अनुरागी मन

साउथ एक्सटेंसन के एक कैफे में बैठा हुआ हूँ. समय बिताना है कुछ देर यहाँ. एक किताब बैग में रखे हुए हूँ जाने कब से. पिछले दस पंद्रह दिनों से शायद. पिछले दो तीन महीनों में जितनी नयी किताबें आयीं हैं उनमें अब तक कोई नहीं पढ़ पाया हूँ. टॉप प्रायोरिटी पर यही किताब थी जिसे अभी खत्म किया हूँ. यहाँ इस कैफे में धीमी आवाज़ में पुराने फिल्मों के गाने बज रहे हैं. “चिट्ठी आई है...वतन से चिट्ठी आई है” और मैं गाने को सुनता हुआ हाथ में “अनुरागी मन” लिए बैठा हूँ. किताब की बहुत सी कहानियां मन में घूम रही हैं. कुछ कुछ नोस्टालजिक सा फील आ रहा है किताब पढ़ते हुए. कुछ कहानियों  से मैं अजीब तरीके से जुड़ गया था. किताब की कहानियां पढ़ते हुए मुझे जाने क्यों पहले का बहुत कुछ याद आ रहा है. शायद अपने पुराने क्वार्टर की बातें या शायद उससे भी पहले, नानी घर की बाते. बहुत शुरुआत की बातें. करीब १९९४-९५ की बातें. मेरे आसपास जितने लोग थे, मामा, मामा के दोस्त, घर के आसपास के भैया लोग, सभी से मुझे ऐसे किस्से सुनने को अकसर मिल जाते थे. किताब की सभी कहानियों के जितने भी पात्र हैं मैं सबसे आसानी से रिलेट कर सकता हूँ. यूँ लगता है जैसे कहीं न कहीं, कभी न कभी सभी पात्रों से मैं मिल भी चुका  हूँ.

आप सोच रहे होंगे कि मैं ये क्या बकवास करने लगा आज. असल में आज की ये पोस्ट एक किताब के ऊपर है. इस पोस्ट को तो वैसे पहले आ जानी चाहिए थी. लेकिन किताब पढ़ने में ही देर हो गयी, और इसमें सारा कसूर मेरे आलसीपने का है और कुछ कुछ पिछले महीने के व्यस्त समय का. किताब का नाम है “अनुरागी मन” जिसे लिखा है अनुराग चाचा(अनुराग शर्मा) ने. अनुराग चाचा का नाम ब्लॉग की दुनिया में परिचय का तो बिलकुल भी मोहताज नहीं. जो भी हिंदी ब्लॉगिंग से सम्बन्ध रखते हैं वो इनके नाम से अच्छे से परिचित होंगे. इनके ब्लॉग से तो कब जुड़ा ये याद नहीं, नहीं भी तो चार से पाँच सालों से तो जुड़ा हुआ हूँ ही. इनकी कहानियों का और इनकी कविताओं का मैं हमेशा से प्रशंसक रहा हूँ. इनके अलावा ब्लॉग पर जाने कितने मुद्दों पर ये लिखते आये हैं. 

मैं अपनी बात करूँ तो पहले भी किताबों से जुड़ी बातें यहाँ पोस्ट करते आया हूँ लेकिन जो मैं हर पोस्ट में कहता हूँ वही बात यहाँ भी कहूँगा, कि मुझे समीक्षा लिखना नहीं आता तो इसे किताब की समीक्षा समझ कर तो बिलकुल भी मत पढ़िएगा. बहुत छोटी सी कोशिश है मेरी किताब मुझे कैसी लगी इसपर कुछ लिखने की.
किताब की पहली कहानी से ही मैं किताब से जुड़ गया था.  किताब की पहली कहानी है “वह कौन था”. रहस्यमय शीर्षक लग रहा है न. कहानी भी वैसी ही है. तीन दोस्तों की कहानी है, जिसमें से एक दोस्त मोहन की मृत्यु हो जाती है. चुनमुन जो मोहन का दोस्त है उसे मोहन की मौत की खबर बहुत पहले मिल जाती है. लेकिन एक चमत्कार होता है और एक दिन अचानक रहस्यमय ढंग से चुनमुन की मोहन से मुलाक़ात हो जाती है. वो रहस्मयी मुलाकात क्या थी? यही कहानी है. मुझे तो कहानी के आखिर में  ये जवाब नहीं मिला कि वह कौन था? चुनमुन से जिसकी मुलाकात हुई थी वह क्या मोहन था? अगर मोहन नहीं था तो वह कौन था? इस रहस्य को जानने के लिए आपको तो किताब पढ़नी पड़ेगी.

