वो कमरा याद आता है..

जावेद साहब की एक कविता है "वो कमरा याद आता है".उस कविता को जब कभी पढ़ता हूँ, एक टीस सी उठती है मन में.दो पुराने कमरे बेतरह याद आते हैं.एक बैंगलोर शहर का वो कमरा, जहाँ मैं इतने साल रहा था और दूसरा पटना के मेरे पुराने क्वार्टर का वो कमरा जहाँ मैं बड़ा हुआ था.मुझे लगता है अपने पुराने घरों के कमरों से लगाव होना शायद स्वाभाविक है, क्यूंकि वो हमारे संघर्षों, उदासियों और खुशियाँ का गवाह रहा है.मैंने भी इन दो कमरे में बहुत अच्छे से अच्छे दिन भी देखे हैं और बुरे से बुरे दिन भी...शायद इसी वजह से ये दोनों कमरे मुझे तब तक याद आते हैं...


मेरे छोटे भाई तन्मय की तस्वीर, मेरे पुराने
कमरे में.ये उस कमरे की एकमात्र तस्वीर है मेरे पास 
पटना का मेरा पुराना घर और उस घर का मेरा वो कमरा..जिससे न जाने कितनी ही यादें जुड़ी हुई हैं.यह कविता उस कमरे की याद और ज्यादा दिलाती है.पापा को ऑफिस की तरफ से क्वार्टर अलोट हुआ था.वो क्वार्टर हम सब के दिल के बेहद करीब था.उस क्वार्टर में तीन कमरे थे..एक मेरा और मेरी बहन का कमरा, दूसरा ड्राइंग रम तीसरा माँ-पापा का कमरा.ड्राविंग रूम बस वो कहने को था, वो दरअसल मेरी बहन का कमरा था..जिससे तीसरा कमरा पूरी तरह से मेरे कब्ज़े में था.मेरा वो कमरा छोटा सा था और चीज़ें भी बहुत ज्यादा नहीं थी - एक पलंग जिसके नीचे एक चौकी लगी रहती थी, अगर ज्यादा लोग आ गए तो उस चौकी को हम बाहर खींच लेते थे ताकि चौकी पर कुछ लोग सो सके, एक ट्रंक जिसमे जाड़े के कपडे रखे जाते थे, एक किताबों की अलमारी, एक छोटी अलमारी जिसमे बहुत सी चीज़ें ठुंसी हुई रहती थी और मेरा एक स्टडी टेबल.इसके अलावा मेरे कमरे में और कोई बड़ी चीज़े मौजूद नहीं थी..लेकिन कमरे की चारों दीवारों पर हर जगह पोस्टर्स लगे हुए थे.पोस्टर्स लगाने के दो वजहें थीं.. एक तो उन दिनों बढ़िया कोटेसन या फिर गाड़ियों के पोस्टर्स खरीदने का मुझे शौक था और दूसरा वो पोस्टर्स दीवारों के खस्ता हाल को ढँक लिया करते थे.

अपने उसी छोटे से कमरे को मैं खूब सजा कर रखा करता था.कोने पर लगे स्टडी टेबल पर बैठकर मैंने कभी पढाई की हो ये याद नहीं आता.मैं पलंग पर बैठकर ही पढता था.स्टडी टेबल मैं अपने दुसरे कामों के लिए इस्तेमाल करता था.दुसरे काम जैसे किसी दोस्त या रिश्तेदार को खत लिखना, डायरी में कविताएँ और शायरी लिखना, कारों की तस्वीरें मैगजीन और न्यूज़पेपर से काट कर अपने कलेक्सन में जमा करना और ऐसे ही कई काम जिनका पढाई से कोई सम्बन्ध नहीं था.पापा ने मेरे लिए एक टेबल लैम्प खरीद लाया था, जिसे मैंने पढाई के दौरान कभी इस्तेमाल नहीं किया.लेकिन सर्दियों के दिनों में जब दोपहर कोहरे में सिमटी होती थी तब मैं कमरे की खिड़की दरवाज़े बंद कर कमरे में अँधेरा कर दिया करता था और तब उस टेबल लैम्प की रौशनी में मैं अपने फ़ालतू कामों को निपटाया करता था.दोस्त दिव्या, प्रभात और शिखा के द्वारा दिए गए गिफ्ट्स जो टेडीबिअर, कार्डबोर्ड पर लिखी अंग्रेजी कवितायें और ग्रीटिंग्स आदि होते थे और उन्हें मैं टेबल के सामने वाली दिवार पर चिपकाकर या टांगकर रखता था.बुरे दिन किसे कहते हैं और असफल होना क्या कहलाता है ये भी इसी कमरे में रहते हुए जाना था मैंने.बातें किया करता था इस कमरे से मैं.

