इवनिंग डायरी – ब्लॉगिन्ग को लेकर कुछ रैंडम बातें

आज शाम बैठे हुए बहुत सी बातें सोच रहा था. ब्लॉग से सम्बंधित भी कुछ बातें सोच रहा था. एक तरह से देखूं तो इस ब्लॉग ने बड़ा सहारा दिया था मुझे, खासकर ऐसे समय पर जब कुछ करीबी दोस्त मुझे सामने से इग्नोर करने लगे थे, और एकाएक मैं बहुत अकेला पड़ गया था..बड़े ख़राब दिन थे वो…ये बैंगलोर के दिनों की बातें हैं. २००९ के नवम्बर-दिसम्बर का वो समय था जब मैंने ब्लॉगिन्ग फिर से शुरू किया था(वैसे इस ब्लॉग को मैंने 2007 में बनाया था). शुरुआत में इस ब्लॉग का नाम “मेरी बातें” नहीं था. इस ब्लॉग का नाम था “My Blog…My Space”. शुरुआत में इस ब्लॉग पर मैं अंग्रेजी में लिखता था, फिर जब हिन्दी में लिखना शुरू किया तब जाने क्या सोच कर इस ब्लॉग को मैंने “मेरी बातें” का नाम दे दिया था. ये नाम यूहीं रेंडमली सोचा गया था. जब से हिंदी में मैंने लिखना शुरू किया तब से लेकर अब तक इस ब्लॉग को मैं नियमित तौर पर अपडेट करते रहता हूँ. हाँ, पिछले कई महीनों से ब्लॉगिन्ग से मैं बहुत दूर हो गया हूँ. एक तरह से ब्लॉग पढ़ना/लिखना छूट सा गया है. मैं ये बहाना नहीं बनाऊंगा कि समय नहीं मिलता या व्यस्त रहता हूँ इसलिए ब्लॉग लिख पढ़ नहीं रहा हूँ…क्योंकि ऐसी कोई बात नहीं है…समय उपयुक्त मिल ही जाता है लेकिन बस ब्लॉग पर आना नहीं हो पा रहा है…इसे आप मेरा आलसीपन कह सकते हैं. 

यकीन मानिए कभी कभी मैं ब्लॉगिन्ग को बहुत मिस करता हूँ. पहले ये एक नियम सा था, सुबह लैपटॉप ऑन करने के बाद ब्लॉग पढ़ता था और शाम में भी जब इन्टरनेट पर लॉग इन करता तो सबसे पहले ब्लॉग की तरफ ही आना होता था. अब लेकिन ब्लॉग की जगह फेसबुक ने ले लिया है. सुबह दोपहर शाम और रात का समय फेसबुक पर चला जाता है. सारे ब्लॉगर भी अब वही मिलते हैं, ब्लॉग का रुख लोगों ने करना बहुत कम कर दिया है. ब्लॉगर भी अब वहां अपनी बात कहना ज्यादा बेहतर समझते हैं…फेसबुक पर उन्हें इंस्टेंट प्रतिक्रिया मिलती है जो ब्लॉग पर नहीं मिल पाती थी. ब्लॉग पर इंतजार करना होता था कि आपके पोस्ट पर कोई आकर कुछ लिखे वहीं फेसबुक पर ये इंतजार नहीं करना पड़ता, वहां आपको तुरंत मिनटों में लाइक और प्रशंसा मिल जाती है…लोग इसके आदी हो गए हैं, उन्हें ये अच्छा लगता है. कुछ लोग ये भी कहते हैं कि वो फेसबुक पर इस वजह से आ गए ब्लॉग छोड़कर क्योंकि उन्हें एक बड़ा ऑडियंस मिलता है और ज्यादा लोग कनेक्ट होते हैं….लेकिन मेरे ख्याल से अब भी ब्लॉग का एक बहुत बड़ा रीच है…शायद फेसबुक से ज्यादा बड़ा रीच ब्लॉग का है. आप खुद के ब्लॉग पर भी ऑडियंस को फेसबुक के जरिये ला सकते हैं…लेकिन फेसबुक के चक्कर में ब्लॉग को ठप कर देना, एकदम छोड़ देना ये समझ नहीं आता. कुछ लोगों को देखता हूँ कि वो अब ब्लॉग की जगह फेसबुक पर ही कहानी/कवितायें लिखते हैं. वो पहले तो अपनी कवितायेँ/कहानियां ब्लॉग पर प्रकाशित करते हैं और फिर उसका लिंक जब अपने फेसबुक वाल पर लगाते हैं तो वहां सीधे सीधे अपनी कहानी/कविता को कॉपी पेस्ट कर रख देते हैं, नीचे एक लिंक रहता है ब्लॉग का. ऐसे में ब्लॉग में ऑडियंस कैसे आ पायेंगे? लोगों को वहीँ फेसबुक पर पूरी कहानी या कविता या आलेख पढ़ने को मिल जाता है, वो वहीँ अपनी प्रतिक्रिया दे देते हैं, ब्लॉग के लिंक पर कौन क्लिक करता है. हाँ को ब्लॉगिन्ग का डाई-हार्ड फैन हो तभी वो वहां सामने फेसबुक पर पड़ा टेक्स्ट को इग्नोर कर के वही बातें ब्लॉग का लिंक खोल कर ब्लॉग में पढ़ना पसंद करेगा. मुझे लगता है इससे बेहतर लोग ये करें कि अपने ब्लॉग के लिंक के साथ पोस्ट का एक अंश वाल पर लगा दें. इससे लोगों को अगर आपके पोस्ट का प्रीव्यू अच्छा लगा तो वो जरूर पढ़ने आयेंगे ब्लॉग पर. बहुत से लोग ऐसा करते हैं. 
ब्लॉग के मामले में गलती शायद मैं भी करता हूँ…बहुत बार ऐसा हुआ है कि बहुत सी छोटी बातें/यादें जिन्हें मैं एक पोस्ट के रूप में ब्लॉग पर लिख सकता हूँ उन्हें मैं ब्लॉग पर लिखने के बजाये फेसबुक पर लिख देता हूँ. शुरुआत में यही छोटी छोटी बातों यादों को मैं यहीं ब्लॉग पर लिखा करता था. वो अब तक सहेज कर इस ब्लॉग के पोस्ट्स के रूप में रखे पड़े हैं. ये ब्लॉग की एक विशेषता है कि आप जितनी अच्छी तरह अपनी बातों को सहेज कर रख सकते हैं उतना फेसबुक पर नहीं. ब्लॉग की पुराने पोस्ट्स को भी आप बड़े आसानी से पढ़ सकते हैं…वहीँ फेसबुक पर पुरानी बातों को खोज कर पढ़ना थोड़ा कठिन है. मेरी समझ में तो ब्लॉगिन्ग का अपना एक अलग चार्म है. अपनी बातों को खूबसूरती के साथ आप ब्लॉग पर लिख सकते हैं. ब्लॉगिन्ग की अन्य बहुत सी खूबियाँ हैं, जिन्हें डिस्कस करना इस पोस्ट को टेक्नीकल साइड में ले जाना होगा, जो मैं नहीं चाहता.
एक दूसरी बात जो मेरे मन में अकसर उठती है वो ये कि हम अकसर अपने ब्लॉग को लेकर इतना सेलेक्टिव क्यों हो जाते हैं? हम ना तो विषय सम्बंधित ब्लॉग लिखते हैं ना ही बिजनेस या किसी फायदे के लिए. ये हमारा पर्सनल ब्लॉग है, और जहाँ तक मेरी बेसिक समझ है पर्सनल ब्लॉग की, वो ये है कि ये एक ऑनलाइन डायरी जैसा होता है जहाँ हम अपनी बातें लिख सकते हैं. अपने अनुभव बाँट सकते हैं. अपनी तस्वीरें साझा कर सकते हैं. लेकिन अकसर हम लोग ब्लॉग को लेकर कुछ ज्यादा ही सेलेक्टिव हो जाते हैं, उसे पत्रकारिता या वैसे ही किसी सिरिअस प्रोफेसन से जोड़ कर देखने लगते हैं….अकसर हम ये इंतजार करते हैं कि जब कोई अच्छा विषय मिले तभी ब्लॉग पर लिखा जाए. और जब कभी कोई ऐसा विषय नहीं मिलता या खुद की कुछ ऐसी ख़ास यादें ना सूझती हैं तब तक हमारा ये ब्लॉग खामोश पड़ा रहता है. 
मेरे समझ में तो पर्सनल ब्लॉग मात्र एक ऑनलाइन डायरी की तरह है, जहाँ आप दिन की हर छोटी से बड़ी बात लिख सकते हैं…अपने अनुभव, अपनी खुशियाँ आप बाँट सकते हैं. खुद को एक्सप्रेस करने का एक साधन है ब्लॉग, लोगों से जुड़ने का एक जरिया….चाहे वो कविता या कहानी या कोई पोस्ट के जरिये क्यों न हो. अपने जान पहचान में, ब्लॉगर सर्किल में मैं इसका(पर्सनल ब्लॉग) सबसे बढ़िया उदाहरण देखता हूँ सुप्रिया के ब्लॉग पर….सुप्रिया अंग्रेजी में ब्लॉग लिखती हैं…लगभग चार साल से उनके ब्लॉग को पढ़ते आ रहा हूँ, और उनके ब्लॉग की खासियत ये है कि वो अपनी आम ज़िन्दगी की बेहद साधारण से साधारण और ख़ास से ख़ास बातें ब्लॉग पर लिखते रहती हैं. इन सब के साथ वो गंभीर मुद्दों पर भी लिखती हैं….महीने में करीब दस से पन्द्रह पोस्ट वो लिख देती हैं, ज्यादा लम्बी पोस्ट नहीं लिखती वो, बस पाँच-छः सौ शब्दों में वो बातें लिखती हैं. उनके पोस्ट को आप अगर शुरू से पढ़ रहे हैं तो बहुत हद तक आप उनके बारे में बहुत कुछ जान सकेंगे. और ऐसे ब्लॉग को पढ़ना अच्छा लगता है, लगता है जैसे हम किसी दूसरे इंसान से, उसकी दुनिया से जुड़ रहे हैं. हिंदी ब्लॉगिन्ग में भी ऐसे कई लोग हैं जो ऐसे ही नियमित तौर पर ब्लॉग लिख रहे हैं. मेरे नजदीकी जानपहचान में मैं कह सकता हूँ कि विवेक भैया भी उन्हीं ब्लॉगर में से आते हैं जो अपने ब्लॉग को नियमित तौर पर लिखते हैं. वो हर मुद्दों पर लिखते हैं, चाहे वो बातें कितनी ही साधारण क्यों न हो, कितनी भी ख़ास क्यों न हो, कहानियां, कवितायें, किस्से, जानकारियां ये सब उनके ब्लॉग पर मिल जायेगी आपको…शायद ब्लॉगिन्ग का सही अर्थ भी यही है.
मैं अपनी खुद की बात करूँ तो मैंने अपना सबसे पहला ब्लॉग बनाया था साल २००३ में. वो रेडिफ.कॉम पर बना एक ब्लॉग था. उस ब्लॉग पर मैं २ साल लिखते रहा था, और जब कभी ब्लॉग लॉग इन करता कुछ भी अपनी बातें लिख कर आ जाता था, वो बातें बहुत ही साधारण सी होती थीं…और मैं हैरान हो जाता था जब उन साधारण सी बातों पर भी लोग कमेन्ट कर के जाते थे. उनके कमेन्ट पढ़ कर लगता था जैसे वो मेरे से बातें कर रहे हैं…मुझे मजा आता था उनकी बातों को पढ़ना और फिर उन बातों से ही इंस्पायर्ड होकर मैं एक दूसरी पोस्ट लिख देता था. वहां मैं अकसर अंग्रेजी में ही लिखा करता था, और कभी कभी हिन्दी(रोमन फॉण्ट में) में भी लिखता था. रेडिफ ने जाने क्यों मेरे उन दोनों ब्लॉग को डिलीट कर दिया, जिसके बाद मैंने ब्लॉगर.कॉम पर अपना ये ब्लॉग बनाया, और तब से अब तक इस ब्लॉग पर लिखते आ रहा हूँ. मैं अपने इस ब्लॉग के आंकड़े देखूं तो २०१० में इस ब्लॉग पर मैंने सबसे ज्यादा लिखा है…कुल ११६ पोस्ट लिखे थे उस साल, और बेसक्ली हर वो बातें जो दिमाग में चलती थीं. चाहे वो पारिवारिक बातें हों, फिल्मों की या किसी और विषय की बातें, उन सब पर मैं शुरुआत के दिनों में लिखता था. उसके बाद से साल दर साल लिखना कम होते गया. मैं खुद सेलेक्टिव होते गया लिखने में, पता नहीं क्यों..
आज शाम बस तय कर लिया है कि ब्लॉगिन्ग में फिर से एक्टिव होना है मुझे. नियमित लिखना शुरू करना है यहाँ और इस ब्लॉग को एक नयी रफ़्तार देनी है. पता नहीं मैं अपने इस ब्लॉग को नियमित अपडेट करने में कितना सफल हो पाता हूँ, लेकिन कोशिश जारी रहेगी मेरी. इस पोस्ट का शीर्षक मैंने जानबूझकर “इवनिंग डायरी” रखा है. शाम में दिन भर की कई बातें होती हैं जो मन में चलते रहती हैं…कई पुरानी यादें ज़हन में तैरते रहती हैं…और मैं बस चाहता हूँ कि उन सब बातों को यहाँ पोस्ट के रूप में सहेजता रहूँ..

