फेरारी की सवारी : ताजगी से भरी हुई एक फिल्म

मैं तो ये मानता हूँ की फ़िल्में बिना किसी पूर्वाग्रह के देखनी चाहिए.कुछ लोगों की ये आदत होती है की वो पहले ही असम्प्शन कर लेते हैं की फिल्म इस विषय पर बनी होगी और इस तरह की होगी, इसलिए वे देखने भी नहीं जाते..जबकि इसकी भी संभावनाएं हैं की फिल्म उनके सोच से एकदम विपरीत हो.मैं कोशिश करता हूँ की किसी भी फिल्म को बिना किसी पूर्वाग्रह के देखूं.लेकिन कभी कभी चूक मुझसे हो जाती है.जैसे इस फिल्म में हुई..”फेरारी की सवारी”.पता नहीं क्यों मैंने अपनी एक राय बना ली थी फिल्म देखने से पहले..की फिल्म क्रिकेट से जुड़ी हुई होगी इसलिए इसे बाद में भी देख सकता हूँ..लेकिन ये भ्रम तब टुटा जब कल एक मित्र ने बातों बातों में इस फिल्म की बहुत तारीफ़ की, और उसे बेहद आश्चर्य हुआ की मैंने ये फिल्म अब तक नहीं देखी है.उसने बड़ा जोर दिया तो आज शाम मैं फिल्म देखने गया, और फिल्म के पहले सीन से ही जो चेहरे पे मुस्कराहट आई तो फिल्म खत्म होने तक चेहरे पर कायम रही.मुझे फिल्म, इसकी कहानी,अभिनय,निर्देशन  इतनी ज्यादा पसंद आई की मैंने सिनेमा हॉल में ही मन बना लिया था की वापस जाते ही इस फिल्म के बारे में जरूर लिखूंगा.राउडी राठोड़, शंघाई और गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी बड़ी फिल्मों के बीच आई ये एक फिल्म बिलकुल फ्रेश है, कहानी एकदम नयी है और सबसे बड़ी बात की कहानी की ट्रीटमेंट बेहद अच्छे तरीके से की गयी है.एक ताज़े हवा का झोंका सा लगी ये फिल्म मुझे.एक छोटे से मिडिल क्लास परिवार के सपनों की कहानी है,अपने सपनों पर विश्वास दिलाने की कहानी है…रिश्तों की कहानी है यह फिल्म.

कहानी फिल्म की बहुत ही सिम्पल सी है और फिल्म की सबसे अच्छी बात ये है की पूरी फिल्म में कहानी सिम्पल ही रहती है बिना कोई खास ट्विस्ट एंड टर्न के.अगर एक लाईन में कही जाय तो ये फिल्म पिता और उसके बेटे के बीच के सम्बन्ध की है.तीन पीढ़ी और उनके बीच के संबंधों की कहानी है ये फिल्म..मोटा पापा(बोमन ईरानी) घर से सबसे बुजुर्ग इंसान हैं और रुसी(शरमन जोशी) के पिता हैं.रुसी एक बहुत ही साधारण सी नौकरी(आर.टी.ओ में हेड क्लर्क)करता है और चाहता है की अपने बेटे केयो(ऋत्विक सहारे) को हर हाल में खुश रखे..उसके सपनों को पूरा कर सके..केयो एक बेहद ही प्रतिभाशाली क्रिकेटर है और वो भारतीय क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाना चाहता है, वह सचिन तेंदुलकर को अपना आदर्श मानता है.देबू(मोटा पापा) एक पूर्व रणजी खिलाड़ी रह चुके हैं और क्रिकेट के राजनीति और छल-कपट के शिकार हो जाने की वजह से उनका क्रिकेट का कैरिअर बर्बाद हो जाता है.उनका ये मानना है की क्रिकेट में जो इग्यारह खिलाड़ी खेलते हैं, बस उन्ही का कैरियर बना रहता है बाकी सब बर्बाद हो जाते हैं.वो इसलिए केयो के क्रिकेट के प्रति लगाव के विरुद्ध रहते हैं, लेकिन रुसी केयो के सपने को हर हाल में पूरा करना चाहता है.केयो का चुनाव लोर्ड्स के एक क्रिकेट ट्रेनिंग कैम्प में होता है और वहाँ जाने के लिए उसे डेढ़ लाख रुपये की जरूरत होती है.एक बहुत ही मामूली पद पर कार्यरत रुसी को बैंक भी लोन देने से इंकार कर देती है, और पैसों के इंतजाम के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं..उसके पास कोई ऑप्सन नहीं बचता सिवाय एक के…और वो अपने बेटे के सपने की खातिर वो रास्ता भी इख्तियार कर लेता है जिसपर चलना उसके ज़मीर के खिलाफ है.पैसों के इंतजाम के लिए रुसी को चंद घंटे के लिए सचिन की फेरारी कार किसी को दिलवानी होती है, जिसकी उसे डेढ़ लाख कीमत मिलेगी, वो अपने पिता के पुराने क्रिकेटजगत के नाम और संपर्क के बल पर सचिन के घर जाता है फेरारी मांगने के लेकिन सिच्युएसन में फंस कर वो सचिन की फेरारी वहाँ से चोरी कर भाग जाता है.उसे रुपये भी मिल जाते हैं लेकिन समस्या आती है फेरारी को वापस सचिन के घर पहुँचाने में..पूरी फिल्म फेरारी को वापस करने के इर्द गिर्द और तीन पीढ़ियों के रिश्तों के बीच घुमती रहती है.फिल्म में सचिन की फेरारी चोरी होती है तो सचिन भी पुरे फिल्म में ना होकर भी मौजूद रहते हैं.सचिन की फेरारी का भी इस्तेमाल बस कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है, फेरारी को वापस सचिन के घर पहुँचाने में जो घटनाएँ घटती हैं, बाप-बेटा और दादा के बीच कैसे रिश्ते सुलझते हैं और दूसरी कहानी किस तरह इस फेरारी के चक्कर में आकार मुख्य कहानी से जुड़ जाती हैं, यह फिल्म वही दिखाती है.
फिल्म में पिता और पुत्र के रिश्ते को बहुत ही मार्मिक तरीके से दिखाया गया है..जहाँ एक तरफ केयो हमेशा अपने दादा(मोटा पापा) से नाराज़ रहता है, वहीँ जब रुसी केयो को ये बताता है की उसके दादा के साथ कैसे छल-कपट किया गया और वो अपने समय के कितने अच्छे खिलाड़ी थी, तब से केयो अपने दादा की बहुत इज्ज़त करने लगता है.वहीँ केयो के क्रिकेट के प्रति दीवानगी से मोटा पापा हमेशा नाराज़ रहते हैं लेकिन एक रात जब रुसी के जिद के आगे झुक कर मोटा पापा केयो के बैटिंग की टेस्टिंग करने के लिए उसे गेंद डालता है तो केयो हर गेंद को बहुत ही कुशलता के साथ खेलता है, मोटा पापा की आखिरी गेंद पर केयो एक शानदार छक्का लगाता है..केयो के इस प्रदर्शन से हैरान मोटा पापा की नाराजगी गायब हो जाती है और केयो का शानदार खेल देख उसका यकीन इतना पक्का हो जाता है की अंत में वो कहता है “जैसा वो खेलता है न, खेलने दो..सेलेक्टर की फाड़ देगा”.
फिल्म के कुछ सीन थोड़े से इम्प्रैक्टिकल लगते हैं जैसे फिल्म का पहला सीन जहाँ रुसी एक ट्रैफिक सिग्नल को तोड़ते हुए आगे निकल जाता है और जब उसे ख्याल आता है की उसने ऐसा किया तो वो अगले ट्रैफिक सिग्नल पर नियुक्त ट्रैफिक इन्स्पेक्टर के पास जाता है और उसे रिक्वेस्ट करता है की वो उसका चालान काटे.ऐसा आम जिंदगी में कितने लोग करते हैं ये तो पता नहीं, लेकिन इस सीन ने चेहरे पर एक मुस्कराहट जरूर चिपका दी.रुसी एक बेहद ईमानदार व्यक्ति है और शायद फिल्म में इस सीन को दिखाने की एक मुख्य वजह यही रही होगी.. ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक का उदाहरण देने के लिए.ये सीन कुछ लोगों को जरूर अखरेगी, लेकिन कम से कम जो बच्चे इस फिल्म को देखेंगे, उनपर थोड़ा तो असर करेगी ही.जहाँ रुसी एक बेहद ईमानदार व्यक्ति है वहीँ उसका बेटा केयो भी एक बेहद सच्चा बच्चा है.वो अपने पिता की मज़बूरी भी समझता है इसलिए दुकान में 2600 रुपये के बैट को कीमत देख कर वापस रख देता है..फिल्म लगभग हर सीन में कुछ अच्छा सा सन्देश देती है, ये हो सकता है की बहुत से लोग को वे सन्देश आज के ज़माने में इम्प्रैक्टिकल से लगे लेकिन आज के दौर में जहाँ यथार्थवादी और मसाला फ़िल्में बन रही हैं, वहीँ कुछ सीख देती हुई फिल्म अगर बनती है तो यह एक सुखद बदलाव है और लोगों को निश्चित रूप से ये फ़िल्में देखनी चाहिए.
कुछ बातें फिल्म की बड़ी अच्छी लगीं, जैसे की शरमन जोशी भले ही एक बहुत ही साधारण से पद पर कार्यरत है, लेकिन उसे हर तरह की कारें और उनकी खासियत के बारे में अच्छे से मालुम है.मोटा पापा भले ही दिन भर मूंगफली खा कर अपने कुर्सी पर चिपके रहते हैं और टी.वी देखते रहते हैं और भले ही वो हर किसी को खूब भला बुरा कहते हों लेकिन शरमन जोशी कभी उनसे रूखे अंदाज़ में बात नहीं करता और जब केयो रूखे अंदाज़ में अपने दादा से बात करता है तो रुसी उसे डांटता भी है और माफ़ी मांगने के लिए भी कहता है.मोटा पापा और केयो के बीच रात में घर के बाहर हुए छोटा सा एक मैच को देखने के लिए भी पुरे मोहल्ले के लोग अपनी खिड़कियों पर आ जाते हैं…इन दोनों के बीच रात का ये मैच बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है.देबू जब अपने मित्र दिलीप धर्माधिकारी(परेश रावल) जो की अब क्रिकेट संस्था का चेअरमैन है और जिसने कभी देबू को धोका दिया था..के पास जाता है अपने पोते के ट्रेनिंग फीस को माफ करवाने तो वो उसे पुरे तरफ से इग्नोर कर देता है..देबू उदास हो जता है लेकिन दिलीप धर्माधिकारी के दफ्तर का ही एक मामूली चपरासी जब देबू से ऑटोग्राफ मांगता है तो देबू हैरान रह जाता है.वो चपरासी देबू को कहता है “सर मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूँ..डेड पिच पर आठ विकट निकालना कोई मामूली बात नहीं है”, तब देबू बड़ा ही भावुक हो जता है.
फिल्म के डायलोग भी बड़े सहज से हैं..फिल्म के डायलोग राजकुमार हिरानी ने लिखे हैं और बहुत ही सीधे सादे आम बातचीत की भाषा वाले संवाद है.निर्देशक राजेश मापुस्कर की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है, लेकिन उन्होंने बहुत ही अच्छा निर्देशन दिया है.फिल्म अपनी सरल सी कहानी को कहीं भी नहीं छोड़ती है, कुछ लोग ये शिकायत जरूर करते हैं की दूसरे भाग में कहानी थोड़ी स्लो हो गयी है, लेकिन मुझे दूसरे हाफ से भी किसी तरह की शिकायत नहीं है..अभिनय में बोमन ईरानी ने मोटा पापा के किरदार को बखूबी जिया है तो वहीँ शरमन जोशी रुसी के किरदार में एकदम सहज से लगते हैं, हाँ कुछ लोगों को रुसी का ये किरदार जरूरत से ज्यादा ईमानदार और सीधा लगे, वो अलग बात है..ऋत्विक सहारे जिन्होंने केयो का किरदार निभाया है उन्होंने शानदार अभिनय किया है.परेश रावल अपने छोटे से रोल में बहुत ही फिट नज़र आए.फिल्म का संगीत भी मुझे अच्छा लगा.
इस फिल्म को रिलीज हुए काफी वक्त हो गया है और अब अधिकतर सिनेमा घरों से ये फिल्म उतर भी गयी होगी लेकिन फिर भी इसके बारे में मैं लिखने के लिए इस लिए भी मजबूर हो गया क्यूंकि मैंने देखा की इस फिल्म पर लोग किसी भी मंच पर कहीं कोई चर्चा ही नहीं कर रहे..अगर किसी ने चर्चा की भी हो तो वो “गैंग्स ऑफ वासेपुर” और “शंघाई” जैसी फिल्मों के बीच दब कर रह गयी होगी.मैं ये नहीं कहता की “गैंग्स ऑफ वासेपुर” और “शंघाई” बुरी फ़िल्में हैं..दोनों ही बेहतरीन फ़िल्में हैं, लेकिन उस तरह के रीअलिस्टिक और क्रांतिकारी फिल्मों के बीच आई एक छोटी सी पारिवारिक और अच्छी फिल्म हमें जरूर देखनी चाहिए..इस तरह से ठुकरा नहीं देनी चाहिए फिल्म को.इस फिल्म में जिस तरह के मध्यमवर्गीय परिवार को दिखाया गया है उससे मैं या आप बड़े ही आसानी से रिलेट कर सकते हैं…किस तरह से खर्चे बचा कर और एक एक पैसे जोड़ कर कुछ खरीदा जाता है, यह एक मध्यमवर्गीय परिवार से बेहतर और कौन जानेगा?ये फिल्म हमारे बीच की ही कहानी है और शायद इस वजह से ये आपको बेहद अपनी सी फिल्म भी लगे.

चलते चलते फिल्म का एक संवाद आपके साथ बांटता चलूँ, जब केयो को ये अहसास होता है की उसके पिता ने क्या क्या किया है उसके ट्रेनिंग के पैसों को इकठ्ठा करने के लिए तब वो अपने पिता से कहता है :
“मैं लॉर्ड्स नहीं गया तो क्या क्रिकेट नहीं सीखूंगा?मेरे पास वर्ल्ड के बेस्ट कोच हैं ना..और वैसे भी सचिन पाजी थोड़े न लॉर्ड्स गए थे..वो भी तो क्रिकेट शिवाजी पार्क में ही सीखे थे न?”
अगर आप अच्छी फ़िल्में देखना पसंद करते हैं, चाहते हैं की वैसी कोई फिल्म देखें जो आप अपने बच्चों के साथ एन्जॉय करते हुए देख सकें और जिससे आपके बच्चों को भी थोड़ी सीख मिले…तब आप इस फिल्म को जरूर देखिये..आप निराश बिलकुल नहीं होंगे.

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  1. ये अच्छी बात नहीं है, कोई नयी फिल्म आने दीजिये फिर मै स्टोरी बताउंगी…अब क्या देखें ? सब कुछ तो बता दिया…
    कुछ दिन रुक नहीं सकते थे.? वैसे फिल्म की सारी सुन्दरता आपके लेख में दिखाई दे रही है… GOOD ONE !!! :))

  2. अरे भैया मैने भी कहा तो था…
    क्रिकेट बस इसमें एक ऐसे सब्जेक्ट के तौर पर है जिसके जरिये फिल्म के किरदार आपस में बातें करतें हैं…

    • याद है भाई..आपने लिखा था अपने फेसबुक वाल पर..और मैंने भी उसमे कमेन्ट में कहा था की मैं फिल्म देखने जाऊँगा..लेकिन फिर जा नहीं सका..और इसके बदले दो बार गैंग्स ऑफ वासेपुर देखने चला गया था..!!

  3. लो !! थियेटर में जा कर देखने के लिए कुछ छोड़ा ही नहीं सब कुछ तो बता दिया यहाँ अपने ब्लॉग पर ही 🙂

    • 😉 🙂 अरे अंशुमाला जी, बहुत कुछ तो और भी है जो मैंने बताया नहीं..दिल तो किया की वो सब भी बता दूँ 🙂 🙂

  4. इस सबके अलावा भी बहुत कुछ है ?? पर मैंने तो अभी तो कहानी वाला पार्ट इसका पढ़ा ही नहीं ;)..फिल्म देखकर ही पढूंगी.

  5. बहुत अच्छी समीक्षा मगर अपने तो कहानी के सारे राज़ खोल दिये 🙂 well अब शायद और भी मज़ा आए यह फिल्म देखने में ज़रूर देखेंगे। 🙂

  6. मन से लिखी समीक्षा है -सोचता हूँ देख आऊँ
    चरित्र चित्रण के लिए कुछ इमप्रैक्तिकल बातों का समावेश करना ही पड़ता है ताकि
    दर्शक उस किरदार से उस संदर्भ में परिचित होलें !

  7. इस फिल्म को सी.डी. पे थोड़ी देर देख कर छोड़ दिया था..वहाँ से… जब देखा शरमन जोशी ने कितनी आसानी से सचिन के घर से फेरारी की चाबी ले ली..तो मैने फिल्म देखनी बंद कर दी..:)
    पर अब तुमारी समीक्षा पढ़कर फिर से देखूंगी..शायद कल ही..तुम्हे पसंद आई तो मुझे भी जरूर आएगी..:)..

    • हाँ दीदी वही मैंने कहा भी..की कुछ सीन थोड़े इम्प्रैक्टिकल से बन गए हैं…जैसे इतनी आसानी से उसका सचिन के घर से फेरारी लेकर निकल जाना…लेकिन इन सब सीन को बिना दिमाग इस्तेमाल कर के देखिये…जिस तरह एक्सन और मसाला फिल्मों को देखा जाता है 🙂 ये तो फिर भी रिश्तों के ऊपर बनी फ़िल्म है…

  8. हमने बेटे के साथ फ़िल्म देखी, बहुत मजा आया, खासकर वाकई वो सिग्नल तोड़ कर चालान कटवाने का सीन तो बहुत ही अच्छा लगा ।

  9. क्या रे…पहले क्यों नहीं बताया…??? अब तो बहुत मन हो गया इसे देखने का…| कहानी भले ही पता चल गयी, पर ट्रीटमेंट देखना है…| वैसे भी कुछ अलग टाइप की फिल्मे पसंद आती हैं…खास तौर से जो परिवार के साथ बैठ कर देख सके…|
    बढ़िया तरीका है समीक्षा का…एकदम अलग…मस्त टाइप…अपनेपन से भरा…|

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