मेरे उस पुराने कमरे का टेबल 
उन दिनों हम सोचते थे की जल्दी से बड़े और अच्छे घर में चल जाए तो इन सब बातों से छुटकारा मिल जाएगा, दीवारें अच्छी होंगी जिनपर कुछ पोस्टर्स चिपकाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.जगह ज्यादा होगी नए घर में और ऐसी कई सुविधाएँ होंगी जो क्वार्टर में मौजूद नहीं थीं.हम सोचते थे की बड़े घरों में चले जाने पर हमारी कई मुश्किलें दूर हो जायेंगी..और हुआ भी वैसे ही...कुछ सालों बाद हम अपने उस क्वार्टर को छोड़कर अपने नए और बड़े फ़्लैट में रहने चले आये.नए फ़्लैट में जगह वाकई पहले वाले क्वार्टर से दुगुनी थी, और दीवारों पर ना तो कोई पोस्टर लगाने की कभी जरूरत होती थी और नाही बड़े पलंग के अन्दर चौकी रखने की जरूरत पड़ी.गेस्ट आ भी जाए तो उनके लिए भरपूर जगह थी.फर्श भी बिलकुल चिकनी थी, पुराने क्वार्टर जैसी खुरदुरी नहीं थी...लेकिन इन सब सुविधाओं के बाद भी अभी तक मुझे लगता है जितना खुश हम उस क्वार्टर में रहते थे उतना इस नए और बड़े घर में आकर नहीं रहे.जब हम सारे नए घर में आये तो कुछ सालों तक तो क्वार्टर को बहुत याद करते रहे.मेरी और माँ की जाने कितनी बार ख्वाहिश होती थी की इस नए फ़्लैट को किराए पर लगाकर हम फिर से उसी पुराने क्वार्टर में रहने चले जाए..उसी पुराने क्वार्टर में जहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ बसती थी.लेकिन एक बार वहां से चले आने के बाद ये संभव भी नहीं था.

अब उस क्वार्टर को छोड़े हमें दस साल हो गए हैं और अब भी मुझे मेरा वो कमरा बहुत याद आता है...कभी सोचता हूँ की काश उस पुराने कमरे में मुझे कुछ दिन कोई रह लेने दे, वहां उसी बिस्तर पर एक भरपूर नींद लेने की बहुत ख्वाहिश होती है.

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एक दूसरा कमरा जो मेरे उस पुराने कमरे की तरह ही याद आता है वो है बैंगलोर का मेरा वो छोटा सा कमरा..वो कमरा जो बस शुरू होते ही ख़त्म हो जाता था.एक बिस्तर उसके सामने एक टेबल, टेबल के बगल में रखा एक किताबों का स्टैंड जिसमे पांच शेल्फ बने हुए थे और उपरी शेल्फ पर भगवन की मूर्तियाँ रखी होती थी, कोने में एक छोटा गैस सिलेंडर, कुछ बर्तनें और बिस्तर के नीचे रखे दो सूटकेस..एक वार्डरोब भी था जिसमे सीलन लगी रहती थी और इस वजह से वो इस्तेमाल में नहीं आता था.इससे ज्यादा सामन कमरे में मौजूद नहीं था फिर भी कमरा हमेशा भरा हुआ सा लगता था.इस कमरे से न जाने कितनी ही यादें जुड़ी हुईं हैं.जहाँ बहुत मस्ती की है, बहुत से अच्छे दिन यहाँ बिताये हैं मैंने वहीँ बहुत से बुरे दिन भी देखे हैं इस कमरे में और ज़िन्दगी के सबसे कड़े इम्तिहान का गवाह यही कमरा रहा है.अकेले रहने की मुझे आदत भी इसी कमरे ने दिलवाई.इसी कमरे ने सीखाया की दोस्त जब तुम्हे बिलकुल अनदेखा कर दें तो कैसे तुम खुद को संभालोगे...कभी कभी तो कई दिन गुज़र जाते थे उदासियों के...मैं दिन भर इधर उधर भटकता और शाम में चुपचाप कमरे में आता था, कमरे की बत्ती बुझा कर बैठा ग़ज़लें, गाने सुनते रहता या कभी दिल बहलाने के लिए कोई फिल्म देख लिया करता था.वीकेंड एकमात्र सहारा था मेरे लिए जब मेरे मित्र रवि जी फुर्सत में होते थे और उनके साथ दो दिन बहुत सुहाने बीतते थे.शायद इसलिए जब मैंने जावेद साहब की कविता की ये पंक्ति पहली बार पढ़ी थी(शायद उन्ही दिनों, २००९ के आसपास) तो मेरे आँखों में आँसू आ गए थे - 
मैं जब भी ज़िन्दगी की  
चिलचिलाती धूप में तपकर
मै जब भी
दुसरों के और खुद के झूठ से थककर
मैं सबसे लड़ के खुद से हार के
जब भी उस इक कमरे में जाता था
वो हलके और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरा
वो बेहद मेहरबाँ कमरा
जो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता था
जैसे कोई माँ बच्चे को आँचल में छुपा ले
प्यार से डाँटे
ये क्या आदत है
जलती दोपहर में मारे मारे घुमते हो तुम

बैंगलोर के अपने इस कमरे की एक शाम, अपने मित्र को अपने
डायरी से कुछ पढ़कर सुना रहा था मैं 
बारिशों के मौसाम में उस कमरे में एक अजीब सा अपनापन बरसता था..मैं कमरे के एक कोने में लेटा छत की ओर ताकते रहता, गाने बजते रहते थे और बाहर हो रही बारिश की आवाजें मेरे कानों में आती रहती थी..मुझे बारिशों में उस कमरे में रहना बड़ा अच्छा लगता था.और शायद इसलिए कविता में जब ये पंक्ति पढ़ी "वो नर्म-दिल तकिया / मैं जिसकी गोद में सर रखके / छत को देखता था / छत की कड़ियों में / न जाने कितने अफ़सानो की कड़ियाँ थीं"  तो मुझे लगा जैसे मेरी ही कहानी ये कविता कह रही हो. 

अपने करीबी मित्र रवि जी से घंटों यहीं बैठकर बातें होती थीं..रवि जी का कमरा मेरे कमरे के ठीक बगल वाला कमरा था.उन्हें भी अपने कमरे से उतना ही प्यार था जितना मुझे. सच कहूँ तो अपने कमरे से उनका प्यार मेरे से कहीं ज्यादा था और अब भी है.शायद इसलिए जब मैंने उन्हें ये कविता पहली बार सुनाई थी, तो कविता के ख़त्म होने के बहुत देर बाद तक वो शुन्य में ताकते रहे थे.मैंने देखा की उनके भी आँखों में आंसूं आ गए थे और उन्होंने मुझसे मुस्कुरा कर कहा था..."सर, आपने तो रुला दिया मुझे...(कमरे को देखते हुए कहने लगे) बिलकुल मेरे और आपके कमरे की बात कही गयी है इस कविता में".

रवि जी अभी हैदराबाद में रह रहे हैं लेकिन उस पी.जी का वो कमरा उन्होंने अब तक अपने पास रखा है, महीने में एक दो बार से ज्यादा नहीं जा पाते बैंगलोर फिर भी कमरे का किराया वो हर महीने देते हैं.मुझे ये बात पता नहीं थी और मुझे लगता था की उन्होंने कमरा छोड़ दिया होगा..लेकिन अभी कुछ दिनों पहले उनसे जब बात हुई तो उन्होंने कहा "सर, उस कमरे को कैसे छोड़ सकते हैं भला, मेरा अपना कमरा है..जब तक संभव होगा उस कमरे को अपने पास रखेंगे हम..वहाँ एक दिन भी बिता लेते हैं तो पुरे महीने की एनर्जी वापस शरीर में लौट आती है".मुझे इस बात से ज़रा भी आश्चर्य नहीं हुआ की उन्होंने कमरा अब तक रखा है, वो कमरा उनके लिए कितना महत्त्व रखता है ये मैं अच्छे से जानता हूँ.हाँ, मेरे कुछ दोस्त हैं जो उन्हें पागल कहते हैं.वो मेरे दोस्त ठीक ही कहते हैं, रवि जी जैसे भावुक लोग समाज के लिए पागल ही तो हैं.

दिल्ली आने के बाद भी बहुत दिनों तक वो कमरा याद आते रहा..अभी पिछले सप्ताह जब फिर से रवि जी से फोन पर बात हुई तो उस कमरे से जुड़ी बहुत सी बातें हमने दोहराईं.हमने इस कविता को भी फिर से याद किया और आखिरी पंक्ति पर (उन्हें शक भी नहीं था / एक दिन / मैं उनको ऐसे छोड़ जाऊँगा /मैं इक दिन यूँ भी जाऊँगा / कि फिर वापस न आऊँगा) आकर हम दोनों भावुक हो गए.रवि जी ने थोडा जोश में आते हुए कहा मुझसे, "सर देखिये अगर बैंगलोर आना संभव है आपका, तो जल्दी प्लान बनाइये, हमारे कमरे में हम एक दो दिन ठहरेंगे...".


खैर, और क्या क्या कहूँ उस कमरे के बारे में...आप ये कविता ही पढ़ लीजिये...शायद आपको भी अपना कोई पुराना कमरा याद आये..

वो कमरा याद आता है 

मैं जब भी ज़िन्दगी की  
चिलचिलाती धूप में तपकर
मै जब भी
दुसरों के और खुद के झूठ से थककर
मैं सबसे लड़ के खुद से हार के
जब भी उस इक कमरे में जाता था
वो हलके और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरा
वो बेहद मेहरबाँ कमरा
जो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता था
जैसे कोई माँ बच्चे को आँचल में छुपा ले
प्यार से डाँटे
ये क्या आदत है
जलती दोपहर में मारे मारे घुमते हो तुम
वो कमरा याद आता है
दबीज़ और ख़सा भारी
कुछ ज़रा मुशकिल से खुलने वाला
वो शीशम का दरवाज़ा़
कि जैसे कोई अक्खड़ बाप
अपने खुरदुरे सीने में शफ़्क़त के समंदर को छुपाये हो
वो कुर्सी और उसके साथ वो जुड़वा बहन उसकी
वो दोनो दोस्त थीं मेरी
वो एक गुस्ताख़ मुँहफट आईना
जो दिल का अच्छा था
वो बेहंगम सी अलमारी
जो कोने में खड़ी इक बुड़ी अन्ना की तरह
आईने को तन्बीह करती थी
वो एक गुलदान
नन्हा-सा
बहुत शैतान
उन दोनों पे हँसता था
दरीचा
या ज़हानत से भरी इक मुस्कुराहट
और दरीचे पर झुकी वो बेल
कोई सब्ज़ सरगोशी
किताबें
ताक में और शेल्फ़ पर
संजीदा उस्तानी बनी बैठीं
मगर सब मुंतज़िर इस बात की
मैं उनसे कुछ पूछूँ
सिरहाने
नींद का साथी
थकन का चारागर
वो नर्म-दिल तकिया
मैं जिसकी गोद में सर रखके
छत को देखता था
छत की कड़ियों में
न जाने कितने अफ़सानो की कड़ियाँ थीं
वो छोटी मेज़ पर
और सामने दीवार पर
आवेज़ाँ तस्वीरें
मुझे अपनाईयत से और यक़ीं से देखतीं थीं
मुस्कुराती थीं
उन्हें शक भी नहीं था
एक दिन
मैं उनको ऐसे छोड़ जाऊँगा
मैं इक दिन यूँ भी जाऊँगा
कि फिर वापस न आऊँगा

मैं अब जिस घर में रहता हूँ
बहुत ही ख़ूबसूरत है
मगर अकसर यहाँ ख़मोश बैठा
याद करता हूँ
वो कमरा बात करता था

Comments

  1. क्या लिखें यहाँ... आपने इतनी आत्मीयता से लिखा है कि सबकुछ आपबीती सा लगता है... हमें भी कई कमरे याद आये, जिस किराये के मकान में बचपन बीता वह, और फिर हॉस्टल के कमरे! जब हम अपने नए फ्लैट में शिफ्ट हुए तो घर पर ज्यादा रहने का मौका ही नहीं मिला, हॉस्टल ही रवाना होना पड़ा, सो फ्लैट से जुडी संवेदनाएं इतनी प्रबल नहीं हैं!
    आपके मित्र की कमरे को लेकर भावुकता को समझ सकते हैं, निवास कभी कभी अपने अस्तित्व का अभिन्न अंग हो जाता है फिर उससे जुदा होना कहाँ मुमकिन!
    ***
    आपकी यह पोस्ट बहुतों को उनके बीते कल का बहुत कुछ याद दिलाएगी, बहुत ही प्यारी पोस्ट:)

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  2. आपका लिखा हुआ पढ़ते - पढ़ते मन अपनी यादों की इतनी वीथियों में घूम आया कि क्या कहें और मुझको मिला अपना खुद का कमरा और उसकी बातों में अभी भी भटक रही हूँ .......