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  1. Bahut achi post likhi hai aapne….
    Sach main bahut zada sochte hai blog likhte hue, maine starting main kissi ko nhi btaya tha blog ke baare main. B as kuch khass dost, Ab dheere dheere itne logon ko pta chal gya hai blog ke baare main ki kuch topics likhte hue mann main yeh khayal aa jata hai ki log kya sochege….jo ki ek writer ke liye bilkul ache baat nhi hai…

    Mere blogging main bhi kahi sare breaks hue hai par everytime i come back to it and the love grows aur haan yeh blog he tha jiske zariye aap jaise acche mitr mile humko 🙂

  2. फेसबुक और ब्लाग एकदम अलग चीजें हैं । फेसबुक पर छोटे-छोटे अनुभव मित्रों के साथ बाँटे जासकते हैं लेकिन ब्लाग का फलक बडा है जो संस्मरण , कोई विशेष प्रसंग ,रिपोर्ताज, यात्रा-वृत्तान्त , डायरी और दूसरी रचनाओं को आसानी से समेट लेता है । फिर भी चयन की बात को भी ध्यान में रखना आवश्यक है । क्योंकि ब्लाग पर कोई बात निजी नही रहती सार्वजनिक होजाती है । अभिषेक ,आपकी पोस्ट तो हमेशा ही रोचक और अपनी सी होती है ।

  3. मैं जब अपनी रौ में आता हूँ, ज़िन्दगी की तकलीफ़ें मेरा दामन पकड़कर पीछे खींच ले जाती हैं… लोगों ने ब्लॉग लिखना छोड़ दिया है और जो लिख रहे हैं उन्हें पढना भी. नए लोगों में यही होड़ लगी है कि वे कैसे "महान लेखक " बन जाएँ. जब तक हम पढना शुरू नहीं करेंगे, लिखने वालों के हौसले दम तोड़ देंगे!!
    मैं भले परेशान रहूँ, लेकिन नियम बना लिया है कि ज़रा भी समय मिला तो लिख्ता रहूँगा. और एक सबसे ज़रूरी बात.. मैं अगर ना भी लिखूँ तो ब्लॉग्स पर जाता हूँ, पढता हूँ और अपनी बात कहता हूँ.. ये नहीं कि जब लिखना हुआ तो घूम आए और बाकी समय चुप लगाये बैठे रहे!! लोगों की मानसिकता में बहुत गहरे बदलाव की ज़रूरत है! पाठक ऑक्सीज़न होते हैं लेखकों के लिये!!
    अच्छा मुद्दा उठाया है तुमने और तुम तो मेरे से काफ़ी सीनियर हो बॉस!! हम तो बच्चे ठहरे!! 🙂

    • पता है चचा…सच कहूँ तो मैं भी शायद उस कैटेगरी में आता हूँ जो जब ब्लॉग पोस्ट लिखने आते हैं तो बाकी ब्लोग्स पर घूम आते हैं और बाकी दिन चुप रहते हैं……ये ख़राब बात है..गलत करता था मैं…और मान रहा हूँ इस बात को! 🙂

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