नन्हा गुरु



आज यहाँ मैं प्रियंका दीदी की लिखी बाल कहानी “नन्हा गुरु” पोस्ट कर रहा हूँ. इस बालकथा को उन्होंने अंग्रेजी में लिखा था. जिसका बाद में उन्होंने हिंदी अनुवाद भी किया. हिन्दी अनुवाद पहले पोस्ट कर रहा हूँ, और उसी के ठीक नीचे मूल कहानी जो अंग्रेजी में है उसे पोस्ट कर रहा हूँ. 




बालकहानी
                       
 नन्हा गुरू
                                                     
प्रियंका
गुप्ता
                                                                                                         दिसम्बर की वह एक सर्द सुबह थी । दस वर्षीय शंकर सुबह से बड़ी बोरियत महसूस कर रहा था । उसकी जाड़े की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थी और मम्मी थी कि उसे खेलने ही नहीं जाने दे रही थी | उनका बस हमेशा की तरह एक ही बहाना था ,” इतनी सर्दी है…। मौसम देखा है , कैसा कोहरा हो रहा है…। अगर सर्दी-जुकाम हो गया तो बस , फिर मना लेना छुट्टी…बुखार में…।”

अब इसके बाद शंकर के पास कुछ भी नहीं बचता था कहने के लिए…। सच ही तो कहती थी मम्मी…उसे सर्दी-जुकाम बहुत जल्दी होता था । पर वह भी क्या करे ? अगर खेले न तो घर में रहकर करने के लिए बचता ही क्या था ? अगर मम्मी उसे बाहर नहीं निकलने देती तो पापा भी उसके ज़्यादा टी.वी देखने या कम्प्यूटर को देर तक चलाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे । उन्हें तो बस किताबों से लगाव था । वे अक्सर शंकर को समझाया करते ,” बेटा , अपनी कोर्स की किताबों के अलावा रोज़ाना कम-से-कम दस पन्ने किसी भी किताब के पढ़ा करो…जो भी तुम्हें रुचिकर लगे…। किताबें हमारा मन तो बहलाती ही हैं , हमें सही-ग़लत का फ़र्क भी सिखाती हैं…। वे हमारी सच्ची दोस्त होती हैं…।”

शंकर पापा का विरोध करने की हिम्मत तो रखता नहीं था , पर पापा की बातें न उसे समझ आती थी , न पसन्द…। भला कोई किताबों के साथ दोस्ती कैसे कर सकता है । बस एक जगह चुपचाप बैठ जाओ और पढ़ो…। यह भी कोई बात हुई…? शंकर का अगर वश चलता तो वह दुनिया भर की किताबों को एक कमरे में बंद करके चाभी समुन्दर में फेंक देता…। यही नहीं , बल्कि वह तो सारे स्कूल भी बन्द करवा देता…। शंकर को स्कूल जाना और पढ़ना , दोनो ही नापसन्द था । उसे तो दोस्तों के साथ खेलना , गप्पें मारना और घूमना पसन्द था । पर क्या करे , दुनिया उसकी मर्ज़ी से थोड़े न चलती है…।

शंकर बैठा अपनी छुट्टियों को मज़ेदार तरीके से बिताने के लिए योजना बना रहा था कि तभी दरवाज़े पर हुई दस्तक से उसका ध्यान भंग हुआ । मम्मी रसोई में व्यस्त थी , सो उसे ही दरवाज़ा खोलने जाना पड़ा । दरवाज़ा खोलने पर जैसे वह पल भर को सन्न रह गया । उसके सामने लगभग उसकी ही उम्र का एक अधनंगा-सा बच्चा खड़ा था । उसे देख कर ही कोई बता सकता था जैसे उसने महीनों से कुछ न खाया हो…। उसे देख कर शंकर को आश्चर्य हो रहा था , इतनी सर्दी में कोई पूरे गर्म कपड़ों के बग़ैर कैसे रह सकता था ? वह ऐसे ही खड़ा रहता कि तभी उस बच्चे के खाना माँगने पर जैसे उसका ध्यान भंग हुआ । शंकर ने तेज़ी से भाग कर अपनी मम्मी को उस आए हुए बच्चे के बारे में बताया तो मम्मी भी सारे काम छोड़ , खाना और शंकर का एक पुराना कपड़ा और कोट लेकर ज़ल्दी से बाहर आ गई ।

