चचा का आशीर्वाद


सच कहूँ तो इस पोस्ट को लिखने का पहले कोई इरादा नहीं था…पिछले दिनों दो बातें ऐसी हुई जिसने शायद मुझे ये पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित किया. पहली बात का जिक्र करना यहाँ उचित नहीं है, वो याद करने लायक बात भी नहीं. बस ये था कि उस बात से सलिल चचा और मुझे दोनों को थोड़ी तकलीफ हुई थी. उसी दिन शाम में एक अच्छी बात भी हुई. मेरे मित्र रवि जी का फोन आया था उस शाम. उन्हें मैंने सलिल चचा के कुछ पॉडकास्ट और शार्ट  फिल्म के लिंक भेजे थे. रवि जी ने देखा सुना और फिर तुरंत उसी वक़्त मुझे फोन किया…वो फोन पर लगातार सलिल चचा की तारीफ़ करते जा रहे थे और मैं इधर खुश होते जा रहा था, थोड़ा इतरा रहा था खुद पर, गर्व सा महसूस हो रहा था, कि सारे लोग जिसकी इतनी तारीफ़ करते हैं वो मेरे चचा है.

उस शाम मैं देर तक सोचता रहा था, कि जाने कब कैसे सलिल चचा से मुलाकात हो गयी थी. अब ये सोचना भी असम्भव सा लगता है कि पहले हम लोग एक दूसरे से अंजान थे. सलिल चचा से जितना प्यार-दुलार, अपनापन मिला है उसकी कोई मिसाल नहीं है..जितना सीखा है मैंने अब तक उनसे, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता..फिर भी एक खलिश आज भी होती है मन में कि मेरे दिल्ली आते ही सलिल चचा का ट्रान्सफर हो गया नहीं तो जाने कितना वक़्त उनके साथ बीतता, कितनी शामें गुज़रती सलिल चचा के साथ.
खैर, ये पोस्ट उन सब बातों के लिए नहीं है. वो सब बातें फिर कभी.  ये एक ख़ास पोस्ट है जिसमें मैं सिर्फ सलिल चचा के कमेंट्स को मैं सहेज कर रख रहा हूँ. जिस शाम का मैंने जिक्र किया, उसी शाम ये ख्याल मेरे मन में आया था कि चाहे वो मेरे दोनों ब्लॉग हों या फेसबुक हो..सब पर सलिल चचा का जी भी कमेन्ट आता है वो ख़ास हो जाता है. वो महज एक कमेन्ट नहीं बल्कि कितनी जानकारी कितनी छोटी कहानियां रहती हैं उस कमेन्ट में. उनको जानने वाला हर कोई मेरी इस बात से इत्तेफाक रखेगा कि उनकी बातें सबसे जुदा होती हैं. 

चचा, मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इस पोस्ट को फिर से “शो-ऑफ” समझेंगे. आपके लिए जो समझते हैं वो तो समझेंगे ही, मेरे लिए भी वे लोग शायद ये सोच सकते हैं कि देखो चचा ने तारीफ़ की भतीजे की और भतीजा भी उसे दिखा कर वाह-वाही लूट  रहा है. जो भी हो, भले इस पोस्ट को वे लोग इललॉजिकल और व्यर्थ का पोस्ट बना कहें,  मैं बस उन लोगों से एक ही बात  कहना चाहता हूँ “I dont give a damn! आप लोग जो सोचे वो सोचते रहे” (थोड़े गुस्से में लिख रहा हूँ इस बात को, माफ़ कर दीजियेगा).

एक बेहद ख़ास अंदाज़ था सलिल चचा की टिप्पणियों का…सिर्फ मेरे ब्लॉग “एहसास प्यार का” पर लिखी गयी पोस्ट के लिए सलिल चचा बस एक स्माइली [ 🙂 ] बना देते थे हर पोस्ट में…और उस स्माइली को देखते ही मैं भी मुस्कुराने लगता था. २०१२ के पुस्तक मेले में किसी से मेरे ब्लॉग का जिक्र करते वक्त सलिल चचा ने कहा था “इसके बस एक ब्लॉग से जुड़ा हूँ और वहां कमेन्ट करता हूँ, बाकी दो ब्लॉग में से एक की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है और एक पर बड़प्पन के नाते बाहर ही रहकर बस मुस्कुरा कर काम चलाना पड़ता है.” जो भी हो चचा, आपका बस वो एक स्माइली भी मेरे लिए काफी था….बहुत था…वो भी मेरे लिए आपका आशीर्वाद ही था, लेकिन जब से आपने स्माइली को छोड़कर कमेन्ट करना शुरू किया है तब से तो मेरी पोस्ट्स की खूबसूरती बढ़ गयी है. यकीन मानिए हर पोस्ट लिखने के बाद सबसे बेसब्री से आपके कमेन्ट का इंतजार करता हूँ मैं.

इस पोस्ट की शुरुआत करता हूँ सलिल चचा की एक कविता से…मैंने ये कविता अंग्रेजी में लिखी थी जिसका अनुवाद सलिल चचा ने किया था. कविता के साथ एक लाइन का नोट मैंने लिख छोड़ा था…वो नोट कुछ ऐसा था…: “Friends, please ignore mistakes, if any, in this post…this was written by me around 2 years back…I know my English is real bad.”. 
इस बात पर सलिल चचा ने कहा –

“अभि बचवा..फ्रेंड्स त इग्नोर कर देंगे लेकिन चचा नहीं करने वाले हैं… हमरा हिंदी भासा का एतना कमजोर है कि तुमरा भावना एक्स्प्रेस नहीं हो सकता है… चलो चचा के तरफ से तुमरा अंगरेजी कविता का हिंदी अनुवाद… अनपढ हैं त का हुआ चच्चा त हईए हैं तुमरे… “
मेघ बरसे

जैसे अश्रु धार मेरे नयन से
हर बूंद मेरे अश्रु की
आती है ले स्मृति तुम्हारी
मैं अकेला हूँ भरी बरसात में
दुःख और पीड़ा को लिए!

ख़ास कितनी थी वो वर्षा
कितनी मनमोहक.
कि मेरे साथ थीं तुम
कितनी चमकीली थी सारी वादियाँ
बरसात वो कितनी मदिर थी
क्योंकि उसमें थी घुली हर बात तेरी
हमसफर होकर जो तुमने मुझसे की थीं.

फूल खिलते थे वो जब बरसात में
घासें हरी दिखती थीं धुलकर
आसमाँ भी साफ चमकीला सा दिखता था
भरी बरसात के बाद, कितना रूमानी.
और कितने थे वो दिन अनमोल
क्योंकि साथ थीं तुम!!

ये मेरी खुशकिस्मती रही है कि सलिल चचा ने मेरी हर पोस्ट(जो पता नहीं उतना डिजर्व करती भी है या नहीं) को दिल से पढ़ा है और अपना आशीर्वाद हर पोस्ट पर दिया है…जब स्नेहा ने मेरे किसी पोस्ट पर ये कहा था कि आपको अपनी एक किताब निकलवानी चाहिए, उसपर सलिल चचा ने मुझसे ये कहा “स्नेहा कह रही थी किताब छपवाना चाहिए…ठीक बोले, का करोगे छपवा कर, गंदा है पर धंधा  है ये… पईसा देकर छपवाओ फिर मुफ्त में बाँटो.. पईसा देकर तारीफ लिखवाओ.. एतना करने से अच्छा है चचा से मँगनी में तारीफ लिखवा लो, दिल से (झूठा नहीं)!! . कितना सच बात कहा है आपने चचा…देखिये किताब छपवाने से कितना अच्छा रहा ये कि मेरे पोस्ट पर आपका आशीर्वाद मिलते रहा है और मिलते रहेगा.

शुरुआत के दिनों की बात करूँ तो जब सलिल चचा ने ब्लॉग पर आना शुरू किया  था , उन दिनों की बातें अब पढ़ता हूँ तो बड़ा अजीब सा लगता है और हंसी भी आती है..कभी चचा ऐसे कहते थे मुझे, ये विश्वास नहीं हो पाता  अब. चचा का पहला कमेन्ट जिसके लिए मैं हमेशा भगवान का शुक्रगुज़ार रहूँगा(कि यही वो कमेन्ट था जिसकी वजह से उनसे जुड़ पाया मैं) वो ये था…

“बहुत अच्छा लिखे हैं … लेकिन दू बात का ध्यान रखिए ..बड़ा हैं इसलिए सलाह दे रहे हैं… पहिला पोस्ट करने से पहिले पढ कर दोहरा लीजिए..इससे गलती पता चल जाता है जो पढते टाईम नहीं अखरता है… अऊर मात्रा का खयाल रखिए.. कऊन कहता है कि आप कवि नहीं हैं… एतना सुंदर भाव लिखे हैं कि बताना मोस्किल है..  ”  [बारिश और तुम्हारी यादें ]

सलिल चचा, आपको भी अजीब लगा न..अब यकीन आता है क्या कि आपने कभी मुझे ऐसे लिखा होगा?  नहीं न…एक और कमेन्ट देखिये :

“आम बोल चाल में हम लोग ई दुनो मुहावरा का परयोग खूब करते हैं..लेकिन ई दुनो को जोडकर जे आप कबिता लिखे हैं उ बेजोड है!!” [ तुम बहुत याद आती हो ] 
(हंसी माफ़ चचा, लेकिन बड़ा मजेदार और अजीब भी लग रहा है पढ़ना की आप मुझे कभी “आप” कह कर पुकारते थे. विश्वास नहीं होता न)

उन दिनों मैं खुश हो जाता था जब भी सलिल चचा ब्लॉग पर कमेन्ट करते थे…वो मेरी कविताओं में गलितयाँ सुधारते…मुझे बताते कि देखो यहाँ तुमने गलत किया है, इसे ठीक कर लो…मुझे ऐसा लगता जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे चलना सिखा रहा हो….मैंने चचा से यूँ हीं एक दिन कहा था, कि आप ऐसे ही मुझे मेरी गलतियाँ बताते रहा कीजिये. सलिल चचा ने जवाब दिया था
“अभिषेक बचवा!! एगो पादरी Cardinal Newman का कहा है कि A man would do nothing, if he waited to do it so well that no one will find fault with what he has done. माने, अगर तुम एही इंतज़ार में रहोगे कि लोग गलती निकालेगा त कभी तरक्की नहीं कर सकते.. कबिता त मन का बात ईमानदारी से कह देने का नाम है…बस ध्यान रहे एम्मानादारी नहीं छूटना चाहिए.” [ तुम जा रही थी ] 

मेरी एक कविता थी, उस कविता पर सब तारीफ़ कर रहे थे, सलिल चचा ने चुपके से आकर कहा कुछ और मैं मुस्कुराने लगा था.

