दोस्त के नाम एक खत

प्रभात 

दोस्त,

याद है न तुम्हें? हम दोनों एक दूसरे को नाम से नहीं अकसर “दोस्त” कह कर ही बुलाया करते थे. तुम्हें याद हो न हो, मैं कैसे भूल सकता हूँ जब बोर्ड कॉलोनी वाले तुम्हारे मकान की सीढ़ियों पर बैठ कर हमने एक दिन ये तय किया था कि “यार नाम से बुलाना कितना बोरिंग लगता है न? आज से हम दोनों एक दूसरे को दोस्त कह कर ही बुलायेंगे”. ये बहुत छोटी सी बात थी, हम नौवीं में थे या दसवीं में…लेकिन ये बात मुझे जाने क्यों याद रह गयी. सच कहूँ तो उन दिनों की बहुत सी छोटी से छोटी बातें मुझे आज भी याद है दोस्त.

हमारी नादानियों के किस्से भी अजीब से थे न. आज याद करता हूँ तो बड़ी हंसी आती है…तुम्हें याद है…? याद  तो होगा ही न? बिजली बोर्ड के ऑफिस के पीछे जो एक छोटा सा खाली मैदान था जहाँ अकसर शाम में हम दोनों बैठा करते थे और कभी कभी वहां हम बैडमिन्टन भी खेलते थे, वहां क्या प्लान किया था हमने? ये याद है तुम्हें? एक दिन हम दोनों को पता नहीं क्या सूझा हम दोनों ने तय किया कि अब हम भी फिल्म स्टार्स सन्नी देओल और सलमान खान के जैसे बॉडी बनायेंगे. तुम कहने लगे “जिम जाना तो यार अफोर्ड नहीं कर पायेंगे, चल खुद से ही कुछ जुगाड़ करते हैं” और हम दोनों ने उस शाम एक कमाल की तरकीब खोज निकाली थी. हमने वहां पड़े हुए दो तीन ईंटों को उठाया और तय किया कि डम्बल की जगह इसे ही इस्तेमाल करेंगे हम दोनों. हम सच में कितने बेवकूफ थे यार…हम सच में ईंटों का इस्तेमाल करने लगे थे और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो ये पागलपन हम दोनों का पूरे एक हफ्ते तक चला था और अंत में थक हार कर फ्रस्ट्रेशन में हमने एक शाम उन ईंटों को फेंक दिया “दुरर्र स्साला…कुछ भी नहीं होने जाना वाला है, सात आठ दिन से प्रैक्टिस कर रहे हैं अब तक तनिको मसल नय डेवलप हुआ है”.

इस तरह के जाने कितने पागलपन हम किया करते थे. मोहब्बतें फिल्म जब रिलीज हुई थी उन दिनों का पागलपन याद है तुम्हें? राज आर्यन( शाहरुख़ खान का फिल्म में किरदार) जैसे कपड़े खरीदना, चश्मे और जूते खरीदना. हमने ये सब किया था. उस एक फिल्म को जाने कितनी बार देखा था हमने. अगर मुझे सही सही याद है तो हमने तेरह बार देखी थी मोहब्बतें. उन दिनों हम गिना करते थे कि कौन सी फिल्म हम कितनी बार देखे हैं. राजभवन वाले रोड से गुज़रते हुए हम पत्ते चुनते थे और सोचते थे अपनी मोहब्बत का पैगाम इन्ही पत्तों में लिखकर सही जगह पहुंचाएंगे, ठीक वैसे ही जैसे मोहब्बतें फिल्म में दिखाया गया था. हम बड़े वाले पागल थे. लेकिन ये पागलपन हम सिर्फ तब करते थे जब हम दोनों अकेले रहते थे, और किसी तीसरे को इस पागलपन का हिस्सा बनने की इजाजत नहीं थी. हमारी एक बहुत ही खूबसूरत सी दुनिया थी जहाँ समझदारी की बातें तो थी ही, पागलपन की बातें भी कम नहीं थी.

सच कहूँ दोस्त, तो तुम्हारी वजह से बहुत आदतें मुझे लगी हैं. ये एक कमाल की बात है, वो आदतें मुझे तुमसे लगी हैं, और तुम खुद उन आदतों के आदी नहीं हुए अब तक. गाने/फिल्मों की आदत भी तो तुम्हारे वजह से ही तो लगी थी. याद है तुम्हें? तुम बताया करते थे “आज केबल पर ये फिल्म आएगा, देख लेना…” “इस फिल्म के गाने अच्छे हैं/ इसके ख़राब”. ऑडियो कैसेट खरीदने में भी सिंगल और डूएट कैसेट का अंतर तुमने ही बताया था, “देखो जिसके पूरे गाने अच्छे हों उसके सिंगल कैसेट खरीद लो और जिसके एक दो उसके डूएट कैसेट…पैसे बचेंगे और फायदे में रहोगे”. एक दफे जब फिल्मों की बात हुई थी, और तुमने ये सुना कि मैंने `हम आपके हैं कौन’ नहीं देखी उस समय तक (शायद 1999 साल रहा होगा, और ये फिल्म तुम्हारी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से एक थी), तो तुम्हें पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि मैंने ये फिल्म नहीं देखा. फिर तुमने कहा था मुझे, कि आज रात केबल पर ये फिल्म दिखाया जाएगा…तुम देख लेना और हाँ, आंटी को भी दिखाना, उन्हें भी बहुत पसंद आएगी ये फिल्म. और मैंने उसी दिन रात में ये फिल्म देखी थी.

दोस्त शहर भी तो तुम्हारे साथ ही घूमना शुरू किया था मैंने. कुछ मजेदार इक्स्पीरीअन्स रहे थे शहर घूमते हुए, जिसे यहाँ कह पाना थोड़ा कठिन है, लेकिन तुम तो समझ ही गए होगे. याद है उस दिन गांधी मैदान में घूमते हुए किस तरह वो  ए.एन.कॉलेज के चार लड़के हम दोनों के पीछे पड़ गए थे. बड़ी सूझबूझ और समझदारी से हम उनसे पीछा छुड़ाकर आये थे. याद है न तुम्हें? तुम्हारे साथ तो यार कितने दफे अपने घर से गांधी मैदान(करीब 8-9 किलोमीटर) तक पैदल ही घूमते टहलते हुए हम दोनों निकल जाते थे. पटना म्यूजियम के पार्क में कभी घूमते तो कभी गोलघर भी चले जाते थे. दोस्त जब तुम कुछ समय के लिए राजेन्द्र नगर शिफ्ट हो गए थे, वो मेरे लिए अच्छा वक़्त नहीं था. तुम्हारे लिए भी वो अच्छा वक़्त नहीं था. मैं एकाएक अकेला पड़ गया था. तब जाने कितनी ही बार मैं उन जगहों पर घूमने जाया करता था.

प्रभात और मैं. ये साल 2000 के सरस्वती पूजा की तस्वीर है.
हमारे लिए वो ख़ास दिन था, बहुत अजीब और मजेदार यादें जुडी
हुई है इस दिन से. तस्वीर ब्लर्ड है लेकिन यादगार तस्वीर है, मेरे
और प्रभात के लिए. 
तुमसे एक नहीं, बहुत सी बातें सीखी है मैंने. हम और तुम दोनों स्कूल में ही थे फिर भी घर-बाहर सभी कामों में उस्ताद थे तुम, और मैं उस समय तक बहुत बातों से अंजान था. बाहरी दुनिया से ज्यादा परिचय नहीं था मेरा. तुम्हारे साथ बहुत कुछ सीखा है मैंने. मुझे कभी तुम बड़े अजीब से लगते थे. पैसे खर्च करने में टोकते रहते थे. बड़े कंजूस थे तुम…हमेशा नसीहत देते थे कि पैसे बर्बाद मत करो. पैसे उडाओ मत. सच कहूँ, तो तुम एक बड़ी वजह थे जो उन दिनों पैसे उड़ाने की लत नहीं पड़ी मुझे. तुम हमेशा मुझे बिना मतलब के पैसे खर्च करने से रोकते रहे. तुम उन दोस्तों में से नहीं रहे जो पैसे उड़ाते थे. हाँ, लेकिन हम अकसर शाम के चाय नाश्ते  के लिए या इधर उधर घूमने के लिए पैसों का मैनेजमेंट कर लिया करते थे.. वो भी बड़े इंट्रेस्टिंग तरीके से. शाम में सब्जी लाने के लिए जो पैसे मिलते थे, हम उनमें हेरा-फेरी कर लिया करते थे. जो चेंज पैसे बचते थे, दो-चार-पाँच रुपये, उसे हम अपनी जेब के हवाले कर देते थे और उन्हीं पैसों को जोड़-जाड़ कर कभी कभार कोल्डड्रिंक की पार्टी एक दूसरे को दे दिया करते थे. डीएवी के पीछे वाला प्लेग्राउंड याद है तुम्हें न? जब एक दो दफे हमारे जेबों में रुपये होते थे तो हम वहां अपनी छोटी सी पार्टी कर लेते थे. गणेश मिष्ठान से छः रुपये में चार समोसे और कोल्ड ड्रिंक लेकर हम वहां आ जाते थे और हमारी एक छोटी सी पार्टी हो जाती थी.

