एल्बम गाड़ियों का

कई शौक थे मुझे बचपन में. उनमें से एक शौक था, गाड़ियों की तस्वीरें जमा करने का. मैं उन्हें एक एल्बम के रूप में सजा कर अपने पास रखता था. बड़ा सम्हाल कर रखता था उनको. जहाँ तक मुझे याद है, करीब पांच छः साल तक मेरा ये शौक मेरे साथ चला है, फिर मैं पटना से बाहर चला आया, और ये शौक भी मेरा खत्म हो गया. मेरे पास तीन बैग भर के गाड़ियों की तस्वीरें थीं. करीब दस साल पहले जब क्वार्टर छोड़ हम अपने फ़्लैट में आये थे, तो जाने कहाँ मेरे दो बैग खो गए जिनमें तस्वीरें सब मैंने जमा कर रखी थीं. लेकिन एक बैग जो बचा कर माँ ने अपने पास रख लिया था वो अब तक मेरे अलमारी में सुरक्षित रखा हुआ है. मेरे गाड़ियों की तस्वीरों के इस कलेक्शन को, मेरी बहन के ग्रीटिंग्स और शादी के कार्ड्स के कलेक्शन को भी माँ ने बड़े सम्हाल कर अपने पास रखा हुआ है अब तक. इस बार जब घर गया था, तो मैं वो सब तस्वीरें देख रहा था, जो मैं जमा करता था. माँ भी मेरे साथ साथ सभी तस्वीरें देख रही थी. माँ ने कहा, तुम कितना काट छाँट किया करते थे, जिधर देखो, अख़बारों के मैगजीन के टुकड़े इधर उधर घर में फेंके रहा करते थे. खैर, उन दिनों की बहुत सी बातें हैं, मुझे अख़बारों के आर्टिकल्स भी जमा करने का शौक था. लेकिन आज तो बस अपने एक अनोखे शौक के बारे में लिखने का मन है. गाड़ियों की तस्वीरें जो मैं जमा करता था, उसके बारे में. 

ये सिलसिला 1997 से शुरू हुआ था. मुझे याद इसलिए है ये बात कि उसी साल मेरी दोस्ती प्रभात से हुई थी और उसी साल मुराद और मैं कुछ समय के लिए अलग हो गए थे. प्रभात से दोस्ती होने के पहले मुराद मेरा सबसे अच्छा दोस्त था. मुराद और मैं क्लास वन से एक साथ पढ़े थे. हम संत कैरेंस हाई स्कूल में पढ़ते थे. इसी साल मुझे दसवीं और आगे आने वाले पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए दूसरे स्कूल में दाखिला दिलवा दिया गया था. संत कैरेंस हाई स्कूल, जहाँ मैं बचपन से पढ़ते आया था, वहाँ आई.सी.एस.ई माध्यम से पढ़ाई होती थी. और मुझे पटना के ही एक दूसरे स्कूल पटना सेन्ट्रल स्कूल में दाखिला दिलवा दिया गया जहाँ सी.बी.एस.ई बोर्ड के माध्यम से पढ़ाई होती थी. मैं बचपन से ही इस स्कूल में पढ़ते आया था, और सारे दोस्त इस स्कूल से ही थे मेरे. उन दिनों फोन की भी सुविधा ज्यादा लोगों के पास नहीं थी. ऐसे में मुझे सबसे बड़ा दुःख इस बात का था कि मेरे सब दोस्त मुझसे बिछड़ जायेंगे. नए स्कूल में मैं पढ़ने जाऊँगा, इस बात को लेकर मैं ज्यादा उत्साहित नहीं था बल्कि संत कैरेंस मुझे छोड़ना पड़ेगा इस बात का ज्यादा दुःख था. मेरे दोस्त छूट जायेंगे, इस बात का दुःख था मुझे. सच कहूँ तो सब दोस्तों से बिछड़ने का नहीं, बल्कि दो तीन ख़ास दोस्तों से बिछड़ने की ज्यादा फिक्र थी. उनमें से ही एक दोस्त था मुराद.

उस समय तक मेरे घर में टेलीफोन का कनेक्शन लग चुक था. नए स्कूल में मेरा ज्यादा मन नहीं लग पाता था. नए टीचर्स, नए बच्चे, सब कुछ नया नया और बड़ा ही अजीब सा लगता था. दिन भर स्कूल में बोर होने के बाद मुझे बेसब्री से शाम का इंतजार रहता था. मेरे लिए पूरे दिन का शायद सबसे अच्छा वक़्त शाम का ही होता था. हर शाम मैं मुराद से फोन पर बातें करता था. लगभग हर दिन हम बातें करते थे. एक नियम सा बन गया था ये कि एक दिन मैं फोन करूँगा और अगले दिन मुराद मुझे फोन करेगा. 

मुराद ने भी नए स्कूल में दाखिला लिया था, उधर उसका मन भी अपने नए स्कूल में ज्यादा नहीं लगता था. शाम को हम दोनों फोन पर एक दूसरे से जाने कितनी बातें करते थे. अपने स्कूल की बुराइयों से लेकर संत कैरेंस के दोस्तों की बातों से लेकर गाड़ियों तक की बातें करते थे हम. मुझसे गाड़ियों के बारे में बात करने वाला मेरा पहला दोस्त मुराद ही था. गाड़ियों के बारे में तकनीकी जानकारी तो बिलकुल जीरो थी उस समय. ना मुझे, ना मुराद को कुछ भी मालूम था गाड़ियों के बारे में, लेकिन फिर भी हम बात करते थे. मेरे लिए उस समय ड्रीम कार कैडिलैक या मस्तंग नहीं था(इनका तो नाम भी नहीं जानता था मैं तब), मेरा ड्रीम कार उन दिनों कन्टेसा हुआ करता था.

कारों को लेकर उन दिनों हम ऐसी ऐसी बातें करते थे, हमारे ऐसे ऐसे लॉजिक होते थे जिन्हें अब सोचने पर बड़ी हँसी आती है. उन्हीं दिनों अख़बारों में कारों के इश्तहार निकलने शुरू हुए थे. बहुत से बड़े ब्रांड्स के कार उन्हीं दिनों लांच हुए थे.. फोर्ड एस्कॉर्ट, हौंडा सिटी, देवू, हुंडई जैसी कारें उसी आसपास हिंदुस्तान में लांच हुई थी और तब अखबारें मैगजीन इनकी तस्वीरों से भरे रहते थे. जिस भी दिन अख़बार में कोई कार की तस्वीर निकलती, मैं मुराद से जिक्र करता, “देख तो भाई आज फलाना कार की तस्वीर निकली है”. एक बड़ी बेतुकी सी बात हम अकसर किया करते थे. फोर्ड एस्कॉर्ट, आइकॉन, हौंडा सिटी या यहाँ तक हुंडई दिखने में बड़ी आकर्षक लगती थीं. अब उन दिनों हम सिर्फ मारुती 800, फ़िएट और एम्बेसडर जैसी गाड़ियों को देखने के आदि थी. इस तरह की स्लीक कारें कहाँ थीं? तो हम कहते एक दूसरे से - इन गाड़ियों के इश्तेहार पटना के अख़बारों में क्यों आते हैं? यहाँ ख़ाक चलेंगी ये गाड़ियाँ. ये तो सिर्फ बैंगलोर मुंबई जैसे शहरों में चलने वाली गाड़ियाँ हैं. हम इन गाड़ियों को बहुत ऊँचे दर्जे की गाड़ियाँ समझते थे. उन दिनों ये थी भी ऊँचे दर्जे की गाड़ियाँ.

मुराद से गाड़ियों के बारे में बात करने का लालच में रहता था. मैं इसलिए जितने भी गाड़ियों की तस्वीरें देखता अख़बार या मैगजीन में, उन्हें काट कर अलग रख लेता... ताकि उन गाड़ियों के बारे में मुराद से बात करना याद रहे. उस साल के गर्मी की छुट्टी में मुराद कुछ समय के लिए शहर से बाहर कहीं चला गया था. मैं दिन भर बोर होने लगा. ना कोई दोस्त ना कोई काम, और पढ़ाई गर्मी की छुट्टियों में कौन करता है? मैं दिन भर अपने मर्फी वाले टू-इन-वन की मरम्मत करता, और अपनी बहन के साथ दिन में खेलता था. लड़कियों वाले खेल जैसे कितकित, जिन्हें ज़्यादातर लड़कियां खेलती थीं, मैं खेलने लगा था. यूहीं एक शाम बैठे मैं बोर हो रहा था, तो सोचा क्यों न मेरे पास जो गाड़ियों की तस्वीरें हैं, उनका एक एल्बम बनाया जाए. वो तस्वीरें तो वैसे रखे रखे कहीं खो जायेंगी. लोग स्टाम्प कलेक्शन करते हैं, मैं गाड़ियों की तस्वीरें जमा करूँगा. 

गाड़ियों की तस्वीर का एल्बम बनाने के लिए मैंने अपने पुराने कॉपिओं के हार्ड कवर को अलग करना शुरू किया. उसपर वाइट चार्ट पेपर चिपकाया और उसपर गाड़ियों की तस्वीरें लगाना शुरू कर दिया. मुझे जिस भी अख़बार या मैगजीन में जिस भी गाड़ी की तस्वीर दिखती, मैं उसे अपने कलेक्शन में जमा करने के लिए रख लिया करता था..चाहे वो गाड़ियाँ आम हो या ख़ास, या चाहे ऑटोरिक्शा की ही तस्वीर क्यों न हो वो. पापा का एक पुराना ब्रीफकेस था, जिसपर मैंने अपना अधिकार जमा लिया था. अपने गाड़ियों के कलेक्शन को मैंने उसी ब्रीफकेस में रखना शुरू कर दिया. देखते ही देखते मेरे पास दो तीन बैग सिर्फ गाड़ियों की तस्वीरों से भर गए थे. देखिये, कुछ इस तरह मैं गाड़ियों की तस्वीरें जमा किया करता था – 




जब मेरे पास कॉपी के हार्ड कवर कम पड़ने लगे थे, तो मैं बस गाड़ियों के इश्तेहार वाले पन्ने को ही अलग कर के अपने पास रख लेता था. – 



सिर्फ गाड़ियों के ही नहीं, मुझे घड़ियों की भी तस्वीरें को जमा करने का शौक था. स्पोर्ट्स वाच जाने कब से मेरे लिए दुनिया की सबसे अच्छी घड़ी हुआ करती थी, जिसे मैं खरीदना चाहता था, पहनना चाहता था. लेकिन बड़ी महँगी आती थी स्पोर्ट्स वाच. बस तस्वीरें देख कर ही खुश हो जाया करता था मैं. अब स्पोर्ट्स वाच पहनने की वैसी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं रही, लेकिन उन दिनों गज़ब का क्रेज था मुझे घड़ियों का. सिर्फ इनकी तस्वीरें ही नहीं, कितनी कीमत है इनकी, इसकी भी जानकरी रखता था मैं. 

बहुत सी गाड़ियाँ के दो पूरे पन्ने में एड निकलते थे. ये देखिये, टाटा इंडिका, इसमें टाटा इंडिका का लांच डेट भी लिखा है. ये भी उन्हीं दिनों के मेरे कलेक्शन से है मेरे पास. - 



नोकिया मोबाइल का ये एड. उन दिनों ये मोबाइल क्या हॉट-शॉट माना जाता था. जिनके हाथ में दिखा ये मोबाइल यानी वो बड़े लोग हैं. ये नोकिया का एड, १९९८ के इंडिया टुडे मैगजीन से लिया गया है. 



और ये सब भी... मेरे उन दिनों के स्पोर्ट्स आइकॉन. इसमें आप देख सकते हैं सचिन, श्रीनाथ, विश्वनाथन आनंद, मार्टिना नवरातिलोवा और सैम्प्रास को. मुझे इस तरह के अख़बार के कटिंग काट कर रखने का भी शौक था. 



कविताओं में भी थोड़ी दिलचस्पी थी, और फ़िराक, गुलज़ार, शमशेर बहादुर सिंह के नाम से परिचित हो रहा था. तो ये भी अपने पास अपने कलेक्शन में जमा कर लिया था मैंने. 




सिर्फ यही नहीं, मेरे कई और शौक थे. फिल्म कलाकारों की तस्वीरे जमा कर के उनका एल्बम भी बनाने का मुझे शौक था. कविताओं/गजलों/कोटेसन को सजा संवार कर डायरी में दर्ज करना भी. वो सब किसी और पोस्ट में. फ़िलहाल तो आज की शाम युहीं ये सब पुरानी बातें याद आ गयीं थीं तो यहाँ लिख डाला. 


Comments

  1. तभी तो मैं हमेशा कहता हूँ कि मेरे इस बेटे में सागर सा विस्तार है... इतने शौक पालना तो कई लोगों का शगल हो सकता है, लेकिन उन शौक को इतनी शिद्दत से निभाना सब के बस की बात नहीं!! एक दीवानगी चाहिए होती है इसके लिये! और मेरा बेटा तो सचमुच पागल है!! :) :) :)

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  2. सच में बहुत इन्वोल्व्मेंट मागते हैं ऐसे शौक .... बढ़िया पोस्ट

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  3. अभी भी कम पागल नहीं हो तुम गाडी को लेकर :D

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  4. तुम्हारी दीवानगी के आलम के बारे में हम क्या कहें रे...??? बस ऐसे ही रहने का...:) :p

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