ट्रेन नोट्स

ये मेरे ट्रेन नोट्स हैं, जो न जाने कब से मेरे लैपटॉप के एक वर्ड फाईल में पड़ी हुई है. इसे मैंने तब लिखा था जब गोमती एक्सप्रेस से दिल्ली से लखनऊ जा रहा था. इस नोट को आज शेयर कर रहा हूँ ब्लॉग पर. मुझे पता भी नहीं कि मेरे इस सवा तीन हज़ार शब्दों वाले ट्रेन नोट्स को आप पढेंगे तो क्यों पढेंगे और कहेंगे इस पर तो क्या कहेंगे. फिर भी इसे यहाँ मैं पोस्ट कर रहा हूँ. 

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13 सितम्बर 2013 
मैं समय से पहले मैं स्टेशन आ गया हूँ. इस सोच से कि ट्रेन के वक़्त से पहले पहुँच जाऊँगा और एक कप कॉफ़ी पियूँगा. वैसे भी मैं कोशिश करता हूँ कि समय से पहले ही स्टेशन पहुँच जाऊं ताकि अंतिम समय पर भाग-दौड़ न हो. लेकिन आज मुझे आने में फिर भी देर हो गयी है. अब रेलवे स्टेशन के बाहर कैफे में कॉफ़ी पीने का वक़्त नहीं है…मैं सीधे प्लेटफोर्म पर चला आया. इस सफ़र को लेकर मैं काफी उत्साहित हूँ. लखनऊ और कानपुर का ट्रिप बड़े मुश्किल से बना है, और सुबह से मैं बहुत खुश था कि इतने साल बाद इस बार लखनऊ में तीन चार दिन रह पाउँगा, शहर घूम पाउँगा. कुछ दोस्तों से मिल पाउँगा. मेरी टिकट गोमती एक्सप्रेस में चेअर कार की थी. चेअर कार में मैंने ज्यादा सफ़र नहीं किया, जो भी छः-सात बार सफ़र रहे होंगे मेरे वो शताब्दी एक्सप्रेस से सफ़र किये थे. कहीं न कहीं मुझे उम्मीद थी कि गोमती एक्सप्रेस के चेअर कार की मेंटेनेंस वैसे ही होगी, शताब्दी जैसी. लेकिन ट्रेन के अन्दर घुसते ही मेरा सारा उत्साह ठण्डा पड़ गया. दरवाज़े पर मैं दो पल ठिठका सा खड़ा रहा. मुझे लगा कि मैं गलती से दूसरी  बोगी में आ गया हूँ. ये ए.सी चेअर कार नहीं हो सकता. मैंने बाहर निकलकर चेक किया. मैं ठीक बोगी में चढ़ा था. मैंने अन्दर प्रवेश किया. “ये ट्रेन की ए.सी.चेयर कार??ये??ऐसी बकवास? अन्दर प्रवेश करते ही मेरा पहला रिएक्शन यही था. अगर शीशे चढ़े न होते और उनपर पर्दे न लगे होते, हलकी ठण्डी हवा नहीं आ रही होती तो कोई भी नहीं कह सकता था कि ये ए.सी चेअर कार है. “अधिकतर कुर्सियां तो टूटी हुई हैं..बेहद ख़राब कंडीशन में है ये कम्पार्टमेंट” मैंने सोचा.

आई.आर.सी.टी.सी वालों ने फिर से मेरे साथ बदमाशी की है. मैंने विंडो सीट सेलेक्ट किया था, टिकट पर भी ३६ नंबर विंडो सीट लिखा हुआ है. लेकिन यहाँ ३६ नंबर की सीट विंडो सीट ना होकर आईल वाली सीट है. मैं थोड़ा निराश हो गया. पैतीस नंबर की विंडो सीट है पर एक बुजुर्ग बैठे हुए हैं. वो बड़े आराम से अपनी दोनों कुहनी को चेअर पर टिका कर सो रहे हैं, मुझे वहाँ बैठने में थोड़ी असहजता महसूस हुई तो मैं बगल वाली आईल सीट जो कि  खाली है, वहाँ चला आया हूँ. सीट पर बैठकर मैंने डायरी निकाल ली है. कुछ लिखने की सोच रहा हूँ. जाने क्यों मैंने डायरी के इस पन्ने पर “ट्रेन नोट्स” लिखा है. शायद इसलिए कि मैं हमेशा ट्रेन में कुछ न कुछ इधर उधर की बातें सोचते रहता हूँ, वो बातें कहीं दर्ज रहे इसलिए मैंने इस पेज पर ट्रेन नोट्स लिखा है.

ट्रेन लगभग खाली है. पता नहीं क्यों? लेकिन ये एक अच्छी बात है. ट्रेन में भीड़ नहीं है तो ज्यादा इरिटेशन नहीं महसूस होगी. सफ़र आराम और सुकून से कटेगा. मुझे हमेशा सफ़र के दौरान, ख़ास कर वैसे सफ़र के दौरान जहाँ मैं चेअर कार पर सफ़र करता हूँ, दो फिल्म की याद आती है. एक तो ईरानियन फिल्म “टिकट” और दूसरी “बिफोर सनराईज”. इन दोनों फिल्म की याद आते ही कल शाम हुई अकरम से बातचीत मुझे याद आने लगी…उसने बातों बातों में यूरोप और यूरोरेल का जिक्र छेड़ दिया था. हम यूरोप जाने के बारे में अभी अपने “वाइल्डेस्ट ड्रीम” में भी नहीं सोच सकते, लेकिन फिर भी हमने बहुत देर तक इसपर बातें की थी. कल शाम हमने इस फिल्म की चर्चा भी की थी. “बिफोर सनराईज”, जो की मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से है.
मैं कुछ सोचने लगता हूँ और अचानक मुझे अपनी उस सोच पर हँसी आने लगती है. जब से उस फिल्म को देखा है, मैं हमेशा सोचता हूँ कि ट्रेन का सफ़र मेरा वैसा ही खूबसूरत होगा जैसे उस फिल्म में “जेसी और सेलिन” का सफ़र था. लेकिन मैं हमेशा ये क्यों भूल जाता हूँ कि वो यूरोप में यूरोरेल से सफ़र कर रहे थे…और मैं यहाँ हूँ.

मैं नज़रें उठा कर आसपास बैठे लोगों को देखता हूँ. सामने की सीट पर एक बूढ़ी महिला बैठी हैं, जिनके हाथ में कोई इंग्लिश नॉवेल है. नॉवेल का नाम मैं नहीं पढ़ पा रहा हूँ. ठीक डाइऐगनली सीट पर एक लड़की  बैठी है जिसके साथ एक बच्चा है. वो बच्चा अगर उसे माँ कह कर ना बुलाता तो उसे मैं कोई कॉलेज स्टूडेंट समझ लेता. मेरे ठीक आगे की सीट पर एक व्यक्ति बैठा है जो कि  फोन पर जोर जोर से बातें कर रहा है, इस बात का अंदाज़ा भी नहीं उसे कि बाकी सहयात्रियों को उसकी इस हरकत से परेशानी हो रही है. सामने शीशे से मुझे जेनरल क्लास दिखाई दे रहा है. लोग खड़े हैं. जबरदस्त भीड़ है उस तरफ. कुछ औरतें अपने बच्चों को गोद में लेकर खड़ी हैं. और इस तरफ सभी आराम से बैठे हैं, सुकून से ठंडी हवा के मज़े ले रहे हैं. सीट आधे से ज्यादा खाली है. मैं सोचता हूँ कि ये एक कितना बड़ा अंतर है. मुझे एकाएक ‘टिकट’ फिल्म का वो सीन याद आ जाता है जहाँ वो बूढा प्रोफ़ेसर जो फर्स्ट क्लास में सफ़र कर रहा था, वो सामने शीशे से जब जेनरल क्लास में एक बच्चे और उसकी माँ को देखता है तो वेटर से दूध लेकर वो उन्हें दे देता है. ये फिल्म का ये सीन इतना साधारण नहीं है, बल्कि बहुत ही भावुक कर देना वाला सीन है. 

मेरा ध्यान दीदी के फोन से टूटता है. उसे पता है कि मुझे विंडो सीट नहीं मिल पायी है और उसे ये भी पता चल गया मेरी आवाज़ से कि मैं थोड़ा इरिटेट सा हो गया हूँ. हमेशा वो बहुत आब्वीअस से सवाल पूछती है. उसने फोन पर पूछा “कोई किताब तुम्हारे पास नहीं है क्या? साथ लेकर चल सकते थे किताब”. 
“मैं दिल्ली में कहीं भी निकलता हूँ, किसी भी काम से तो भी कोई न कोई किताब मेरे बैग में होती है, और अभी तो मैं लखनऊ जा रहा हूँ…वाट डू यु एक्स्पेक्ट?” वो हँसने लगती है. मैं उसे उस किताब के बारे में बताता हूँ जो मेरे पास है. मैं उसे कहता हूँ कि अपनी डायरी अभी मैंने निकाली है, उसमे लिखूँगा कुछ. वो भी ठीक उसी वक़्त यही बात कहती है… “अपनी डायरी में लिख लेना कुछ…” हम दोनों हँसने लगते हैं. ये हमेशा होता है कि हम दोनों एक ही साथ अकसर एक ही बात सोच लेते हैं और एक दूसरे से कह लेते हैं. इसे कुछ लोग टेलीपैथी भी कहते हैं शायद. उससे फोन पर बात खत्म होती है, मैं जैसे ही बायीं तरफ देखता हूँ, पैतीस नंबर सीट पर बैठे बुजुर्ग बड़े गौर से और अजीब नज़रों से मुझे देख रहे होते हैं. शायद अभी दीदी के साथ फोन पर मैं जब ऐसे हंस रहा था उसी की वजह से. मुझे थोड़ी एम्बरास्मेंट होने लगती है. “ये लड़की मुझे मार खिलवा कर रहेगी. हमेशा फोन पर ये ऐसे ही हंसा देती है मुझे.” मैं सोचता हूँ. 
डायरी का जो पन्ना खुला हुआ है, उस पूरे पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखा है… “जैसे किसी ने मेरी सांस को धागे की तरह उँगली में फंसा कर खींच दिया हो”. ये कोट किस कहानी से है, बहुत सोचने पर भी मुझे याद नहीं आता. शायद निर्मल वर्मा के ही किसी कहानी से.
कौन सी कहानी से वो लाइन है ये तो मुझे याद नहीं आई…लेकिन सोचने के इस क्रम में बहुत कुछ ऐसा अनचाहा जाने क्यों याद आने लगा जिसे मैं याद करना नहीं चाह रहा था. जो अच्छी यादें नहीं हैं. वो बातें ज्यादा देर तक दिमाग में न टिके इसलिए मैं सीट से उठकर बाहर निकलता हूँ. वाशरूम की तरफ. सोचता हूँ थोड़ी देर दरवाज़े पर खड़े रहकर वापस सीट पर आ जाऊँगा. थोड़ी देर बाहर दरवाज़े के पास खड़े रहकर जब मैं वापस आता हूँ तो देखता हूँ, कि एक आदमी उस सीट पर बैठा है जहाँ कुछ देर पहले मैं बैठा हुआ था. मुझे लगता है कि शायद ये उसकी सीट होगी. लेकिन जैसे ही मैं पास आता हूँ वो हडबडा के उठता है, इधर उधर कुछ अनिश्चित भाव से देखता है जैसे कुछ खोज रहा हो और फिर तेज़ क़दमों से सीधे बाहर चला जाता है. मैं मुड़ के देखता हूँ तो पीछे से टीटी आ रहा होता है. मुझे समझने में देर नहीं लगी कि उसके पास जेनरल कम्पार्टमेंट की टिकट थी और वो इसलिए बाहर चला गया. 
ट्रेन आकर अलीगढ में रुकी है. मैं नीचे उतरता हूँ, चाय पीने के लिए और कुछ खाने के लिए. ट्रेन अलीगढ तक आते आते पन्द्रह मिनट लेट हो चुकी है. यहाँ भी ट्रेन प्लेटफोर्म पर दस मिनट से खड़ी है. मैं चाय और दो ब्रेड पकौड़े लेकर अपने सीट पर वापस आ गया हूँ. मेरी दोस्त पिया का फोन आता है, वो मुझे सन्डे को मिलने के लिए बुलाती है. मैं उसे कहता हूँ कि मैं लखनऊ जा रहा हूँ. वो थोड़ा चिढ़ जाती है. “तुम हमेशा अपना प्लान बना लेते हो, और मेरे प्लान का सत्यानाश हो जाता है…” वो चिढ़ते हुए फोन पर मुझे डांटती है. “अरे बताना भूल गया था मैं…” मैं कहता हूँ. “तुमने फेसबुक पर क्यों नहीं अपडेट किया कि लखनऊ जा रहे हो तुम?”. मुझे हँसी आ जाती है. “अब कहीं भी जाओ तो फेसबुक पर अपडेट करना जरूरी है क्या?” मैं उससे पूछता हूँ. तुम तो कुछ भी करते हो तो फेसबुक पर अपडेट कर देते हो..” वो कहती है. मैं चुप ही रहता हूँ. वो शायद ठीक कह रही है. मैं बस मुस्कुराते रहता हूँ. दिल्ली आते ही उससे मिलने का वादा कर के फोन काटता हूँ. 
अलीगढ से कुछ लोग चढ़े हैं ट्रेन पर, ट्रेन में पहले से ज्यादा भीड़ हो गयी है. लेकिन अब भी कई सीट खाली है. मेरे ठीक डाइऐगनल आईल पर जो माँ-बेटे बैठे हुए हैं, वहाँ एक यात्री आये हैं. थोड़े बुजुर्ग से दिख रहे हैं लेकिन तमीज की कमी है उनमें. बहुत ही रूखेपन से बात कर रहे हैं वो. लड़की बड़े विनम्रता से रिक्वेस्ट करती है उनसे, कि उनका बेटा और वो सीट पर बैठे हैं, तो वो ठीक आगे की सीट पर बैठ जाए जो खाली है. उनका बेटा विंडो सीट पर बैठा था. वो लेकिन भड़क उठे “मेरी सीट ये है तो मैं और कहीं क्यों जाऊं? चलिए उसे कहिये वो इधर आये..”. बच्चा बड़ा ही समझदार और तमीज वाला है. बिना अपनी माँ की बात की प्रतीक्षा किये वो सीट से उठता है और बड़े विन्रमता से कहता है “सॉरी अंकल…आप बैठ जाईये”. 
मुझे उस बुजुर्ग व्यक्ति पर बड़ा गुस्सा आ रहा है. इस घटना ने कुछ लोगों का ध्यान माँ-बेटे और उस व्यक्ति की तरफ मोड़ दिया था… मेरा भी ध्यान मेरी डायरी से हट कर उनकी तरफ आ गया था. लड़का कुछ दस-ग्यारह साल का होगा और उसकी माँ तो उसकी माँ कम, उसकी बड़ी बहन ज्यादा लग रही है. लड़के की माँ की ज़बान भी बहुत अच्छी है. तहजीब वाली. वो अपने बेटे से बड़े प्यार से बातें कर रही है. उनकी बातचीत सुन ये भ्रम होता है जैसे दो बच्चे आपस में बात कर रहे हैं. – 
“आप मुझे खाने दे दीजिये, मैं अपने सीट पर बैठकर ही खा लूँगा”
“नहीं, तुम इधर आओ, मेरे पास”
“आप इस वजह से नहीं दे रहीं की मैं गिराऊंगा खाना? गिराऊंगा क्या मैं?”
“हाँ….आप बदमाशी बहुत करते हैं, गिरा दीजियेगा आप…” कह कर वो लड़की हंसने लगी. 
उनकी इस प्यारी बातचीत पर मैं भी मुस्कुरा देता हूँ. माँ-बेटे की बातों में एकाएक मुझे दिलचस्पी आने लगती है और मैं उनकी बातें सुनने लगता हूँ. मैं चाहता हूँ कि उस बच्चे से कुछ बात करूँ, लेकिन यूँ अनजान  लोगों से, चाहे वो बच्चे ही क्यों न हों, उनसे बात करना हमेशा से मेरे लिए मुश्किल काम रहा है.

किसी छोटे से स्टेशन पर ट्रेन रुकी है. स्टेशन का नाम शिवरामपुर है. मैं खिड़की से देखता हूँ, कुछ चाय वाले बाहर घूम रहे हैं. मैं बाहर निकल कर चाय लेता हूँ. उस छोटे प्लेटफोर्म पर मैं टहलते हुए चाय पीना चाहता था…लेकिन ट्रेन यहाँ ज्यादा देर नहीं रुकेगी…ये सोच कर मैं वापस अपने सीट पर आ जाता हूँ.
चाय पीकर मैं फिर से ट्रेन की गेट पर कुछ देर के लिए गया था. गेट पर कुछ लोग खड़े थे, वहाँ पुलिस वाले भी आ गए थे. पुलिस वाले उन लोगों को धमका रहे थे, और दूसरी तरफ जेनरल डब्बे में जाने को कह रहे थे. जब से ट्रेन चली है तब से पुलिस वाले को मैं डिजिकैम लेकर घूमते देख रहा था. क्यों वो डिजिकैम लेकर घूम रहे थे ये समझ नहीं पा रहा था मैं. अब माजरा कुछ समझ में आ रहा था. वो ऐसे लोगों की विडियो बना रहे थे जो गलत तरीके से सफ़र कर रहे हैं. वहाँ खड़े कुछ लोगों में और तीनों पुलिस वालों में थोड़ी बहस होने लगी. मैं वापस अपने सीट पर आ जाता हूँ.
जो किताब मैं लेकर चला था, मैं उस किताब को पढ़ने लगता हूँ. सामने बैठी उस लड़की और उसके बच्चे की और मेरा अचानक ध्यान जाता है. लड़की का हेअर बैंड टूट गया था. कैसे? ये पता नहीं…मैंने नहीं देखा था. मैं किताब पढ़ने में व्यस्त था. दोनों अपनी प्यारी लड़ाई लड़ रहे हैं. शायद उनकी इसी प्यारी बहस से मेरा ध्यान उनके तरफ खिंच आया. दोनों उस हेअरबैंड के दो टुकड़े से खेल रहे हैं. दोनों उसे तलवार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और हेअरबैंड के दोनों टुकड़ों से तलवारबाजी कर रहे हैं. “
“ये देखो…आप हार गयीं….” बच्चे ने कहा.
“नहीं तुम हारे….”. 
“नहीं मैं नहीं हारा…आप हार गयीं….आप चीटर हैं…आपने चीटिंग की है…” 
“नहीं चीटर तुम हो…मैं नहीं….” दोनों की लड़ाई कंटिन्यू रहती है.
माँ-बेटे को ऐसे आपस में खेलता देखना मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. मैं सोचता हूँ कि सिर्फ इस वजह से ये सफ़र यादगार बन सकता  है, कि ये दो प्यारे लोग मिले थे मुझे. लेकिन ये मेरे लिए कितनी निराशा की बात है कि मैं अपने स्वभाव के चलते उनसे बातचीत नहीं कर पा रहा हूँ.

शाम के साढ़े पाँच बज रहे हैं. ट्रेन शिखोबाबाद पहुंची है. करीब एक घंटे ट्रेन लेट हो चुकी है. पैतीस नंबर वाले बुजुर्ग यहीं उतर गए हैं. मैं पैतीस नंबर के विंडो सीट पर आ गया हूँ. एक फैमली चढ़ी है ट्रेन पर शिखोबाबाद से. पति-पत्नी और एक बच्चा. तीनों बगल के तीन सीट पर बैठ चुके हैं. चढ़ते ही तीनों ने कानों में एअरफोन ठूंस लिया है, और मोबाइल हाथ में पकडे हैं. उन्हें आये करीब आधा घंटा हो चुका है, लेकिन उनमें से किसी की आवाज़ मुझे सुनाई नहीं दी. मैं खिड़की से बाहर देखने लगता हूँ. एक खुशबु सी महसूस होती है अचानक मुझे. मैं इधर उधर देखता हूँ. ट्रेन का वार्डबॉय रूमफ्रेशनर छिडक रहा था कम्पार्टमेंट में. उसके पीछे एक चायवाला चला आ रहा है. मैं उससे चाय लेता हूँ और वापस खिड़की से बाहर देखने लगता हूँ. ये ट्रेन की मेरी चौथी चाय है. मैं वाकई बहुत चाय पीता हूँ. मैं सोचता हूँ.
मेरे आगे की सीट पर वही बुजुर्ग बैठे हैं. उनके साथ एक पुलिस इंस्पेक्टर साथ में आकर बैठ गया है. दोनों की शायद पहले से जान पहचान है. वो माँ-बेटे वहाँ पर दिख नहीं रहे थे. पहले मुझे लगा कि कहीं वे दोनों ट्रेन से उतर तो नहीं गए, लेकिन फिर तुरंत आगे की सीट पर दोनों बैठे हुए दिखे मुझे. 
ट्रेन अब कानपुर के आसपास है. कुछ ही देर में कानपुर पहुँचने वाली  है ट्रेन. अब ये सफ़र बहुत बोरिंग सा हो गया है. हालाँकि ट्रेन सिर्फ २ घंटे ही की देरी से चल रही है, लेकिन फिर भी मैं बहुत इरिटेट हो गया हूँ. मैं चाहता हूँ अब जल्दी से ये सफ़र खत्म हो जाए. डायरी भी मैंने बंद कर के रख दी है. लिखने का बहुत कुछ दिल कर रहा है, मन में बहुत सी बातें रैंडमली चल रही हैं, लेकिन फिर भी मैं डायरी में उन्हें नहीं लिखता.
मैं आँखें बंद कर के थोड़ी देर सोने की कोशिश करता हूँ, लेकिन कुछ आवाज़ आ रही है पीछे से. मैं पीछे मुड़ता हूँ… तो टीटी किसी व्यक्ति से बातें कर रहा है. जाने क्या बात हुई दोनों हंस रहे हैं. उनकी बातों पर पहले मेरा ध्यान नहीं गया था. जब से मेरा ध्यान गया वो टीटी उस व्यक्ति को अपने नौकरी के बारे में बता रहा था… “साहब मैं तो टीटी गलती से बन गया…मैं बॉक्सिंग में डिस्ट्रिक्ट चैम्पियन था….बाबूजी बोले कि इससे कुछ नहीं होगा तो मैंने इधर टीटी की नौकरी ज्वाइन की….बड़ी मेहनत से नौकरी मिली थी, तीन सौ रुपये और कुछ मिठाई पहुंचाई थी साहब के घर तब जाकर मिली थी ये नौकरी मुझे” टीटी महाशय ये बात उस व्यक्ति को बता रहे हैं….उनकी कुछ और बातें होती हैं…खासकर महंगाई को लेकर…टीटी साहब कह रहे हैं “पता है आपको उन दिनों मेरी तनख्वाह ५८० थी और अब ५८००० है. पहले फिर भी मैं ३५-४० रुपये बचा भी लेता था लेकिन अब कुछ नहीं बचता. महंगाई बहुत बढ़ गयी है साहब”. उन दोनों की बातें चलती रहती हैं. टीटी साहब अब उस व्यक्ति के बगल वाली सीट पर बैठ गए हैं.
सवा नौ बजे ट्रेन कानपुर पहुंची है. कानपुर से लखनऊ पहुँचने में ट्रेन को करीब डेढ़ घंटे लगते हैं….लेकिन डेढ़ घंटे भी और ट्रेन में काटना पहाड़ सा काम लग रहा है. मुझे घर पहुँचते करीब रात के बारह बज जायेंगे. वो भी तब जब ये ट्रेन अभी से ठीक ठाक चली तो.. वरना कहीं ऐसा न हो की आधी रात के बाद ट्रेन पहुंचे लखनऊ और मुझे घर जाने के लिए कोई सवारी भी न मिले. मुझे अब लिखने का भी कुछ मन नहीं कर रहा है. बस चिढ़ हो रही है ट्रेन से. चाय वाला फिर से नज़र आता है. मैं सोचता हूँ कि एक कप चाय और पी सकता हूँ मैं. हाँ, ये मेरी ट्रेन की पांचवीं चाय होगी, लेकिन मुझे हमेशा ट्रेन में चाय पीने की आदत रही है. ये बुरी आदत नहीं है. मैं चाय पीता हूँ और आँखें बंद कर कुछ देर आराम करने की कोशिश करता हूँ.
चाय पीने के बाद यूँ तो नींद टूट जाती है, लेकिन मैं जबरदस्त नींद में चला गया था. भैया के फोन से मेरी नींद खुली थी. वो ट्रेन के बारे में पूछ रहे थे. मैं घड़ी देखता हूँ. रात के ग्यारह बज रहे हैं. एक छोटे से स्टेशन पर ट्रेन दो मिनट रुकी थी. भैया को मैं स्टेशन का नाम बताता हूँ… ‘कुसुंभी’. भैया कहते हैं कि अब मैं लगभग लखनऊ पहुँच चुका हूँ. भैया से फोन पर बात होती है कि तभी पापा का कॉल आ जाता है. माँ और पापा अभी तक जागे हैं. माँ को मैं कहता हूँ सो जाने, लेकिन वो कहती है तुम घर पहुँच जाओ तब बता देना..उस समय तक जागे रहेंगे”. माँ से फोन पर बातें खत्म होती है कि  दीदी का फोन आता है. वो भी अभी तक जाग रही है, उसे भी मैं सोने के लिए कहता हूँ तो वो भी मुझे माँ की तरह डांट देती है… “तुम घर पहुँच जाओ तब मैं सोऊँगी..” वो कहती है. दीदी का फोन रखते ही ट्रेन लखनऊ पहुँचती है. ट्रेन ने अमौसी स्टेशन पार किया है. अब लखनऊ आ गया. मुझे थोड़ी राहत मिलती है..अब घर में जाकर मैं एक अच्छी और लम्बी नींद लूंगा.
इस ट्रेन के सफ़र ने बहुत थका दिया है. ट्रेन के सफ़र में मैं कभी थकता नहीं, लेकिन पिछले दो दिन काफी व्यस्त रहे थे और सुबह से भी लगातार काम में उलझा रहा था..शायद थकान इस वजह से ज्यादा लग रही थी. लेकिन ये अच्छा है कि ट्रेन का सफ़र अब खत्म होने को आया है. मेरी ट्रेन यात्राएं आमतौर पर बड़ी बोरिंग सी होती है. लेकिन इस सफ़र को मैं बोरिंग के केटेगरी में नहीं रखूँगा. हाँ थोड़ा इरिटेट हो गया हूँ इस ट्रेन से, लेकिन फिर भी ये सफ़र याद रहेगा. वैसे भी जितने बार लखनऊ गया हूँ, हर बार का सफ़र अपने आप में एक यादगार सफ़र रहा है. ये सफ़र भी मुझे याद रहेगा.

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  2. मेरे ट्रेन में सर्वाधिक सुन्दर अनुभव तब हुये हैं जब मैं बिना किसी मानसिक बोझ के चढ़ा हूँ। बस अवलोकन और लेखन। पढ़कर अच्छा लगा।

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