किताब की सभी कहानियां वैसे तो अच्छी हैं, किसी एक श्रेणी की कहानियां नहीं हैं, रूमानियत लिए भी कहानिया हैं, तो रिश्तों के ऊपर भी कहानियां हैं तो सामाजिक मुद्दों पर भी कहानियां हैं इस संग्रह में. मुझे कौन कौन सी कहानियां पसंद आई उसकी बात करूँ तो....लगभग सभी...पहली कहानी के बाद की जो कहानी थी, “खाली प्याला”. इसमें खासकर जो कहानी का एक पात्र है नीलाम्बक्कम जी और जिससे कहानी के नायक की अच्छे सम्बन्ध होते हैं, उनके किरदार से मैं थोड़ा जुड़ सा गया. मुझे कल्याण के दिन की बात याद आ गयी, मेरे पड़ोस में जयंत जी नाम के एक व्यक्ति रहते थे. उनका स्वभाव बहुत हद तक नीलाम्बक्कम जी से मिलता जुलता था. वो भी एक बैंक में ही कार्य्ररत थे. बुरे समय पर उनसे भी मुझे वैसे ही मदद मिली जैसे कहानी में होता है. कहानी क्या है...नीलाम्बक्कम जी ने कैसे मदद की नायक की और उनके सम्बन्ध क्या हैं इसके लिए तो आपको कहानी पढ़नी होगी.

किताब की कुछ कहानियां पढ़कर जाने क्यों ऐसा लगता है ये कहानी कम संस्मरण ज्यादा है. जो भी हो, मैं तो कहानी के किरदारों से जुड़ता चला गया, फिर चाहे वो “जावेद मामू” कहानी में जावेद मामू का ही किरदार क्यों न हो. या चाहे एक दूसरी कहानी “करमा जी की टुन्न परेड में करमा जी का किरदार और उनके “कैपिसिटी” का जिक्र. ये “कैपिसिटी” कुछ और नहीं बल्कि कितनी दारु आप चढ़ा पाते हैं वो क्षमता है. इस किरदार के बारे में पढ़ते ही मुझे ख़ास दो तीन लड़कों की याद आ गयी जिनका जिनका किरदार करमा जी से बेहद मिलता जुलता था, या कहे की एकदम वही था.

“मजदूर का एक दिन” एक मजदूर की कहानी  है, इस कहानी का अंत मन में एक टीस छोड़ जाता है, वहीँ एक दूसरी कहानी है "एक और इन्सान". इस कहानी में नायक कुछ लोगों से ठगा जाता है और उसे लगने लगता है कि पूरी दुनिया में लुटेरे ही हैं, और इसी वजह से वो एक जरूरतमंद की मदद नहीं कर पाता. इस कहानी के आखिर में भी मन में एक टीस उठती है. ये सोचते हैं हम कि जाने अनजाने हम भी ऐसा करते हैं. आसपास इतने ठगी लोग हैं, कैसे पहचाने कौन सही है कौन गलत?
एक दूसरी कहानी है “सौभाग्य” जो मुझे अच्छी लगी. इसे पढ़ते हुए जाने क्यों बीते दिनों की कुछ बातें याद आने लगी. मन में एक फ्लैशबैक सा चलने लगा था. इसके अलावा एक और कहानी जो आम कहानियों से थोड़ी हट के लगी मुझे वो “असीम”. एक मजेदार बात भी हुई असीम कहानी पढ़ते वक़्त. उस कहानी में एक गाने का जिक्र है, “ढूँढो ढूँढो रे साजना...” और ये कहानी पढ़ते वक़्त, इस गाने का जिक्र पढ़ते वक़्त मैंने गौर किया कैफे में इसी फिल्म का एक और गाना बज रहा था... “नैन लड़ जाहियें तो...”. इन दो कहानियों को आप थोड़ी रूमानियत लिए हुए कहानियां कह सकते हैं. “असीम” को तो पक्के तौर पर रूमानी कहेंगे. इस कहानी का ट्रीटमेंट मुझे सच में बड़ा प्यारा लगा. कहानी का अंत भी ऐसा है जो आमतौर पर कहानियों में देखने को नहीं मिलता . एक और कहानी “सच मेरे यार है..” तो बहुत पसंद आई थी...एक बात जो मुझे लगी कि इस किताब की सभी कहानियों के अंत में कुछ न कुछ ऐसी बात होती है जिसकी आप उम्मीद नहीं करते. इस कहानी में भी वही हुआ.