जितनी देर वह बच्चा खाना खाता रहा , शंकर मम्मी के पीछे छुप कर उसे अचरज़ के साथ निहारता ही रहा । गर्म कपड़े पहन कर और भरपेट खाना खाकर बच्चा बेहद संतुष्ट नज़र आ रहा था ।

” मम्मी , क्या मैं थोड़ी देर इससे बात कर सकता हूँ…।” शंकर को उस बच्चे के बारे में जानने की बहुत इच्छा हो रही थी , सो उसने मम्मी से इजाज़त माँगी । मम्मी भी शायद उसका अकेलापन समझ गई थी सो उन्होंने भी ‘हाँ’ कह दी । शंकर बहुत खुश हुआ…चलो कोई तो मिला उसे अपनी बोरियत मिटाने को…।

उस बच्चे से पूछने पर शंकर को मालूम हुआ कि उसका नाम छोटू था और वह पास ही की एक मलिन बस्ती में अपनी विधवा माँ और एक छोटी बहन के साथ रहता था । उसके पिता की दो साल पहले एक गंभीर बीमारी से मृत्यु हो चुकी थी तथा उसकी माँ आसपास के इलाके में बर्तन माँज कर उसका और उसकी बहन का पालन-पोषण कर रही थी । शंकर को यह जान कर और भी आश्चर्य हुआ कि ग़रीब होने के बावजूद छोटू पास के एक सरकारी स्कूल में पढ़ता भी था । शंकर समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर छोटू को पढ़ने की क्या ज़रूरत थी , जबकि वह तो बड़ी आसानी से अपनी ग़रीबी का बहाना लेकर स्कूल जाने से बच सकता था ।

शंकर को छोटू ने यह भी बताया कि वह बड़ा होकर एक डाक्टर बनना चाहता है ताकि वह अपनी माँ और छोटी बहन को जीवन के वे सारे सुख और आराम दे सके जो उन्हें कभी नहीं मिले ।

” जानते हैं भैया , जब मैं डाक्टर बन जाऊँगा जो सिर्फ़ पैसे से ही इलाज नहीं करूँगा , बल्कि मुफ़्त में भी करूँगा ताकि मेरे बापू की तरह पैसे की कमी के कारण कोई और न बिना इलाज के मरे…।” कहते हुए छोटू की आवाज़ में एक निश्चय की झलक थी ।

शंकर अब भी उसे अचरज़ से देखे जा रहा था । किस मिट्टी का बना है यह…? अभी वह कुछ और सोचता कि तभी छोटू ने कुछ चिरौरी-सी करते हुए शंकर से पूछा , ” भैया , क्या आप मुझे अपनी पिछली कक्षा की कुछ पुरानी किताबें और एक-दो कहानियों की किताबें भी दे सकते हैं…? दर‍असल मैं चाहता हूँ कि मैं अधिक-से-अधिक सीखूँ…तभी तो मैं अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफ़ल होऊँगा…।”

अपनी ओर अब भी चुपचाप ताकते शंकर को देख कर छोटू को लगा , वह आवश्यकता से अधिक माँग रहा है । किसी की आत्मीयता और प्यार के चलते इतना भी नहीं माँगना चाहिए कि देने वाला दुत्कार दे…इसी भय से छोटू वापस जाने के लिए मुड़ा ही था कि शंकर ने लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया । छोटू ने देखा , शंकर की आँखों में एक अनजानी-सी चमक थी । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता , शंकर ने कस कर उसे गले लगा लिया और तेज़ी से अंदर की ओर भाग गया , अपने इस नए और अनजाने से नन्हें दोस्त के लिए किताबें लाने…।

शंकर के स्कूल खुल चुके थे । अबकी बार शंकर पहले जैसा नहीं रहा था…स्कूल और किताबों से दूर भागने वाला…। मम्मी , पापा , उसके दोस्तों…सब को सुखद आश्चर्य हो रहा था उसमें आए इस बदलाव को देख कर…। पर जब भी कोई इस परिवर्तन का कारण जानना चाहता , शंकर की आँखों में वही अनजानी-सी चमक लौट आती । एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ उसका जवाब होता ,” इसका श्रेय तो मेरे गुरू जी को जाता है…।”

Short story
                                                                     
THE GURU
                                                                                                                                
Priyanka Gupta

                It was
a cold December morning. Ten years old Shankar was peeping out of his room’s
window, wondering what to do to amuse himself. His Christmas hols had started
and most of his close friends were out of the town. Shankar felt very bored.
What to do?  Mom didn’t allow him to go
outside to play on such a cold and foggy day.

