जाने पहचाने चेहरे


कुछ ऐसे जगह होते हैं जहाँ अक्सर जाने पहचाने चेहरे नजर आ जाते हैं…उन चेहरों को हम नाम से नहीं बस शक्लों से पहचानते हैं…उनसे हमने कभी बातें नहीं की होतीं, लेकिन हम उन्हें हर दिन देखते हैं..सड़कों पर चलते हुए, दुकानों में, बसों में…ट्रेनों पर या फिर मेट्रो में…हम कितने ही ऐसे लोगों से हर रोज़ मिलते हैं लेकिन कभी बात नहीं होती.ये चेहरे अगर कभी किसी दुसरे जगह दिख जाते हैं तो भीं हम उन्हें पहचान सकते हैं.कभी कभी तो ऐसे चेहरे आपको ऐसी जगह और ऐसे समय पर दिख जाते हैं जब आप उन्हें देखने की उम्मीद नहीं रखते, और उनका चेहरा भी भूल चुके होते हैं…वो एकाएक सामने आ जाते हैं, और उस समय एक अजनबी के लिए आपके चेहरे पर ना चाहते हुए भी एक छोटी मुस्कान आ जाती है.

मैं बैंगलोर में 276 बस नंबर से अक्सर आता जाता था….कुछ ऐसे चेहरे थे जो आते जाते बस स्टॉप में या फिर बस में दिख जाते थे जिन्हें मैं शक्लों से पहचान गया था…शायद वो भी मुझे मेरे शक्ल से पहचानते होंगे.मैं कभी नहीं सोचा था की उन्ही चेहरों में से कोई चेहरे से कभी यूँ राह चलते मुलाकात हो जायेगी, वो भी किसी दुसरे शहर में –
कल शाम की बात है…मैं एक होटल में शाम की चाय पी रहा था, की मुझे लगा मेरे सामने वाले टेबल पर बैठा शख्स मुझे लगातार देखे जा रहा है..शुरू में तो मैं उसे पहचान नहीं पाया, लेकिन ये लग रहा था की शायद उसकी शक्ल कहीं देखी हुई है..थोड़ा दिमाग पर जोर डाला तो याद आया, की ये शख्स तो हर रोज़ बैंगलोर में 276 नम्बर की बस से आता जाता था, और मैं उसे हर दिन बस स्टॉप पर देखता था…ये बात याद आते ही मेरे चेहरे पर हलकी मुस्कराहट आ गयी, और ताकि उसे ये न लगे की मैं उसे देख मुस्कुरा रहा हूँ…मैंने अपने चेहरे को दूसरी तरफ मोड़ लिया…वो भी शायद मुझे पहचानने की कोशिश कर रहा था…उसे भी शायद याद आ गया होगा की उसने मुझे कहा देखा था..कुछ देर बात उसने खुद मुझसे पूछ लिया…”आप शायद बैंगलोर में रहते थे?मैंने कई बार आपको बेल रोड के बस स्टॉप पर देखा था”.मैंने भी उससे कहा की मुझे आपका चेहरा याद आ गया था.मुझे भी और उसे भी थोड़ी ख़ुशी हुई की ऐसे भी दो अनजान लोगों की इतनी दिलचस्प मुलाकात हो सकती है…हलकी फुलकी हमारी बात हुई और वो अपने रास्ते चला गया और मैं अपने…लेकिन मैं सोचने लगा की कैसे ये एक छोटी सी मुलाकात मेरे चेहरे पर मुस्कराहट लेते आई थी…जब बैंगलोर में उसे बस स्टॉप पर खड़े देखता था उस समय ये ख्याल भी नहीं आया था की इस शख्स से कभी मेरी मुलाकात हो पाएगी, किसी दुसरे शहर में और इसके साथ बैठकर मैं कभी बातें करूँगा…

पिछले साल भी ऐसी ही एक बात हुई थी…जून का ही महिना था और मैं दिल्ली के पालिका बाज़ार के पास एक पार्क में टहल रहा था..की वहीँ घूमते फिरते एक व्यक्ति से मुलाकात हुई..उसने ही मुझे टोका था, उसे आसपास कौन घुमने की जगह है उसकी जानकारी लेनी थी…मुझे देखने से ही वो शख्स हैदराबाद का निवासी लग रहा था…मैंने पूछ भी दिया उससे “क्या आप हैदराबाद से आये हैं”. उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था..उसे पहले तो लगा की मैं भी वहीँ का हूँ…उसने मुझसे तेलगु में बात करनी शुरू कर दी…लेकिन फिर मैंने उसे बताया की मैं वहां का नहीं हूँ…लेकिन उधर मेरा इंजीनियरिंग कॉलेज था, तो हैदराबाद के लोगों को उनके बातचीत करने के ढंग से पहचान जाता हूँ..वो बड़ा खुश हो गया था.उसे उम्मीद नहीं थी की ऐसे कोई हैदराबाद से संपर्क रखने वला व्यक्ति उसे दिल्ली के सड़कों पर मिल जाएगा…मुझे भी ख़ुशी हुई थी उससे मिलकर…ऐसा लगा जैसे मेरे शहर का कोई व्यक्ति मिल गया मुझे.ये वैसी ही फीलिंग थी, जब इंजीनियरिंग में पढाई करते थे और कर्णाटक में कहीं किसी ढाबे पर या बस स्टैंड पर पटना का कोई व्यक्ति टकरा जाता था हमसे…बहुत ख़ुशी होती थी उस वक़्त.पटना के अलावा बैंगलोर और हैदराबाद भी अपना सा शहर लगता है, इसलिए अगर कहीं किसी दुसरे शहर में हैदराबाद या बैंगलोर के लोगों से राह चलते मुलाकात हो जाती है तो लगता है जैसे अपने शहर के किसी व्यक्ति से मिल रहे हैं.

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  3. haan sach..aksar aisa hota he…aur un roz dikhne walo chehron se ik ankhaa sa rishta ho jata he..muskuraahat ka……………sochne baitho to…..kyi baar ache dosti ke rishte ke piche yahi muskaan bhi hoti he…….roz roz smile dete kyi baar jaan pehchaan ho jaati he…………aur wahii ajnabi roz dikhne wala chehra kahi baahr dikhe to us zydaa nazdeeki aur koi nhi lgtaa……

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