इवनिंग डायरी : किस्से-कहानियाँ


आज एक फिल्म देखी..तमाशा. फिल्म तो बेहतरीन है...इस साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक. तमाशा एक ऐसे इंसान की कहानी है जो खुद को खोज रहा है.. जो आइडेन्टटी क्राइसिस का शिकार है, जिसे कहानियों से इतना प्रेम है, वो कहानियों में इस कदर समाया हुआ है कि  स्प्लिट पर्सनेलिटी का शिकार हो गया है. उसके अन्दर का एक इंसान वो है जो दुनिया को बाहर  से दीखता है, कम बोलने वाला, डिसेन्ट बर्ताव करने वाला, ज़िन्दगी से कोम्प्रोमाइज़ करते हुए चलने वाला.. तो वहीँ दूसरा इन्सान उसके अन्दर खुल के ज़िन्दगी जीने वाला बिंदास इंसान है. फिल्म का ये किरदार दिल और दुनिया की बीच फंसा एक व्यक्ति है. इस किरदार के बचपन को फिल्म में बड़े ख़ूबसूरती से दिखाया गया है. ये किरदार अपने बचपन में पैसे जमा कर के कहानियां सुनता था. फिल्म के इस एक भाग ने मेरी जाने कितनी यादें ताज़ा कर दी. कहानियां सुनना बचपन में किसने नहीं किया होगा? अब के बच्चे तो खैर कार्टून नेटवर्क में और गेम्स में लगे होते हैं, लेकिन हमारे बचपन की बातें याद कीजिये तो ज़रा, हममें से लगभग सभी का बचपन किस्से कहानियों में बीता है. बचपन में किस्से कहानियां सुनना किसी पसंद नहीं था, घर में नाना-नानी, दादा-दादी, माँ-पापा कहानियां सुनाते थे, आसपड़ोस के बड़े बुजुर्ग भी कितनी कहानियां बच्चों को सुनाते थे. मेरे लिए बचपन में कहानियों का मुख्या श्रोत तो नानी, माँ या पापा ही थे. लेकिन इनके अलावा भी कई लोग थे जो बचपन की कहानियों से जुड़े हैं, आज बड़े दिनों बाद दिल कर रहा है उन बातों को याद करने का.


बचपन 

मुझे अपनी बचपन की एक बात आज भी बड़े अच्छे से याद है. हमारे घर में एक नौकर था संभु. अमिताभ बच्चन का वो जबरदस्त फैन था. जब भी उसे फुर्सत होती, गर्मी के दिन में शामों को या जाड़े के दोपहर को वो हमें फ़िल्मी कहानियां सुनाता. जो फ़िल्में अमिताभ की उसको पसंद थी वो उनकी कहानियां हमें सुनाता. बचपन में फ़िल्में वैसे भी हम बहुत कम देखते थे. सिनेमा हॉल जाना तो बहुत दूर की बात थी. हम बच्चे जिद करते तो दो महीने में एक बार भाड़े पे विसिपी आ जाता था हमारे लिए ताकि हम फिल्म देख सके. ऐसे में फिल्मों से नाता जोड़ने का काम हमारे लिए संभु ही किया करता था. वो जो भी फ़िल्म देखता उस फिल्म की कहानी हमें सुनाता था और वो भी फुल एक्शन  के साथ. बाकी एक्टर्स के फिल्मों की कहानी वो बड़े सामान्य ढंग से सुनाता था लेकिन अमिताभ के फिल्मों की कहानी सुनाते वक़्त जोश आ जाता था उसे, और उसपर भी अगर उसकी सबसे पसंदीदा फिल्म "मर्द" की कहानी हो तब तो कहानी सुनाते वक़्त उसके अन्दर  का जोश देखने लायक होता था. जाहिर सी बात है हम भी पूरे जोश और रूचि के साथ  सुनते थे इस फिल्म की कहानी, इस एक फिल्म की कहानी उससे जाने हम कितनी बार सुन चुके थे. हम बच्चे भी कम थोड़े न थे, अक्सर संभु को कहते, हमें "मर्द" की ही कहानी सुनाओ...और फिर संभु का शुरू हो जाता "मैं हूँ मर्द ताँगे वाला.." के साथ ही `मर्द' की कहानी सुनाने का सिलसिला.. मर्द के अलावा शहंशाह ऐसी दूसरी फिल्म थी जिसकी कहानी सुनाते वक़्त वो पूरे जोश में होता, और इस कहानी को सुनते वक्त भी हम सब बहुत आनंद लेते थे . मुझे आज भी याद है "मर्द" और "शहंशाह", ये दोनों फ़िल्में मैंने पहली बार तब देखी थी जब मैं दसवीं में था लेकिन उस समय तक इतनी बार इन दोनों फिल्मों की कहानी सुन चुका था कि फिल्म मुँहज़बानी  याद थी. अब भी सच कहूँ तो चैनल बदलते वक़्त अगर इन दोनों में से किसी भी फिल्म पर नज़र पड़ जाती है तो ऊँगली उसी चैनल पर कुछ देर के लिए ठिठक जाती  हैं.

