हॉस्टल की यादें..

कॉलेज लाईफ की सबसे अनमोल यादों में से हॉस्टल में बिताये दिन सबसे पहले याद आते हैं…दोस्तों के साथ रात भर बैठकर गप्पें करना, बदमाशियों में हिस्सेदार होना, सबके साथ मिलकर नाईट-आउट करना… अनगिनत यादें ऐसी हैं जो बाद में जब भी याद आते हैं तो चेहरे पर एक मुस्कुराहट तो आ ही जाती है..आज सोचा की वैसी ही कोई यादें यहाँ शेयर करूँ…मैं दो हॉस्टल में रह चूका हूँ.एक तो इंजीनियरिंग के दिनों में हॉस्टल में रहना हुआ और फिर बैंगलोर में, जहाँ मैं एक प्राईवेट हॉस्टल में रहता था.बैंगलोर और बसव्कल्याण दोनों जगह की हॉस्टल की यादें बेहद खूबसूरत हैं और उन्हें आज भी याद करता हूँ तो अच्छा लगता है..वो दिन वो मस्ती बेतरह याद आते हैं…आज सोचा की वैसे ही दो किस्सों को यहाँ शेयर करूँ.पहला किस्सा जो है, वो २०१० में रश्मि दीदी के ब्लॉग के लिए मैंने लिखा था, उस पोस्ट को आज यहाँ शेयर कर रहा हूँ..और साथ ही में एक मीठी सी याद बैंगलोर के हॉस्टल की….

अप्रैल फूल 

एक बार १ अप्रैल के दिन सबने प्लान बनाया कि अपने एक दोस्त सौरभ को थोड़ा अलग अंदाज में उल्लू बनाया जाए.हमारे वो मित्र एक लड़की से प्रेम करते थे, और उस लड़की को भी ये अच्छे से पता था कि हमारे मित्र उन्हें देख आहें भरते हैं.तो हमने प्लान ये बनाया कि कैसे भी कर के उस लड़की का टी-शर्ट चोरी किया जाए और उसे अपने मित्र को पहनाया जाए.लेकिन चोरी करना गर्ल्स हॉस्टल में, और वो भी कपड़े…बेहद खतरनाक काम था.इसलिए इस जोखिम भरे काम के लिए हमने तैयारी अच्छे से कर रखी थी.दो दिन पहले ही आसपास के जगहों का मुआयना किया गया.जिस गर्ल्स हॉस्टल में हमारे दोस्त की प्रेमिका रहती थी, वो हमलोगों के फ़्लैट के बाजू में था, गर्ल्स हॉस्टल की और हमारे फ़्लैट की बाउन्ड्री कॉमन थी.३१ मार्च की रात एक बजे हमारे दो मित्र आशीष और विपिन कपड़े चोरी करने के मकसद से हॉस्टल की तरफ बढे.हॉस्टल की दीवाल लांघ जैसे ही वो कम्पाउंड में आगे बढे तो उन्हें लगा कि कोई उधर से आ रहा है, जल्दबाजी में वो हॉस्टल के पीछे वाले कोने की तरफ भागे.हॉस्टल के पीछे एक छोटा सा गड्ढा, एकदम छोटा तालाब जैसा कुछ था..जिसके बारे में उन दोनों को मालूम नहीं था.वो लोग जल्दबाजी में उसी में जा गिरे, मिट्टी, कीचड़ और पानी से लथपथ हो गए, फिर भी उनका हौंसला नहीं टूटा और वो आगे बढे…हम अपने छत से ये सब देख रहे थे…हॉस्टल के मेन गेट पर नज़र भी लगाये हुए थे और लगातार उनका हौसला बढ़ा रहे थे.वो दोनों जांबाज हॉस्टल के छत तक पहुँच गए.तय ये था कि बस एक ही लड़की के कपड़े लाना है, लेकिन दोनों नालायक सभी के कपड़े ले आयें.उनका तर्क ये था कि एक लड़की के कपड़े गायब हुए तो सब हवा को दोष देंगे, लेकिन सबके कपड़े गायब होंगे तो ये तो पक्का हो जाएगा न कि किसी ने कपड़ों पर हाथ साफ़ किया है…

खैर, इस बात की खबर अभी तक हमारे उस मित्र को नहीं थी.अगले दिन(१ अप्रैल) उस टी-शर्ट(सौरभ बाबू की प्रेमिका की टी-शर्ट) को अच्छे से आयरन कर सौरभ बाबू को ये कह कर पहना दिया हमने, कि ये टी-शर्ट अकरम ने नया ख़रीदा है.सौरभ बाबू जब संदेह भरी दृष्टि से टी-शर्ट की तरफ देखें तो हमने कहानी ये बनाई कि अकरम को ये टी-शर्ट पसंद आ गयी, और ऐसा ही टी-शर्ट आपकी प्रेमिका पहनती है…इसलिए अकरम आपको ये टी-शर्ट गिफ्ट कर रहा है.सौरभ बाबू अब तक कन्फ्यूज से थे, लेकिन उन्होंने टी-शर्ट पहन लिया. अब बारी थी मिशन को आखिरी शक्ल देने की.सौरभ को हम वो टी-शर्ट पहनाकर छत पर ले गए, दूसरी तरफ गर्ल्स हॉस्टल की छत पे सभी लड़कियाँ पहले से मौजूद थी.लडकियाँ सौरभ को शक की निगाह से देखने लगीं और खुसुरफुसुर करने लगीं. .सौरभ बाबू को भी थोड़ा अजीब लगा, वो मेरे से पूछे “भाई, क्या बात है ये सब हमको ऐसे देख के क्या बडबडा रही है?” मैंने कहा – “अरे महाराज उसका टी-शर्ट पहिन के छत पे उसके सामने घूमेंगे आप तो ऐसे देखेगी ही न वो सब. ” सौरभ बाबू का चेहरा उड़ गया था..वहीँ पे सबको गाली देने लगे – “सबके सब कमीने हैं, मेरा धर्म भ्रष्ट करवा दिया सबने…लड़की का कपड़ा पहना दिया पागल सब….मेरे इज्जत का बैंड बजा दिया…” वो और भी पता नहीं क्या क्या बुदबुदाते हुए वो नीचे उतर गए.. 
छत पे सभी लड़के ठहाके लगाकर हँसने लगे..जब मैं नीचे आया तो सौरभ बाबू कहते हैं – “अभिषेक भाई, आपसे ऐसा उम्मीद हम नहीं किये थे..आप भी मिले हुए थे..?” मैंने भी प्यार से कहा – “अरे सौरभ बाबू यही तो ज़माने का दस्तूर है, आज अप्रैल फ़ूल है…पिछली बार आप सबको बनाये थे इस बार आप बन गए..टेक अ चिल पिल ” वैसे ये साफ़ कर दूँ, कि एक और बदमाशी हमने फिर से उसी रात की थी…कुछ लड़कों ने लड़कियों के कपड़ों पर एक छोटा सा हार्ट का शेप बना दिया, और फिर उसी रात वो कपड़े सही सलामत गर्ल्स हॉस्टल की छत पे पहुँच गए, ताकि उन्हें ये यकीन हो जाए कि कपड़े वाकई चोरी हुए थे, और चोरी हमने ही की थी. 
अरे ये तो ‘मैंने प्यार किया है’ के बाद का है… 
बैंगलोर में मैं जिस प्राईवेट हॉस्टल में रहता था उस हॉस्टल का नाम था “कूल लैंड हॉस्टल”.यहाँ जॉब करने वाले लड़कों के साथ कॉलेज के भी स्टूडेंट्स रहते थे.स्टूडेंट्स सारे एम.एस.रमैय्या कॉलेज में पढ़ रहे ग्रैजूएशन के छात्र थे.सब मेरे से काफी छोटे.मैं जब २००७ में उस हॉस्टल में गया था तब वहाँ रह रहे अधिकतर स्टूडेंट अपने ग्रैजूएशन फर्स्ट इअर में थे..लेकिन फिर भी सब से दोस्ती खूब अच्छी हो गयी.कुछ ऐसे लड़के भी थे(जैसे निशांत और संजीव) जिनके साथ वक़्त ज्यादा बीतने लगा और देखते ही देखते वो काफी अच्छे और करीबी दोस्त बन गए..शाम को जब जॉब वाले लड़के अपने कामकाज से वापस आते तो बाकी लड़कों के साथ मिलकर खूब महफ़िलें जमती..खूब बातें होती..फ़िल्में चलतीं और खूब सारी मस्ती होती.शाम को अक्सर हम सब मिलकर एक साथ घूमने-टहलने निकलते, चाय की दुकानों पर हमारी शाम बीतती थी.चाय की दूकान पर अक्सर कुछ लड़कों को सिगरेट पीने की आदत थी.निशांत, संजीव और बाकी सारे लड़के जो हमसे छोटे थे उन्हें भी सिगरेट पीने की आदत थी, लेकिन वो लोग इतनी कोशिश करते थे कि हमारे सामने वो सिगरेट ना पिएँ….लेकिन कभी कभी हमारे सामने भी वो सिगरेट पी ही लेते थे. 
उनकी इस आदत पर हम कभी कभी उन्हें डांट भी देते थे, “तुम लोगों से हम सब इतने बड़े हैं और फिर भी सामने सिगरेट पीते हो? शर्म नहीं आती?” वो लोग भी हमारी इस डांट से कभी चिढ़े नहीं और बात मानकर या तो कभी सिगरेट बुझा देते थे या ये कहकर “भैया बस ये और इसके बाद नहीं..” हमें मना लेते थे. 
एक शाम जब हम सब चाय पी रहे थे तो संजीव ने उसी चाय की दुकान से एक सिगरेट खरीदी और सिगरेट पीने लगा.पास में ही खड़े राहुल, गुडडू और नवनीत खड़े थे, वो संजीव को सिगरेट पीता देख डांटने लगे…”तुमसे हम सब बड़े हैं इस बात का ख्याल है कि नहीं तुमको और सिगरेट पीने लगे?” .संजीव शायद थोड़ा डर गया था..उसने सिगरेट बुझाई और फिर हमसे माफ़ी माँगा उसने.सबने उसे माफ़ तो उसी वक़्त कर दिया, लेकिन ऐसा मौका छेड़ने का और क्लास लेने का भला कौन छोड़ने वाला था? 
सब मिलकर संजीव को छेड़ने लगे, और हॉस्टल पहुँचने तक उसकी अच्छी खासी क्लास भी ले ली सबने…संजीव भी इन सब बातों को बहुत अच्छे से ले रहा था और वो बिना चिढ़े मजाक को एन्जॉय कर रहा था. 
सब मेरे रूम पर इक्कट्ठा हुए, और फिर थोड़ी बातचीत शुरू ही हुई थी कि राहुल के तरफ से एकाएक एक सवाल आया…बिलकुल अनएक्स्पेक्टिड सा सवाल था वो.राहुल ने संजीव से पूछा…”अरे यार, एक बात बताओ…तुम्हारा डेट ऑफ़ बर्थ क्या है? 
संजीव ने भी बिना कुछ सोचे कह दिया…भैया…”1990. 
राहुल ने तपाक से कहा…”क्याsss?? 1990???अरे हो अभिषेक जी….ये देखिये इधर…ये लड़का तो तो ‘मैंने प्यार किया है’ के बाद का है…नब्बे का जनम है इसका और सलमनवा तो नवासीये में अपना फिल्म लेकर आ गया था….ई तो मैंने प्यार किया है के बाद का लईका है”. 
राहुल ने भले ये बात एकदम रैंडमली कहा हो, लेकिन वहाँ बैठे सभी लड़के इस बात पर ठहाके लगाकर हँसने लगे.संजीव बेचारा बुरी तरह से झेंप गया था… 
राहुल हमारे हॉस्टल में नहीं रहता था, तो वो जब कुछ महीनो के लिए बैंगलोर से बाहर गया, और फिर जब वो वापस आया तो वो पूछना चाह रहा था मेरे से कि संजीव कहाँ है? लेकिन उसे शायद संजीव का नाम याद नहीं था….बहुत तरीके से उसने पूछा मेरे से….कि वो जो लड़का उस दिन था, वो कहाँ है, वो जो उस दिन सिगरेट पी रहा था, वो कहाँ है? लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि वो आखिर किसके बारे में पूछ रहा है..मैं सबके नाम ले रहा था, और वो कह रहा था…अरे ये नहीं…वो दूसरा लड़का था… 
फिर जब राहुल एकदम हार गया, कहने लगा कि छोडिये, नाम याद आएगा तो बताएँगे. ये कहकर वो चुप हो ही गया था कि अचानक से उसे याद आया…और उसने फिर से पूछा…”अरे वो लड़का, जो मैंने प्यार किया है के बाद का था, वो कहाँ है?” 
मुझे जोर की हंसी आ गयी…मैंने कहा, अच्छा आप संजीव के बारे में पूछ रहे हैं”. 
राहुल ने कहा “हाँ, उसी के बारे में..” राहुल भी हँसने लगा था. 
फिर मैंने संजीव को उसके कमरे से बुलाया और राहुल को कहा, ये देखिये ये रहा “मैंने प्यार किया है” के बाद का लड़का. 
संजीव को हॉस्टल के लड़के(हमारे उम्र वाले) कई दिनों तक इस नाम से छेड़ते रहे थे, “मैंने प्यार किया है के बाद वाला लड़का”.संजीव भी जब थोड़ा चिढ़ता तो कहता, हाँ तो इसको देखो, “ये तो ‘क़यामत से कयामत तक’ के बाद का लड़का है…इसे आप लोग क्यों नहीं बोलते कुछ?” 
आज भी जब सब दोस्त मिलते हैं तो संजीव के इस नाम को याद कर के हम सब खूब हँसते हैं.

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  1. तो आज पता चल ही गया…इत्ता बड़ा राज़…:) 😛
    वैसे बहुत मज़ेदार पोस्ट…हमेशा की तरह…। बाकी तो ‘हम कुछ न बोलेंगे…’ 😀 😛

  2. "ये लड़का तो तो 'मैंने प्यार किया है' के बाद का है…"

    अच्छी उक्ति है…!
    Really a novel one…

    ये छोटी छोटी ख़ुशी के बहाने ही तो हासिल हैं यादों के…
    बीता दिन कभी न बीते… यूँ ही संजोते रहे यादें और बांटते रहे…!
    शुभकामनाएं!

  3. यादें यादें यादें … कितनी और जुड़ जाती हैं यादें इनके साथ जो अपनी अपनी होती हैं …
    हमेशा की तरह … बस कमाल …

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