और किस किस कहानियों का नाम लूँ मैं. “अनुरागी मन” जो किताब की सबसे लम्बी और आखिरी कहानी है उसके ठीक पहले तीन लघुकथा है, “नसीब अपना अपना”, “गंजा” और “आती क्या खंडाला”. ये सभी कहानियां मुझे अच्छी लगी. इसके अलावा “टोड” भी पसंद आई.

जैसा कि  अधिकतर कहानी संग्रह में होता है, जो कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी होती है, वो ख़ास होती है. वैसे ही इस किताब में भी है. “अनुरागी मन” मुख्य कहानी है किताब की और निसंदेह सबसे बेहतरीन कहानी. लम्बे समय तक याद रह जाने वाली कहानी है ये. तीन दोस्त हैं कहानी में, ईर, बीर और फत्ते. बीर यानी वीर सिंह बाकी दो दोस्तों को अपनी कहानी सुना रहे हैं. जो कहानी वीर सिंह सुना रहे हैं वो उनके और उनकी परी “झरना” के बारे में है. कहानी के शुरुआत में जितने प्यारे पल दीखते हैं और हम इस उम्मीद से कहानी आगे पढ़ते हैं कि को प्यारी सी प्यार की कहानी पढ़ने को मिलेगी. लेकिन कहानी में अचानक मोड़ आने शुरू होते हैं, और अजीबोगरीब हालात पैदा हो जाते हैं. ये कहानी वीर सिंह का झरना के प्रति प्यार और झरना का वीर सिंह के प्रति प्यार के ऊपर ही कहानी है. कहानी का अंत लेकिन मुझे तो पूरी तरह स्तब्ध कर गया. कुछ देर तक तो किताब के आखिरी पन्ने पर मैं अटका रहा. “अनुरागी मन” एक ऐसी कहानी है, जो मेरे ज़ेहन में लम्बे समय तक रहेगी.

ऐसा कब पढ़ा था कोई कहानी संग्रह जिसमें एक अलग ही तरह का नोस्टाल्जिया हो ये याद नहीं आता. इस संग्रह में कुछ कहानियां ऐसी हैं जिसमें जो मुख्य पात्र है वो कहीं पुराने जगह वापस जाता है, जहाँ उसनें अपने कुछ दिन बितायें हों, कुछ पुराने लोगों से मिलता है. कहानी पढ़ते हुए जाने क्यों मेरे अन्दर की एक इच्छा सिर उठाने लगी...उन सभी जगहों पर वापस जाने की इच्छा जहाँ कुछ समय के लिए ही सही, रुका था मैं, जहाँ के आसपास के लोगों से एक रिश्ता बना था, उन सभी पुराने परिचितों से मिलने का फिर से मन करने लगा जिनसे एक अरसे से मुलाक़ात नहीं हुई है. सबसे अच्छी बात इस किताब की ये है कि आप सभी पात्र से मिले होंगे पहले कभी कहीं न कहीं और सभी पात्र आपको अपने आसपास के ही लगेंगे, कभी कभी ये भी लगेगा कि कहानी के पात्र स्वयं आप ही हैं. इंसानी रिश्तों पर सभी कहानियां आधारित हैं जिसे बेहद सरज और सहज अंदाज से लिखा गया है. यूँ  भी अनुराग चाचा का लिखा हुआ हमेशा सरल और सहज होता है.

कुछ कहानियां चाचा के ब्लॉग पर पढ़ी थी...वो अब तक याद है...जैसे एक कहानी जिसमें लड़का लड़की बड़े समय बाद मेट्रो में अचानक मिल जाते हैं(माफ़ कीजियेगा चचा मुझे कहानी का शीर्षक बिलकुल याद नहीं आ रहा). एक और कहानी का शीर्षक जो चमत्कारिक रूप से याद आ रहा है मुझे सुखान्त...चमत्कारिक रूप से इसलिए कहा कि मुझे याद नहीं रहते अकसर शीर्षक. ऐसे ही और भी कई कहानियां हैं....जैसे इसी कहानी संग्रह में है “गरजपाल की चिट्ठी” और “जाके कभी न परी बिवाई”, जो मुझे बेहद पसंद आई थी, जिन्हें ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुका था. गरजपाल की चिट्ठी खासतौर पर याद है. मुझे याद इसलिए भी है कि चाचा ने मेरी किसी पोस्ट में ही इस कहानी का लिंक दिया था. उन सभी कहानियों के जैसे जो उनके ब्लॉग की मुझे याद रह गयी है इस किताब में भी वैसी कई कहानियां हैं जो मुझे लम्बे समय तक याद रह जाने वाले हैं. अनुराग चाचा की सहज शैली, कहानी के आखिर तक पाठक को बांधे रहने की क्षमता और उनके पात्र "अनुरागी मन" को और खूबसूरत बना देते हैं. निश्चित तौर पर पढ़ी जाने वाली किताब है "अनुरागी मन".