संभु के अलावा बचपन में एक और कहानियों का श्रोत थे मेरे और मेरी बहन के लिए. हमारे टयूशन टीचर जिनका नाम शायद बिरेन्द्र था. इनसे तो हमनें हर तरह की कहानियां सुनी हैं, पढाई करते हुए जब बोर हो जाते थे या कभी दिल नहीं करता था पढ़ने का तो ये हमें कहानियां सुनाया करते थे. ये हमें अपने गाँव की कहानी सुनाते. अक्सर भूत प्रेतों की कहानियां भी सुनाते थे ये हमें. कुछ कहानियां तो इनकी अब तक याद है, जैसे कैसे इनके भाइयों को किसी आत्मा ने एक टूटा पुल पार करने से बचाया था और कैसे गाँव के एक पुराने सिनेमा हॉल में रात के वक़्त भूत प्रेत सिनेमा देखते थे. ये कहानियां अब भले बेतुकी और मजाक वाली लगे हमें, लेकिन उन दिनों तो कसम से इतनी रोमांचक होती थीं कि हम इन कहानियों के हैंगओवर में रहते थे. याद है अब तक कैसे जब ऐसी कहानियां सर सुनाते थे तो हम स्कूल में बाकी दोस्तों को लंच टाइम में ये कहानियां सुनाते थे. बाद में शायद इनकी कोई नौकरी लग गयी तो हमें पढ़ाने ये नहीं आतें थे, लेकिन बाद में सर को हम जितना टयूशन के लिए मिस करते थे उससे कहीं ज्यादा इन्हें हम इनकी कहानियों के लिए मिस करते.

स्कूल  के दिन 

दसवीं क्लास में हम लोग टयूशन पढ़ने जाते थे, शिव शंकर सिंह नाम था सर का, बाकी बच्चे इनसे चिढ़ते थे, लेकिन मेरे से हमेशा सर की ट्यूनिंग काफी अच्छी रही. सर गाने के शौक़ीन थे, और मुकेश के बहुत बड़े वाले फैन. यहाँ तक कि कोचिंग में एक तरफ हारमोनियम रखा होता था, शुरुआत में ही एक दिन जब यूहीं इन्होने हमें हारमोनियम पर "एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल" गाना सुनाया तो मैंने तारीफ़ करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि सर मुझे तो लग ही नहीं रहा था कि आप गा रहे हैं, लग रहा था जैसे मुकेश की आवाज़ कानों में आ रही है. बस फिर क्या था, उस दिन से लेकर अंत तक सर की ट्यूनिंग भले बाकियों से कैसी भी रही हो,  मेरे साथ तो एकदम परफेक्ट थी. सर भी हमें जाने कहाँ कहाँ से चुन चुन कर कहानियां सुनाते थे, हर इतवार को खासतौर पर पढाई के बाद हम आधा घंटा रुकते थे सर की कहानियां सुनने के लिए. सर अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों की कहानियां सुनाते तो कभी फ़िल्मी कलाकारों और गायकों की कहानियां. सर की कहानियां भी इतनी मजेदार होती थीं कि हम कोशिश करते सन्डे को कुछ भी हो जाए लेकिन कोचिंग जरूर जाना है.

