घर अंगना…मैं और मेरी बहना

मोना अपने जन्मदिन पर केक काटते हुई

आज तीन जून का दिन है. मेरी बहन मोना का जन्मदिन है आज. ये दिन हमेशा से हम सब के लिए बहुत ख़ास रहा है. घर की बहुत दुलारी रही है मोना. मुझे हमेशा जाने क्यों एक बात याद आती है. शायद 1996 या 1997 की बात होगी. मेरे छोटे मामा उन दिनों मुंबई में नौकरी करते थे . उन्होंने मोना के जन्मदिन पर मोना को एक ग्रीटिंग कार्ड भेजा था और उसके साथ अपनी एक चिट्ठी. उस चिट्ठी से ये साफ़ झलक रहा था कि तीन जून को पटना में नहीं रहना उन्हें कितना अखर रहा था. मुझे आज भी वो चिट्ठी बहुत अच्छे से याद है. पहली बार जब तीन जून को मैं घर पर नहीं था, उस दिन मुझे समझ आया था कि मामा ने वो चिट्ठी लिखते वक़्त मोना को कितना मिस किया होगा. अब तो शायद बहुत साल हो गए मोना के जन्मदिन पर मैं हमेशा बाहर ही रहा हूँ. और आज भी आज के दिन घर से, मोना से दूर रहना थोड़ा तो अखरता ही है.

मोना और मेरे वैसे तो कई किस्से हैं…लेकिन एक मजेदार किस्सा जो माँ हमेशा सुनाती है वो हमारे बचपन का किस्सा है. हम दोनों पाँच-छः साल के होंगे. एक दिन कमरे में बिल्ली घुस आई थी और हम दोनों उस कमरे में अकेले थे. बिल्ली को देखते ही हम दोनों बहुत ज्यादा डर गए और एक दूसरे से लिपट एक सुर में चिल्लाने लगे थे. हम ना तो कमरे से भागे ना ही किसी को बुलाये…बस एक दूसरे को पकड़ कर जोर जोर से रोने लगे और चिल्लाने लगे. हमारी आवाज़ सुनकर माँ दौड़ते हुए आई थी लेकिन हमें यूँ चिल्लाता देख वो हमें चुप कराने के बजाये पहले हँसने लगी थी. माँ आज भी जब ये किस्सा सुनाती है हम खूब हँसते हैं. इस किस्से को माँ के मुँह से सुनने में अलग आनंद आता है, यहाँ मैं कितना भी कोशिश करूँ, ये किस्सा उतना रोचक नहीं बन सकता जितना तब बनेगा जब माँ इसे सुनाएगी.

मोना और मैं, हम दोनों खूब लड़े भी हैं और खूब प्यार भी किये हैं एक दूसरे को. मेरे लिए जो भी सामान आता था उस पर पहला हक़ मोना जताती थी. ये मेरे बड़े होने का एक डीमेरिट था. कुछ भी नया आता मेरे लिए तो उसपर पहला हक़ मोना का होता और वो अपना पुराना सामान मुझे थमा देती… “लो, इसे तुम इस्तेमाल करो और नया वाला मुझे दो”. बचपन से हम दोनों साथ साथ रहे हैं, साथ हर खेल खेले हैं, चाहे वो बैडमिंटन हो, क्रिकेट, लूडो, पिट्टो, चोर-सिपाही, डेंगा पानी, कितकित या लुका छुपी. मोना और हम शुरू से दोस्तों की तरह पले बढ़े हैं. एक दूसरे से लगभग हर कुछ हम शेयर करते थे..छोटी बड़ी हर तरह की बातें. मेरे सभी राज़ की बातें मोना जानती थी, और मोना मेरे हर राज़ को राज़ रखने में बहुत माहिर भी थी(अब भी है). हाँ, कभी कभी मोना मुझे ब्लैकमेल करती थी…और खासकर तब जब वो मुझे कुछ काम करने को कहती और मैं आना-कानी करता था..वो सीधा माँ को आवाज़ लगाती “माँ सुनो तो तुम्हें एक बात बतानी है…” और इस डर से कि कहीं मोना सच में माँ को बता न दे कुछ, मैं झट से मान जाता था…“अच्छा बताओ क्या करना है…” मैं कहता, और मोना के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान उभर आती थी. लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ है कि माँ के सामने मोना मुझे ये धमकी देती और माँ को किसी साजिश की भनक लग जाती…वो पूछती बताओ तो क्या छुपा रहे हो दोनों? लेकिन मोना बड़े खूबसूरती से बात को घुमा ले जाती थी, और मैं चैन की सांस लेता. उन दिनों मुझे बड़ा गुस्सा आता था मोना पर…मोना का कोई भी ऐसा राज़ नहीं था जिसका सहारा लेकर मैं मोना को ब्लैकमेल कर सकूँ लेकिन मोना हमेशा मुझे ब्लैकमेल करने के बहाने ढूँढ लिया करती थी. माँ को भी बाद में इस बात की समझ आ गयी कि हम दोनों के बीच कुछ बातें ऐसी हैं जो सिर्फ हम दोनों एक दूसरे तक ही रख सकते हैं. अब तो माँ का डायलॉग  ये होता है “हम तो जानते हैं कि तुम दोनों एक दूसरे का बात नहीं बताओगे….जाओ मत बताओ”.