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  3. सच में ऐसी स्मृतियाँ कभी भुलाये नहीं भूलतीं .........हमें भी बहुत कुछ याद दिलाती पोस्ट ...आभार

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  4. आपकी पोस्ट की यही बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद है की आपके और मेरे अनुभव बेहद मिलते हैं एक दूसरे से जाने क्या क्या याद दिला गया आपका यह आलेख हमारा भी एक घर हुआ करता था सरकारी जहां मैंने अपनी ज़िंदगी के 22 साल गुज़ारे तो आप इस बात से ही अंदाज़ा लगा सकते हैं मेरी यादों और मेरे सपनों का मगर अफसोस कि अब ना वो घर रहा और ना ही वो मोहौला अब वहाँ शॉपिंग कोंप्लक्स बना दिया गया है मगर सच मुझे भी न सिर्फ वो कमरा बल्कि पूरा घर ही बहुत-2222222222222 याद आता है। :)

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  5. प्रभावित करती रचना .

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  6. बड़े घर में खुद को खो देने का डर है, छोटा घर अभी भी याद आता है।

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  7. बहुत ही आत्मीय यादें, मेरे भाई को भी अपने कमरे से कुछ ऐसा ही लगाव था और नौकरी में आ जाने के बाद भी ,फ़्लैट में शिफ्ट हो जाने के बाद भी उसने कई साल तक अपना वो कमरा अपने पास रखा था .

    तुम्हारी पोस्ट की ऊपरी पंक्तियाँ पढ़ते ही पहले मैं अपने ब्लॉग पर गयी और वहाँ जावेद जी की वो कविता पढ़ी ,मैंने भी इसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट किया था वहाँ शरद जी की टिपण्णी आप सबके कमरे के प्रति लगाव के सन्दर्भ में बहुत सटीक लगी .
    शरद कोकासJuly 9, 2010 at 1:07 PM
    जावेद साहब की यह निजी अभिव्यक्ति बेहद खूबसूरत है जो बहुत से लोगों की अभिव्यक्ति हो सकती है । कमरा होता ही है इसलिये कि वह आपके लिये केवल शरण स्थल नहीं होता बल्कि वह आपको फिरसे लड़ने की तकत मुहैय्या कराता है ।

    शरद कोकास जी ने भी 'मेरा कमरा' पर एक कविता लिखी है
    हमेशा की तरह बहुत ही प्यारी सी पोस्ट

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  8. लो, हम ढूंढ कर शरद जी की लिखी कविता भी पढ़ आये ... लिए भी लिंक दे रही हूँ,पढ़ लेना क्यों मेरी आदत बिगाड़ना चाहती हो ?
    बहुत काम करवा लिया तुम्हारी इस पोस्ट ने :)

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    1. दीदी, सच कहूँ तो लिखने वक़्त याद आया था की आपने तरकश की कुछ कवितायें अपने ब्लॉग पर डाली थीं....लेकिन ये भी आपने ब्लॉग में लगाया था ये याद नहीं था...देखिये, मेरा वहां कमेन्ट भी है!
      उन दिनों आपसे बातें तो बस शुरू हुई थी मेरी!! कितना अच्छा समय था वो...२०१० सच में एक अच्छा साल था...:) :)
      शरद जी की कविता जाता हूँ पढ़ने!!! युही काम करते रहिये दीदी, बड़े बुजुर्ग कहते हैं काम करना अच्छी बात होती है ! :)

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  9. @ उन दिनों आपसे बातें तो बस शुरू हुई थी मेरी!! कितना अच्छा समय था वो...२०१० सच में एक अच्छा साल था...:) :)
    यानी कि शुरू होकर अब बातें जारी हैं तो अच्छा समय नहीं रहा :):)
    २०१३ में क्या बुरा हो गया भाई...और २०१४ तो तुम्हारे लिए और भी अच्छा होने वाला है...क्यूँ ? ये तुम्हे मालूम है :)

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    1. हम तो अभी से २०१४ से डर रहे हैं, और आप हैं की...:)
      खैर जाने दीजिये, जानता हूँ दीदियाँ ऐसे ही भाईयों की खिंचाई करती हैं :) :)

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  10. सच! एक अजीब सा अहसास समाया रहता है तुम्हारी यादों में..

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  11. kewal ek smiley bana ke chale jaayein ??? kaam chal jaayega na...

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  12. Nostalgic.... maayka aur apna wo kamra yaad aa gaya ..aaj fir :'(

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आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया