इवनिंग डायरी – लैपटॉप वापस आया

एक लैपटॉप के बिना कितना असहाय से हो जाते हैं हम. अब हमारी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं ये गैजेट्स…लैपटॉप, मोबाइल या टैबलेट. पिछले पंद्रह दिनों से मेरा लैपटॉप ख़राब था. सर्विस सेंटर में था, और इन पंद्रह दिन तो जैसे सारे काम रुक से गए थे. सभी डाक्यूमेंट्स, सारे काम की चीज़ें अब लैपटॉप में ही तो रखे होते हैं. आश्चर्य होता है न ये सोच कर कि हमारी निर्भरता गैजेट्स पर कितनी बढ़ गयी है. बिना लैपटॉप/मोबाइल/टैबलेट के कोई काम नहीं हो पाता जैसे.  वो तो कहिये कि कुछ दिन पहले ही एक नया फोन खरीदा था, तो बहुत हद तक ईमेल्स वगैरह देखकर उनका जवाब देना उससे हो जाता था. लेकिन बाकी बहुत से ऐसे काम होते हैं जिसके लिए लैपटॉप की जरूरत तो होती ही है.

चार साल पहले भी ऐसा ही कुछ हुआ था मेरे साथ, जब मेरा पुराना लैपटॉप ख़राब हो गया था, और डेढ़ महीने दो-तीन अलग-अलग सर्विस सेंटर में रहने के बावजूद वो बन नहीं पाया था, मुझे नया लैपटॉप खरीदना पड़ा था. उस समय मैं बैंगलोर में था और लगभग अकेला था. ना मेरे पास कोई स्मार्टफोन था उस समय (होते कहाँ थे उन दिनों अब के जैसे स्मार्टफोन) ना कोई और विकल्प(जैसे टैबलेट) था. जरूरी काम तो साइबर कैफे से हो जाता था, लेकिन बाकी सारे काम बिलकुल ठप पड़ गए थे. हाँ लेकिन एक अच्छी बात भी हुई थी उन दिनों, बहुत सी किताबें/मैगज़ीन/नॉवेल्स वगैरह पढ़ने का वक़्त मिल गया था. इस बार हालाँकि स्थिति थोड़ी अलग थी, कुछ दिनों घर पर रहा था, कुछ न कुछ काम होते रहे थे, तो ज्यादा अखरा नहीं लैपटॉप का खराब होना. हाँ डर जरूर था एक कि कहीं लैपटॉप अगर बन न पाया तो? क्योंकि लैपटॉप में हार्डवेयर प्रॉब्लम था, और पिछला लैपटॉप इसी वजह से नहीं बन पाया था और मुझे नया लैपटॉप खरीदना पड़ा था. लेकिन शुक्र है कि इस बार वैसा कुछ हुआ नहीं, लैपटॉप ठीक होकर आ गया है मेरे पास. 
ये लैपटॉप या स्मार्टफोन के चक्कर में हम खुद के लिए वक़्त कहाँ निकाल पाते हैं. कभी कभी सोचता हूँ तो लगता है कि समय समय पर इन गैजेट्स का ख़राब होना भी हमारे लिए जरूरी ही है. खुद के लिए वक़्त तो मिलेगा हमें…ये हाथ में रहते हैं, स्मार्टफोन/टैबलेट वगैरह तो अकेले बैठे हुए भी हम इनके स्क्रीन की ओर  ताकते रहते हैं….इनके गिरफ्त में रहते हैं हम हमेशा. 
खैर जो भी हो, फ़िलहाल तो मैं खुश हूँ, मेरा लैपटॉप वापस घर आ गया है बन कर. वैसी ही ख़ुशी हो रही है जैसा कि तब होता है जब परिवार का कोई सदस्य बहुत दिन तक अस्पताल में रहकर वापस घर आता है. लैपटॉप मिलने के दो दिन तक तो लैपटॉप को ऑन करने में बड़ा डर लग रहा था, बस आधे एक घंटे चला कर बंद कर दे रहा था लैपटॉप. कहीं कुछ ख़राब हो गया फिर से तो? मन में यही चलता था. ठीक वैसे ही जैसे घर का कोई सदस्य जब बहुत दिन अस्पताल में रह कर वापस आता है, तो उसकी कितनी देखभाल की जाती है.. “ज्यादा न चलो, आराम करो, ख्याल रखो अपना” वगैरह. लैपटॉप को भी मैं तो वैसे ही ट्रीट कर रहा हूँ..आज शाम बड़ा डरते हुए इसे लगातार चला रहा हूँ, अब तक तो बिलकुल ठीक है, समय समय पर इसे छू कर भी देख ले रहा हूँ कि इसका शरीर कहीं ज्यादा गर्म तो नहीं हो रहा…लेकिन नहीं, एकदम ठीक काम कर रहा है ये…
अब तो बस यही दुआ है कि मेरा लैपटॉप ये ठीक से रहे…इसकी तबीयत ठीक रहे…बहुत महंगा इलाज हुआ है इसका. अब बस ख़राब मत हो जाना तुम फिर से…!

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  1. बिलकुल सही कहा रे तुमने…ये गैजेट्स ज़रूरत के रूप में हमारी ज़िंदगी में आए और अब कभी-कभी एक लत की तरह हमारे साथ जुड़ जाते हैं…| कई बार सच में इनके बगैर रहना बहुत सकून पहुंचाता है और वापस पुराने दौर में लौटने जैसा अच्छा अहसास भी जगा देता है…|
    तुम्हारा प्यारा लैपटॉप थोड़ा बदमाशी करके आया है, पर ज़रा प्यार से ही पेश आते रहना उसके साथ…:) :p

  2. सच गैजेट्स पर निर्भरता तो बढ़ गयी है …. बस हमें इन यंत्रों को काम में लने का सही मंत्र समझना होगा ….. अब ख्याल रखें लैपी जी का 🙂

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