दोस्त, जाने क्यों आज वो सब रास्ते खूब याद आ रहे हैं जहाँ से हम कोचिंग या स्कूल जाया करते थे. पुनाईचक और शिवपुरी के उन रास्तों पर साइकिल चलाते हुए हम गाने गुनगुनाते रहते थे..कुछ गाने जो हमारे पसंदीदा थे उनमें परदेश फिल्म का गाना “ये दिल दीवाना..” “बॉर्डर फिल्म का गाना “संदेशे आते हैं…” सोनू निगम के एल्बम के गाने, “ये है प्रेम” एल्बम के गाने मुख्य थे. लेकिन जो गाना हम शायद सबसे ज्यादा गुनगुनाते थे वो था “तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना”. ये फिल्म भी मेरी और तुम्हारी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से है. सच कहता हूँ दोस्त, आज भी जब भी ये गाना कहीं भी सुनता हूँ तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ही याद आती है. ये गाना तुम्हारे और मेरे मन से जुड़ा हुआ है.

प्रभात के साथ मैं. मार्च में प्रभात से मुलाकात हुई थी.
जिस एक चीज़ को बड़े शिद्दत से महसूस करता हूँ और  मिस करता हूँ वो है तुम्हारे घर के सीढ़ियों पर बैठकर शाम की चाय पीना. वो गर्मियों के दिन थे जब तुम जगदेव पथ के अपने मकान में शिफ्ट किये थे, और जाने हम कितनी देर तक तुम्हारे घर की सीढ़ियों पर बैठे रहते थे और बातें करते रहते थे. जब अँधेरा होने लगता तब मैं वहां से वापस अपने घर आता था. हम कितनी सारी बातें करते थे दोस्त. अपने उम्र के लड़कों से कितनी अलग बातें होती थी हमारी…दुनिया की, रिश्तों की, परिवार की, प्यार मोहब्बत और दोस्ती की बातें हम करते थे. दोस्त, वो शामें सबसे खूबसूरत होती थी जो तुम्हारे साथ बीतती थी. आज भी मन करता है कि एक टाइममशीन मिल जाए और वापस पहुँच जाए हम उन दिनों में. इस खत को मैं ज्यादा लम्बा नहीं करूँगा, इसलिए इसे यहीं समाप्त कर रहा हूँ, इस वादे के साथ कि तुम्हे अपने इस ब्लॉग के जरिये ऐसे कई खत लिखते रहूँगा मैं और कई ऐसी पुरानी यादें तुम्हें याद दिलाता रहूँगा. 
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ये खत मैंने अपने दोस्त प्रभात को लिखा है. उसके जन्मदिन की बधाई देने के लिए जब एक छोटा सा नोट मैंने कल फेसबुक पर लगाया था, तब ये सारी बातें दिमाग में आने लगी थी..और मैंने सोचा कि इन बातों को यहाँ अपने ब्लॉग में संजो कर रख लूँ, इसलिए ये खत है प्रभात के नाम!

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  1. प्यारी यादों से सजे ख़त हमेशा दोतरफा सकून पहुंचाते हैं…और उस पर से तुम्हारे लिखे ख़त…वो तो यकीनन दिल की गहराई तक उतर जाते हैं…|
    तुम लकी हो कि प्रभात जैसा दोस्त मिला तुम्हे…पर तुमसे ज्यादा लकी तो वो है, जिसे तुम मिले…:)
    इनमे से बहुत सारी बाते पहले ही सुन चुके हैं तुमसे…बाकी भी डिटेल्स सुन ही लेंगे…जाओगे कहाँ भैय्यू…:p
    प्रभात को एक बार फिर हैप्पी वाला bday…और तुम दोनों के लिए…सलामत रहे दोस्ताना तुम्हारा…:)

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