सर के अलावा कुछ दोस्त भी ऐसे मिले जो कहानियों से गज़ब तरह से obssesed थे. जहाँ दो दोस्त दिव्या और शिखा अपनी काल्पनिक दुनिया की जाने कौन सी कहानियां सुनाते थकती नहीं थी वहीँ प्रभात ऐसा दोस्त था जो हमेशा अपने परिवार की, आसपास के लोगों की बातें शेयर करता था. हम दोनों को कोई फिल्म पसंद आ जाती तो उस फिल्म की कहानी पे अलग से बातें होने लगती. दिव्या शिखा ने तो ये प्लान तक बना लिया था कि जैसे सलीम-जावेद की जोड़ी फिल्मों में कहानियां लिखती थी, वैसे ही हमारी तिकड़ी को भी फिल्मों की कहानियां लिखनी चाहिए. लेकिन मेरा सबसे बड़ा मेरा कंसर्न था, कि अगर हमारी कहानियां परदे पे आ गयी तो कहीं दर्शकों को सिनेमा हॉल के बाद सीधे पागलखाने न जाना पड़ जाए. इस बात पर दिव्या की सलाह होती, प्रभात को भी हमारी तिकड़ी में शामिल कर दो, अगर दिव्या-शिखा की बेतुकी और इललॉजिकल बातों से बात थोड़ी इधर उधर जाए तो अभि-प्रभात की बोरिंग और सिरिअस बातों से कहानी फिर थोड़े ट्रैक पे जाए.

कॉलेज के दिन 

इंजीनियरिंग में आने के बाद भी कहानियों का सिलसिला थमा कहाँ, बस फर्क इतना पड़ा कि कहानियां कम और बातें ज्यादा होने लगी. लेकिन ये बातें भी कहानियों से कहाँ कम थी, हम दोस्तों की ये बातें भी तो कहानियां ही होती थी. मुझे आज भी याद है शुरूआती दिनों में अपने दोस्त अकरम के साथ रात रात भर बैठ के एक दूसरे की कहानियां सुनते थे. अपने पुराने दोस्तों की बातें याद करते, तो आने वाले दिनों की भी कई सारी प्लानिंग करते.अकरम के अलावा, समित, आशीष, आशीष भारती, और संकल्प, इन सब के साथ भी कितने किस्से कहानियां हमनें शेयर की. हर शाम हम टहलने निकलते, खुबा कॉलेज के पीछे झील थी जहाँ हम हर शाम अड्डा जमाते थे और जाने कितनी कहानियां एक दूसरे से सुनते और सुनाते. सबसे ज्यादा जिनकी कहानियां सुनी जाती थी वो मेरी ही होती. मैं अपने बचपन की, बचपन में सुने किस्सों की, स्कूल के अपने दोस्तों की और भी जाने कितनी कहानियां कॉलेज के दोस्तों के साथ शेयर करता, और वे भी बड़े मन से मेरी कहानियां सुनते थे. शायद कॉलेज के बाद किस्से-कहानियों का वो सिलसिला खत्म ही हो गया. वो बातें वो कहानियां इंजीनियरिंग के दिनों की आज भी बहुत याद आती है.


कॉलेज के बाद का समय - बैगलोर और दिल्ली 

कॉलेज के बाद मैं बैंगलोर आया जहाँ बड़े लम्बे समय तक मैं रहा. यहाँ मेरे ऐसे कोई दोस्त नहीं थे जो कहानियों में दिलचस्पी लेते, एक मनीष सर थे जो थोडा बहुत इंटरेस्ट लेते थे, लेकिन ज्यादा नहीं. मुझे बैंगलोर आने के बाद अपने इंजीनियरिंग के दोस्तों की और उन किस्से कहानियों के दौर की बड़ी याद आती. ये ब्लॉग भी शायद मैंने उस वक़्त इस वजह से ही बनाई थी, कि मेरी बातें सुनने वाला यहाँ तो कोई नहीं कम से कम ब्लॉग पर तो अपने मन की बातें कर लिया करूँ, यहीं वे सब बातें-किस्से-कहानियां शेयर कर लूँ जो पहले दोस्तों से बाँट लिया करता था.