सबसे आखिर में चलते चलते, असीम कहानी से लिया गया ये कोट –

'प्यार कोई मिठाई का टुकड़ा नहीं जो किसी को देने से खत्म हो जाएगा. यह तो खुशबू है. जितना दोगे उतना ही फैलेगी.'




Comments

  1. 'प्यार कोई मिठाई का टुकड़ा नहीं जो किसी को देने से खत्म हो जाएगा. यह तो खुशबू है. जितना दोगे उतना ही फैलेगी.'
    What a quote!!!
    Beautiful post...!

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  2. तुम लाख कहो तुम समीक्षाएं नहीं लिख पाते...पर अब भी मान लो मेरी बात...तुम बहुत अच्छी तरह से बताते हो किसी किताब के बारे में...|
    अब तो ये पक्का पढनी ही पढेगी |

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  3. बहुत बढ़िया अभिषेक ।

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  4. खूब बढ़िया … अनुरागी मन की दास्ताँ

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  5. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 100वीं बुलेटिन रिपोर्ट - हर्षवर्धन श्रीवास्तव में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  6. अनुराग जी को मैं भी बहुत समय से जानती हूँ...मिली नहीं कभी ...... एक खास बात उनके लेखन में ये है कि हमेशा सकारात्मकता मिलेगी और अन्त परिणाम के साथ होता है ज्यादातर ....

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  7. तुम्हारे बारे में क्या लिखूँ ..... यही कि तुम जैसे हो वैसे ही लिख भी देते हो ..... सीधा और सरल सा ....पढ़ी नही किताब लेकिन "जाके कभी न परी बिवाई" का पॉडकास्ट सुना है ...

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  8. वाह.... बहुत बढिया लिखा है किताब के बारे में और कहानियों के बारे में. निश्चित रूप से खरीदना चाहूंगी किताब.

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  9. अभी उनकी पोस्ट पर यही लिख कर आ रहा हूँ कि बच्चा है अपना, दिल से लिखता है. समीक्षा वमीक्षा तो साहित्य के चोंचले हैं. असली चीज़ है किसी किताब को पढते हुये उसे दिल के करीब पाना और ख़ुद से जोड़ लेना. और तुम्ने अनुराग जी के लिये जो भी लिखा वो बिल्कुल दिल की बात है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता.

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  10. चाचा ने सुन्दर कहानियां लिखी और भतीजा ने सुन्दर समीक्षा ... बहुत अच्छा लगा ... पार्टी तो बनती है ...

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  11. अनुराग जी एक जाना पहचाना नाम है ब्लॉग जगत में .... उनका मुखर, स्पष्ट स्तरीय लेखन और हर विषय को रुचिकर और गंभीरता के रखने की कला के सब कायल हैं .... उनकी कहानियां और रचनाएं हमेशा कुछ हट के होती हैं जो देर तक याद रहती हैं ... आपने समीक्षा भी उसी अंदाज़ में की है ... शुरू करने के बाद पूरी पोस्ट पढ़े बिना रहना मुमकिन नहीं होता ...

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  12. बेहतरीन समीक्षा ............. ये भी लिखना चाहिए था, ये किताब मिलेगी कहाँ से :)

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    1. मुकेश,
      अंजुमन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित अनुरागी मन फ्लिपकार्ट और रेडग्रेब पर उपलब्ध है। लिंक नीचे हैं:
      अनुरागी मन, फ्लिपकार्ट पर
      अनुरागी मन रेडग्रेब पर

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  13. अभिषेक की समीक्षा पढ़कर मन प्रसन्न हुआ, और लगा कि इस किताब का लिखना सार्थक हुआ।

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  14. आपने जैसा कहा उससे तो लगता है
    किताब पड़नी ही पड़ेगी अब

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  15. अनुराग जी के लेखन की मै भी बड़ी प्रशंसक हूँ, उनके लेखन से पाठक को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और यही एक अच्छे लेखक की पहचान भी होती है ! "अनुरागी मन" की निश्चित ही बहुत सुन्दर समीक्षा की है आपने सच में मन प्रसन्न हुआ पढ़कर बहुत बहुत बधाई !

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  16. बहुत बढ़िया !
    पढ़ते हैं :)

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया