डबल सेंचुरी का बुखार – ३ –

पहली और दूसरी पोस्ट से जारी,

२०१० के अप्रैल-मई की बात है, कहीं किसी ब्लॉग पर एक कमेन्ट देखा, एकदम पटनिया भाषा का रंग लिए हुए..जाहिर है उत्सुकता तो होगी ही, अपने मिट्टी की भाषा में इतना सुन्दर कमेन्ट करने वाले आखिर ये हैं कौन?प्रोफाइल देखा तो नाम पता नहीं चला, नाम की जगह लिखा था “चला बिहारी ब्लॉगर बनने” लेकिन शहर पता चल गया, पटना.जब उनका ब्लॉग पढ़ा तो पहली ही पोस्ट ने दिल जीत लिया.वह भाषा जिसे सुनते और बोलते हुए हम बड़े हुए हैं, उसी भाषा में इतनी खूबसूरत बातें ब्लॉग पर पढ़ दिल खुश हो गया.मैं पुरे उत्साह में उनकी सभी पोस्ट पर एक-दो टिप्पणी चिपका आया और उनकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगा.शायद मैंने टिप्पणियों में ही उन्हें ये बताया था की आपकी ही तरह मैं भी पटना से हूँ.
कुछ ही देर में उनकी टिप्पणी मेरे ब्लॉग पर आई.उन दिनों मुझे बेकार की कवितायें पोस्ट करने का भुत सवार था.जहाँ एक तरफ सभी कविता की तारीफ़ कर रहे थे, वहीँ उन्होंने मुझे टोकते हुए कहा की “कविता में बहुत गलतियाँ हैं, पोस्ट करने से पहले कविता एक बार फिर से पढ़ लिया करो और मात्रा का ख्याल रखो”.अब अगर कोई अनजान व्यक्ति अगर इस अपनेपन के साथ टिप्पणी करता है और आपको आपकी गलतियाँ बताता है तो जाहिर है उसके लिए आपके दिल में थोड़ी तो जगह बन ही जायेगी.वैसा ही हुआ मेरे साथ.वे लगातर मेरी कविताओं में गलतियाँ निकाल कर मुझे बताते रहे और जब कभी कुछ अच्छा लिख जाता तो दिल से खूब तारीफ़ भी करते, और उनकी तारीफ़ सुन मुझे बहुत अच्छा लगता.वे कोई और नहीं, बल्कि सलिल चचा हैं, जिन्हें आप सब सलिल वर्मा के नाम से जानते हैं और अगर सच कहूँ तो उनकी टिप्पणियों ने मुझे बेहतर लिखने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया है.उनकी जो पहली टिप्पणी थी, जिसका मैंने अभी जिक्र किया, वो मेरे दूसरे ब्लॉग “एहसास प्यार का” पर थी, लेकिन फिर भी मैं वो टिप्पणी यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.
बहुत अच्छा लिखे हैं … लेकिन दू बात का ध्यान रखिए ..बड़ा हैं इसलिए सलाह दे रहे हैं… पहिला पोस्ट करने से पहिले पढ कर दोहरा लीजिए..इससे गलती पता चल जाता है जो पढते टाईम नहीं अखरता है… अऊर मात्रा का खयाल रखिए.. कऊन कहता है कि आप कवि नहीं हैं… एतना सुंदर भाव लिखे हैं कि बताना मोस्किल है..
सलिल चचा का पहला कमेन्ट मेरे इस पोस्ट पर आया था.इनकी टिप्पणियाँ मुझे हमेशा लाजवाब कर जाती हैं.समझ में ही नहीं आता की जवाब क्या दूँ.कभी कभी जब ये खूब तारीफ़ कर देते हैं, तब मुझे अपनी ही लिखी पोस्ट को दुबारा पढ़ना पड़ता है, ये समझने के लिए की क्या मैंने सही में इतना अच्छा लिख दिया है..या चचा प्रेमवश मेरी इतनी तारीफ़ कर रहे हैं.शिखा दी की किताब पर मैंने जो पोस्ट लिखी थी, उसपर उन्होंने टिप्पणी में लिखा था :
कल मिली ये किताब और और मेट्रो के पौने दो घंटे के सफर में समाप्त!! लिखता हूँ इसके बारे में.. मगर तुम्हारे लेखन की बात ही कुछ और है.. इसका मुकाबला करना मेरे बस में नहीं!!
इस टिप्पणी ने सच में मुझे हैरान कर दिया.मुझे लगा की उनसे तो मैं सीखते रहता हूँ और दिल ही दिल सोचता हूँ काश मैं भी कभी उतनी ही आत्मीयता से लिख पाऊं जैसे सलिल चचा लिखते हैं.चचा जी की इस तरह की टिप्पणियाँ मिलती हैं तो लगता है जैसे लिखना सफल हुआ.राजेश जी की किताब पर मैंने जो पोस्ट लिखी थी, वहाँ भी इन्होने कुछ ऐसी टिप्पणी ही की थी.मैंने जब एक दफे हैदराबाद की अपनी यादें पोस्ट में समेटी तो उसपर प्रवीण जी ने टिप्पणी में कहा : “आप ट्रैवेल गाइड भी लिखिये, सच में बहुत चलेगी।”..प्रवीण जी की बात को ही आगे बढाते हुए सलिल चचा ने टिप्पणी में जो कहा उससे मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी – 
अभिषेक से राजू गाइड!! कमाल कर दिया!!
सलिल चचा और मैं, दोनों ही गुलज़ार साहब के चाहने वाले हैं.ये बात मुझे इस पोस्ट पर आई उनकी टिप्पणी से मालुम चली, और इस पोस्ट से जाहिर हुआ की हमारी ही तरह ये भी गुल्ज़ारियत धर्म के मानने वालों में से हैं.सलिल चचा की वैसे तो सभी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल हैं, और उनपर बात करने बैठूं तो पोस्ट काफी बड़ी हो जायेगी जिसे झेलना आपके लिए थोड़ा मुश्किल हो जाएगा, तो ऐसे में उनकी कुछ टिप्पणियाँ जो मेरे दिल करीब हैं, और जो मेरे ईमेल में रह गयीं हैं, वो यहाँ दे रहा हूँ :

पोस्ट : गॉन इन सिक्सटी सेकण्ड
एक बार अपने हाथों से एक फेरारी खरीदने के लिए पैसे भेजे थे मैंने अपने किसी क्लाएंट के लिए… सोचता हूँ (और शायद सोच ही सकता हूँ) कि अगर ऊपरवाले ने उस लायक बनाया तो तुम्हें फेरारी ज़रुर गिफ्ट करूँगा!!
पोस्ट तो हमेशा की तरह “दिल से!!!”

पोस्ट : जानिये फोर्मुला वन रेस को
बहुत ही रोचक जानकारी!! मुझे तो इस विषय में हर बात नयी लगी!! मगर मुझे तुम्हारी रफ़्तार के प्रति आसक्ति का पता है, इसलिए इस विषय पर तुमसे बेहतर कौन लिख सकता है!!
हम न बदलेंगे वक्त की रफ़्तार के साथ, हम जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा !

अरे अभिसेक बेटा! ई जो चचा हैं न तुमरे जेतना पईसा नहीं कमाए हैं जिन्नगी में ओतना रिस्ता कमाए हैं. हमरा तो मानना है कि कंधा कम नहीं पड़ना चाहिए!! जोक्स अपार्ट! हमरी तीन माँ के बारे में त जानबे करते हो, अब सुनो परिबार के बारे में… एगो बंगाली माँ, एगो बंगाली भाई अऊर बहिन, एगो मद्रासी बहिन, एक जोड़ा पाकिस्तानी भाई भौजाई, दो मुसलमान भाई अऊर बहुत सा तुमलोग जईसा बाल बच्चा… भगवान के साथ तो अपना कभी रिस्ता बनबे नहीं किया.. अब एतना सारा लोग मिलकर दुआ करेगा तो कम से कम हमरा जिन्नगी में भी सांति रहेगा… एगो अऊर बात नोट करो. तुम त फॉरेक्स का आदमी हो, त ई सबक नोट कर लो.. हमेसा दिल का सुनो. दिल तो पागल है, मगर हर सच बोलने वाला को दुनिया पागल कहता है!! जियो बेटा! जुग जुग जियो!

अब इस टिप्पणियों वाली इस कड़ी को समाप्त करने से पहले कुछ और टिप्पणियाँ जो मेरे दिल के करीब हैं, और जिनमे से कुछ एक कहानी सी कहती हैं –

प्रशांत की टिप्पणी, पोस्ट : तुम सब काश होते मेरे साथ 
ऐसा संभव नहीं है.. लोग इसे प्रैक्टिकल होना कहते हैं.. “इमोशनल बातों के लिए इस दुनिया में कोई जगह नहीं है” ऐसा लोगों से अक्सर सुनना पड़ता है.. मगर क्या करें, अक्सर यह गुनाह हमसे भी हो जाया करता है.. कई दोस्तों से धोखा भी खूब खाया मगर दोस्तों के दोस्ती के पीछे अब भी कुर्बान होता हूँ.. कभी कभी लगता है कि कि जान कर धोखा खाने कि भी आदत बन गई है.. मगर कई दोस्त ऐसे भी हैं जो आँख मूंदकर मेरे लिए कुवें में भी कूद जाए.. तभी तो दोस्ती पर भरोसा बाकी है अभी.. शायद यही दुनिया है.. 🙂
कुश  की टिप्पणी, पोस्ट : दिल्ली विजिट 
मेरा बस चले तो तुमको दोस्त ऑफ़ द यर का अवार्ड दिला दु..
पंकज की टिप्पणी(पोस्ट पर नहीं फेसबुक पर), पोस्ट : अकबर-बीरबल 

यह वक्त भी गुजर जाएगा अभिषेक… टेक केयर.. 
(उस दिन मेरा मन बड़ा उदास था, और पंकज की ये पहली टिप्पणी मिलते ही लगा किसी दोस्त ने कंधे पर हाथ रख कर कहा हो की सब ठीक हो जाएगा)
अमिता नीरव जी की टिप्पणी, पोस्ट : द गोल्डन 80’s
तुम्हारी पोस्ट पढ़कर एक विचार आया… शायद हम संवाद-अतिरेक के दौर में हैं, जहाँ बातें तो बहुत कुछ है, लेकिन ‘कहा’ कुछ नहीं जाता है। अजनबियों से बातें होती है, लेकिन अपने कहीं छूट जाते हैं। 
कुछ तो बेफिक्री के दौर का भी मामला है… मुझे भी 80 का दशक सूट करता है, क्योंकि उस दशक में कोई बोझ, दौड़, तनाव और दबाव नहीं हुआ करते थे… बस बेफिक्री हुअ करती थी, क्योंकि उस वक्त कोई-कोई ही ‘कुछ’ हुआ करता था, इसलिए आप पर भी ‘कुछ’ हो पाने का वैसा दबाव नहीं हुआ करता था।

प्रियंका दी की टिप्पणी, पोस्ट :  वो गर्मियों के दिन
बहुत प्यारी पोस्ट है…। न जाने कितनी बातें याद दिला दी…। गर्मियाँ मुझे आज भी अपने बचपन की गर्मी की छुट्टियाँ याद दिला जाती है जब छुट्टियों से पहले इम्तहान खत्म हो जाते थे और आखिरी पेपर के होते ही मैं कई महीनों से जमा कर रखी हुई कहानी की किताबें निकाल देर रात तक जाग-जाग कर उन्हें ख़त्म किया करती थी…और दूसरे दिन सुबह दस-ग्यारह बजे तक लम्बी तान कर सोती…। दोपहर को आसपास के संगी-साथियों से कॉमिक्स की अदला-बदली होती । वो एक कॉमिक्स के अठन्नी के किराए में कई-कई कॉमिक्स पढ़ कर हम सब कितना आह्लादित होते थे, उसका मज़ा अब शायद हजारों रुपए खर्च कर के किसी चीज़ को पाकर भी नहीं आता…।
तुम्हारी सहज भाषा में लिखी गई पोस्ट पढ़ना हमेशा मेरे लिए एक सुखद अहसास होता है…।

(यहाँ प्रियंका दीदी की बात कहते हुए कहना चाहूँगा, की इनकी हमेशा सभी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग पर बहुत जेनरस रहती हैं…ये खुद इतनी अच्छी लेखिका, कवियत्री हैं, की इनके कहे शब्द मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं..इनसे पत्रों के जरिये जान पहचान बना था, और पता भी नहीं कब इन्हें मैंने दीदी कहना शुरू कर दिया..हाँ, ये सच भी है की हर पोस्ट पर इनकी टिप्पणियों का इंतजार मुझे बेसब्री से रहता है, और इनकी एक शिकायत भी रहती है मेरे से, की मैं ब्लॉग-पोस्ट की लिंक देना भूल जाता हूँ.यहाँ ये भी बता दूँ मैं की एकमात्र यही एक ऐसी ब्लॉगर हैं, जिनके नए पोस्ट की जानकारी जब ईमेल से आती है, तो मैं इरिटेट होने के बजाये बहुत खुश हो जाता हूँ…इनके पोस्ट के लिंक देखकर…इन्हें मैं अपने ब्लॉग के स्पेशल रीडर के कैटेगरी में रखता हूँ हमेशा, और पता नहीं क्यों एक ख़ास सी जगह इनके लिए मन में बनती जा रही है. )

वन्दना की टिप्पणी, पोस्ट : अकेलापन – घबराना क्यों
अकेलापन तो एक दरिया है, जिसमे सबको एक बार तो डूबना ही है.जो तैरना जानते है उनके लिए कोई समस्या नहीं है, जिन्हें नहीं आता, जो पहली बार इस में उतरे हैं , धीरे -धीरे वो भी तैरना सीख जाते है, अगर सीखना चाहे तो. कभी-कभी किसी और का सहारा मिल जाता है तो वो बिना सीखे इस अकेलेपन से उबर जाता है. कुछ बहुत कमज़ोर होते है, डर का हव्वा इस कदर रहता है, कि तैरना कभी सीख नहीं पाते.वो वक्त के किसी लहर से साथ गुम हो जाते है. कहना ये है कि डूबने का मौका कभी मिले या नहीं, तैरना पहले से सीख लीजिए. वरना पेट में जब कुछ वक्त का खारा पानी चले जाता है, तो मेरे जैसा प्राणी ब्लॉग्गिंग करने लगता है. हे हे हे joking only!
अरविन्द जी की टिप्पणी, पोस्ट : कुछ पुरानी यादों के नशे में – जाड़े का मौसम(1)
बढियां मेमायर !
मुझे भी एक स्मृति है ..जब मेरे मित्र ने उस फ़िल्म का पहला शो देखकर मुझे अरसे बाद फोन किया था ..हेलो बोलकर पूछा .पहचाना …..मैंने कहा कुछ कुछ ..उधर से आयी आवाज -हाँ कुछ कुछ होता है न ? मैं एम्बरासद …..बाद में कहकहे ….

रश्मि दी की टिप्पणी, पोस्ट : राष्ट्रगान – कितना सम्मान और कितना अपमान
राष्ट्र गान का सम्मान करने का ज़ज्बा बहुत कुछ बच्चों के पालन-पोषण पर निर्भर करता है. अगर बच्चों को शुरू से ही सिखाया जाए तो यह सम्मान भावना उनके मन में रच-बस जाती है …जैसे हमारे-तुम्हारे.
पर आजकल स्कूल में जगह की कमी के कारण..गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर स्कूल के सारे विद्यार्थियों को नहीं बुलाया जाता. उनके मन में राष्ट्र-गान से लगाव पनप ही नहीं पाता. फिर भी एक बार जब सब परिपक्व उम्र तक पहुँच जाते हैं…तो इतनी सम्मान-भावना तो होनी ही चाहिए. वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले…धोनी ने कहा कि मुझे उस पल का इंतज़ार है जब पूरा स्टेडियम एक साथ राष्ट्रगान गायेगा…सचमुच बहुत अच्छा लगा था,यह सुन.

मुंबई में सिंगल थियेटर हो या मल्टीप्लेक्स…फिल्म शुरू होने से पहले,राष्ट्रगान बजता है..और सारे लोग (बच्चे -किशोर-युवा-वृद्ध) उसके सम्मान में मौन खड़े रहते हैं…अच्छा लगता है ये देख.


प्रशांत की टिप्पणी, पोस्ट : बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता!!
हर पल, हर लम्हा, ऐसा लगता रहा कि वह पलट कर वापस आएगी.. आते ही कहेगी की मैं तो मजाक कर रही थी.. एक-एक दिन करते हुए महीनों गुजर गए, फिर साल-दर-साल भी गुजरते चले गए.. वो भी तो कुछ ऐसे ही गई थी, बिना बताये, बिना कुछ कहे.. जैसे चोरी हो गई हो.. दिल कहे की वो कभी भी वापस आ जायेगी.. अगली सुबह उठूँगा और लगेगा की कुछ हुआ ही ना था.. किसी सपने जैसा.. वो भी गुडमॉर्निंग उसी मानिंद कहेगी जैसे हर सुबह कहती थी.. जब कभी दिल बहकने लगे, दिमाग उसे ठिकाने लगा दे, यह याद दिला दे की वो जा चुकी है.. बिना कुछ कहे, बिना खुद सफाई दिए, बिना कोई सफाई दिए, बिना किसी सुनवाई के सजा सुना कर………..
गिरिजा जी की टिप्पणी, पोस्ट : जाको राखे साईयां मार सके ना कोई
मैं तो यह देख कर अभिभूत हूँ कि आज जबकि टीवी चैनल व दूसरे कई संचार माध्यम नई पीढी को एक अलग दिशा में ले जारहे हैं आप जैसे नौजवान देश व देश के जांबाज प्रहरियों के लिये गर्व और सम्मान रखते हैँ । यहाँ आपने जो कुछ लिखा है उसे पढ कर फिर सुन कर कौन रोमांचित न होगा । यहाँ मैं कहना चाहूँगी कि बुराई फैलाने से बुराई मिटती नही, बढती है उसी तरह अच्छी बातों का प्रचार-प्रसार आस्था व विश्वास को बढाता है । उम्मीदें जगाता है । आप इसी दिसा में कुछ कर रहे हैं ।
अतिप्रिया की टिप्पणी, पोस्ट : दिल्ली विजिट
I don’t have words to say. But what i love about this post is that we have become a family and i don’t think time can erase the memories we all have. and abhi bhaiya i still remember what you said that day. i m glad you are here for us. :)…. 
मेरे दोस्त प्रभात की मेरे ब्लॉग पर एकमात्र टिप्पणी, पोस्ट : दो दोस्त और एक फिल्म
zindagi ke kuch panne palat kar wapas aa gaye par ye sach hai ki film film hoti hai aur zindagi zindagi kyunki hum dono me se kisi ko kuch nahi mila par ……… kuch baatein unkahi hi achchi hoti hai thanks Abhi 


टिप्पणियों के इस सिलसिले को यहीं खत्म करते हुए कहना चाहता हूँ की आप सभी की टिप्पणियाँ हमेशा बहुत खूबसूरत होती हैं, लेकिन सभी की टिप्पणियों का जिक्र करना संभव नहीं था, तो उन्ही कुछ टिप्पणियों का जिक्र किया है जो मेरे ईमेल में सुरक्षित हैं.

Recent Articles

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर : शिक्षक दिवस पर खास

सुदर्शन पटनायक द्वारा बनाया गया, चित्र उनके ट्विटर से लिया गया आज शिक्षक दिवस है, यह दिन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ....

तीज की कुछ यादें, कुछ अभी की बातें और एक आधुनिक समस्या

इस साल के तीज पर बने पेड़कियेबचपन से ही तीज का पर्व मेरे लिए एक ख़ास पर्व रहा है. सच कहूँ तो उन दिनों इस...

एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना..

बारिश हो रही हो, मौसम सुहाना हो गया हो और ऐसे में अगर कुछ पुराना याद आ जाए तो जाने क्या हो जाता है...

बंद हो गयी भारत की सबसे आइकोनिक कार, जानिये क्यों थी खास और क्या था इतिहास

Photo: CarToqपिछले सप्ताह, अचानक एक खबर आँखों के सामने आई, कि मारुती अपनी गाड़ी जिप्सी का प्रोडक्शन बंद कर रही है. एक लम्बे समय...

आईये, बंद दरवाजों का शहर से एक मुलाकात कीजिये

यूँ तो साल का सबसे खूबसूरत महिना होता है फरवरी, लेकिन जाने क्यों अजीब व्यस्तताओं और उलझनों में ये महिना बीता. पुस्तक मेला जो...

Related Stories

  1. Hence Proved, हम खाली तुमको गरियाते ही नहीं हैं, दोस्ती की खातिर कुर्बान होने का भी कूबत रखते हैं.. 🙂

  2. यूँ ही दिल से लिखते रहो..फिर टिप्पणियाँ भी दिल से वाली मिलती रहेंगी 🙂

    • सलिल चचा आजकल गुजरात शिफ्ट हो गए हैं, इसलिए दिखाई नहीं देते…जल्द ही ब्लॉग पर वापस आ जायेंगे!

  3. हमें तो पोस्टों से अधिक आनन्द टिप्पणियों में आने लगा है, नयी पोस्ट के लिये स्वयं सोचना पड़ता है, टिप्पणी में लेखक के विचार प्रवाह को ही आगे बढ़ाना पड़ता है।

  4. …..याद करने का शुक्रिया… वैसे मैं हरेक ब्लॉग को पढ़ते हुए उस पर आई टिप्पणियाँ जरूर पढ़ती हूँ, कई बार ब्लॉग से ज्यादा टिप्पणियों में मिल जाता है। कोई विचार, कोई दर्शन, कोई अनुभव, कोई नाजुक सी बात या फिर कोई क्लू… लिखने, सोचने, जुगाली करने के लिए….। बहुत अच्छी पोस्ट, दिल खुश कर दिया 🙂

    • बिलकुल!! कभी कभी तो मुझे पोस्ट में आई हुई टिप्पणियाँ पोस्ट से बेहतर लगती है!!

  5. सलिल जी की कमी खलती है….
    अच्छी पोस्ट लगी…
    अच्छा किया ये लिखा..

    टिप्पणियों के इस सिलसिले को यहीं खत्म करते हुए कहना चाहता हूँ की आप सभी की टिप्पणियाँ हमेशा बहुत खूबसूरत होती हैं, लेकिन सभी की टिप्पणियों का जिक्र करना संभव नहीं था, तो उन्ही कुछ टिप्पणियों का जिक्र किया है जो मेरे ईमेल में सुरक्षित हैं.

    वरना………..

    अनु

    • वो लिखते हुए गलती हो गयी थी….टिप्पणियाँ तो ब्लॉगर के कमेन्टपेज में सुरक्षित रहती ही है, और दूसरी बात क्या पता बाद में इसका एक भाग और पोस्ट कर दूँ… 🙂

  6. तुमरे हाथ का लिखा हुआ अब तक का अंतिम कमेन्ट, जो तुम हमरे घर पर छोड़ गए थे, पढ़ने के बाद तुमरी चाची का आँख भर आया.. हमरा त बाते जाने दो… अऊर जेतना पुरनका कमेन्ट सब तुम इहाँ पर सजा दिए हो, कि हमको खुद्दे बिस्वास नहीं होता है कि हम ई सब लिखे होंगे.. मगर हमरा सबसे फेवरिट कमेन्ट था जो हम तुमरे कविता का अनुबाद किये थे… तुमरा एही "दिल से" लिखने का अंदाज हमको तुमरा मुरीद बना लेता है.. सिनेमा, कार, कविता, जात्रा, परिचय, अनुभव, संस्मरण, समीक्षा.. ई सब कुछ लिखने का तुमरा एगो अलगे ग्रामर है!!
    परमात्मा तुमको हमेसा अइसने बनाए रक्खे.. और तुमरा मासूमियत बना रहे!! आमीन!!!

  7. जब ये लिखे, तब फिर भूल गए थे न हमें लिंक भेजना…??? वैसे बहुत अच्छा लग रहा इस सीरीज को पढ़ते हुए…| ऐसे ही खूबसूरती से लिखते रहो और सबका प्यार पाते रहो…|
    (P.S : इस पोस्ट में मेरा नाम मिल गया, इस लिए इत्ता प्यार से लिख रहे हम, वर्ना…:P )

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

नयी प्रकाशित पोस्ट और आलेखों को ईमेल के द्वारा प्राप्त करें