ये वही बरामदा है और ये वही हम दोनों. इसी बरामदे में हम
खेलते थे. इस बरामदे की ये एकमात्र तस्वीर मेरे पास है. इस
तस्वीर में भले मैं अजीब तरह से हंस रहा हूँ फिर भी मेरे लिए
कीमती तस्वीर है ये. 

मोना और मैंने शायद सबसे ज्यादा मस्ती गर्मी की छुट्टियों में की है, जब हम राजबंशी नगर के क्वार्टर में रहने आ गए थे. उससे पहले जब तक लाल बाबू  मार्किट में रहे, तब मोहल्ले के बहुत सारे बच्चे थे जिनके साथ हम खेलते थे, भोलू, गौरव, अंशु, शिल्पी दीदी के साथ हम खेलते थे. लेकिन क्वार्टर में आने के बाद हम दोनों अकेले पड़ गए. खुद ही एक दूसरे के साथ खेलने लगे थे. हम अधिकतर खेल क्वार्टर के बरामदे में खेलते थे…बरामदे में मुख्य रूप से हम दो खेल ही खेलते थे..क्रिकेट या कितकित. उन दिनों मेरे पास नया खरीदा हुआ “पॉवर” का बैट था और SG का गेंद. उस गेंद से बाहर दोस्तों के साथ खेलने से पापा मना कर चुके थे, क्योंकि उस गेंद से चोट लगने का डर था. वो गेंद बस घर में रखा रहता था. मैंने बड़े शौक से उस गेंद को खरीदा था. उसका इस्तेमाल तो करना ही था किसी तरीके से, तो मैं मोना के साथ उस गेंद से घर के बरामदे में खेलने लगा. हम धीरे धीरे खेलते, और “एक टप्पा खाने पर कैच आउट” वाला नियम रखते थे हम दोनों. अकसर माँ-पापा से थोड़ी डांट भी हम सुन जाते थे… बरामदे का फर्श ख़राब कंडीशन में हमेशा रहता था, और हम कितने धीरे भी खेलते तो भी फर्श एक दो कमज़ोर जगह से टूट ही जाया करता  था  जिसे बाद में प्लास्टर से भरना पड़ता था. इन सब के अलावा दीवार की भी प्लास्टर कभी कभी झड़ जाती थी. जब भी ऐसा कुछ होता था हम कुछ दिनों के लिए अपना खेल रोक लेते और कुछ दिनों बाद खेल फिर से शुरू हो जाता था.

