है, कहीं फेसबुक/ट्विटर या ब्लॉग की पोस्ट न समझ लीजियेगा. वैसे आज के ज़माने में पोस्ट बोलते ही सोशल मीडिया ध्यान में आता है). पोस्ट ऑफिस में बैठी महिला से मैंने पूछा, “ग्रीटिंग्स कार्ड पर कितने का स्टाम्प लगेगा?”. खुद पर थोड़ी शर्म भी आई, इतना भी नहीं पता कि कितने का स्टाम्प लगेगा? महिला ने जवाब दिया, “चार रुपये का..” उसके बाद फिर से मैंने एक बेवकूफी वाला सवाल पूछ दिया उनसे, “ये सामने जो पोस्ट-बॉक्स है उसी में डाल दूँ न?”. महिला ने जवाब दिया, “लाइए इधर दीजिये मुझे..”. उन्हें जब मैंने वे सारे कार्ड थमाए तो पहले तो कुछ झिझकी फिर मुस्कुरा कर बोलीं, “ज़माने बाद देख रही हूँ किसी को नए साल पर इतने कार्ड इकट्ठे पोस्ट करते हुए..”. अच्छा लगा उनका ये कहना और इस बात की ख़ुशी भी हुई कि जो काम मैं पिछले दो सालों से सोच रहा था उसे इस साल पूरा किया.

इस साल ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदते हुए एक बड़ी मजेदार बात सामने आई. सालों पहले हम जब ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदते थे तो उन दिनों Unicef के ग्रीटिंग्स कार्ड बाज़ार में नए आये थे जो आम कार्ड के वनिस्पत सस्ते होते थे. इस बार जब ग्रीटिंग्स खरीदने दुकान गया तो देखा अर्चिस या हॉलमार्क केअच्छे ग्रीटिंग्स कार्ड जहाँ ४० रूपए से शुरू हो रहे थे वहीँ Unicef के कार्ड आज भी 10 से लेकर 20 रुपये में मिल रहे थे. और सबसे अचरज की बात ये थी की ये ग्रीटिंग्स कार्ड बिक भी रहे थे. मुझे लगता था कि आज के तड़क-भड़क के ज़माने में इतने सिम्पल कार्ड कौन खरीदेगा? लेकिन लोग खरीद रहे थे. मुझे सालों पहले की बात भी याद आई जब हम कोई अलग सी दिखने वाले कार्ड को झट खरीद लेते थे ये सोच कर कि कहीं कोई दूसरा इसे न ले ले. कार्ड पर हर के लिए सन्देश लिखते हुए भी पहले की बातें याद आने लगीं. कैसे खोज खोज कर हम संदेशें लिखते थे. संदेशे और चिट्ठियों को लिखने में मुझे पूरे एक दिन का वक़्त लग गया. लेकिन सब को जब कार्ड पोस्ट करने के बाद ख़ुशी बहुत महसूस हुई.

एक और प्रोमिस खुद से किया है इस साल. साल में कम से कम दो बार सभी मित्रों को और सभी परिवार के सदस्यों को चिट्ठी जरूर लिखूंगा. अपने इस प्रोमिस को कहाँ तक निभा पाता हूँ ये तो नहीं पता लेकिन नए साल पर जब सभी को खत लिख रहा था तो उस समय इतनी अच्छी सी फिलिंग आ रही थी जिसे मैं बयां नहीं कर सकता. वैसे तो कार्ड और चिट्ठियों के अलावा भी कितनी बातें हैं जो इस साल के लिए सोच रखी है. अब देखिये किसी कहाँ तक पूरा कर पाता हूँ. अपने इस ब्लॉग से भी इस साल एक प्रोमिस किया है, ब्लॉग-लेखन को कुछ और रफ़्तार देनी है, पिछले साल बड़ा सुस्त सा रहा था ब्लॉग. अब इस साल कोशिश रहेगी यहाँ नियमित लिखता रहूँ.

चलते चलते, बीते सालों के कुछ खुशनुमा पल..तस्वीरों में..

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  1. अभी……..क्या ऐसा ही गुलाबी लिफ़ाफ़ा हमें भी मिलने वाला है???
    सच!! मैं भी कोशिश करूंगी चिट्ठियां लिखने की….
    हालाँकि रक्षाबंधन पर मैं अब भी सभी भाइयों को राखी टीके के साथ बाकायदा चिट्ठियां लिखती हूँ जिनकी पहली लाइन होती हैं….
    हम सब यहाँ कुशल से हैं आशा है आप सब भी अच्छी तरह होंगे 🙂

    तुम्हारे card का इंतज़ार है….मेरे पास बरसों पुराने ख़रीदे और सहेजे कोरे कार्ड्स रखे हैं अब तक……
    नए साल में और भी ज़्यादा खुशियाँ पाओ ऐसी दुआ है तुम्हारे लिए…
    स्नेह…
    अनु

  2. क्या इत्तेफ़ाक़ है कि आज ही यह पोस्ट आई और आज ही तुम्हारा कार्ड और चिट्ठी मुझे मिली। और ज़माने का बदलना देखो कि कार्ड छोड़ पहले चिट्ठी पढ़ना शुरू किआ। बहुत रियर मिलती है न। कोई 15-16 साल बाद कोई चिट्ठी मिली होगी।
    खैर…अब यह सब देख कर कैसा लगा और फुदक फुदक मैंने कितना हल्ला मचाया यह तो तुम समझ ही सकते हो इसलिए वो बताने की और शुक्रिया कहने की तो जरुरत ही नहीं है न 🙂

  3. क्या इत्तेफ़ाक़ है कि आज ही यह पोस्ट आई और आज ही तुम्हारा कार्ड और चिट्ठी मुझे मिली। और ज़माने का बदलना देखो कि कार्ड छोड़ पहले चिट्ठी पढ़ना शुरू किआ। बहुत रियर मिलती है न। कोई 15-16 साल बाद कोई चिट्ठी मिली होगी।
    खैर…अब यह सब देख कर कैसा लगा और फुदक फुदक मैंने कितना हल्ला मचाया यह तो तुम समझ ही सकते हो इसलिए वो बताने की और शुक्रिया कहने की तो जरुरत ही नहीं है न 🙂

  4. शुरू में हम सोचते जरूर हैं लेकिन समय के साथ कब क्या होता चला जाता है,पता ही नहीं चलता…सब समय के गर्त में है …लेकिन अपने आप से वादा करना अच्छे काम के लिए बहुत अच्छी बात है इससे हम दृढ़ संकल्पित होते हैं ..
    बढ़िया विचार प्रस्तुति
    नए साल की हार्दिक शुभकामनायें

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