कविताएँ ही नहीं, खूबसूरत रिश्ते भी रचती हो तुम...

वैसे तो बहुत सी बातें हैं लेकिन एक बात ख़ास तौर पर है जो शिखा दीदी को और मुझे जोड़ती है. वो है ये दिसंबर का महीना. मेरे लिए तो दिसंबर ख़ास रहा है हमेशा से ही, शायद बचपन से ही. बहुत सारी अच्छी बातें मेरे लिए दिसंबर में ही हुई हैं, और शिखा दीदी के लिए भी शायद ये दिसंबर कुछ ऐसा ही महीना है. उन्हें भी प्यार है दिसंबर से. शिखा दीदी के लिए दिसंबर को पसंद करने की एक और वजह हो सकती है, ये बीस दिसंबर का दिन.. शिखा दीदी का जन्मदिन.

उन दो लोगों के साथ जिनका जन्मदिन दिसंबर में है.
मिर्ज़ा गालिब और शिखा दीदी 
मुझे सही से याद तो नहीं, लेकिन वो आज से पाँच साल पहले यही क्रिसमस के आसपास की बात होगी जब शिखा दीदी को पहली बार जाना था, पहली बार इनकी एक कविता पढ़ी थी. मुझे लगभग यकीन है कि पाँच साल पहले की वो बीस तारीख की ही शाम थी, जब यूँ ही प्रशांत के ब्लॉग से घूमते टहलते मैं इनके ब्लॉग तक पहुँचा था, और सामने एक कविता लिखी मिली थी. अगर मुझे सही से याद है तो कविता के साथ इन्होने एक तस्वीर लगा रखी थी, और लिखा था “व्यू फ्रॉम माई विंडो”. बहुत देर तक मैं तस्वीर को देखते रहा था, और सोचते रहा था, मेरे खिड़की से ऐसा व्यू क्यों नहीं दीखता. बैंगलोर में था मैं और बर्फ से लदे पेड़ों को देखकर सोच रहा था यहाँ ठंड क्यों नहीं होती है इतनी? कविता पर नज़र बाद में गयी थी मेरी. “बर्फ के फाहे” कविता का नाम था और उस कविता ने उस शाम गज़ब का असर किया था मुझपर. बड़ा डिस्टर्बिंग सा दिन था वो, मुझे अच्छे से याद है. बहुत देर तक सड़कों पर घूमते रहा था मैं और फिर वापस आया था घर तो कुछ ब्लॉग पढ़ने लगा था. उन्हीं दिनों मैंने फिर से ब्लॉगिंग  शुरू की थी. 

शायद तब से ही शिखा दीदी की ये कविता मेरे लिए उनकी ट्रेडमार्क पोएट्री बन गयी है. जैसे गुलज़ार, ग़ालिब का नाम लेते ही उनकी कुछ कवितायें मन में आ जाती हैं, ठीक वैसे ही शिखा दीदी की कविताओं का जिक्र जब कभी आता है तो मुझे हमेशा यही एक कविता याद आती है. 

पिछले साल अगस्त में दीदी दिल्ली आयीं थी, तो इन्होंने अपनी कविता-संग्रह “मन के प्रतिबिंब” मुझे तोहफे में दिया था. किताब हाथ में आते ही मैंने सबसे पहले इंडेक्स वाला पन्ना खोला. उम्मीद नहीं बल्कि मैं श्योर  था कि मेरी सबसे पसंदीदा कविता किताब में होगी जरूर(दीदी अगर नहीं होती वो कविता किताब में तो I think I would have killed you.). किताब के चालीसवें पन्ने पर वो कविता थी. दीदी से मैंने उसी वक़्त कहा(अगर आपको याद हो दीदी तो) कि ये मेरी सबसे पसंदीदा कविता है आपकी...आपको  ये बात पहले से पता थी. आपने कहा “मुझे पता है”. लेकिन जो बात आपको शायद नहीं पता, शायद मैंने कभी बताया कि ये कविता मेरे लिए कितनी ख़ास है. पता नहीं आपको या यहाँ पढ़ने वाले लोगों को यकीन हो न हो But this poetry means a lot to me... A Lot.

सोचा मैंने उसी दिन था कि किताब पर कुछ लिखूंगा, ठीक जैसे इनकी पहली ब्लॉकबस्टर “स्मृतियों में रूस” को पढ़ने के बाद मन किया था कुछ लिखने का. लेकिन दो वजहों से, एक तो थोड़ी व्यस्तता और दूसरा मेरा आलसीपना, जिससे मैं बेहद त्रस्त हूँ, नहीं लिख पाया. शिखा दीदी, उसके लिए माफ़ी. 

आज सोचा है कुछ लिखने के लिए आपकी किताब “मन के प्रतिबिम्ब” पर. आप कहेंगी, थोड़ा देर नहीं हो गया लिखना? तो नहीं दीदी, किताबें, कवितायें कभी पुरानी नहीं होती है. 

इस किताब को पढ़ तो उसी दिन लिया था. पंद्रह अगस्त का दिन था न वो? उसी शाम, जब आपसे मिलकर वापस आ रहा था, मेट्रो के एक घंटे के सफ़र में किताब की लगभग सभी कवितायेँ पढ़ ली थी मैंने. आज फिर ये किताब अपने शेल्फ से निकाला है, सोचा कुछ लिखना है इसपर तो आज फिर दोबारा पढ़ लूँ. दोबारा पढ़ना किताबों को अच्छा होता है, ज़िन्दगी में में अच्छी चीज़ों का रिविजन करते रहना चाहिए न. 

सच कहूँ तो मुझे एक बात का हमेशा आश्चर्य होता है, कि कुछ लोगों के व्यक्तित्व से उनकी लेखनी शायद मेल नहीं खाती. जैसे कभी कभी शिखा दीदी के साथ लगता है मुझे, कैसे मुमकिन है जिसके स्वभाव में इतनी कोमलता, मासूमियत, और चुलबुलापन भरा हो, उतनी ही सशक्त और प्रभावी लेखन हो उनका. चाहे कवितायें हो या आलेख, कितना प्रभाव डाल जाती हैं वो हम पर, कितनी कुछ कह जाती हैं, कितनी बातें सोचने को विवश कर देती हैं, इस बात से मुझे हमेशा बड़ा आश्चर्य होता है. 

शिखा दीदी की इस किताब में लगभग हर विषय पर कवितायें हैं, सामाजिक विषय हो या नारी पर लिखी कवितायेँ, रूमानी कवितायेँ, व्यंग्य  या ज़िन्दगी की पहेलियों को सुलझाती कवितायें, और हर कविता बेहद प्रभावित करती हैं. कई कवितायें तो ऐसी हैं जिसे पढ़ने के बाद थोड़े बेचैन होते हैं, आप सच में जवाब खोजते हैं, लेकिन हाथ कुछ नहीं आता. 

किताब की शुरुआत जिस कविता से होती है वो दरअसल एक प्रश्न है जो छत पर अकेली खड़ी लड़की खुद से पूछती है, क्या मिला ज़िन्दगी में उसे? इस कविता से शायद हर कोई रिलेट हो सकता है, हम सब कभी न कभी तो खुद से पूछते ही हैं, ये सोचते ही हैं कि क्या चाहा था मैंने और क्या मिला अब तक हमें. इस पहली कविता में ही नहीं बल्कि इस किताब में बहुत सी ऐसी कवितायें हैं जो प्रश्न करती हैं, जवाब मांगती हैं. कविताओं में समाज के प्रति, लोगों की मानसिकता के प्रति शिखा दीदी का गुस्सा झलकता है. “चीखते प्रश्न” एक ऐसी ही कविता है जो हमसे बहुत सारे सवाल करती हैं. उनका गुस्सा समाज के प्रति इस कविता में आसानी से दिखता है हमें और उनके सवाल भी कितने जायज लगते हैं. अतीत हमारे देश का स्वर्णिम रहा है और हमें उसपर गर्व है लेकिन वर्तमान कैसा है? देश में जो कुछ हो रहा है क्या उसके बाद भी हमें अपने भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए? और जब वर्तमान ऐसा है तो भविष्य का तो कुछ पता ही नहीं. इन्ही सारे सवालों चिंताओं पर उनकी ये कविता है. 
कैसे कहूँ मैं भारतीय हूँ
क्यों करूँ मैं गुमान
आखिर किस बात का
क्या जवाब दूं उन सवालों का
जो "इंडियन" शब्द निकलते ही
लग जाते हैं पीछे
...
जहाँ रात तो छोड़ो
दिन में भी महिलायें
नहीं निकल सकती घर से ?
बसें , ट्रेन तक नहीं हैं सुरक्षित
क्यों दुधमुंही बच्चियों को भी
नहीं बख्शते वहां के दरिन्दे ?
क्या बेख़ौफ़ खेल भी नहीं सकतीं
नन्हीं बच्चियाँ ?
कैसे जाते हैं बच्चे स्कूल ?
...
उत्तर आता है ..
ओह !! इतिहास है
वर्तमान नहीं,
और भविष्य का तो
पता ही नहीं..
मैं रह जाती हूँ मौन,स्तब्ध
और चीखने लगते हैं
फिर से वही प्रश्न..
‘प्रलय बाकी है’ और ‘सौदा’ भी ऐसी ही कविता है जो २०१२ दामिनी केस और स्त्री के अस्मत पर आधारित हैं, पढ़ने के बाद कविता आपको थोड़ा उदास करती है, थोड़ा विचलित होते हैं हम..
नहीं था उसे मंजूर भीख में इज्ज़त लेना
झुका कर निर्दोष पलकें भी क्या जीना?
और नम आँखों से आखिर उसने
सूर्य की सारी रक्तिमा समेत ली थी
अपनी हाथ की कोमल रेखाएँ
अपनी ही मुट्ठी में भींच ली थीं. 

अगली कविता है जिसमें एक बच्ची जिसका जन्म नहीं हुआ अब तक, उसके मन की बात है. वो बच्ची अपनी माँ से कह रही है - 
जब तू चाहेगी तब रोऊँगी
जब चाहेगी तब सो जाऊँगी
भैया के खिलौने को भी
मैं ना हाथ तनिक लगाऊँगी
और डोली में चढ़ते वक़्त भी
ना रोऊँगी ना तुझे रुलाउंगी
बस आने दे दुनिया में मुझको 

कविताओं के ये चीखते प्रश्न, समाज का ये सच, समाज का ये रूप आपपर जैसे जैसे हावी होने लगता है, मन बहुत कुछ सोचने लगता है. ठीक उसी समय आपकी नज़र जाती है किताब के छत्तीसवें पन्ने पर. शीर्षक पढ़ते ही चेहरे पर मुसकराहट आ जाती है, “हाँ ये लग रहा है दीदी टाइप की कविता है..” शीर्षक है टप टप टपा टप टप...” और कविता की पहली लाइन पढ़ते ही चेहरे की मुस्कान और बड़ी हो जाती है 
सुनो आज मौसम बहुत हंसीं है
फिफ्टी फिफ्टी के अनुपात में
सूरज और बादल टहल रहे हैं
चलो न, हम भी टहल आयें
...
हाँ बाबा हाँ, जानती हूँ
बातों से नहीं भरता पेट
कोरी भावनाएं हैं यह सब
फ़ालतू लोगों के शगल
फिर भी..
उफ़ कितनी जिद्दी हूँ न मैं.
कविता की इन आखिरी पंक्ति को पढ़कर मैं मुस्कुराने लगता हूँ... कहता हूँ खुद से हाँ दीदी, बहुत जिद्दी हैं आप.
यहाँ से शुरू हो जाती हैं दीदी की रूमानी कविताओं की सिरीज़. कविताओं की मेरी सबसे पसंदीदा Genre. मैं किताब पर अपनी पकड़ और मजबूत कर लेता हूँ यहाँ से, कॉफ़ी का सिप लेते हुए इस सीरिज की पहली कविता पढ़ता हूँ. कविता का शीर्षक है `पुरानी कमीज़'. कितनी प्यारी बात कितनी सहजता से इस कविता में दीदी ने कहा है.. प्यार किसी कमीज़ की तरह नहीं है जो बार बार बदला जाए. कमीज़ पुरानी हो जाए तो उसे बदल दिया जाता है, नयी कमीज़ आ जाती हैं उसकी जगह, लेकिन प्यार ऐसा नहीं है.
कमीजें कितनी भी बदलो
लेकिन प्यार नहीं बदला जाता
पुरानी कमीज़ के बाद बारी आती है, मेरी पसंदीदा कविता की. बर्फ के फाहे. दीदी आप माने चाहे न माने, ये कविता याद है मुझे, पूरी की पूरी.
तेरा प्यार भी तो ऐसा ही है,
बरसता है बर्फ के फाहों सा
और फिर ......
बस जाता है दिल की सतह पर
शांत श्वेत चादर सा।
...
मैं ओढ़ के उसे
लिहाफ की तरह
सो जाती हूँ निश्चिन्त।
उसमें बसी
तेरे प्यार की गर्माहट
देती है यूँ हौसला
जिन्दगी की कड़ी सर्दी से उबरने का.

निकलने का मन नहीं करता बर्फ के फाहों से, लेकिन यहाँ से दिखाई देती है शिखा दीदी के खयाली मटरगस्ती. ये छोटी कवितायें लेकिन कितनी रूमानियत लिए हुए हैं ये देखिये – 
हम इस खौफ से
पलकें नहीं
बंद करते
उनमें बसा तू
कहीं अँधेरे से
डर न जाये
...
उसकी पलकों से गिरी बूंद
ज्यूँ ही मेरी उँगली से छुई
हुआ एहसास
कितने गर्म ये जज्बात होते हैं. 
...
कभी कोई लिखने बैठे
कहानी तेरी मेरी
तो वो दुनिया की
सबसे छोटी कहानी होगी
जिसमें सिर्फ एक ही शब्द होगा
‘परफेक्ट’ 

आपकी सभी कवितायेँ भी तो ऐसी ही हैं दीदी, परफेक्ट! एक क्षणिका और भी है जो मुझे बेहद पसंद है और बेहद प्यारी...
तेरे लिए मैं
तेरी उस पसंदीदा टाई की तरह हूँ
जिसे तू हर ख़ास मौके पर
गले से लगा लेता है
पर मेरे लिए तू
मेरे सीने में लगी वो चेन है
जिसे मैं कभी खुद से अलग नहीं करती. 

वैसे तो प्यार कभी पुराना नहीं होता, वो वैसा ही नया रहता है लेकिन शायद जैसे जैसे ज़िन्दगी में मसरूफियत आ जाती है प्यार वैसा नहीं रहता जैसा शुरू में दोनों के बीच रहता है. शायद कुछ कवितायें जैसे ‘गूंगा चाँद, मेरा गिरना तेरा उठाना, ऐ सुनो’, ऐसे ही जज़्बात बयाँ करते हैं. ‘ऐ सुनो’ जहाँ मुझे बेहद प्यारी कविता लगी वहीँ इसकी आखिरी के पंक्ति थोड़ा एक टीस सी दे गयी मन में. शायद ऐसा ही होता हो – 
पर अब न जाने क्यों
न तुम रुठते हो
न मैं मनाती हूँ
दोनों उलझें हैं
अपनी अपनी दिनचर्या में
शायद रिश्ते अब
परिपक्व हो गए हैं हमारे
...
ऐ सुनो, तुम आज फिर रूठ जाओ न
एक बार फिर मानाने को जी करता है 

प्यार और रिश्तों पर दीदी ने बहुत प्यारी प्यारी बातें कही हैं. कवियों की लिखी जाने कितनी ही कवितायें हैं जिसमें रिश्तों को परिभाषित किया गया है, सभी में वही बातें रहती हैं, वही अर्थ लेकिन कहने का अंदाज़ सब का अलग अलग होता है. दीदी ने भी बड़े खूबसूरत अंदाज़ से रिश्तों को परिभाषित किया है.
रिश्ते बनते नहीं
बनाने पड़ते हैं
...
रिश्ते खुद नहीं आते
रिश्तों के पाँव जो नहीं होते
...
रिश्ते कोई सेब नहीं होते
जो टपक पड़ते हैं अचानक
और कोई न्यूटन बना देता है
उससे कोई भौतिकी का नियम
रिश्ते तो वह कृति है,
जिसे रचता है एक रचनाकार
श्रम से, स्नेह से, समर्पण से

इनके अलावा कुछ कवितायें इंस्पायर भी करती हैं, जैसे ये कविता है, “अपने हिस्से का आकाश”. दीदी के ब्लॉग पर ही पढ़ चुका था इसे, और उस वक़्त भी पढ़ने के बाद यही ख्याल आता था.. ‘हाउ इन्स्प्यारिंग’. 
पर हमने भी अब है ठानी
उससे भीड़ के दिखाना है
कह दो, उस आसमां से
ज़रा सा खिसक जाए
अपने हिस्से का आकाश
हमें भी बिछाना है.
इस किताब में एक बेहद दिलचस्प कविता है. नानी और मुन्नी. एक नानी और एक छोटी बच्ची के बीच के संवाद है कविता में. कविता में मुन्नी दीदी को समझा रही है कि सामाज में जो बदलाव हो रहे हैं उसे समझने के लिए आपको भी अपनी दृष्टि नयी करनी होगी. 
एक दिन पड़ोस की नानी 
और अपनी मुन्नी में ठन गयी
अपनी अपनी बात पर
दोनों ही अड़ गई
...
नानी बोली क्या ज़माना आ गया है
घडी घडी डिस्को जाते हैं
बेकार हाथ पैर हिलाते हैं
ये नहीं मंदिर  चले जाएँ
मुन्नी चिहुंकी
तो आपके मंदिर वाले
डिस्को नहीं जाते थे?
ये बात और है
डिस्को तब उपवन कहलाते थे
...
बदला ज़माना नहीं
बदला आपके चश्मे का नंबर है
मुन्नी नानी का मुहँ चूम
फुर्र से उड़ गई
और नानी बेचारी सोच में पड़ गई
पल्लू से चश्मा पोंछ
नानी बुदबुदाई
अभी वो कहीं नहीं जायेंगी
कल ही बेटे से कह
पहले ये मुआ चश्मा बदलवाएगी

किताब में कुछ पचास कवितायें हैं और कुछ क्षणिकाएं. ज़िन्दगी एक ऐसी चीज़ है जो कितनों के लिए रहस्य का विषय है. कितने लोगों ने समझने की कोशिश की है, कविताओं के माध्यम से, कहानियों से. गुलज़ार साहब ने कहा भी है “ज़िन्दगी क्या है जानने के लिए/ जिंदा रहना बहुत जरूरी है/ आज तक कोई रहा भी तो नहीं. मतलब ज़िन्दगी एक ऐसी पहेली की तरह है जिसका मतलब आजतक कोई समझ नहीं सका, लेकिन फिर भी कविताओं के माध्यम से सब अपनी अपनी बात रखते हैं. दीदी की भी कई कवितायें इसी पहेली के आसपास हैं. “इक नज़र ज़िन्दगी, किस रूप में चाहूँ तुझे मैं, करवट लेती ज़िन्दगी, जीवन सार” में वही बात है. 

किताब के आखिर में आते आते उस विषय पर कविता दिखती है जो हमेशा से कवियों शायरों का प्रिय विषय रहा है और शायद जिसके बिना किसी की भी कविता अधूरी होती है – माँ पर लिखी कवितायें. दीदी की भी एक कविता है माँ पर. माँ पर लिखी हर कविता अपनी सी लगती है, लगता है जैसे खुद की माँ की बातें उस कविता में हम पढ़ रहे हैं, दीदी की ये कविता पढ़ते वक़्त भी मुझे अपनी माँ की याद आई.
मेरी हर जिद को 
आखिरी है कह कर
पापा से मनवा लेती थी तुम
...
जब हम तुम्हारी तरह मुहँ बना
नक़ल कर जोर से हंसते थे
तो झूठ मूठ के गुस्से में
थप्पड़ दिखाया करती थीं तुम.
माँ पर लिखी कविता के ठीक बाद की जो कविता है वो पढ़ना शुरू करने से पहले ही मुझे कुछ याद आता है. शिखा दीदी ने ये कविता अपनी पिता को समर्पित की है. “पापा तुम लौट आओ न”. कविता के शीर्षक से मुझे एक पुरानी बात याद आ गयी, उन दिनों दो पोस्ट पढ़ी थी दीदी के ब्लॉग पर, एक ये कविता और एक और पोस्ट जिसका शीर्षक मुझे फ़िलहाल याद नहीं. उन दोनों पोस्ट को मैंने अपनी माँ को भी पढ़वाया था, और माँ वो कविता और पोस्ट को पढ़कर बहुत भावुक हो गयीं थी, कहा उसने मुझे, “शिखा की कविता और पोस्ट पढ़ कर मुझे भी पापा(मेरे नाना) की याद आ गयी. ये कविता है ही ऐसी, बेहद भावुक. ये कविता मन को भिगोती हैं, आँखें नम कर जाती है ये कविता जैसे अभी पढ़ते हुए भी मेरी आँखें नम हैं, रुलाती है हमें.

पापा तुम लौट आओ ना,
तुम बिन सूनी मेरी दुनिया,
तुम बिन सूना हर मंज़र,
तुम बिन सूना घर का आँगन,
तुम बिन तन्हा हर बंधन.
पापा तुम लौट आओ ना
...
याद है मुझे वो दिन,वो लम्हे ,
जब मेरी पहली पूरी फूली थी,
और तुमने गद-गद हो
100 का नोट थमाया था.
और वो-जब पाठशाला से मैं
पहला इनाम लाई थी,
तुमने सब को
घूम -घूम दिखलाया था.
..
आज़ मेरी आँखों में भरी बूँदें,
तुम्हारी सुद्रण हथेली पर
गिरने को मचलती हैं,
आज़ मेरी मंज़िल की खोई राहें ,
तुम्हारे उंगली के इशारे को तरसती हैं,
अपनी तक़रीर अपना फ़लसफ़ा
फिर से एक बार सुनाओ ना,
बस एक बार पापा! लौट आओ ना.

खासकर के इस कविता को पढ़ने के बाद एक पर्सनल बात दीदी से यहाँ कहना चाहूँगा, अंकल को आप पर बहुत गर्व होता होगा दीदी.

कुल मिलकर इस कविता की सभी कवितायें मुझे पसंद आयीं, इसलिए नहीं कि  ये मेरी दीदी हैं और मैं इनके प्रति बायस्ड हूँ. बल्कि इसलिए कि ये कवितायें सच में खूबसूरत हैं. ‘मन के प्रतिबिम्ब’ की एक ही कमी लगी मुझे, थोड़ी और होनी चाहिए थी इसमें रूमानी कवितायें, लेकिन मुझे यकीन है कि अपनी अगली कविता संग्रह निकालते वक़्त दीदी इस बात का ख्याल रखेंगी.


चलते चलते :
करीब दो महीने पहले ABP न्यूज़ के द्वारा आयोजित हिंदी दिवस के एक कार्यक्रम में शिखा दीदी को बेस्ट ब्लॉगर का पुरुस्कार दिया गया था. दीदी ने मुझे फोन पर ये खबर दी थी, मैंने तो उन्हें कहा कि अगली फ्लाइट पकड़ के दिल्ली आ जाईये, बैठने की सीट न भी मिले तो खड़े खड़े आ जाईये, लेकिन ये मानी नहीं. मुझे कहा इन्होंने कि तुम मेरे बदले वो पुरस्कार ले लो जाकर. वहाँ जाना और उस कार्यक्रम का हिस्सा बनना एक अच्छा अनुभव रहा था. ये तो पता था कि ये एक सेलिब्रिटी हैं, लेकिन इनके सेलिब्रिटीनेस को उस दिन महसूस किया, जब पुरस्कार वितरण के बाद मैं लंच कर रहा था, लोग आ रहे थे मेरे पास, “आप शिखा जी के भाई है न? उनसे कहियेगा कि वो बहुत अच्छा लिखती हैं?”. एक लड़की आई मेरे पास, कहा उसने, शिखा जी को मेरा हेल्लो कहियेगा, और उनसे ये भी कहियेगा कि मैं उनके फेसबुक में जुडी हुई हूँ, बहुत अच्छा लिखती हैं वो. बड़ा अच्छा अहसास हुआ था कि शिखा दीदी को वे लोग भी जानते हैं और पढ़ते हैं जो लेखन से जुड़े नहीं हैं. उस दिन की बातों पर एक पोस्ट लिखने का सोचा था लेकिन लिख नहीं पाया, दीदी, उसके लिए भी माफ़ी. लेकिन उम्मीद करता हूँ इस पोस्ट ने सब कुछ कवर कर लिया होगा.



आप बस यूँही लिखते रहिये, और मुझे सेलिब्रिटी का भाई होने का ये अच्छा एहसास देते रहिये...बस यही चाहता हूँ मैं.



P.S : इस किताब के साथ बस एक छोटी सी कमी जुड़ी हुई है, ये ऑनलाइन स्टोर पर शायद उबलब्ध नहीं है, लेकिन अगर आपको अच्छी किताबें, अच्छी कवितायें पढ़नी हो तो मेहनत तो करनी पड़ेगी न, फटाफट संपर्क करें किताब के लिए : 
शिखा वार्ष्णेय : shikha.v20@gmail.com
किताब के प्रकाशक को लिखें : subhanjaliprakashan@gmail.com

किताब का मूल्य : मात्र सौ रुपये.


Double P.S ; दिसंबर वाकई खूबसूरत होता है दीदी, और दिसंबर में जिन लोगों का जन्मदिन होता है वो भी खूबसूरत होते हैं, और इन्ही सारे वजहों से देखिये कभी किसी फ़ालतू राइटर का वो राइटर्स ब्लॉक भी टूटता है. 



Happy Birthday Shikha di. God Bless you ! 

Comments

  1. सारी बातों से इत्तेफाक रखते हैं रे...बस्स एक बात में थोडा सा संशोधन...सेलेब्रिटी के सेलेब्रिटी भाई...:)
    आगे आने वाले जो जो लोग मेरी बात से सहमत हैं, वो हाथ उठाएँ...:) :)
    एक बार फिर से जन्मदिन की शुभकामनाएँ शिखा जी को...और साथ में वार्निंग भी...कि इतनी अच्छी समीक्षा पढने के बाद अगर हमको भी autographed प्रति नहीं मिली तो फिर तो pangaaaaaaaaaaa...:P :P फिर न कहिएगा पहले से बताया नहीं...:P :)

    ReplyDelete
  2. Just one word - fabulous :)
    loved reading your post after a long time.

    ReplyDelete
  3. Gyasu Shaikh said:

    अभिषेक जी,
    शिखा जी से आपकी अक़ीदत भली लगी, पठनीय भी !
    आपने मेरे भी पुराने दिन याद दिल दिए, जब मैं शिखा जी
    और उनके 'स्पंदन' से जुड़ा था। शिखा जी की कविताएं
    पसंद आई थी और तब जमकर टिप्पणियां भी लिखी थी…
    हाँ ! ज़्यादातर सकारात्मक ही, जैसा कि नेचर है शिखा जी का ।
    फिर तो 'स्पंदन' से रिश्ता रूटीन सा हो गया था। अपलोड किये
    उनके फोटोज भी उतने ही रुचि कर थे। हर तरफ एक ताज़गी
    सी बिखरी रहती।

    अगर जिस किसी का एक भी पाठक अभिषेक जी जैसा हो तो वे
    अनायास ही सफल है !

    ReplyDelete
  4. ब्लॉगिंग के जरिये जुड़े रिश्तों का खूबसूरत उदाहरण है आप दोनों का रिश्ता .
    शिखा की सहजता उसकी रचनाओं में भी खूब लुभाती है .
    आप दोनों को ढेरों शुभकामनाएं !

    ReplyDelete
  5. ब्लॉगिंग से मिली नेमत हो तुम...

    ReplyDelete
  6. मेरे पास है ये किताब :)

    ReplyDelete

Post a Comment

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया