सरस्वती पूजा…कुछ यादें..!

वसंत पंचमी जिसे हम सरस्वती पूजा भी कहते हैं, वसंत के आने का प्रतीक है. आज माँ सरस्वती की पूजा होती है. बचपन में हम आज के दिन बड़े खुश रहते थे. पढ़ाई से थोड़ी राहत मिलती थी आज के दिन और स्कूल में होने वाले कार्यक्रम का हिस्सा बनना और उसमें पूरा दिन व्यस्त रहने में एक अलग ही उत्साह होता था. घर पर माँ सुबह ही पूजा कर लेती थी, और हमें कहा जाता कि सुबह कम से कम आधा-एक घंटा भी पढ़ने के लिए. माँ का तर्क होता था कि ऐसा करने पर सरस्वती माँ खुश होंगी और हमें विद्या और बुद्धि देंगी.

मुझे खास तौर पर वसंत पंचमी इस लिए भी पसंद है, कि साल के इस समय का मौसम सबसे खूबसूरत होता है(हाँ थोड़ा दुःख भी होता है इस बात से कि सर्दियों का मौसम खत्म होने लगता है). कितना कुछ याद आ जाता है वसंत के जिक्र से ही. हमारे लिए वसंत सरस्वरती पूजा आने के दिन होते थे, हाफस्वेटर पहनने के दिन होते थे, फुलस्वेटर या जैकेट कंधे पर डाल कर घूमने के दिन होते थे…बेर और मक्को खाने के दिन, एक्जाम्स खत्म होने के दिन, शाम में ज्यादा देर तक क्रिकेट खेलने के दिन होते थे, देर तक शाम में घूमते रहने के दिन होते थे और राजा हिन्दुस्तानी का गाना आये हो मेरी ज़िन्दगी में तुम बहार बन कर गुनगुनाने के दिन होते थे.  दिन बदला सा लगने लगता है हवाओं में एक अलग ही खुशबु फैली होती है वसंत में…

अब घर से बाहर इतने साल से रहते हुए कुछ भी खास फर्क नहीं पड़ता. अब ना तो एक्जाम होते हैं, ना स्कूल, ना दिल्ली-बैंगलोर में पंडाल ही लगते हैं जहाँ सरस्वती जी की मूर्तियाँ बिठाई जाती हैं. अब ना तो क्रिकेट के दिन हैं और ना ही हाफस्वेटर पहनने के दिन आते हैं अब. बेर और मक्को खाने पर भी अब वैसा फील नहीं आता जैसा पहले आता था. फिर भी वसंत पंचमी के नाम से ही जाने क्यों मन में आज भी एक अलग ही उत्साह आ जाता है. मन थोड़ा नोस्टैल्जिक सा होने लगता है.

इस साल वसंत पंचमी का कोई वैसा उत्साह था नहीं. लेकिन कल सुबह से ही मौसम ने अचानक करवट ली है, और सर्दी बिलकुल ही गायब सी हो गयी. अचानक लगने लगा जैसे वसंत के दिन आ गए हैं. शाम में हवा बिलकुल पटना के वसंत के दिनों की याद दिला रहे थे. बड़ा मिस किया था कल शाम अपने शहर को…वहाँ के सरस्वती पूजा को तो और ज्यादा मिस किया.

