स्नैक्स पॉइंट की एक शाम

बैंगलोर डायरी : ४ 


ये बातचीत मेरे और प्रकाश(बैंगलोर के एक कॉफी शॉप के मालिक का बेटा जो लगभग मेरा हमउम्र ही है) के बीच 24 सितम्बर 2011 को हुई थी, जिसे उसी दिन मैंने ड्राफ्ट के रूप में सेव किया था..आज बहुत दिनों बाद देखा इसे तो उस शाम की पूरी तस्वीर आँखों के सामने घूमने लगी…आज शाम उस कॉफी शॉप की याद भी बेतरह आई…तो सोचा की इस बातचीत को अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर दूँ..

प्रकाश : सर आप राईटर वैगरह का कुछ काम करने लगे हैं क्या आजकल?

मैं : अरे नहीं यार, ऐसा क्यों पूछ रहे हैं आप?
प्रकाश : सर आपको यहाँ जब भी देखता हूँ तो हमेशा कुछ न कुछ लिखते हुए ही देखता हूँ..खाली बैठ कर कॉफी पीते तो कभी नहीं देखा आपको 
मैं : अरे यार, मैं राईटर नहीं हूँ..हाँ, ब्लॉग लिखता हूँ..हिन्दी ब्लॉग..आप जानते हैं ब्लॉग्गिंग के बारे में?
प्रकाश : (कुछ देर मेरे तरफ कन्फ्यूज्ड होकर देखता है और फिर कहता है)नहीं सर ज्यादा नहीं पता..हाँ, बस नाम सुना है मैंने ब्लॉग्गिंग का..वो इन्टरनेट पर किसी तरह का वेबसाईट होता है न?
मैं : हाँ भाई, एकदम ठीक पहचाना..बस वहीँ पर लोग अपने अनुभव, कवितायें, आर्टिकल वैगरह लिखते हैं और पढ़ने वाले पढ़ते हैं..कमेन्ट करते हैं..
प्रकाश : तो सर आप भी कविता लिखते हैं क्या?
मैं : नहीं भाई, मैं कविता बहुत ही कम लिखता हूँ…ज्यादातर मैं अपने अनुभवों के बारे में लिखता हूँ या फिर कहानियां…
प्रकाश : हिन्दी में?
मैं : हाँ भाई, हिन्दी में ही 
प्रकाश : वाह सर…अच्छा है..तभी मैं जब एक दो बार आपके पास से गुज़रता था तो देखता था आप डायरी में हिन्दी में लिखते रहते हैं..सच कहूँ सर तो ..बड़े विद्वान और सीरिअस टाईप होते हैं हिन्दी लिखने वाले..
मैं : (हँसते हुए) अरे नहीं नहीं…ऐसा किसने कहा आपसे?
प्रकाश : साहब कहेगा कौन?दीखता है..इंग्लिश में तो सब लिखते हैं..जिसको देखिये सब अंग्रेजी बोलते हैं..लेकिन हिन्दी में कौन लिखता है आजकल….बस वही जो बड़े सीरिअस टाईप होते हैं और विद्वान होते हैं..
मैं : हा हा, भाई..देखिये मैं भी हिन्दी में लिखता हूँ..और मैं नाही तो विद्वान हूँ और नाही वैसा सीरिअस टाईप.
प्रकाश : सर, विद्वान वाली बात पर तो कुछ नहीं कह सकता, लेकिन हाँ आप मुझे सीरिअस जरूर लगते थे..वहाँ(कैसीनो रेस्टुरेंट, बी.ई.एल. रोड, बैंगलोर) जब आते थे तो ऐसे नहीं लगते थे आप
मैं : ऐसे नहीं लगते थे का मतलब?
प्रकाश : पता नहीं सर, लेकिन जब पहले आप वहाँ आते थे तो आप हमेशा अपने दोस्तों के साथ होते थे और आपके टेबल पर खूब हंसी मजाक चलते रहती थी..और आप सब बहुत देर तक बैठते थे..तब आपको देखकर नहीं लगता था की आप बाद में लिखना भी शुरू कर दीजियेगा और तब आप इतने सीरिअस तो बिलकुल भी नहीं दीखते थे…फिर बहुत दिन तक ना तो वहाँ आए और नाही यहाँ..यहाँ तो आप शॉप खुलने के सात आठ महीने बाद पहली बार आए..
मैं : भाई, विश्वास तो मुझे भी नहीं होता की इसी जगह रहते हुए कैसीनो में बैठकर डिनर किये मुझे एक साल से ज्यादा हो गया(कारण बताना चाहा लेकिन फिर मैं चुप हो गया)….कभी कभी होमडिलीवरी ही माँगा लेता हूँ..और मैं इस कॉफी शॉप के आगे से हमेशा गुज़रता था.लेकिन ये पता नहीं था की ये दुकान भी आपका ही है..वो तो एक दिन युहीं आ गया तो देखा की आप सब यहाँ मौजूद हैं..और फिर तब से लगातार यहीं आने लगा..
प्रकाश : ओह अच्छा… 
कुछ देर तक दोनों खामोश रहे, फिर..
मैं : अच्छा भाई आपको ऐसा क्यों लगा की अब मैं बहुत सीरिअस हो गया हूँ…पहले भी तो मैं ऐसा ही था..
प्रकाश : पता नहीं सर..हो सकता है…लेकिन आप यहाँ पिछले पांच-छः महीने से लगातार आ रहे हैं और हमेशा अकेले ही दीखते हैं…कभी कभी तो यहाँ आप शाम से देर रात तक बैठे रहते हैं और शुरू शुरू में मुझे लगता था की आप किसी मुसीबत में है, इसलिए इतने चुप से और खोये खोये से रहते हैं….लेकिन फिर जल्द समझ आ गया की आप ऐसे ही हैं….सीरिअस..हमेशा कुछ सोचते हुए…शायद लिखने के लिए सीरिअस होना जरूरी होता होगा(वो कुछ देर हँसता है और फिर ये सोच कर चुप हो जाता है की कहीं मुझे बुरा न लगा हो)
मैं : नहीं भाई..ये लोगों की बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है की जो लिखते हैं वो बड़े सीरिअस टाईप के लोग रहते हैं…और मैं तो शुरू से ही कम बोलने वालों में रहा हूँ…कैसीनो जब भी गया तो मेरे बाकी दोस्त ही महफ़िल जमाए रखते थे..मैं तो ज्यादातर चुपचाप ही रहता था…
प्रकाश : ओह अच्छा..हो सकता है सर..वैसे भी उतने बड़े जगह में किस ग्रुप के कौन कौन लोग चुप हैं और कौन बोलने वाले ये कहाँ पता चलता है सर….ये छोटी जगह है और आप हमेशा अकेले ही आते हैं, तो शायद इसलिए मुझे लगा की……….(वो कहते कहते रुक गया, और फिर कुछ देर बाद पूछता है) – “सर आपके वे दोस्त कहाँ हैं अब..”
मैं : हैं भाई, सब यहीं पर हैं..
प्रकाश : तो अब आपके साथ दिखाई नहीं देते वे सब..
मैं : यार मैं बड़ा बोरिंग इंसान हूँ, और वे सब अब बड़े आदमी बन चुके हैं..बस मैं ही सड़कों की ख़ाक छान रहा हूँ…..कहाँ फुर्सत रहेगी उन बड़े और व्यस्त लोगों को मेरे जैसे बोरिंग इंसान के लिए..(उन दिनों मैं बुरे मूड से गुज़र रहा था, तो सीधा यही बात बोल दिया प्रकाश से, जो की शायद मुझे उससे नहीं कहनी चाहिए थी, क्यूंकि प्रकाश से महज जान पहचान ही थी, दोस्ती नहीं)
प्रकाश : अरे सर आप तो गज़ब बात कर रहे हैं..इतना सुन्दर बात करते हैं आप, आप बोरिंग कैसे हो सकते हैं?
मैं : हूँ यार..बड़ा बोरिंग किस्म का इंसान हूँ..फ़ालतू और बेमतलब की बातें करता हूँ..शायद इस वजह से तो उन लोगों को मैं पसंद नहीं आता…हो सकता है पहले भी पसंद नहीं आता हूँगा, लेकिन उन दिनों उन्हें मेरी जरूरत थी..तो मेरे से नजदीकी बनाये रखे थे..अब नहीं है, तो मेरे से दूर हो गए..

कुछ देर फिर वो खामोश रहा, और फिर कहता है – सर कोई अपनी लिखी कविता सुनाइये न…
मैं : यार मेरी लिखी कवितायें बड़ी बकवास किस्म की होती हैं..
प्रकाश : फिर भी सुनाईये सर…प्लीज..रिक्वेस्ट करते हैं आपसे..
मैं : ठीक है यार, सुनाता हूँ…
मैंने अपने डायरी से एक चार कवितायें उसे सुनाई और वो कवितायें सुनने के बाद कहता है – सर आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं…
मैं : यार लेकिन मुझे कवितायें लिखनी नहीं आती…बहुत गलत सलत लिख देता हूँ..कभी फुर्सत में लैपटॉप लेकर आया तो कहानियां सुनाऊंगा तुम्हे..
प्रकाश : देखिये सर मुझे कवितायें की समझ नहीं है..लेकिन जो आपने सुनाई, मुझे बड़ी अच्छी लगी…अब तो आपकी कहानियों का इंतज़ार रहेगा मुझे…वो भी आप अच्छा ही लिखते होंगे…
वो टेबल जहाँ मैं बैठा करता था..शायद
प्रकाश को ये टेबल देख कभी न कभी
मेरा ख्याल आता भी होगा

मैं बस मुस्कुरा के रह गया..फिर थोड़ी देर बाद वही कहता है – सर आप इतना अच्छा बात करते हैं, इतना अच्छा कविता सुनाएँ हैं..कैसे आपके दोस्त आपको इग्नोर कर सकते हैं…आप अगर मेरे दोस्त होते तब तो मुझे बहुत अच्छा लगता…आपसे हर शाम कितना कुछ सुनने को मिलता और इतनी अच्छी अच्छी बातें होती..
मैं : शुक्रिया यार..लेकिन मैं तो हर शाम यहाँ आते ही रहता हूँ…आपसे बातें होती रहेंगी..
प्रकाश : अरे वाह सर..इससे तो अच्छा और कुछ नहीं हो सकता..सर एक बात कहूँ आपसे…आप यहीं इसी टेबल पर बैठ कर लिखते रहिएगा…जितना देर बैठने का मन करे आपका…आप बैठे रहिये…
प्रकाश फिर अपने कॉफी शॉप के स्टाफ को बुलाकर कहता है – सर के लिए एक कॉफी लाओ और एक प्लेट समोसा..मैंने जब कहा की भाई सिर्फ कॉफी लाना..तो प्रकाश कहता है…सर आज का समोसा मेरे तरफ से रहेगा!

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  1. ऐसी शामें याद रह जाती हैं… कुछ ऐसी जगहें होती हैं जिनसे अनायास जुड़ाव महसूस करते हैं हम…!
    अच्छा किया आपने ड्राफ्ट में सेव कर लिया था शाम की बातचीत को… इतने दिन लगे प्रकाशित होने में पर कुछ भी धुंधला नहीं पड़ा:)
    It was nice reading the conversation!!!

  2. सही है बॉस !! फ्री के समोसे खाने का अच्छा तरीका है. सीरियस टाइप हो जाओ :).. अगली बार किसी केफे में हम भी यही ट्राई करेंगे.:) वैसे इसे डायरी से निकाल कर अच्छा किया.

  3. सीधी सी बात है, जब याद आता है कि अभी तक बैचलर की स्वतन्त्रता है, तब प्रसन्न हो लेते हैं। जब याद आता है कि अभी तक शादी नहीं हुयी तो मन दुखी हो जाता है।

  4. बड़े विद्वान और सीरिअस टाईप होते हैं हिन्दी लिखने वाले..

    क्या बात है…उसकी खुशफहमी बनी रहे…:)

  5. शिखा जी की बात से सहमत हूँ। 🙂 वरना वैसे तो जीवन में बस वो गीत है न पुरानी जींस और गिटार यादें यादें रह जाती है….

  6. Comment karne k liye intezaar nhi hua, is liye mobile se roman mei hi likh rahi…
    Vaise hindi mei likhne valey kya sachmuch serious type hotey hain…??? 😛
    Samosa khaney agli baar apni diary shayree le kr hm bhi chalenge…:) 😉 😛

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