जाको राखे साईयां मार सके ना कोई

कुछ दिन पहले मैंने एक विडियो देखा.जिसमे इंडियन आर्मी के योगेन्द्र सिंह यादव ने अपने कारगिल युद्ध के अनुभव को सबके साथ साझा किया.कारगिल युद्ध में अद्दुत साहस और वीरता के लिए योगेन्द्र सिंह यादव को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था.वैसे तो योगेन्द्र सिंह यादव का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं लेकिन अगर फिर भी कुछ लोग हैं जो इनके बारे में नहीं जानते तो उनके लिए बता दूँ कि योगेन्द्र सिंह यादव 18 ग्रेनेडीअर के घातक टुकड़ी के सदस्य थे..और टाइगर हिल पहाड़ी पर कब्ज़ा करने में इनकी अहम भूमिका थी.इन्हें बाद में भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से भी नवाज़ा गया.कुछ साल पहले आई फिल्म ‘लक्ष्य’ में हृतिक रोशन का किरदार भी योगेन्द्र सिंह यादव से ही इंस्पायर्ड था.फिल्म ‘एल.ओ.सी कारगिल’ में मनोज वाजपयी ने योगेन्द्र सिंह यादव का किरदार निभाया था.योगेन्द्र सिंह यादव आज के आधुनिक भारत के हीरो है.योगेन्द्र सिंह यादव, मनोज कुमार पाण्डेय, संजय कुमार और कैप्टन विक्रम बत्रा जैसे भारतीय सैनिक जिनपर सभी देशवासियों को गर्व है.आज के मोडर्न इंडिया में जहाँ मुश्किल से ही कोई रोल मॉडल मिलते हैं, ये युवाओं के लिए एक आदर्श कहे जा सकते हैं.

सबसे पहले मैं शहीद भगत सिंह, उनके परिवार से आए लोग और शहीद परिवारों के लोग, माताओं और बुजुर्गों, मैं सबसे पहले आप लोगों के चरणों में अपना नतमस्तक होकर वंदना करता हूँ कि मुझे आशीर्वाद दे, कि मैं आगे जीवन में भी और भी कुछ कर सकूँ..किसी ने कहा है
वक्त का लिखा न कभी मिट सकता है
और उसके मर्जी के बिना पत्ता तक न हिल सकता है