बैंगलोर में संजोग से कुछ दिन बाद एक दोस्त मिले, रवि जी. इन्हें भी मेरी तरह बातें करने का शौक था. किस्से कहानियां सुनने सुनाने का शौक था. अक्सर शाम को हमारी महफ़िल जमती थी. वीकेंड तो पूरा बस पुराने किस्से कहानियों में ही खोया रहता था. बस चाय पे चाय के दौर और किस्से कहानियों का सिलसिला चलता रहता. उन दिनों भी कितनी बार ऐसा हुआ है कि जो पुराने किस्से रवि जी को सुनाता उसे ही बाद में ब्लॉग पर लिख देता. जब तक बैंगलोर में था, रवि जी एकमात्र दोस्त थे जो अपनी कितनी ही कहानियां हमें सुनाते और मेरी कहानियां सुनते. बैंगलोर से दिल्ली आने के बाद ये रहा सहा कहानियों का सिलसिला भी ख़त्म हो गया.

बैंगलोर से दिल्ली आ गया, लेकिन इस शहर से इस एक बात को लेकर बड़ी निराशा रही है अब तक. ऐसा कोई दोस्त नहीं मिला यहाँ जिसे बातों का शौक हो, या शायद ये भी हो सकता है कि यहाँ के दोस्त अपनी ज़िन्दगी में कुछ ज्यादा ही मशरूफ हैं. सबके अपने परिवार हैं, अपनी जिम्मेदारियां हैं.. उन्हें शायद ये भी लगता हो कि पुराने बातों को याद करने से, भूले हुए किस्से-कहानियों से कोई फायदा नहीं होने वाला बल्कि समय ही बर्बाद होगा. खैर जो भी हो, मुझे दोस्तों से इस बात को लेकर कोई शिकायत नहीं है.

दिल्ली में ऐसे दोस्त न मिलने का असर मेरे मोबाइल बिल पर हुआ है. उन दोस्तों से जिन्हें कुछ सुनने कुछ सुनाने का शौक है, उनसे घंटों बातें होती हैं. सबसे ज्यादा जिसने मेरी इस आदत को झेला है वो है मेरी प्यारी प्रियंका दीदी. उससे तो न जाने कितनी बार घंटों बातें की है फ़ोन पर, कितने किस्से कहानियां सुने भी हैं और सुनाई भी है. इस पोस्ट को लिखने का इरादा भी उससे यही सब बात करते हुए किया था मैंने. मुझे लगता है ये किस्से कहानियां हमारी ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा हैं. हम कितना कुछ सीखते हैं इन्हीं किस्सों से, इन्ही कहानियों से. आज भी जब पापा या माँ अपने पुराने दिनों की बातें सुनाते हैं तो बड़ा अच्छा सा अहसास होता है, अब भी कितनी बातें सिखने को मिलते रहती हैं उन्हीं पुराने किस्से कहानियों से. सच कहें तो ये किस्से कहानियां हमारे लिए बेहद जरूरी हैं, और हमसे भी ज्यादा बच्चों के लिए. आज के दौर में जहाँ बच्चे किस्से कहानियों से दूर होते जा रहे हैं, कहीं ऐसा न हो ये किस्से कहानियां बस फिल्म तक ही सीमित होकर रह जाए.




Comments

  1. तुम्हारे किस्से होते ही इतने अच्छे हैं भैय्यू...हमको पता ही नहीं चलता कि कितना वक्त बीत गया...| और सच्ची...ये शम्भू वाले किस्से में इतना मज़ा आया था न, तभी तो हमको लगा था कि इस पर एक पोस्ट आनी ही चाहिए...|
    और हाँ...अब ऑन अ सीरियस नोट...बहनें भाइयों की बातें-आदतें झेलती नहीं, उनका आनंद लेती हैं...| इस बात के लिए तो कान खिचेगा तुम्हारा...:P

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  2. स्मृतियाँ ताज़ी हो गयी .......... बहुत कुछ सामने से गुजर गया

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया