अकरम की शादी

मेरे सबसे करीबी दोस्त अकरम की शादी पिछले महीने की बारह तारीख को हुई.ये पोस्ट यहाँ लगाना मेरे लिए जरूरी था.जहाँ दोस्तों का अनुरोध था की अकरम की शादी से जुडी कोई पोस्ट मैं खासकर के लिखूं, वहीँ इस पोस्ट को लिखने का मन मेरा भी कई दिनों से था.मेरी पूरी कोशिश के बावजूद पोस्ट थोड़ी लम्बी हो गयी है…फिर भी : 

अकरम और मैं..शुरूआती दिन : 

एक बहुत पुरानी तस्वीर…ये जगह हम दोनों के लिए यादगार जगह
थी.कॉलेज के दिनों में हम अक्सर यहाँ आकर अपनी शाम
बिताया करते थे.

हैदराबाद बस स्टैंड पर मैंने अकरम को पहली बार देखा था.देखने से बड़ा ही सिम्पल किस्म का शरीफ बन्दा लगा वो.फिर दुसरे दिन कॉलेज में एडमिशन फॉर्म भरने के समय उससे पहली बार थोड़ी बातचीत हुई…तो लगा की इससे मेरी अच्छी दोस्ती हो सकती है लेकिन उसी वक़्त जब उसके एडमिशन फॉर्म पर नज़र गयी और उसकी दसवीं और बारहवीं के परसेंटेज को मैंने देखा तो लगा की ये मेरे लीग का लड़का नहीं है..बड़ा पढ़ाकू किस्म का लड़का लगता है.लेकिन शायद हम दोनों की दोस्ती होनी तय थी.उसी दिन शाम में हमें हॉस्टल अलोट किया गया और हम दोनों रूममेट बन गए.चूँकि हम सबसे पहले कॉलेज पहुंचे थे और शुरूआती दिन में ख़ास पढाई होती नहीं थी, तो हमें बातें करने का अच्छा वक़्त मिल जाता था.ना ही वो मोबाईल और इन्टरनेट का ज़माना था और नाही हमारे हॉस्टल में कोई टी.वी था..तो हम दोनों डिनर के बाद देर रात तक बातें करते थे, अपने बीते दिनों की बातें, अपने शहर के दोस्तों की बातें और आगे भविष्य में क्या करना उसकी प्लानिंग.शायद यही वो दिन रहे होंगे जब अकरम और मैं करीब आये और अच्छे दोस्त बने.सच कहूँ तो अकरम पुरे इंजीनियरिंग के दौरान एक बड़ा सहारा रहा है मेरे लिए..या ये कहें की हम दोनों एक दुसरे के लिए सहारा थे.मेरी और उसकी सोच बहुत हद तक मिलती है,और हमने हमेशा एकदूसरे को अच्छे से समझा भी है..शायद इसलिए उसकी अहमियत ज्यादा है मेरी ज़िन्दगी में…कॉलेज के समय में भी और आज भी.

दुआओं का असर :

अकरम और मैं – अकरम के रिसेप्सन का एक पल

अकरम की शादी की खबर मुझे पिछले एक साल से थी.अकरम मेरा सबसे करीबी दोस्त है, तो स्वाभाविक है की उसकी शादी की खबर सुनकर मुझे बहुत उत्साहित होना चाहिय था, लेकिन फिर भी मैं उतना उत्साहित नहीं था, और सच पूछिये तो शायद अकरम भी ख़ास उत्साहित नहीं था.अकरम का बुरा वक़्त चल रहा था, और बहुत सी परेसनियों से वो घिरा हुआ था.मैं भी सीधे तौर पर अकरम की उन सभी परेसानियों में इन्वोल्व हो चूका था.हम बहुत देर देर तक उन समस्याओं और मसलों पर बातें करते लेकिन फिर भी कभी कोई सीधा हल नहीं निकल पाता था.मैं अकरम को हमेशा कहता था की परेसनियाँ जल्दी खत्म हो जायेंगी..लेकिन उसे इन बातों से ज्यादा तसल्ली नहीं मिलती थी.मैं अकरम को समझाता था की घरवालों और दोस्तों की दुआएं तुम्हारे साथ हैं, तो देखना ये जो कुछ भी है सब जल्द सुलझ जाएगा.अकरम भी हाँ-हूँ कह कर मन को समझा लेता था.कुछ समय बाद अकरम ने जैसे सारा कुछ ऊपरवाले पर छोड़ दिया था..और  कहता अब जो होगा देखा जाएगा.और सच में देखिये जैसे जैसे शादी की तारीख नज़दीक आते गयी, वैसे वैसे उसकी परेसनियाँ घटती गयीं.जो हल हम इतने महीनो से नहीं ढूँढ पाए थे वो अचानक सामने दिखाई देने लगा.अकरम जब शादी के बाद वापस दिल्ली आया तब उसने सबसे पहले मुझसे यही कहा “ये सब दुआओं का ही असर है दोस्त, बड़ी ताकत होती है दुआओं में, मैंने तो देख लिया है अपनी ज़िन्दगी में कैसे दुआ कुबूल होती है और सच्चे मन से दुआ करो तो कितनी जल्दी कुबूल होती है.”.

निकाह : 

अकरम का निकाह १२ मार्च को था और हमें निकाह में शरीक होने आरा जाना था.आरा पटना से ५० किलोमीटर की दुरी पर है.अकरम का निकाह बड़े सादे तरीके से हुआ था, बिना किसी हल्ला-हंगामे, शोर शराबे के.निकाह का समय दोपहर रखा गया था.दोस्तों में सिर्फ दो ही दोस्त उसके निकाह में शरीक होने वाले थे.एक मैं और दूसरा विशाल.तय हुआ की हम विशाल की गाडी से आरा जायेंगे.अच्छी बात ये थी की गाडी विशाल का ड्राईवर चला रहा था, जिससे मैं गाडी चलने के झंझट से बिलकुल मुक्त था(पटना में ऐसा मेरे साथ नहीं होता है, अक्सर गाडी मुझे ही चलानी होती है)और अपना सारा ध्यान बातचीत पर केन्द्रित कर सकता था.मौसम भी उस दिन बड़ा अच्छा था.हमें ढाई घंटे लगे आरा पहुँचने में.

हम आरा के गोपाली चौक मोहल्ले में पहुंचे जहाँ हमें एक धर्मशाला में रुकवाया गया था.धर्मशाला के पास ही एक मस्जिद में अकरम का निकाह होना था.जिस धर्मशाला में हम रुके थे वो कोई बहुत पुराने जमाने का घर लग रहा था जिसे बाद में धर्मशाला में बदल दिया गया होगा.जिस कमरे में हमें रुकवाया गया था उस कमरे की बालकोनी सीधे बाजार के सड़कों की तरफ खुलती थी.वहां से आरा के बाजारों का नज़ारा मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था.कुछ देर बाद जब कुछ रस्म के लिए अकरम मस्जिद चला गया तब मैं और विशाल काफी देर तक उस बालकोनी में खड़े रह कर बातें करते रहे.धर्मशाला में ही हमारे नास्ते और चाय का प्रबंध किया गया था.नास्ते में आरा की कुछ स्थानीय मिठाइयाँ भी थी जो मुझे बहुत पसंद आई, उनमे से एक “खुरमा” का नाम मुझे याद रह गया.

निकाह के बाद : मैं, अकरम और विशाल 

अकरम के मस्जिद जाने के कुछ देर बाद हम भी मस्जिद गए.अकरम का निकाह शुरू होने वाला था.अकरम का निकाह एक बुजुर्ग मौलवी करवा रहे थे जिनकी आवाज़ बेहद बुलंद थी.निकाह का महत्त्व और उसकी शर्ते पढ़ी गयी और फिर अकरम से निकाह की रजामंदी पूछी गयी.अकरम बाबु ने “कुबूल है” कहा और सब एक दुसरे को मुबारकबाद देने लगे.मैं जब अकरम को मुबारकबाद देने आगे बढ़ा तो अकरम ने कहा की “जब मौलवी साहब निकाह की शर्ते और उसका महत्त्व बता रहे थे तब मैं थोड़ा नर्वस सा हो गया था”.मुझे और विशाल को इस बात जोरों की हंसी आ गयी, अकरम बेचारा थोडा शरमा सा गया.

अकरम बाबु अपने ससुराल में. 

निकाह के बाद हम अकरम के ससुराल की तरफ बढे.हमारे भोजन का इंतजाम वहीँ किया गया था.अकरम का ससुराल मस्जिद से बिलकुल पास में ही था.कुछ गलियों से होकर वहां तक जाना पड़ता था.वहां अकरम बाबु को एक लम्बा और भारी सा सेहरा पहनाया गया जिससे अकरम का चेहरा बिलकुल छिप सा गया था.सेहरे से अकरम बड़ा इरिटेट सा हो गया था और जब न तब वो सेहरा उतारने की बात कहता था.सेहरे की वजह से अकरम की आवाज़ भी एकदम से धीमी हो गयी.पहले तो हम ये समझे की अकरम बाबु की शादी हो रही है इसलिए आवाज़ निकालनी बंद हो गयी, लेकिन बाद में अकरम को सफाई देनी पड़ी की सेहरे की वजह से उसे बोलने में परेसानी हो रही है…लेकिन हमने उसके इस तर्क को सीधे तौर से ख़ारिज कर दिया.

अकरम के ससुराल में हमें बेहद लजीज पकवान परोसे गए, जिसे देखकर हमारे दोस्त विशाल बाबु बड़े खुश से हो गए.सच मानिए तो वो तरह तरह के पकवानों का मजा लेने ही शादी में शरीक हुए थे.दो स्वीट डिश जो मुझे बेहद पसंद आये थे उनके नाम मैं हमेशा भूल जाता हूँ.अभी भी मुझे उनके नाम अकरम से पूछने पड़े.एक जर्दा, जिसे मीठी पुलाव कहते हैं और दूसरा मकुती जो की मुझे खासकर के पसंद आया.भोजन करते शाम हो गयी थी.हमारे पास समय कम था इसलिए हम भोजन के बाद ज्यादा देर रुक नहीं पाए और वापस पटना आ गए.


तबियत का ख़राब होना : 

पता नहीं किसका कसूर था, अकरम की शादी में बने लजीज पकवान का या मेरे मुहं का..जिसने शायद कुछ ज्यादा ही खा लिया होगा…की अगले दिन भयानक रूप से मेरी तबियत ख़राब हो गयी.अकरम के शादी के अगले ही दिन मुझे जबरदस्त रूप से बदहजमी हो गयी थी.रात भर में कुछ 15-16 उल्टियाँ हो गयीं और रात के दो बजे मुझे डॉक्टर से दिखाने अपने इलाके के अस्पताल में जाना पड़ा.उस अस्पताल(राजबंशी नगर हॉस्पिटल)में जहाँ ये दावा किया जाता है की चौबीस घंटे इमरजेंसी सुविधा उपलब्ध है, वहां डॉक्टर क्या एक अटेंडेंट भी नहीं दिखाई दिया हमें.पापा के डांट-फटकार के बाद कहाँ से तो एक डॉक्टर साहब अवतरित हुए.. और उन्होंने बस दो तीन सवाल कर मुझे कुछ दवाइयां दीं, जिनसे मेरी हालत में कुछ भी सुधार नहीं हुआ.सुबह तक का समय कुछ घरेलु दवायों के सहारे कटा और फिर मैं अपने रेगुलर डॉक्टर से चेकअप करवाने चला गया.वहां उन्होंने कुछ दवाएं और एक ईन्जेक्सन दिया जिससे उल्टियाँ तो बिलकुल रुक गईं लेकिन पूरा दिन बेहोशी और नींद में बीता..शाम तक मेरी हालत बहुत हद तक सुधर चुकी थी लेकिन कमजोरी बहुत ज्यादा लग थी..मुझे चिंता होने लगी की दो दिन बाद अकरम के रिसेप्सन में कैसे जा पाउँगा.लेकिन भगवन का शुक्र था की अकरम के रिसेप्सन के दिन तक मेरी तबियत बिलकुल ठीक हो गयी थी.

रिसेप्सन :

अकरम और उनकी पत्नी आलिया

अकरम के रिसेप्सन में हमें अकरम के घर हाजीपुर जाना था, जो की पटना से कुछ तीस-चालीस किलोमीटर दूर है.वैसे तो रिसेप्सन में बहुत से मित्रो का आना तय था, लेकिन सबके प्रोग्राम कैंसल होते चले गए.पटना से जो दोस्त जाने वाले थे उनमे एक मैं और विशाल..और हमारे साथ सौरभ बाबु, उनकी पत्नी और समित बाबु थे.हम सब एक साथ ही जाने वाले थे.सौरभ बाबु जिन्हें हमसब प्यार से नेता बाबु भी कहते हैं उनके चरित्र से तो विशाल वाकिफ था, लेकिन उनसे कभी मिला नहीं था.पहली ही मुलाकात में विशाल को अंदाज़ा हो गया की हमारे सौरभ बाबु कैसे अद्भुत व्यक्तित्व के मालिक हैं.रास्ते भर खूब मस्ती भरी बातें हुईं, पूरी शाम सौरभ बाबु की बातों का मीटर तीन सौ चालीस किलोमीटर की रफ़्तार से चल रहा था लेकिन फिर भी उन्हें पछतावा रहा की ज्यादा बातें करने का वक़्त नहीं मिल पाया.

मैं, अकरम, आलिया, सौरभ 

अकरम का रिसेप्सन उसके घर से हो रहा था, हम खुश थे जिसकी दो वजह थी.एक तो हम अकरम के घर पहली बार आये थे और दूसरी वजह थी की कुछ दोस्त सालों बाद मिल रहे थे.समित से जहाँ चार साल बाद मुलाकात हो रही थी वहीँ नीलमणि से सात-आठ साल बाद मिलना हुआ था.अकरम के रिसेप्सन में एक बड़ा अफोसोस ये रहा कि हम देरी से पहुंचे थे, और ज्यादा वक़्त वहां बिता नहीं सके.लेकिन जितने देर हम वहां थे एक अच्छा माहौल सा बन गया था.दोस्तों का एक तरह से गेट-टूगेदर हो गया था.

नीलमणि जी का नानी घर :

हम अकरम से विदा लेकर वापस पटना के लिए निकल रहे थे की नीलमणि जी ने अनुरोध किया की हम उन्हें उनके नानी घर तक छोड़ दें.उनका नानी घर भी हाजीपुर में ही था, और मुख्य बाईपास सड़क से कुछ चार-पांच किलोमीटर की दुरी पर.नीलमणि को अपने नानीघर गए करीब दस-बारह साल हो गए थे और जाहिर तौर पे इन दस-बारह साल में इलाके में काफी तब्दीली आ गयी थी..हम ये मानकर चल रहे थे की नीलमणि का नानीघर ढूँढने में थोड़ी तकलीफ हो सकती है.नानीघर के लोकेसन को लेकर नीलमणि खुद ही थोड़े कन्फ्यूज से थे.बाईपास सड़क पर हम जैसे ही पहुंचे, नीलमणि ने मुझे निर्देश दिया.. “अभिषेक भाई, अपना स्पीडोमीटर देखते रहिये, जैसे ही चार किलोमीटर की दुरी पूरी हो आप गाड़ी रोक दीजियेगा” और साथ ही उन्होंने कहा की देखते रहिये कहीं ‘गदई सराय’ का बोर्ड मिले तो..वहीँ मेरी नानी का घर है.अब नीलमणि के कहे अनुसार मैंने गाडी ठीक चार किलोमीटर दूर जाकर खड़ी कर दी.लेकिन अँधेरे में कुछ भी पता नहीं चल रहा था.सौरभ बाबु और नीलमणि बाबु गाडी से उतरे और कुछ पूछताछ करने लगे.छोटे इलाकों की खास बात यही रहती है की वहां सब एक दुसरे को लगभग पहचानते हैं.कुछ लोगों ने एक घर की तरफ इशारा किया की शायद वही घर हो.उस घर के तरफ हम जैसे ही बढे वैसे ही नीलमणि को याद आया, की हाँ यही घर है.घर में अँधेरा था, शायद लाईट चली गयी थी. सौरभ बाबु और नीलमणि दोनों घर में घुस गए.गाडी में बैठे हुए हम लोग सोच रहे थे की अगर गलती से ये दोनों गलत घर में घुस गए होंगे तो पता नहीं दोनों का क्या हाल होगा.लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.वो नीलमणि का नानीघर ही था, और कुछ देर में नीलमणि के मामा भी बाहर निकल के आये.हमने तब नीलमणि से विदा लिया और वापस पटना की तरफ मुड़ गए.वापसी में भी नेता बाबु के बातों का मीटर फुल स्पीड में चल रहा था.करीब रात के साढ़े बारह बजे हम घर पहुंचे.हम जितने भी मित्र गाडी से गए थे अकरम के रिसेप्सन में,हम सबने बड़ा ही अच्छा वक़्त साथ बिताया.कुछ और मित्र जिनके आने का कार्यक्रम टल गया था अगर वो भी आ पाते तो एक अलग ही माहौल बनता…लेकिन फिर भी हम सब ने अकरम की शादी में खुल के मजे किये.

दोस्त : समित , सौरभ, नीलमणि, विशाल 

इस दुआ के साथ की अकरम-आलिया हमेशा खुश रहें, मुस्कुराते रहे.

अकरम और आलिया नैनीताल में

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  1. मजा आ गया पढ़ कर, लेकिन आपके बताये अनुसार दो चीजें तो साफ हैं. पहला ये कि ये विशाल बड़ा पेटू आदमी है दोस्त की शादी से ज्यादा इसका ध्यान खाने पर रहता है 🙂
    और दूसरा की आपकी याद्दाश्त काफी अच्छी है. "गदाई सराय" जैसा शब्द ध्यान रखना आसन काम नहीं है. वाह! लेकिन जो भी हो पोस्ट काफी अच्छी थी 🙂

    http://vkashyaps.blogspot.in/

    • ये तो पढ़ने वाले के मन पर है साहब, क्या समझ कर पढ़े.कुछ लोग यूँ भी समझ सकते हैं की अभिषेक का दोस्त विशाल को 'अच्छे पकवान' खाने का शौक है. 🙂

    • अभिषेक बाबु,
      मरदे गजबे कर दिए जी!
      अब एतना सम्मान दीजिएगा त हम गलियाएंगे कईसे?
      वैसे सबसे ज्यादा तो लगता है कि अभिषेक के दोस्त विशाल को उसका दिमाग खाने का शौक होगा 🙂

  2. बेटा अभि,
    हम भी बहुत दिन से इंतज़ार में थे कि अभी तक अकरम मियाँ के निकाह का पोस्ट नहीं आया… फिर लगा कुछ जोरदार तैयारी चल रहा होगा.. निकाह, वलीमा सब निपटा कर बुझाता है इत्मिनान हो गए थे.. लेकिन मन खुश हो गया पढकर.. परमात्मा दुनों को सदा सुखी रखे! आमीन!!

  3. अभि, हमेशा की तरह बहुत अच्छी पोस्ट…| कब से इंतज़ार था इस पोस्ट का…| और ये कैसे कह रहे तुम कि पोस्ट लम्बी है…| भाई, पता ही नहीं चला कि कब पोस्ट ख़त्म भी हो गयी और हम आगे पढने के लिए स्क्रॉल करते रह गए…|
    अकरम और आलिया को एक बार फिर बधाई…|

  4. दोस्त इस पोस्ट की जो पहली पंक्तियाँ है वो तो दिल को छु लिया और बहुत सारी पुरानी यादें जैसे बिलकुल आँखों के सामने आ गई.
    और इस पोस्ट के लिए बहुत बहुत शुक्रिया इसलिए की देखो और कितनी दुआएं मिल रही है मुझे. और तुम सभी दोस्तों का बहुत बहुत शुक्रिया जो मेरे ख़ुशी में शामिल हुए!

    और पोस्ट लम्बी कैसे हुई यार इतने कम शब्दों में तुमने जो इतनी साड़ी बाते कह डाली.

  5. अकरम भाई शादी मुबारक…
    शादी में खा-पी के आपकी तबीयत खराब होगी …हम तो पहले से जानते थे खैर परेसान भैया के कमेंटस का इंतेजार है..

  6. पूरी शाम सौरभ बाबु की बातों का मीटर तीन सौ चालीस किलोमीटर की रफ़्तार से चल रहा था लेकिन फिर भी उन्हें पछतावा रहा की ज्यादा बातें करने का वक़्त नहीं मिल पाया… 🙂

  7. अभी भाई, बहुत दिनों बाद ब्लॉग कि दुनिया में वापस आया और आपकी ब्लॉग पढ़ी. फिर वही बात याद आ गयी कि कैसे एक व्यक्तिगत अनुभव को प्रस्तुत करें कि एक अनजान भी उस से जुड सके. आपको ये कला बखूबी आती है. पढकर अच्छा लगा.

  8. अकरम की शादी का विवरण इतने विस्तार से पढने मिला कि जैसे शादी की फिल्म ही देखने मिल गई । अभिषेक आपकी खूबी है कि लिखते समय छोटी-छोटी चीजों को भी नही भूलते ।

  9. बहुत सी बातें कहनी हैं.
    १. अकरम को बहुत बहुत बधाईयाँ.
    २. जिंदगी में जितने भी अच्छे इंसानों से मिला हूँ, उनमें से एक तुम और एक अकरम है.
    ३. अब पता चला की तुम्हारे फोन ना उठाने का एक और कारण तुम्हारी तबियत का नासाज़ होना भी था.
    ४. एक रात में उतनी उल्टियाँ? ये खाने की वजह से तो नहीं हो सकता है. और साथ में बदहजमी भी?? भाई कितनी बार कहें हैं की जितना पीना हो पियो, मगर नीट तो मत मारा करो. उल्टी और बदहजमी कि वजह यही रही होगी. मानते हैं कि दोस्त की शादी थी. फिर भी.
    ५. खुरमा मौर्यालोक के "मनेर स्वीट्स" में भी मिलती है, और वे भी बढ़िया बनाते हैं. सो जब पटना से बैंगलोर आना हो तो एक किलो लेते आना मेरे लिए.
    ६. "गदाई सराय" कैसे याद रह गया रे? कहीं "गधा" शब्द से तो रिलेट नहीं कर रहे थे?
    ७…..अरे बहुत सारी बातें हैं.. नंबर बढ़ते ही जायेंगे.. सो अब बंद. 🙂

    और हाँ फिर से, दारू इतना मत पीयो की उल्टी आ जाये. चाहे दोस्त की ही शादी क्यों ना हो.. 😛

  10. वाह , वैसे तो हम नहीं जानते एक दूसरे को , लेकिन आपने मुझे आरा में बीते बचपन में पहुंचा दिया| साधुवाद !

  11. यार का निकाह हो और उम्दा प्रसारण न हो ..नामुमकिन..बेहद ख़ास है ये..अच्छा लगा

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