आज सुबह जब नींद खुली तो दो लोगों ने सबसे पहले वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की शुभकामनाएं दी थीं. एक तो माँ, और दूसरी दीदी. माँ का फोन सुबह साढ़े नौ बजे आया था, और तब तक मैंने पूजा कर लिया था. माँ जब तक फोन पर ये कहती कि आज पूजा कर लेना, तब तक मैंने ही कह दिया माँ से “पूजा कर लिए हैं”. माँ इस बात से थोड़ी खुश हुई, उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि मैंने पूजा कर ली है. सुबह साढ़े नौ का वक़्त था और तब तक माँ ने खुद पूजा नहीं किया था. उसे ये शक था कि मुझे याद भी नहीं होगा कि आज सरस्वती पूजा है. मैंने माँ को कहा कि आज सोशल नेटवर्किंग का ज़माना है, अगर भूल भी जाऊं तो फेसबुक के जरिये याद हो ही जाता है. लोग एक दिन पहले से ही फेसबुक पर स्टेट्स ठेलने लगते हैं. माँ आज थोड़ा व्यस्त सी थी सुबह में, घर में रिश्तेदार आये हुए थे. उसने बस ये इन्स्ट्रक्शन देकर कि “आज तुम दोपहर और रात में कुछ अच्छा खा लेना, यहाँ आज पूरी-छोले बन रहे हैं”.. कह कर माँ ने फोन काट दिया. फ़ोन रखने के बाद भी कुछ देर तक मैं पटना की बातें सोचने लगा. घर पर आज के दिन माँ जरूर कुछ अच्छा बनती है, मैंने सोचा. आज के दिन ही क्यों, कोई भी त्यौहार या पर्व छोटा या बड़ा क्यों न हो, माँ हमेशा कुछ न कुछ विशेष बनाती ही है. उस वक़्त पटना को, घर को, माँ को बड़ा मिस किया मैंने.

दीदी से भी लगभग उसी समय बात हुई, उसने मुझे आज के दिन एक काम सौंप दिया. फोन पर कहा उसने, कि आज तुम कुछ लिखना जरूर. आज के दिन लिखना चाहिए. अचानक लगा कि जैसे मैं स्कूल के दिनों में पहुँच गया हूँ, जब माँ कहती थी कि आज के दिन पढ़ना चाहिए, चाहे थोड़ी देर ही क्यों नहीं. तो दीदी की ही बात को मानते हुए मैं आज ये पोस्ट लिख रहा हूँ. वैसे भी अब वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की शुभकामनायें देते हुए उसने कहा… उसने कहा है, तो मेरा लिखना अनिवार्य है, वरना वो लड़ेगी बहुत मेरे से.

दीदी से बात करने के बाद बहुत देर तक सोचते रहा मैं कि  क्या लिखूं? बहुत देर तक एमएस वर्ड के ब्लैंक पेज को घूरते रहने के बाद भी कुछ सूझ नहीं रहा था. तो सोचा कि क्यों न आज के दिन की ही कुछ हलकी फुलकी यादें लिखूं यहाँ. ये कोई कठिन काम नहीं है मेरे लिए. सरस्वती पूजा की एक नहीं, कई सारी खूबसूरत यादें हैं मेरे पास. सब को लिखना संभव भी नहीं है यहाँ.

वैसे आज के दिन यानी सरस्वती पूजा के जिक्र से ही मुझे हमेशा अपनी बहन निमिषा का वो मासूम सा सवाल याद आ जाता है जो उसने पूछा था, जब वो ग्यारहवीं में थी. हम सुबह नाश्ता कर रहे थे, कि अचानक निमिषा ने मुझसे सवाल किया “भैया आज सरस्वती माँ का हैप्पी बर्थडे है क्या?”
मैं जवाब क्या देता? हंसने लगा. “हाँ आज उनका हैप्पी बर्थडे है” मैंने निमिषा से कहा.
निमिषा का फिर अगला सवाल था.. “तो आज केक भी खाने को मिलना चाहिए न…”
हम सब उसकी इस बात से हसंने लगे थे. किचन से माँ ने कहा, “बाबु आज केक नहीं लड्डू, बेर और मक्को मिलेंगे खाने के लिए”.
निमिषा थोड़ी उदास हो गयी, कहने लगी “तो क्या फायदा ऐसे बर्थडे का, जब केक ही नहीं मिले खाने को”.


ये शायद आज से छः सात साल पहले की बात होगी…उन दिनों मैं इंजीनियरिंग में था और सेमेस्टर की छुट्टियों में घर आया हुआ था.

मेरे लिए सरस्वती पूजा ख़ास होना शुरू हुआ था शायद साल 1998 से. उसके पहले की कुछ भी ऐसी ख़ास यादें नहीं हैं जिन्हें मैं याद कर के लिख सकूँ. लेकिन उस साल स्कूल में जो कार्यक्रम आयोजित होने वाले थे, उनकी तैयारियों में मैं भी शामिल था. मुझे स्कूल के प्रिंसिपल एस.एस.सिंह ने शामिल किया था, और कई मुख्य काम मुझे सौंपे गए थे. एस.एस सर का मैं फेवरिट स्टूडेंट था शायद इसलिए उन्होंने मुझे शामिल किया होगा(ये अलग बात है कि उनसे मैं कोचिंग भी पढ़ता था). स्कूल के किसी बड़े फंक्शन  को यूँ ऑर्गनाइज़ करना बड़ा उत्साह से भरा और इक्साइटिंग काम होता था. ख़ास होने का एहसास होने लगता था. ऑर्गनाइज़िंग कमिटी का मुख्य सदस्य था मैं तो थोड़ा हाईलाईट भी हो गया था. स्कूल में लोग मेरा नाम जानने लगे थे. ये एहसास उन दिनों बड़ा अच्छा लगता था. वैसे भी स्कूल में पोप्युलर होना कौन नहीं चाहता.

1998 के बाद से लगभग हर साल सरस्वती पूजा मेरी ख़ास ही रही. कुछ न कुछ विशेष यादें हर साल की रही हैं. इसके अगले ही साल 1999 में मैं अपने बड़े पापा के साथ गाँव चला गया था. गाँव में हमारे घर में हम सरस्वती जी की मूर्ति बरामदे में बिठाते हैं. ये भी एक अलग ही अनुभव था मेरे लिए. अपने आप में पहला और बिलकुल अलग सा अनुभव. एक छोटा पंडाल जैसा लगाना, पूरे बरामदे को सजाना, और प्रसाद का इंतजाम करना… कितने काम होते थे. दिन भर जबरदस्त व्यस्तता रहती थी. पूजा के दिन जितने भी गाँव के लोग माँ के दर्शन आतें सब को प्रसाद देना और दिन भर वहीँ बरामदे में बैठकर “डेक” पर गाने सुनते रहना. बिलकुल ही अलग अनुभव था मेरे लिए. अगले दिन मूर्ति को विसर्जित करने पोखर ले जाना तो और भी यादगार अनुभव था. कितने गाँव के लोग साथ जुड़ते हुए चले गए थे जब हम ठेले से सरस्वती जी की मूर्ति ले जा रहे थे विसर्जित करने. “डेक” पर गाने बज रहे थे और बच्चे और लड़के पूरे रास्ते नाचते हुए जा रहे थे. ये बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव था मेरे लिए. 
२००६ की सरस्वती पूजा की तस्वीर 
सरस्वती पूजा के अवसर पर अपने गाँव मैं तीन बार गया हूँ और तीनों बार की बड़ी खूबसूरत सी यादें रहीं हैं. 1999 के बाद दूसरी बार मैं २००३ में गाँव गया था. इस साल लेकिन कुछ काम से मुझे सरस्वती पूजा के दिन ही सुबह पटना आना था. मैं थोड़ा निराश था इस बात को लेकर. बहुत उत्साहित था मैं की इस बार सरस्वती पूजा पर मैं गाँव में फिर से रहूँगा, लेकिन अचानक एक जरूरी काम आ गया था और सुबह मुझे पटना के लिए निकलना था. शाम में भैया सरस्वती जी की बड़ी और खूबसूरत मूर्ति लेकर आये थे…अगले दिन पूजा में नहीं रहने का मन में अफसोस तो था, लेकिन मैं पूरी रात जागा रहा था और भैया-दीदी के साथ मिलकर रात में ही बरामदे को सज़ा दिया था. मैंने कहा उनसे, कि इसी बहाने इस साल भी मैं जुड़ा रहा घर से पूजा से. सरस्वती पूजा के दिन जब पटना आ रहा था, तो रास्ते में बस जितने छोटे गाँव से होकर गुज़र रही थी, मुझे जाने कितने ही सरस्वती जी की मूर्तियों के दर्शन होते गए थे. पटना पहुँचने के बाद मैं शाम में अपने कुछ दोस्तों के घर चला गया था, जिनके मोहल्ले में वो सब सरस्वती पूजा का आयोजन कर रहे थे और बहुत देर तक शाम में उनके साथ बैठा रहा था. ये एक लम्बी और अच्छी कहानी है, जो कभी बाद में बताऊंगा, लेकिन उस शाम हमें बड़ी ख़ुशी हुई थी, हम तीन दोस्तों ने उस शाम एक बड़ा ही अच्छा काम किया था, जिसके वजह से वो शाम यादगार बन गयी थी.

सरस्वती पूजा में गाँव मैं आखिरी बार २००६ में गया था. इस बार पूरे परिवार के साथ. माँ, पापा, नानी और मेरी बहन…हम सब गए थे गाँव. गाँव का ये ट्रिप कई मायने में ख़ास था. हम गाँव पहली बार अपनी गाड़ी से गए थे और रास्ते में कई जगह घूमते हुए हम गाँव पहुंचे थे. मेरे कुछ रिश्तेदार रहते हैं गाँव में, उन सब के घर जाना हुआ था, और उस साल लगभग सभी के घरों में सरस्वती जी की मूर्तियाँ बिठाई गयीं थीं. बहुत ही अच्छा सा दिन था वो.

इन यादों के अलावा भी कितनी ऐसी यादें हैं सरस्वती पूजा की, जिन्हें याद करने बैठूं तो बहुत लम्बा वक़्त लग जाएगा. बारहवीं के वो दिन, जब हमारा फेअरवेल और सरस्वती पूजा दोनों का आयोजन साथ में किया गया था, इंजीनियरिंग के दिन जब पहले दो साल हम कॉलेज में रहकर सरस्वती पूजा मनाये थे….जाने कहाँ कहाँ घूम कर, खोज कर हम मक्को और बेर खरीद लाये थे…और सब लोगों ने मिलकर पूजा किया था. बैंगलोर की  वो पहली  सरस्वती पूजा जो हमने अपने हॉस्टल ‘कूल लैंड’ में सबके साथ मनाई थी . पटना के वो सारे सरस्वती पूजा जो 1998 के बाद हम मनाते आये थे. बेशुमार यादें हैं आज के दिन की.

लिखते हुए मन बड़ा ही नोस्टैल्जिक सा हो गया है. बहुत कुछ, जाने क्या क्या और याद आते जा रहा है…अभी तो फ़िलहाल बस इसी पोस्ट को यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ, बाकी बातें संभव हुई तो बाद में कभी लिखूंगा. इस पोस्ट को पोस्ट करना अभी जरूरी भी है, आज का दिन खत्म होने वाला है, और अगर ये समय पर ब्लॉग पर न आया, तो दीदी बड़ा लड़ने वाली है मेरे से….

तो दीदी, ये पोस्ट तुम्हारे लिए…!

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  1. क्या कहें इन खूबसूरत बातों के लिए…| बस्स, यूँ ही पोस्ट लिखने के लिए बात मानते रहा करो, कम-से-कम तुम्हारी प्यारी-सी लेखनी से ऐसी यादें तो झरती रहेंगी…मन को यूं ही भिगोती रहेंगी…:) 🙂

  2. का का याद दिला देते हो तुम भी! और तुम्हारे लिखने में डिटेलिंग एतना परफेक्ट होता है कि लगता है कुच्छो नहीं छूटा. अगर कुछ छूटा है तो ऊ समय जिसका तुम जिकिर कर रहे होते हो!
    बदलाव तनिक्को नहीं आया हमारे से लेकर तुम्हारे समय में! लेकिन एगो बात बताओ, कभी सोचे हो कि कहाँ जाकर ई सब गायब हो गया पटना से???

  3. कुछ यादें मेरी भी ताजा हो गई ………
    कॉलेज के दिनों मे हर साल सरस्वती पुजा करते थे ……… चंदा इकट्ठा करना, फिर प्रोग्राम रात मे करना ……. कितना काम और कितना मेहनत 🙂

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