इवनिंग डायरी – ३

बड़े दिनों से ब्लॉग्गिंग लगभग बंद ही है. आज यूहीं फेसबुक पर टहल रहा था तो एक पाँच साल पुरानी अपनी ही पोस्ट दिखाई दे दी. ये देखिये..


ये वो दौर था ब्लॉग्गिंग का जब हम महीने में लगभग बीस से ऊपर ही पोस्ट लगा देते थे, और बाकी के ब्लोग्स पढ़ते भी उसी रफ़्तार से थे. लेकिन अब कहाँ हो पाता है ऐसा कुछ. एक पोस्ट्स का सिलसिला इवनिंग ब्लॉग्गिंग के नाम से शुरू किया था मैंने पहले, सोचा था यूहीं बस स्क्रिबल..बेतरतीब बातें यहाँ उस कड़ी में लिखते रहूँगा, लेकिन फिर उसे भी भूल गया. आज की शाम फिर से ब्लॉग को झाड़ा पोछा है, ताकि कुछ न कुछ लिख सकूँ, बहुत सा कुछ अस्पष्ट सा मन में चल रहा है, वही कोशिश है आज लिखने की.

इधर दो दिनों से दिल्ली का मौसम बड़ा सुहावना हो गया है. मौसम के साथ कई अच्छी बातें हुई इन दिनों, कुछ नयी उम्मीदें बंधी हैं. कुछ नया करने को मन बना है. पिछले महीने लगभग पूरी तरह व्यस्त रहा. दिल्ली में कम ही रहना हुआ. पहले तो दस दिनों के लिए बैंगलोर, फिर वहां से आकर थोड़े दिन बाद पटना जाना हो गया. घर पर बहन और भांजे के साथ बहुत ही अच्छा वक़्त बिता. इन दिनों तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स से दूर ही रहा. कोई जरूरत ही नहीं महसूस हुई इन साधनों की. इधर जब से दिल्ली में हूँ, थोड़ा अकेला सा महसूस हो रहा है, वजह शायद यही है कि पिछले महीने जो व्यस्तता रही, अब उन सब से बिलकुल खाली हो चूका हूँ. ऐसे में आज अचानक मेरी सबसे अच्छी दोस्त दिव्या का फोन आ जाना बड़ा अच्छा लगा. जाने कितने दिनों बाद उससे बात हो रही थी. शायद पाँच छः महीनों बाद. इतनी बातें थीं हमें एक दूसरे को बताने की, कि मानो हम दोनों में होड़ सी लगी थी, कौन कितनी बातें बता रहा है एक दूसरे को. दिव्या से ही बातों के दौरान मेरी बहन मोना और खासकर भांजे अयांश के बारे में बात हुई. दिव्या और मोना एक दूसरे को काफी अच्छे से जानते हैं. अयांश के तमाम बदमाशियों और शरारतों के किस्से मैं दिव्या को सुनाने लगा, इस बात की परवाह किये बगैर कि दिव्या का फोन बिल कितना आएगा.

जाने आज क्या क्या याद दिला दिया मेरी इस दोस्त ने. वक़्त सच में कितनी जल्दी बीतता है न. पता भी नहीं चलता दस साल पंद्रह साल कैसे निकल गए. मानों अभी कल की ही बात हो जब हम सब दोस्त एक साथ थे, और अब सब जाने कहाँ अलग अलग राहों पर चल निकले. कितनी जल्दी हम सभी बड़े हो गए. बचपन के दिन कितनी जल्दी बीत गए. दिव्या से बात करने के बाद आज मैं अपने दोस्तों के बारे में नहीं बल्कि मोना के बारे में सोच रहा था. एक समय था जब हम साथ साथ रहते थे, और अब ऐसा होता है कि कभी कभी ही मिलते हैं. महीनों में कभी कभी और साथ रहना भी ज्यादा कहाँ हो पाता, पाँच दस दिन…उसके बाद सभी फिर अपने अपने कामों में, अपनी अपनी जिन्दगियों में व्यस्त हो जाते हैं. जिस बहन के साथ खेलते कूदते, लड़ते झगड़ते हुए बड़े हुए उससे ही अब महीनों में कभी कभी मिलना हो पाता है. जानता हूँ, समझदार लोग कहेंगे कि यही तो दुनिया का नियम है लेकिन फिर भी. बचपन में जब स्कूल में था, तो ये बात कभी दिमाग में भी नहीं आती थी कि हम कभी अलग अलग रहेंगे. हमेशा सोचते थे साथ ही रहेंगे. बचपन में ही क्या, जब तक बैंगलोर में मोना के साथ रहा था, तब तक ये ख्याल नहीं आता था कि मोना शादी के बाद अपने घर चली जायेगी, और ये जो उसका अपना घर, जहाँ वो बचपन से बड़े होने तक हुक्म चलाते हुए आई है, वो इसी घर में कभी कभी मेहमान की तरह आएगी. ये सब बातें बड़ी ऑब्वीअस सी बातें हैं न. लेकिन फिर भी कभी कभी इन सब बातों को सोच कर मन अजीब सा हो जाता है. ये कैसा नियम बना हुआ है दुनिया का.

ये मोना और मेरी बैंगलोर की आखिरी तस्वीर है. हमारी ट्रेन थी दिल्ली के लिए और ये तस्वीर मनीष सर ने खींची थी. इसके बाद मोना बैंगलोर छोड़कर पटना चली गयी..जनवरी की ये तस्वीर है, तारीख तो याद नहीं लेकिन आज इसी तस्वीर को ही देखकर न जाने कितनी बातें याद आई.

आज पता नहीं बड़े मिक्स्ड से ख्याल आ रहे हैं मन में इसलिए ये पोस्ट में भी साफ़ साफ़ कुछ कह नहीं पा रहा हूँ जो कहना चाह रहा हूँ, बस बेतरतीब बातें हैं जो आज यहाँ न जाने क्यों लिखे जा रहा हूँ. मेरी एक पुरानी बचकानी सी ख्वाहिश भी थी जिसे आज दिव्या ने ही याद दिलाया. मैं पहले अकसर सोचता था कि जहाँ भी मैं रह रहा हूँ(जैसे उन दिनो बैंगलोर में था) वहां ही अपनी सभी बहनों को बुला लूँगा और सबको अपने साथ रखूँगा. मोना, निमिषा, सोना, प्रियंका दी, माही…सब को…दिव्या ने आज यूहीं बातों बातों में मुझे छेड़ने के लिए ये सवाल उठाया.. क्यों? घर बना रहे कोई बैंगलोर में जहाँ रह सको अपनी बहनों के साथ? मैं भी हँसने लगा. इस तरह की जाने कितनी ख्वाहिशें अभी भी मन में आती हैं. बैंगलोर में ही इस बार प्रियंका दी के साथ था तो एक दिन यूहीं घूमते हुए उससे कहने लगा, चलो छोडो कानपूर, आ जाओ यहीं रहते हैं हम सब. मोना, सोना और निमिषा को भी बुला लेते हैं.

खुशियाँ मेरी ज़िन्दगी की

खैर ये बचकानी सी ख्वाहिशें तो होती रहती हैं. लेकिन मैं सच में चाहता हूँ कभी ऐसा हो हम सब भाई बहन एक साथ लम्बे समय तक रहे. हालांकि ये सोच कर थोड़ा डर भी लगता है, निमिषा और प्रियंका दी की धमकी भी याद आती है. दोनों का कहना है, सोच लो, तुमको हम सब बहनें अकेले ही परेशान कर देते हैं, अगर सभी मिल एक ही जगह मौजूद हों तो तुम्हारा क्या होगा? मैंने सोचा दोनों से कहूँ, कि तुम लोग को जितना मज़ा आता है मुझे तंग करने में, परेशान करने में…उससे ज्यादा मज़ा मुझे आता है तुम लोगों से परेशान होने में. हालांकि मैंने कहा नहीं उन दोनों से, लेकिन वो दोनों ये बातें बहुत अच्छे से जानती होंगी.

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