साथियों, जीवन के अंदर भगवान एक अवसर प्रदान करता है- कि हे मनुष्य, मनुष्य जीवन जो आपको दिया है, इस जीवन को और तेज बनाओ और इस जीवन से ऊपर उठ कर के मानव सेवा करो. कुछ ऐसा ही अवसर मुझे 1999 कारगिल के युद्ध के दौरान प्राप्त हुआ. जब ये कारगिल का युद्ध शुरू हुआ था, उस समय मैं अपने नये जीवन की शुरुआत करने के लिए अपने घर शादी करने के लिए आया हुआ था. 5 May 1999 को मेरी शादी थी और 20 May 1999 को जब मैं वापस जम्मू काश्मीर पहुंचा तो मुझे पता चला कि मेरी बटालियन 18 ग्रेनेडीअरस द्रास सेक्टर की तोलोलिंग पहाड़ी पर लड़ाई लड़ रही है. ये मेरे जीवन का सबसे सुनहरा अवसर था, मेरे दिल की तमन्ना थी कि मैं देश के लिए कुछ कर सकूँ. मुझे गर्व है अपने इस देश के ऊपर और गर्व है अपने माता पिता के ऊपर जिन्होंने मुझे इस धरती पर जन्म दिया और इस धरती पर कुछ करने का अवसर प्रदान किया. 
जब मैं अपनी बटालियन 18 ग्रेनेडीअरस में द्रास सेक्टर में पहुंचा तो मैंने उस तोलोलिंग पहाड़ी पर 22 दिन तक अपने जवानों के साथ लड़ाई लड़ी. उस लड़ाई के अंदर मेरी बटालियन के दो ऑफिसर, दो जे.सी.ओ और 22 जवान वीरगति को प्राप्त हुए और 22 June 1999 को उस तोलोलिंग पहाड़ी पर तिरंगा फहरा दिया गया. उसके बाद मेरी बटालियन को जो द्रास सेक्टर की सबसे ऊँची चोटी टाइगर हिल टॉप था उसे कैप्चर करने का आदेश दिया गया. उस आदेश को सुन कर के हमारे कमैन्डिंग ऑफिसर कर्नल कुशाल चन्द्र ठाकुर ने अपनी बटालियन में एक नयी “घातक” टुकड़ी का निर्माण किया जिसमें यंग यंग सोल्डर को उन्होंने चुना पूरी बटालियन से. मैं बड़ा सौभाग्यशाली रहा कि उस टीम के अंदर मेरा चुनाव हुआ. और एक सौभाग्य की बात और थी मेरे लिए कि उस टीम का सबसे आगे चलने वाला सदस्य भी मुझे बनाया गया. ये टुकड़ी मेरे बटालियन की एक अहम टुकड़ी थी जिसको सबसे पहले टाईगर हिल टॉप पे जाकर फतह करनी थी. और उस रास्ते से जाकर फतह करनी थी जिस रास्ते से पाकिस्तानी ये सोच भी नहीं सकते थे कि यहाँ से भी इंडियन आर्मी ऊपर आ सकती हैं. 
साथियों 2 July 1999 को हमने टाइगर हिल टॉप पर चढ़ने की तयारी शुरू कर दी और शाम को साढ़े छः बजे हमने चढ़ना भी शुरू कर दिया. तीन दिन-दो रात की यात्रा करने के बाद 5 July 1999 को सुबह हम उस टाइगर हिल टॉप के ऊपर चढ़ पाए. सुबह का वक्त था और रास्ता इतना कठिन था कि रस्सा का सहारा ले कर, आपस में साथी एक दूसरे का सहारा ले कर उस मंजिल को तय कर रहे थे. बर्फीली आंधियां चल रही थी और मुहँ पे थपेरे मार रही थीं.. लेकिन इन सब की परवाह न करते हुए हम कदम से कदम मिला कर के आगे बढ़ते रहे. उसी क्षण हमारे ऊपर दुश्मन का फायर आया. जिस रास्ते से हम चल रहे थे उस रास्ते के दोनों तरफ नाले थे और नालों में दुश्मनों का बंकर था. अँधेरे की वजह से हम उन बंकरों को नहीं देख पाए और उन्होंने हमारे ऊपर फाइरिंग कर दिया. अंधाधुंध गोला-बारी शुरू हो गयी.. तकरीबन साढ़े दस बज चुके थे दिन के और पांच घंटे फायर में दुश्मन ये अंदाज़ा नहीं लगा सका कि यहाँ इंडियन आर्मी के कितने जवान है. हम सात जवानों ने दिखा दिया कि यहाँ पर हम सात जवान नहीं बल्कि सात सौ जवान है. लेकिन तकरीबन ग्यारह बजे दुश्मन की एक छोटी सी टुकड़ी हमको देखने के लिए आई कि वास्तव में हम कम जवान है या ज्यादा है. 
जब वो हमारे बिलकुल नजदीक आई तो हमने उनके ऊपर फाईरिंग शुरू कर दिया जिसमें आठ को मौत के घाट उतार दिया और दो को घायल कर दिया. लेकिन उन दोनों सैनिकों ने अपने कमांडर को जाकर बता दिया कि वहाँ पर हिंदुस्तान के केवल सात जवान है. उन्होंने अपनी दुबारा से प्लानिंग की और तकरीबन आधे घंटे के बाद उन्होंने हमारे ऊपर दुबारा अटैक किया और तकरीबन सत्तर आदमी हमारे ऊपर अटैक करने के लिए आए. ऊपर से ही उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया. अल्लाह-ओ-अकबर के नारे लगाने शुरू कर दिए और धीरे धीरे हमारे नज़दीक आते रहे. हम इंतज़ार में पड़े हुए थे कि जैसे ही ये दुश्मन हमारे नज़दीक आएगा तो हम इनके ऊपर अंधाधुंध फाईरिंग कर के टूट पड़ेंगे क्योंकि हमारे पास एम्युनेसन की धीरे धीरे कमी होते जा रही थी. हमारे पास नीचे से कोई सप्लाई नहीं हो पा रही थी एम्युनेसन के लिए. धीरे धीरे जब वो नज़दीक आते रहे तो ऊपर से उन्होंने पत्थर मारने शुरू कर दिए. हमें मजबूर कर दिया कि हम सर नहीं उठा सकते हैं, पत्थरों के पास से ही दुबके हुए फाईरिंग करते रहे, इंतज़ार करते रहे नज़दीक आने का और एक सही मौका का इंतज़ार था हमें कि वो जब नज़दीक आए तो हम उनको ज्यादा से ज्यादा को मौत के घाट उतार सके. जैसे जैसे वो नजदीक आते रहे हमारे हौसले और बुलंद होते रहे और उन्होंने जब अल्लाह-ओ-अकबर का नारा लगाकर के हमारे ऊपर टूट पड़े तो ये हमारे छः साथी, छः जवान अंधाधुंध फाईरिंग कर के खुद तो सोए लेकिन दुश्मन के 35 आदमियों को मौत के घाट उतार दिया. मैं भी बेहोशी के अवस्था में था. घायल हुआ था, शरीर के चारों तरफ से खून निकल रहा था. लेकिन साथियों, दर्द नहीं हो रहा था. क्योंकि ये जनून जब सिर पर चढ़ जाता है तो उस समय सिर्फ तिरंगा और भारत माता ही दिखाई देती है. 
मैं पड़ा हुआ, इतना बेहोश नहीं था कि मैं उनकी बातें न सुन सकूँ और उनको न देख सकूँ,.मैं चुपचाप अपनी अवस्था में पड़ा रहा और सही मौके की तलाश में था, कि अभी मैं अकेला हूँ और दुश्मन अभी ज्यादा है. जैसे ही एक घंटा होगा मैं मौके का फायदा उठाऊंगा और इनको ज्यादा से ज्यादा मार गिराऊंगा. मैंने सुना था कि पाकिस्तानी आर्मी के सैनिक हिंदुस्तान के साथ क्या क्या सुलूक करते हैं. मैं भी देखना चाह रहा था कि क्या वास्तव में वो ऐसा सुलूक करते हैं हमारे साथ? 
दोस्तों, मेरे साथी शहीद हो चुके थे. एक की मेरे सामने डेड बॉडी थी मेरे साथी की. एक मेरे बगल में थी. चार मेरे साथी दूसरे पत्थर के पास थे. उन्होंने उनपर तीन-तीन बार आकार गोलियाँ मारी. डेड बॉडीयां छलनी कर दी उन्होंने फिर भी उनको सब्र नहीं आया, फिर उन्होंने बूट की ठोकरें मारी. फिर भी सब्र नहीं आया. फिर गालियाँ दी. बहुत गालियाँ दी. गालियाँ देने के बाद उन्होंने हमारे जो पांच सौ मीटर नीचे लगी एम्.एम.जी पोस्ट था, उस पोस्ट को बर्बाद करने के लिए अपने साथी, जो उनके साथी मशको घटी में तैनात थे उनको मेसेज दिया कि यहाँ का इंडियन आर्मी का जो एम्.एम.जी पोस्ट है इसको बर्बाद कर दो. मेरे दिल के अंदर घटी बजी, कि अगर इन्होने एम्.एम्.जी पोस्ट को कब्ज़ा कर लिया, ऊपर इनका पोस्ट है और नीचे इनका पोस्ट हो जाएगा, तो नीचे वाले साथी तो खत्म हो जायेंगे. क्योंकि नीचे वाले साथी को नहीं पता है कि ऊपर वाले साथी शहीद हो चुके हैं. मैंने ऊपर वाले से दुआ करी कि हे भगवान मुझे इतना ज़िंदा रख दे कि मैं अपने साथियों को सुचना दे दूँ की आपके ऊपर अटैक होने वाला है. दोस्तों जब सच्चे दिल से किसी चीज़ को करने की दिल में ठान लेते हैं तो वो काम अपने आप बनते चला जाता है. भगवान उसमें साथ देते चला जाता है. 
मैं ये सोच ही रहा था अपने साथियों के पास कैसे सुचना भेजूँ, कि उतने में ही जो दुश्मन का ऑफिसर था उसने बोला कि इन हरामजादों का राईफिल उठा लो. उनका एक साथी हमारी राईफल उठा रहा था, दूसरा साथी दुबारा से गोलियाँ मार रहा था. उसने ऐसे ही आकार के गोलियाँ मारी. पहले मेरे सामने वाले साथी को मारी फिर बगल वाले को मारी. मेरे को भी बाजू में गोली मारी उसने, पैर में मारी, जांघ में मारी. गोलियाँ मार कर के चला गया. मेरा पूरा चेहरा कटा हुआ था. सर से खून निकल रहा था. मेरे दिल के अंदर एक ताकत थी. दिल में ये सोचा हुआ था कि अगर उसने मेरे सर में और छाती में गोली नहीं मारी तो मैं जिंदा रहूँगा. लेकिन उसने ज्योंही एक कदम आगे बढ़ाया, पता नहीं उसके दिल के अंदर क्या हुआ, उसने दोबारा से पलट कर के मेरे छाती के ऊपर फायर कर दिया. 
साथियों, “जाको राखे साईयां मार सके ना कोई”…मेरे छाती के पास पॉकेट में पर्स रखा हुआ था और पर्स में पांच पांच रुपये के सीक्के रखे हुए थे और वे सिक्के ऊपर वाले की मेहरबानी से इकट्ठे थे और सिक्कों को गोली लगी. गोली के धक्के से मुझे भी एहसास हुआ कि मैं मर चूका हूँ. लेकिन दुश्मन मेरी राईफल उठा कर के वापस अपने साथियों की तरफ भागा तो एकदम झटके से आँखें खुली और मेरी अंतरात्मा ने आवाज़ दिया कि “योंगेन्द्र, अभी तक नहीं मरा है तो अब तेरे को कोई मार भी नहीं सकता”. जो मेरे पास हथगोला बचा हुआ था, मैंने उस ग्रेनेड को लिया और भागते हुए दुश्मन के ऊपर थ्रो कर दिया. सर्दी के कारण कोट सबने पहने हुए थे उसमें पीछे टोपा लगा हुआ था और उस टोपे में ग्रेनेड गिर गया.. जब तक वो उस ग्रेनेड को निकाल पाता, ग्रेनेड फट गया. ग्रेनेड के फटते ही वो दुश्मन हमारे ऊपर जा गिरा और एकदम उनमें एक खलबली सी मच गयी कि यहाँ पर एक फ़ौज नीचे से आ रही है. उनमें से कुछ बोले की ‘नहीं, इनमें से कोई ज़िंदा है’.कु छ बोले की ‘जिंदा नहीं नीचे से फ़ौज आ रही है’. 
अभी जैसे ही वो दुश्मन हमारे ऊपर गिरा, मैंने दोनों हाथ बढ़ाये उसके राईफल को उठाने के लिए लेकिन एक हाथ तो बिलकुल बेकार हो चूका था, एक ही हाथ से राइफल को उठाया और अंधाधुन्ध फाईरिंग कर दिया और उसी फाइरिंग में उनके चार आदमियों को मौत के घाट उतार दिया. उसके बाद दूसरे पत्थर के पास गया फिसलते हुए, फिर वहाँ से फाईरिंग किया फिर तीसरे से फाईरिंग किया, उन्हें जजमेंट नहीं होने दिया कि यहाँ पर इंडियन आर्मी का एक ही सोल्डर है. उनको लगा कि नीचे से दूसरी टुकड़ी ऊपर आ रही है. बस..उनके अंदर इतना ही दम था कि वे भाग खड़े हुए और उन्होंने पीछे मुड कर ये भी नहीं देखा कि यहाँ पर इंडियन आर्मी का एक ही सोल्डर है. मैं भी चारों तरफ से फईरींग करता रह और उनको वहाँ से भगाता रहा. कुछ दूर चलने के बाद मुझे उस कैप्टन कि बात याद आई कि उसने एम्.एम्.जी पोस्ट पर अटैक करने के लिए अपने साथियों को बोल चूका है. कहीं ऐसा न हो कि हमारे साथी मेरे पहुँचने से पहले ही शहीद हो जाए. मुझे उनके अटैक से पहले वहाँ पहुंचना है. फिर जो ऊपर का उन्होंने डिप्लॉइमन्ट किया हुआ था, कहाँ पर उनके सपोर्टिंग वेपन लगे हुए थे, एम्युनेसन डैम था, रहने के लिए जो टेंट लगाये हुए थे, वो सब कुछ पूरा लोकेसन वहाँ से दिखाई दे रहा था. वो सब कुछ देखने के बाद मैं अपने साथियों के पास वापस आया, फिर दिल के अंदर ये एहसास हुआ कि हो सकता है कि इनमें से कोई मेरी तरह ज़िंदा हो. मैं वापस आकार के अपने साथियों को देखा. किसी का सर पूरा चित्थरा हुआ हुआ था तो किसी का छाती पूरा निकला हुआ था. दोस्त और साथी तो बहुत प्यारे होते हैं. बहुत देर बैठ कर के रोया लेकिन फिर दिल के अंदर से एक आवाज़ आई कि जो इनकी शहादत है और जो हमको काम मिला था, वो काम कमें पूरा करना है. इनकी शहादत को बेकार नहीं होने देना है. जो इनका मिसन था, जो हमारा मिसन था, आज मुझे पूरा करना है. 
तो फिर वहाँ से मुझे नीचे जाना था पांच सौ मीटर. मैं सोच रहा था कि नीचे कैसे जाऊं कि एक शक्ति अन्दर, मेरे सामने आई,. उसने मुझे रास्ता दिखाया कि इस नाले से नीचे लुढक जाओ. मेरा बायां हाथ जो की टूट चूका था, मुझे पहले लगा कि ये कट गया है. फिर सोचा कि अगर ये कट गया है तो किसलिए इसे लेकर घूमता रहूँ? इसे यहीं डाल देता हूँ. मैंने झटका मारा हाथ अलग करने के लिए लेकिन चमड़ी उसमें उलझी हुई थी. तो लगा कि ये टूटा नहीं है. हाथ को बाँधने की कोशिश करी तो ये बंधा नहीं. तो बायां हाथ उठाया और पीछे बेल्ट में फंसाया इसे. फिर उस नाले से लुढक गया. लुढकता लुढकता जब काफी नीचे पहुंचा तो फिर एकदम दिमाग घुमा कि कहीं पाकिस्तान के तरफ तो नहीं लुढक गया. फिर मैंने देखा कि मेरे साथी, जो मेरे साथ ऊपर चढ़ने के लिए मेरे साथ थे वो वापस एम्.एम्.जी पोस्ट की तरफ आ रहे हैं. हमारे टीम कमांडर लेफ्ट.बलवान सिंह और कैप्टन सचिन निबालकर. मैंने उनको आवाज़ दिया तो उन्होंने मुझे उस नाले से ऊपर खेंचा. और जब मेरी कंडीसन देखी तो कोई ये नहीं कह रहा था की ये ज़िंदा रहेगा. पूरा ड्रेस चीथरे-चीथरे हो गया था. लेकिन मेरे दिल के अंदर ज़ज्बा था कि मैं जिंदा रहूँगा. मैं उनको बोला कि सर, मुझे कुछ नहीं हुआ है लेकिन यहाँ एम्.एम्.जी पोस्ट पर अटैक होने वाला है. उन्होंने सी.ओ साहब को रिपोर्ट किया कि ‘साहब, जो आज हमारी टुकड़ी ऊपर गयी थी अटैक करने के लिए उसमें से एक बन्दा जिंदा बच के आया है और छः जो उसके साथी थे वो शहीद हो चुके हैं’. सी.ओ साहब ने उन्हें बोला कि तुरंत इस जवान को मेरे पास भेजो. दो बज चुके थे उस टाईम तक. सीओ साहब के पास जब मैं पहुंचा तो साढ़े सात बज चुके थे. फर्स्ट एड तो मेरा हो गया था लेकिन खून का बहना बंद नहीं हुआ था. जब मैं सी,ओ साहब के पास पहुंचा तो आखों के आगे बिलकुल अँधेरा हो चूका था. कुछ पहचान नहीं पा रहा था. बोल तो बराबर रहा था. सी.ओ साहब ने बोला ‘बेटा मेरे को पहचान रहा है?’..मैंने कहा ‘साहब, मैं नहीं पहचान रहा हूँ’.मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. उन्होंने अपने टेंट में मुझे डाला. ग्ल्युकोज का बोतल पिलाया और फिर बोला, ‘हाँ बेटा, अब बता’..फिर मैं उनको पूरा शुरू से आखिर तक की कहानी बताई की ‘साहब हमारे साथ ये हुआ और अब ये होने वाला है’. हमारे सी.ओ कमांडिंग ऑफिसर कर्नल कुशल चन्द्र ठाकुर ने दोबारा से री-प्लानिंग बनाई और जो बड़उ कंपनी थी हमारे बटालियन की उसे टाइगर हिल टॉप पे भेजा और उसी रात को उस टाइगर हिल टॉप पर देश का तिरंगा फहरा दिया गया. 
मुझे खुशी हो रही है कि इस देश के अंदर शुरू से ही, क्योंकि इतिहास बताया चला आ रहा है…. शुरू से ही जो क्रान्ति हुई हैं, उसमे हमारे नौजवान साथियों ने बढ़ चढ़ कर के हिस्सा लिया है और कुर्बानियां दी हैं. जब मैं वहाँ बेहोश पड़ा हुआ था तो ये सोच रहा था कि जब तेईस साल की उम्र में शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु हँसते हँसते फांसी के फंदे को चूम सकते हैं तो क्या हम यहाँ पर उनकी दी हुई विरासत को अपने खून से नहीं छुटा सकते. उन्होंने तो अपना सर्वस्य त्याग दिया. अपना पूरा बलिदान इस देश के लिए दे दिया. हमने तो सिर्फ अभी थोड़ा सा खून बहाया है, बलिदान देना तो अभी बाकी है.

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  1. मैंने भी यह वीडियो पूरा देखा था और अपने फेसबूक प्रोफ़ाइल पर इसको शेअर भी किया था … पर तुमने इसको एक नया रूप दे दिया … पूरा का पूरा वीडियो और योगेन्द्र जी के विचार यहाँ पोस्ट के रूप मे दे कर इसकी पहुँच और बढ़ा दी … मेरी ओर से साधुवाद स्वीकार करो !

    जय हिन्द … जय हिन्द की सेना !

  2. बहुत अच्छा किया इसे लिखकर. विडियो तो देखा था पर पढकर और गर्व हुआ.
    आभार अभि !

  3. आपका बहुत-बहुत आभार अभि..जी कि आपने इस पोस्ट को यहाँ इतनी शिदत्त से लिखा पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा। ऐसे महान इन्सानो और देश भक्तो को एक सल्युट मेरा भी….जय हिन्द

  4. मैं तो यह देख कर अभिभूत हूँ कि आज जबकि टीवी चैनल व दूसरे कई संचार माध्यम नई पीढी को एक अलग दिशा में ले जारहे हैं आप जैसे नौजवान देश व देश के जांबाज प्रहरियों के लिये गर्व और सम्मान रखते हैँ । यहाँ आपने जो कुछ लिखा है उसे पढ कर फिर सुन कर कौन रोमांचित न होगा । यहाँ मैं कहना चाहूँगी कि बुराई फैलाने से बुराई मिटती नही, बढती है उसी तरह अच्छी बातों का प्रचार-प्रसार आस्था व विश्वास को बढाता है । उम्मीदें जगाता है । आप इसी दिसा में कुछ कर रहे हैं ।

  5. शुक्रिया इस पोस्ट के लिए……

    काबिले तारीफ़ प्रस्तुति अभि जी.

    अनु

  6. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना….
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

  7. शान्ति गर्ग जी,
    ये मेरी कोई रचना नहीं है..योगेन्द्र जी के "स्पीच" का ट्रांसक्रिप्ट है!

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