“अब हम का बोलें… कुछ नहीं बोलते हैं जाओ… ग्रामर बहुत गड़बड़ है इस बार!! on [तुम्हारी यादों का हैंगओवर]”

मैं तो बस यूँ ही रेंडमली पोस्ट लिख देता हूँ, बिना सोचे बिना समझे. लेकिन जब ऐसे ही लिखे पोस्ट्स पर इस तरह की  खूबसूरत बातें पढ़ने को मिलती है तो मुझे पोस्ट दोबारा पढ़ना पड़ता है ये देखने के लिए कि मेरी लिखी पोस्ट क्या सच में इतनी खूबसूरत थी? दिल्ली डायरी की लेटेस्ट पोस्ट पर सलिल चचा के ये दो कमेन्ट देखिये…


“इस पोस्ट का मुझे बेसब्री से इंतज़ार था बेटू!! बस दो चार दिनों से रोज़ अपडेट देखता रहता था कि तुमने लिखा कि नहीं.. आज जब देखा तो दिल को तसल्ली हुई!! “तेरे जाने की घड़ी, आह बड़ी सख़्त घड़ी है” इसीलिये चाहता था कि ये सख़्त घड़ी जितनी जल्दी गुज़र जाये उतना अच्छा है. मगर चचा गुलज़ार के साथ साथ हमारे चचा राही मासूम की बातें भी चुभती हैं बेटू… याद कोई बादलों  की तरह हल्की-फुल्की चीज़ नहीं जो आहिस्ता से गुज़र जाये, यादें एक पूरा ज़माना होती हैं और ज़माना कभी हलका नहीं होता. ख़ैर वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा! आज मुझे बहुत पुरानी कहानी दोहराये जाने का एहसास हो रहा है: फ़ासले ऐसे भी होंगे, ये कभी सोचा न था, सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था!! / पुनश्च: 440 वाट नहीं, 440 वोल्ट!” [ तेरे जाने की घड़ी बड़ी सख्त घड़ी है ]

“अपने चेहरे पर लिखवा लो – Fragile! Handle with care!! तुम्हारी पोस्ट्स पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि दौड़कर तुम्हें समेट लूँ अपने दामन में ‘मेरे बच्चे’ कहकर.. अगले ही पल महसूस होता है कहीं मेरे दामन में तुम चूर-चूर होकर न बिखर जाओ!! देखता तो मैं भी हूँ ऊपरवाले की ओर, मगर कभी यह नहीं कहता कि Thank you God!! मैं तो हमेशा यही कहता हूँ कि तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर तूफ़ाँ ये प्यार का मन में बसाकर कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी आँसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी बोल क्या सूझी तुझको , काहे को प्रीत बनाई!! Love you my son!!”  [ दिल्ली डायरी (४) ]

मेरी एक पोस्ट है जो मेरे दिल के बेहद करीब है. इस पोस्ट को लेकर चचा के मन में एक कन्फ्यूजन आ गया था…जिसे मैंने बाद में दूर किया था…[चचा आपको याद है क्या कन्फ्यूजन? 🙂 ] चिंता और थोड़ा गुस्सा जो दिखाया है चचा ने उसे पढ़ कर मैं सच में मुस्कुराने लगा था..

“पूरी पोस्ट को पढ़ते हुए एक अजीब सा ख़ौफ़ पसरता चला गया दिलोदिमाग़ में… सिर्फ़ माँ ही नहीं, कभी-कभी बहुत चाहने वाले भी ‘बिन चिट्ठी बिन तार’ उस दुख से बात कर लेते हैं जो बयान नहीं किया गया. कुछ-कुछ जो कहा नहीं वो सुनते हुए और जो सुना नहीं वो कहते हुए भी.. मैं भी पिछले कुछ महीने से उस लड़के के लिए बहुत परेशान हूँ.. कुछ करीबी लोगों से ज़िक्र भी किया.. लेकिन जब बेटे का जूता बाप के पैर से भी बड़ा हो जाए, तो डर लगता है कुछ कहते हुए भी.. गुलज़ार साहब की यह नज़्म एक बार मैंने भी कोट की थी.. लेकिन आज बशीर साहब का कलाम दोहराने का जी चाह रहा है..कभी मिल जाए वो शख्स तो उसे कहना कि मैं आज भी उसे बहुत चाहता हूँ, उसकी फ़िक्र है मुझे.. 
यूँ ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो 
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो 
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से 
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो 
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा 
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो 
मुझे इश्तहार सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ 
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो
ये ख़िज़ा की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

नहीं बेहिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर नहीं
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो 
एक खाली सा दिन ]

चचा का गुस्सा दिखाने का तरीका वैसे बड़ा नायब होता है. ब्लॉग के पोस्ट या फेसबुक वाल पर कभी कोई शेर चिपका देते थे, मैं समझ जाता था कि चचा आज गुस्से में हैं, और फिर उनसे फोन पर बात कर के उन्हें मनाता था…एक बड़ा ही मजेदार सा प्यारा सा कमेन्ट देखिये सलिल चचा का जो कि मेरी  एक और पोस्ट पर आया था : 


“अपना ज़माना याद आ गया.. इससे कुछेक डिग्री ऊपर!! मगर अब लिखना मुमकिन नहीं!! वैसे भी तुमने मेरे ब्लॉग पर आना छोड़ रखा है तो पढ़ भी नहीं पाओगे!! :)” [ यादों में एक दिन – क्रिसमस ] 

बीच में कुछ समय के लिए मेरे ब्लॉग एहसास प्यार का पर सह लेखक के रूप में मेरी दोस्त दिव्या जुड़ गयी थी. दिव्या बीच बीच में कभी कविता तो कभी गाने पोस्ट किया करती थी. उन दिनों मैं सच में उलझा हुआ रहता था…और इसी बात को लेकर सलिल चचा ने एक दिन एक मजेदार कमेन्ट किया था..पोस्ट दिव्या ने लगाई थी ब्लॉग पर…

“अभिसेक पहिले चचा कहता था… अब भागल चलता है..कहाँ ओझराया है पते नहीं चलता है…कोनो बात नहीं… तुमको की बोर्ड थमा दिहिस है त जरूरे कोनो कारन होगा… ई गनवा त हमरा जमाना का है…बहुत सानदार गाना है!!!” [ खोया खोया चाँद !!!!! ] 

चचा का प्यार भरा गुस्सा देखिये यहाँ भी देखिये….एक बार फिर :

“तुम इतने अच्छे क्यों हो पुत्र!! कभी कभी दुनिया के दस्तूर से अच्छे लोगों को देखकर डर लगने लगता है.. अभि, तुम जब भी लिखते हो दिल से लिखते हो.. अगर कभी तुम्हारी किताब छपी, तो याद रखना उसका इंट्रो हम ही लिखेंगे!! आजकल चचा से नाराज़ चल रहे हो लगता है!! न फोन न मुलाक़ात!! जब हम नहीं रहेंगे त हमको भी ऐसे ही याद करोगे बेटा और सोचोगे मिल ही लेते तो अच्छा था!!” on टूटते तारों का सच


(सलिल चचा आप ख़ास तौर पर गौर कीजियेगा ऊपर वाले अपने कमेन्ट पर…इंट्रो लिखने की बात पर कुछ याद आया आपको? उस शाम इस बारे में भी बात हुई थी न आपसे.)

अपने इस ब्लॉग के सौ पोस्ट पूरे होने पर मैंने जो लिखा था, उसपर चचा ने कमेन्ट ‘रोमन’ में किया था, जिसका अनुवाद उसी पोस्ट में अर्चना बुआ ने किया. दोनों कमेन्ट देखिये : 

“Commenting with a very BAAAAD mood.. Itni sweet si post aur main roman me comment kar raha hoon. . Seriously… Bus me travel kar raha hoon aur tumhari post padhkar apne kurte ki aastin se apni aankhe ponchh raha hoon.. Hamesha kehta aaya hoon aur aaj bhi kahunga ki ye sachche emotions tumhare dil ki seep me chhipe wo moti hain jiska mukabla duniya ki koi daulat nahin kar sakti.. Chacha hoon magar Ghalib nahin, varna kahta ki apni ye post mere naam kar do aur badle me meri sau sawaa sau posts le lo!! Kuchh log dil ke kareeb hote hain.. Magar kuchh log dil me hote hain.. Tum dil me ho mere. Is post ki timing aur writting par khade hokar taaliyan baja raha hoon. WO KHUSHNASIB HAI JISKO TU INTIKHAB KARE!! Jeete Raho!!” [ सफ़र की शुरुआत… ]

अर्चना बुआ का अनुवाद : 
“कोई नी भैया मैं हूँ ना– 🙂 इतनी स्वीट सी पोस्ट और मुझे रोमन में कमेंट करना पड़ा सबसे पहले उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ …… सही बताउँ तो -बस में सफ़र कर रहा हूँ, और तुम्हारी पोस्ट पढ़कर अपने कुर्ते की आस्तीन से अपनी आँख पोंछ रहा हूँ…. हमेशा कहता आया हूँ और आज भी कहूँगा कि ये सच्ची भावनाएँ तुम्हारे दिल की सीप में छिपे वो मोती हैं,जिसका मुकाबला दुनियाँ की कोई दौलत नहीं कर सकती.. चाचा हूँ मगर “गालिब” नहीं, वरना कहता कि अपनी ये पोस्ट मेरे नाम कर दो और बदले में मेरी सौ सवा सौ पोस्ट ले लो !! कुछ लोग दिल के करीब होते हैं.. मगर कुछ लोग दिल में होते हैं.. तुम दिल में हो मेरे .. इस पोस्ट की टाईमिंग और राईटिंग पर खडे़ होकर तालियाँ बजा रहा हूँ… ” वो खुशनसीब है जिसको तू इन्तिखाब करे!!” जीते रहो !! (गलतियों के लिए मुझे बःई माफ़ कर देना …दोनों … ) …:-)” [ सफ़र की शुरुआत… ] 
एक और पोस्ट जो मेरे दिल के बेहद करीब है, जिसे मैंने अपनी दिदु के लिए लिखा था, उसपर सलिल चचा का कमेन्ट, और इस पोस्ट पर भी फिर से रोमन में ही कमेन्ट किया था सलिल चचा ने जिसका उनको बड़ा अफ़सोस भी था..

“Afsos ho raja hai ki kis post par comment hindi mein karna chaahiye ths, Roman mein likh kar de raha hoon.. Main to kabhi mila nahin lekin tumhare tukda-tukda kisson ne inhein mere liye khas bana diya.. Ek line yaad aayi WO KHUSHNASEEB HAI JISKO TU INTIKHAAB KARE.. Jab koi aisa smeh barasanewala mil jaaye to har din khas ho jata hai.. Aur ye to janmdin hai.. Meri zuban mein – AAJ TO MAZA AA GAYA PAIDA HOKAR! Main aashirwad doon, shubhkaamanaayen doon ya sneh.. 100th post ki PARI ke liye hazaron khishoyom bhare baras ki duayen! Amen!” [मैंने परी को देखा है.. ] 
सलिल चचा रोमन में कमेन्ट मेरे ब्लॉग पर बहुत कम करते हैं, और जब करते हैं तब मैं समझ जाता हूँ की वो व्यस्त हैं और मोबाइल के जरिये ब्लॉग पढ़ रहे हैं. मुझे बड़ी ख़ुशी होती है कि सलिल चचा व्यस्तता के बीच भी समय निकाल कर मोबाइल के जरिये ही सही मेरे ब्लॉग को पढ़ रहे हैं….

” Abhi beta! Kuchh baatein DIL-LOGICAL hoti hain aur usmein zamane ka logic nahim chalata.. Usne PURPLE keh diya to baat illogical ho gayi aur log GULABI jaadaa keh dein to kaun sa logic hai?? I am with my princess.. Tumhare blog ka rang bhi PURPLE hai beta.. Ab bataao!!! Bahut khoobsoorat post!! ” [  सर्दियों की आहट और मौसम का पहला खत..तुम्हारे नाम ]

मेरी एक पोस्ट पर चचा ने एक नज़्म लिखी थी, ये नज़्म भी मेरे दिल के बेहद करीब है. पोस्ट सच कहूँ तो कुछ भी ख़ास नहीं थी, लेकिन सलिल चचा की इस  नज़्म से वो पोस्ट आम से बेहद ख़ास हो गयी. 

लोग मशगूल थे सब शादी में
रस्में मंडप में चल रही थीं उधर,
दूर उस लॉन की सरगोशी में
तन्हाँ बैठे हुए थे हम दोनों
और अचानक बजी गाने की धुन
तुम उठी, उठके नाचने भी लगी,
मुझको तो नाचना आता ही नहीं.
तुमने पीछा शुरू किया मेरा
मैं तो बस गोल-गोल भागा फिरा
ऐसे जैसे न पकड़ पाओ मुझे.
और फिर रुक गयीं अचानक तुम
हंसके बोली कि बड़े बुद्धू हो
मन्त्र पंडित जी पढ़ रहे थे वहाँ
और हम गोल-गोल घूमें यहाँ.
देख लो सात पे रुकी हूँ मैं
कोई वादा नहीं लिया मैंने
मैं बिना शर्त बस तुम्हारी हूँ
अपनी मम्मी से कहके घर रख लो!
मिस्टिरीअस अक्टूबर -२-  ]


इस पोस्ट के बाद फिर एक पोस्ट पर सलिल चचा ने कहा था कि उन्हें एक नज़्म लिखने की ख्वाहिश हुई थी. सलिल चचा आपने लिखा क्यों नहीं? लिख देते तो मेरे कलेक्सन में वो नज़्म जुड़ती न…

“आज फिर नज़्म लिखने की ख्वाहिश हो रही थी.. फिर लगा कि नहीं, तुम्हारी यादों की खूबसूरती और मासूमियत के आगे कुछ भी कहना छोटा लगता है.. मगर एम्मान्दारी से कह रहा हूँ कि जब भी तुम्हारी इन यादों से गुज़रता हूँ तो कोई नज़्म खुद ब खुद अंगडाई लेने लगती है.. बहुत प्यारी लगी ये याद भी!!” [ टेरेस, कॉफ़ी और वो ]

चचा की अधिकतर बातें ऐसी होती हैं की मैं सच में बड़ा आश्चर्य में पड़ जाता हूँ, कुछ समझ में नहीं आता कि उन्हें जवाब क्या दूँ. फिर उनकी कही एक बात याद आती है…कहा था चचा ने एक बार, कि जरूरी नहीं हर बात पर कुछ कहा ही जाए. कभी कभी कोई बातों का जवाब नहीं होता कुछ भी….

“कभी कभी तुम्हारी इन पोस्टों को पढकर लगता है कि पूरी की पूरी पोस्ट ही दुबारा लिख डालूँ.. और जानते हो अगले ही पल मेरा मन क्या कहता है मुझसे?? मेरा मन कहता है,”बहुत गुमान है न अपने लिखने पर, लेकिन लाख कोशिश करके भी तुम ऐसा नहीं लिख सकते!! कभी नहीं लिख सकते! तुम्हारा बयान बासी होगा सलिल मियाँ!! और बासी बयान से वो खुशबू नहीं आ सकती जो ‘उसके’ परफ्यूम का एहसास करा सके!” बस बेटा अभिषेक.. तुमसे मैं भी सौरी कह लूँ, उस ख्याल के लिए!!” [ परफ्यूम की खुशबु ] 

छोटी छोटी कहानियाँ भी चचा ने शेयर की है मेरे कई पोस्ट पर. “मेरी बातें” ऐसे कई कमेंट्स हैं उनके. कुछ एहसास प्यार का पर भी हैं वैसे कमेंट्स…

“जब आई.एस-सी. में पढता था तब भी लिटरेचर की क्लास बहुत ईमानदारी से अटेंड करता था.. उन्हीं दिनों एक प्रोफ़ेसर से इश्क हो गया था.. उन्होंने एक कविता इतने खूबसूरत अन्दाज़ में पढाई कि बस पढाने वाले पर रीझ गया मैं.. कविता थी अल्फ्रेड टेनिसन की “द मिल्लर्स डॉटर”.. इसके कुछ साल बाद गुलज़ार साहब की ये नज़्म पढ़ी.. बिलकुल वही थीम.. आज तक इस नज़्म को नहीं भूला मैं और न उस पोएट्री को!! तुमने भी क्या क्या याद दिला दिया! याद नहीं कब पढ़ी थी वो पोएट्री.. शायद दिसंबर ही रहा हो!!” [ इसमें मेरा प्यार मिला हुआ है.. ]

एक और..

“तुम बच्चों के साथ जी तो सकता हूँ.. गुज़ारे हुए लम्हों को वापस नहीं ला सकता.. हमारे ज़माने में तो अंग्रेज़ी फ़िल्में होती नहीं थीं..!हमने जोन और मिशेल की फिल्म “फ्रेंड्स” देखी थी वैशाली में.. अरे! तुम कार की बात करते हो और मैं बेकार की बात करने लगा.. सबसे अच्छी बात तुम्हारी पोस्ट की ये होती है कि तुम दिल से लिखते हो.. पढ़ने वाले को अपने साथ बहाकर ले जाना खूबी है तुम्हारी!गौड ब्लेस यू!!” [ लव इन दिसम्बर ] 
सलिल चचा का एक और कमेन्ट…

“बबुआ तुमरा बात से त हमको भी पटना (आझे लौटे हैं पटना से) का वाटर लोगिंग याद आ गया..लेकिन ऊ सब बाद में.. पहिले त भरतेंदु जी का कबित्त याद आ गयाः टूट टाट, घर टपकत, खटियो टूट पिय की बाँह ओसिसवाँ सुख की लूट… अऊर मोडर्न टैम में बरखा रानी ज़रा जम के बरसो मेरा दिलबर जा न पाए झूम कर बरसो!!! on [ उस दिन के बाद वैसी बारिश फिर नहीं हुई.. ]

एक पोस्ट जिसे मैंने बेहद दिल से लिखा था, उसपर ने लिखा था कुछ..चचा आप ज़रा गौर कीजिये यहाँ, आपने गाने के सिक्वेल के बारे में लिखा है कुछ..मुझे चाहिए वो सिक्वेल. (वैसे जहाँ तक याद आता है आपने बताया था कि आपके पास अब वो है नहीं)

“इस पूरे एहसास को मैंने भी रूह से महसूस किया है.. पता नहीं क्यों.. मगर कभी महेंद्र, कभी माया और कभी सुधा से मिला हूँ.. और माया.. पता नहीं क्यों उससे मिलकर माफी नहीं मांग पाया.. आज भी सोचता हूँ कि मेरी माफी ड्यू है उसपर!! कहीं बिना माफी मांगे ही चला गया तो??? ये फिल्म जब भी देखता हूँ और ये गाना जब भी सुनता हूँ, एक सिहरन सी होने लगती है.. इस गाने का सिक्वेल भी लिखा था मैंने..!!” on [ मुझे अपने कॉलर से झटक कर गिरा मत देना ]

और चचा का ये कमेन्ट, सच में मैं इस कमेन्ट पर स्पीचलेस हो गया था : 

“वत्स!! फिल्म इजाज़त में पागलपन की इन्तिहाँ देखी थी… सोचा था, इससे ज़्यादा कोई पागल नहीं हो सकता और यहाँ तक सोच पाना गुलज़ार साहब के ही बस की बात है.. आज तुम्हारे इस पागलपन ने स्पीचलेस कर दिया!!पूरी पोस्ट एक लंबी नज़्म की तरह है!! on [ तुम बिन -२- ]


सलिल चचा के इस नज़्म के साथ पोस्ट खत्म कर रहा हूँ, जो उन्होंने मेरी एक कविता पर लिखी थी, वो कविता मैंने फेसबुक पर लगाई थी…

काश तुमने
नज़्म ये लिखी न होती!
काश तुमको मिल गया होता
वो सब
जिसने तुम्हें पटका है माज़ी की
हसीं रंगीनियों से
आज की तारीकियों में
काश वो होता
दुआ अपने बुज़ुर्गों ने जो दी थी
हाथ माथे पर बड़े ही प्यार से रखकर
तो फिर इस नज़्म की सूरत
ही कुछ होती अलग�
बेटा मिरा प्यारा सा
बस जीता है वो जज़्बात
और एहसास से लबरेज़ है वो रूह तक
जिसने तुझे ख़ुद से अलग अपने किया
उसको कहाँ मालूम क्या खोया है उसने
नज़्म ये उसके लिये तो हो नहीं सकती
मगर ये दिल तुम्हारा
मानता भी है कहाँ
चाचा का कहना
मान लेते तुम
तो सचमुच
नज़्म ये तुमने कभी लिखी नहीं होती!!
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एक जरूरी बात और भी…

इधर कुछ दिनों से चचा मेरे एक दूसरे ब्लॉग से भी जुड़े हैं. वो असल में दिदु(प्रियंका दीदी) का ब्लॉग है, लेकिन उस ब्लॉग पर उससे ज्यादा मेरा अधिकार है. तो मैं इस पोस्ट में उस ब्लॉग पर आये चचा की कुछ टिप्पणियों को भी यहाँ सहेज कर रख रहा हूँ…..

“एक प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य लेखक ने हास्य के तौर पर लिखा था कि “राम नाम सत्य है” एक ऐसा वाक्य है जो एक सनातन सत्य है. लेकिन इसे केवल शवयात्रा के समय प्रयोग करने की परम्परा बन गयी है.इसे किसी के विवाह पर बोलकर देखिये फिर लोग आपका क्या हाल बनाते हैं! उसी तरह कई बातें देश, काल और परिस्थिति के अनुसार अपना अर्थ प्राप्त करती हैं और खो देती हैं. इसलिये वे सारे प्रश्न जो यहाँ उठाये गये हैं उसका जवाब देना बहुत कठिन है. सही-गलत, अच्छा-बुरा ये सब तुलनात्मक हैं, जो पूरी तरह देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करते हैं!”  on [ भावनाओं को समझो… ] 

“हमारे पापा की पोस्टिंग इलाहाबाद में थी और माँ हम सब भाई-बहनों को पटना में रखकर उनकी पढ़ाई और परवरिश करती थीं. इसलिए हम लोगों को हमेशा यही सिखाया गया कि हम ऐसा कोई काम न करें जिससे किसी को यह कहने का मौक़ा मिले कि माँ की परवरिश में कमी थी इसलिए बच्चे बिगड़ गए… अभाव कभी नहीं रहा परिवार में, लेकिन शुरू से जाने क्यों ज़रूरत की किसी चीज़ के लिए ज़िद नहीं करना पड़ी और बेज़रूरत की चीज़ कभी अच्छी नहीं लगी. आज भी चादर से पाँव न निकलें यही सोचता हूँ. आपकी इस पोस्ट से बचपन की गलियों में एक बार फिर से घूम आया. हाँ, मेरी बेटी नहीं समझती यह सब… शायद इस्लिए कि ख़ुद को बड़े बाप की बेटी समझती है, जो अपनी इकलौती बेटी की हर ख़्वाहिश पूरी कर देता है!! बहुत अच्छी और प्यारी पोस्ट!!!!! on[ कच्ची-सी धूप…गुनगुनी-सी धूप… ]


“अरस्तू ने कहा था कि जो समाज में नहीं रहना चाहता वो या तो देवता है या जंगली जानवर..इसलिए ज़रुरत समाज के गलत कायदों को बदलने की है न कि खुद को सही साबित करने की..
तुम्हारी हर बात से सहमत हूँ, लेकिन ये भी मत भूलो कि
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे,
अब इतनी भी ज्यादा सफाई न दे!!
मैं तो ख़ुद भी कितने रिश्ते संभाले घूम रहा हूँ!! on [ ब्लड इज़ थिकर दैन वॉटर…या…??? 
]

“भरोसा, उम्मीद, एक्स्पेक्टेशन वगैरह ऐसे सम्बन्ध हैं जो हमेशा दो तरफा होकर चलते हैं. कुछ इस तरह कि आज उँगली थामके तेरी, तुझे मैं चलना सिखला दूँ, कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बूढा हो जाऊँ!
वो बाप जो हवा में बच्चे को उछालता है और बच्चे को पता होता है (जबकि होता नहीं) कि बाप के हाथ उसे थाम लेंगे. अक्सर बच्चे माँ-बाप का भरोसा साबित करते समय ये भूल जाते हैं. क्योंकि उन सभी (हवा में उछालना, चिल्लाते ही दूध पिलाना) को या तो खेल सम्झते हैं या माँ-बाप का फर्ज़.
भरोसा इंसान को ख़ुद पर करना चाहिये. या जिसपर किया जाए उसके प्रति पूरी तरह समर्पित होकर. दरसल हम अपने फैसलों पर दूसरों की मुहर चाहते हैं. अर्जुन युद्ध से भागना चाहता था और इसके लिये भगवान की सहमति चाह्ता था. अपने तर्क दे रहा था. ख़ुद पर उसका भरोसा डगमगा गया था. भगवान उसे आज्ञा भी दे सकते थे, लेकिन उन्होंने उसे भरोसा दिलाया, अपनी बात कही और उसे युद्ध के लिये प्रेरित किया. और यह भरोसा देना 18 अध्याय तक चला. हम किसी के आगे अपना रोना रोते हैं और कहते हैं कि दुनिया भरोसे के क़ाबिल नहीं रही, तो यह उस आदमी पर भरोसा करने जैसा नहीं है, बल्कि ख़ुद को भरोसेमन्द साबित करने जैसा है.
वैसे एक बात जो मैंने पहले भी कभी कही है कहीं कि आँसुओं का विज्ञापन कभी मत करो, वास्तव में इनका कोई मार्केट नहीं.
रोने के लिये कन्धे का मिल जाना भरोसा नहीं. दुनिया का सबसे भरोसेमन्द आदमी तो तुम्हारे अन्दर बैठा है, उसे ढूँढो और उसे अपना दोस्त बनाओ!!
/
बहुत अच्छा विषय चुना है तुमने!!”  on[ मुठ्ठी में बन्द तितलियाँ.. .]