गर्मी की छुट्टियों में हम एक बदमाशी भी करते थे. मैं नौवीं या दसवीं क्लास में रहा हूँगा. उन दिनों हमारे घर में केबल कनेक्शन  नहीं लगा था. जब कभी कोई ख़ास क्रिकेट सीरिज या क्रिकेट मैच होता जिसका प्रसारण दूरदर्शन पर नहीं किया जाता तो उस मैच को देखने के लिए हम केबल का कनेक्शन हम बगल में रह रहे आंटी के यहाँ से लेते थे. केबल का एक बड़ा सा तार खिड़की के छज्जे पर हमेशा रखा रहता था, उसे ही खींच कर हम घर के अन्दर ले आकर टीवी से कनेक्ट करते थे. और जब केबल का काम नहीं होता था तब वो केबल तार छज्जे पर ही एंटीना के पास पड़ा रहता था. गर्मी की छुट्टियों में हमारे पास समय पूरा होता था और हमें बड़ा मन करता था केबल टीवी देखने का. दोपहर में केबल पर नयी रिलीज हुई फ़िल्में दिखाते थे. घर में लेकिन पापा माँ ने मना कर रखा था केबल कनेक्शन के लिए. लेकिन हम दोनों ने केबल टीवी देखने का एक जुगाड़ खोज निकाला था. माँ-पापा सुबह साढ़े दस ऑफिस जाते थे और उनके ऑफिस जाते ही मैं जल्दी से छज्जे पर चढ़ के केबल के तार को अन्दर कमरे में फेंक देता…मोना दूसरे तरफ खड़ी रहती, वो तार खींच कर टीवी में लगा देती. हम लोग पूरे दोपहर इत्मिनान से टीवी देखते और शाम में पापा या माँ के आने से पहले तार अपने जगह पहुंचा देते. कभी कभी जब पापा या माँ समय से पहले जब आ जाते तब हम जबरदस्त रूप से डर जाते थे…कि कहीं हमारी चोरी पकड़ी न जाये. जल्दबाजी में टीवी से तार निकालकर उसे कमरे के वेंटिलेटर में छुपा देना पड़ता था, और बस ये प्रार्थना करते कि जब तक तार को हम वापस छज्जे पर न पहुंचा दें तब तक पापा माँ की नज़र वेंटिलेटर पर न पड़े. लेकिन ये मेहनत ज्यादा दिन नहीं करनी पड़ी थी. कुछ महीनों बाद हमारे घर में केबल कनेक्शन परमानेंट लग गया था. लेकिन जितने भी महीने तक हम ये बदमाशी किये हमें बड़ा मज़ा आता रहा इसमें.

मैं जब दसवीं में था तब यूँ हीं टाइम पास में कभी कभी कवितायें लिखने लगा था. मेरी हर कविता  की पहली ऑडियंस मोना ही होती थी. एक डायरी थी मेरे पास जिसमें कवितायें लिखता था, और हर कविता लिखने के बाद मोना को दिखाता. फिर जब पटना से बाहर रहने लगा तब भी जब कभी मौका मिलता था मैं मोना को अपना लिखा कुछ पढ़वाते रहता था. मुझे शायद पहला सबसे बड़ा कॉम्प्लीमेंट भी मोना ने ही दिया था जब मैं बैंगलोर में था. हम दोनों KFC में डिनर कर रहे थे. हमें रात की बस से हैदराबाद के लिए निकलना था और हैदराबाद से पटना जाना था हमें. KFC में अचानक कोई गाना बजने लगा था. कौन सा गाना ये याद नहीं मुझे. मोना उस गाने से एकाएक चिढ़ गयी…कहने लगी “देखो तो कितने सड़े हुए गाने बनने लगे हैं आजकल….इससे बेहतर गाने तो भैया तुम लिख सकते हो” मैं उसकी बातों पर हँसने लगा था. उसने फिर गंभीर शक्ल बनाते हुए कहा “अरे सच में, सिरिअसली…तुम इन सब से बेहतर लिखते हो”. मैं किससे कितना बेहतर लिखता था(या हूँ) ये मैं अच्छे से जानता था, लेकिन फिर भी मोना के दिए इस कॉम्प्लीमेंट से उस समय बड़ी ख़ुशी हुई थी.

मोना की शायरी या कविताओं में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही. लेकिन वो किताबें(इंग्लिश नॉवेल्स) बहुत पढ़ती थी. अब भी पढ़ती है वो किताबें. मोना ने लेकिन बहुत पहले एक कविता लिखी थी. मैं उन दिनों इंजीनियरिंग के लिए पटना से कर्णाटक आया था, तब मोना से चिट्ठियों में बात होती थी. मोबाइल उस वक़्त था नहीं, तो शुरुआत के एक साल खूब चिट्ठियां लिखी हैं हम दोनों ने एक दूसरे को(आज भी उस इन्सान को खूब कोसता हूँ जिसके वजह से मेरा वो बैग गुम हो गया जिसमें मैं सब की चिट्ठियां सहेज कर रखता था). मोना ने एक दिन जो चिट्ठी भेजी थी उसमें उसने लिखा था “भैया आज बैठे हुए पता नहीं क्या सोच रही थी, सलमान खान के गाने से इंस्पायर्ड  होकर मैंने एक कविता जैसा कुछ लिखा है जो तुम्हें भेज रही हूँ..देख लो ज़रा तुम और इसमें हो सके तो कुछ करेक्शन  कर के मुझे वापस भेज देना…” मुझे इस बात की थोड़ी हैरानी तो हुई थी कि मोना ने जाने क्या सोच कर मुझे कविता ठीक करने को कहा है, लेकिन ख़ुशी इस बात की ज्यादा थी कि मोना ने अपनी पहली कविता लिखी है. आज मोना का जन्मदिन है तो उसी कविता को यहाँ लगा रहा हूँ.

जाने ये क्या हो रहा है मुझे
जाने क्यों खोयी रहती हूँ मैं अनजाने ख्यालों में
जाने किसकी तस्वीर रहती है हर पल आँखों में
जाने ये कौन बसा हुआ है मेरे तसव्वुर में


कब दिन ढला कब शाम हुई
क्या जानूं मैं कब रात हुई
जाने क्या सोचती रहती हूँ मैं बातों बातों में
जाने किसे खोजती हूँ मैं हर महफ़िल में
भीड़ में भी क्यों तनहाई का एहसास होता है
कौन है जो हर पल मेरे पास रहता है
जाने किसे ढूँढती हूँ मैं अपनी ही परछाई में

मुझे पता है वो है यहीं कहीं
कहीं न कहीं
मिलूंगी मैं भी उससे यहीं कहीं..
कभी न कभी
है बस इंतजार मुझे उस घड़ी का
कि जिस पल आएगा वो सामने मेरे

ऐ रब है बस इतनी सी दुआ तुझसे
खत्म कर दे ये बेकरारी का आलम
मिला दे उस अजनबी से मुझे
कि नहीं होता अब और इंतजार मुझसे

– मोना(ऋचा)

मोना का इस साल जन्मदिन और ख़ास है. इस साल मोना ने हम सब को अवि के रूप में एक खूबसूरत तोहफा दिया है. अवि के साथ मोना का ये पहला जन्मदिन है.
हैप्पी बर्थडे मोना !!

मोना- अवि- मैं 

अंशुमान जी – अवि – मोना 

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  1. बहनों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है भाई पर अपनी दीदीगिरी चलाने का…और बड़ा भाई हो तो फिर क्या कहने…तब तो ये अधिकार दुगुना हो जाता है…:)
    तुम दोनो अब भी कभी प्लान कर लिया करो ऐसी कुछ बदमाशियाँ…और मोना…भाई पर ऐसी बहनगिरी और ब्लैकमेलिंग करती रहना…हमेशा…:)
    और ये सिर्फ़ एक कविता लिख के क्यूँ रुक गई मोना…??? चलो, जल्दी से अगले बड्डे से पहले ढेर सारी कविताएँ लिख डालो…:)

  2. प्रिय मोना को जन्मदिन के साथ-साथ इतना प्यारा भाई भी बहुत बहुत मुबारक । ऐसा स्नेह दुर्लभ है । जहाँ भी हो इसे सम्हाल कर रखलो । अभिषेक , अतुल्य है आपका अपनी बहिन के लिये यह स्नेह । बहुत ही मीठी यादें । मेरे साथ उल्टा रहा । भाई छोटा था और जमकर रौब चलाता था । मैं सहती थी । लेकिन आज हम दोनों में उतना ही गहरा स्नेह है ।

  3. अभिषेक बेटा! उलझा हुआ हूँ इसलिये देखकर भी पढने का मौका नहीं मिल पा रहा था. अभी भी पढ नहीं पाया हूँ. मगर मेरा आशीष मोना को देना!! कहना चाचा नहीं भी पढें तो महसूस ज़रूर करते हैं!!

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