              “You’ll
catch cold which would result in high fever…” she had forbidden as always when
he asked for her permission and at home, Daddy didn’t allow him much of T.V and
computer. He always insisted on books,” Try to read at least ten pages a day
other than your course books,” he often says,” Books are our best friends.”

                 But
Shankar finds it a boring business. How can one just sit at one place and read?
Even if he could, he would have banned all the books and more preferably, would
have closed all the schools forever. He doesn’t like going to school. He only
liked playing, chatting with friends and watching action movies. He often
thought what a wonderful place this world would have been if there were no
schools to go to and no books to read.

                 He was
thinking of the various plans to be carried out during the holidays, when he
heard someone knocking at the door. Mother was busy in the kitchen so Shankar
had to go to see who was there at the door. When he opened the door, he was
shocked to see a boy of nearly of his own age, standing there half-naked, shivering
with cold. He also seemed to be hungry since ages. His stomach was almost
touching his back. Shankar stood there for some moments, unable to speak. How
could anybody bear such cold without proper clothes? Shankar regained his
senses only when the boy asked him for some food.

                 
Horrified at his condition, Shankar at once ran inside to fetch some
food from his mother. On 
hearing a quick description of the poor boy, mom
herself brought some food and a few old clothing of Shankar.

                 
Shankar was hiding behind his mother, watching the poor chap with
interest. The boy seemed very content after eating and wearing Shankar’s old
clothes. Now Shankar couldn’t resist the urge of asking about him.

                   The
boy, whose name was Chhotu, lived in the nearby slum area with his widow mother
and a baby sister.

                  “Mummy, may I chat with him for some more
time?” Mother nodded when Shankar asked her. He felt very pleased. At least he
had got somebody to spend a little time with on such a dull day.

                   He
came to know that Chhotu’s father died of tuberculosis last year and his mother
is a maid in some houses of that locality. She had been ill for two days, so
couldn’t cook for the children. They even did not have enough clothes. In such
circumstances, he had no other option but to move out in the same way for some
food.

                    
Shankar was amazed to know that despite such poor condition, Chhotu
studied in the government school and was very determined to become a doctor
someday. Then he would be able to provide her mother and sister with all the
comforts of life. He had also planned to provide free treatments and medicines,
so that no other poor should die of illness as his father did.

                  “Bhaiya,
can you please give me your old books and some story books too, if possible?”
Chhotu pleaded him, “I love reading. I want to learn as much as I can because
only then I shall be able to get whatever I want to achieve in my life.” Shankar
was spell bound for a moment. What an amazing boy he was! Wanted to study when
he had the excuse of poverty for not going to school! Wanted to become
something just to bring happiness in the lives of his beloved ones and also the
other people of the society…!!!

                    As
Chhotu found no response on Shankar’s side, he turned back to leave, feeling
disappointed. But Shankar held his hand. When he looked back, he saw that
Shankar’s eyes were gleaming. He just gave Chhotu a tight hug and ran inside to
fetch some books for this little fellow, who was still trying to overcome the
shock of that unexpected hug.

                   
From that day, even till now, whenever somebody asks Shankar the reason
of his sudden increased interest and improvement in his studies, he just
answers back with the same gleam of his eyes, “The credit for this goes to my GURU…”

                     So
I think that like the others, you too are eager to know WHO SHANKAR’S GURU WAS?

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  1. किसी के बारे में लिखी तुम्हारी सब पोस्ट्स पर कुछ भी कहना मेरे लिए जितना आसान होता है, आज उतना ही मुश्किल लग रहा कुछ कह पाना…| बस इतना समझ लो कि कई बार मौन शब्दों से ज़्यादा मुखर होता है…और हर भावना शब्दों से बयान नहीं की जा सकती…:) 🙂

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