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  1. सच्ची बहुत मेहनत किया है तुमने इस पोस्ट को लिखने में…भले ही कोई इसे आसान समझे पर हमको मालूम है कि इतनी सारी पोस्ट्स में जाकर ढूंढ-ढूँढ कर इन कमेंट्स को इकठ्ठा करके पोस्ट तैयार करना…ये तुम जैसा प्यारा लड़का ही कर सकता है…:)
    लगे हाथ मेरा काम भी आसान कर दिया, सलिल चचा के कमेंट्स मेरे….(सॉरी…तुम्हारे…:P) ब्लॉग से भी लाकर इधर लगाने के लिए…| शुक्रिया की उम्मीद कर रहे हो तो भूल जाओ…ये तुम्हारा फ़र्ज़ था…:) 😛
    वैसे सीरियसली…चचा का आशीर्वाद तुमको मिला है…बहुत भाग्यशाली हो…|

  2. ऐसा लगा कि ज़माने बाद अपने घर लौटा हूँ और बरसों से बन्द पड़े कमरे की कुण्डी खोलकर अपनी पुरानी यादों को महसूस कर रहा हूँ… तुम्हारी वो सारी पोस्ट्स नज़रों के सामने से गुज़र गईं और साथ ही दिल से निकले कमेण्ट्स और उनसे जुड़े हुए एहसासात.. कुछ कमेण्ट्स तो इतनी शिद्दत से लिखे थे मैंने कि आज भी पढकर आँखें नम हो गईं. और मेरी वो नज़्में जिन्हें ख़ुद मैंने सम्भालकर नहीं रखा (अभी भी कॉपी नहीं किया है) उनसे मिला दिया तुमने. हालाँकि वे अब मेरी कहाँ, सब तुम्हारी ही तो हैं!
    उस नज़्म का सिक्वेल फिर से बैठकर लिखना होगा, क्योंकि उस समय लिखकर फेंक दिया करता था. सहेजकर रखता तो ज़रूर साझा करता. तुम्हारी तमाम पोस्ट मुझे अपनी कुछ बीती हुई बातें, कोई वाक़या याद दिलाती रही हैं… आख़िर हम भी किसी ज़माने में तुम्हारी उम्र के थे. ये बात और है कि आज उन बातों को याद करके हँसी आती है, लेकिन हँसी सिर्फ एक गिफ्ट रैप ही साबित होती है उन यादों के लिये. क्या कहूँ, कुछ भी नहीं कह पा रहा हूँ. कभी हँसी कभी आँसू सामने आ जाते हैं.
    जीते रहो. और प्रियंका से जो मैं गुस्सा हो गया था (बाद में पता चला गलती तुम्हारी है- मॉडरेशन को लेकर) वो बात तो तुमने बताई नहीं! ख़ैर, बस यूँ ही लिखते रहो बिन्दास! दिल से लिखना दुनिया का बेहतरीन लेखन है. बिना बनावट!!

    • सलिल चचा, वो गुस्सा भी तो आपके आशीर्वाद और प्यार का ही हिस्सा था…और फिर माना भी यही जाता है कि हम अपनों से ही गुस्सा होते हैं…| वैसे अब तो आपका आशीर्वाद है ही मेरे साथ…|

  3. अभिषेक बडा ही अनूठा कार्य किया है आपने । सलिल भैया हैं ही ऐसे । अपनी टिप्पणियों से साधारण पोस्ट को भी विशेष बना देना उनका स्वभाव भी है और कौशल भी । उनकी टिप्पणियाँ स्वयं एक पोस्ट होतीं हैं । मैं अपने ही नही दूसरे ब्लाग पर भी उनको देखती हूँ तब यही सोचती हूँ कि कितना विस्तार समेटे हुए है ,रचनाकार चाहे छोटा हो या बडा हो सबके लिये कितनी जगह बना रखी है इस अद्भुत इन्सान ने ।
    और जैसे संवेदनशील और विचारशील चाचा वैसा ही भतीजा । इस ब्लाग पर आकर कोई चलताऊ टिप्पणी करके तो देखे बशर्ते पोस्ट उसने ध्यान से पढी हो ।
    बहुत शुभकामनाएं । ऐसे ही बने रहो । लिखते रहो ।

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