द गोल्डन 80's

आप क्या सोचते हैं?अगर आपको पहले के किसी टाईमफ्रेम में जीने का अवसर मिले तो आप किस टाईमफ्रेम में जाना पसंद करेंगे?शायद अपने बचपन के टाईमफ्रेम में..या फिर अपने वैसे समय में जिसे आप अपना गोल्डन डेज मानते हैं...या फिर शायद उस सदी में जो आपको सबसे ज्यादा अपने तरफ आकर्षित करता है...अगर कोई यही सवाल मुझसे पूछे या फिर ऐसा कोई अवसर मुझे मिले तो मैं कहूँगा की मैं अस्सी के दशक में जाना चाहूँगा..हालांकि मेरे लिए मेरे गोल्डन डेज नब्बे के दशक के थे..लेकिन फिर भी जाने क्यों अस्सी का दशक मुझे हमेशा से बहुत फैसीनेट करता है.


आप शायद ये सोच रहे होंगे की मैं ये बेतुका सवाल क्यों पूछ रहा हूँ..दरअसल पिछले साल एक बड़ी ही खूबसूरत फिल्म आई थी, "मिडनाईट इन पैरिस".उसमे जो नायक रहता, उसका नाम गिल है..और उसे "पैरिस" बारिशों में बहुत खूबसूरत लगता है..उसका मानना है की 1920 पैरिस का सबसे सुनहरा समय था और पैरिस उन दिनों आज से भी ज्यादा खूबसूरत हुआ करता था..उसे पैरिस का वो पुराना समय हमेशा से बहुत रोमांचित करता है...उसकी एक तमन्ना है की वो 1920 के पैरिस में जी सके.एक रात जब वो पैरिस के सुनसान गलियों में टहल रहा होता है तो एक घंटाघर के पास जाकर कुछ देर बैठ जाता है..रात के बारह बजते ही एक गाड़ी उसके पास आकार रूकती है, और उसमे बैठे लोग उसे गाड़ी के अंदर आने के लिए कहते हैं..उसे हैरत तब होती है जब वो उस गाड़ी में बैठ कर 1920 के समय में चला जाता है.वो अपने प्रिय लेखक एर्नस्ट हेमिंग्वे और चित्रकार पाब्लो पिकासो से मिलता है..उस रात के बाद वो ऐसा हर रात करने लगता है..रात के बारह बजते ही वो उस घंटाघर के पास आ जाता है और फिर पुराने दिनों में चला जाता है.इस बीच जो कुछ भी होता है उससे गिल को अपनी जिंदगी की वो राह मिल जाती है जिसकी उसको तलाश रहती है.इस फिल्म ने मुझे बेहद प्रभावित किया..हालांकि ये मैं भी जानता हूँ और फिल्म बनाने वाले भी की ऐसा होना असंभव है, सारी बातें फिल्म की काल्पनिक है...लेकिन फिर भी फिल्म को देखते हुए मुझे एक नॉस्टैल्जिक फीलिंग महसूस होती है.शायद इसलिए भी की मैं भी पुराने दिनों में वापस जाना चाहता हूँ..उन दिनों में जब जिंदगी में सुकून बाकी था, और इतनी भाग-दौड़ नहीं थी.फिल्म जब खत्म हुई तो मैंने खुद से एक सवाल पूछा, की मैं कौन से सदी में वापस जाना चाहता हूँ..बिना एक पल सोचे दिल ने कहा "अस्सी के दशक" में.

मुझे नहीं पता की अस्सी का दशक मुझे हमेशा से इतना फैसनेट क्यों करता है..शायद इसलिए की अस्सी के दशक में आई कुछ फ़िल्में मेरी पसंदीदा फिल्मों की सूचि में सबसे आगे रही हैं..कुछ फ़िल्में जैसे गृह प्रवेश, बातों बातों में, क़र्ज़, याराना, सिलसिला, बाजार,मासूम, जाने भी दो यारों, स्पर्श, चश्मे बद्दूर, वो सात दिन, इजाजत...ये सभी अस्सी के दशक में ही रिलीज हुई थी और मैं हमेशा इन फिल्मों के किरदारों को, उनके बातचीत करने के, रहने सहने के ढंग को बड़े गौर से देखता हूँ..ये फ़िल्में देखते हुए मुझे लगता है की मैं उस ज़माने में खड़ा हूँ कहीं.मुझे लगता है की मैं उन दिनों के सुकून भरी जिंदगी को महसूस कर सकता हूँ.मुझे लगता है की मैं यारों की वैसी महफ़िल का एक हिस्सा हूँ जो फिल्म में मुझे देखने को मिलती है.ये सब फ़िल्में मैंने जाने कितनी ही बार देखी है, और हर बार मैं फिल्मों में, उनके किरदारों में खो जाता हूँ.

दोस्तों की ऐसी महफ़िल अब कहाँ 
आज के ज़माने में जहाँ लाखो पंगे हैं, वहीँ उन दिनों जिंदगी बेफिक्र रहती थी.लोगों को दूसरे लोगों की फ़िक्र थी, सबके पास सबके लिए वक्त था.दोस्तों से मिलने के लिए आपको ट्विट्टर,फेसबुक या फिर चैट का सहारा नहीं लेना पड़ता था.बकायदा यारों की महफ़िल जमती थी..दोस्तों से बात करने के लिए ये नहीं देखना पड़ता था की उनके चैट पर "लाल बत्ती" जल रही है या "हरी".सिर्फ दरवाज़े पर आकार एक आवाज़ लगाना ही काफी था.बैठ कर बातें करने के लिए "मैक डी" या "सी.सी.डी" जैसे महंगे शौक की जरूरत नहीं थी..चाय की दुकान ही दोस्तों का अड्डा हुआ करता था.अकेलापन या डिप्रेसन उन दिनों लोगों को किसी दूसरे ग्रहों की बात लगती होगी, या अगर नहीं भी तो कम से कम ऐसे लोगों की संख्या तो बहुत ही कम होगी जो इन शब्दों के अर्थ जानते होंगे.लोग आपको भूलते नहीं थे, और नाही आप किसी को चाह कर भी भुला सकते थे.ये भी कितनी अजीब बात है न की आज लोगों से जुड़ने के इतने साधन मौजूद हैं फिर भी लोग पहले से कहीं ज्यादा तनहा और बेबस हैं.


आज तो हालत ये है की  दोस्त एक दूसरे के सामने बैठे होते हैं फिर भी मोबाइल पर किसी और से एस.एम्.एस के जरिये बात जारी रखते हैं..खुद मेरे साथ ये कितनी बार हुआ है की मेरे कुछ दोस्त मेरे साथ बैठे हुए हैं, बातें कर रहे हैं और उसी समय वो अपने किसी और दोस्त से भी मेसेज के जरिये बातचीत जारी रखते हैं..मुझे वैसे समय बहुत गुस्सा भी आता है, और बात आगे बढ़ाने का पूरा मूड ही खराब हो जाता है.जहाँ आजे के ज़माने की शोर्ट मेसेजिंग सर्विस और ट्वीट है, वहीँ उन दिनों चिट्ठियां हुआ करती थी..हालांकि चिट्ठियां लिखने का सुख मैंने भी बहुत उठाया है, और तब तक चिट्ठियां लिखता रहा दोस्तों को, जब तक उनके जवाब आते रहते थे..उनके जवाब आने बंद हो गए, तो मैंने भी चिट्ठियां लिखना बंद कर दिया.

फेसबुक पर हर दिन दोस्त एक दूसरे से चैट पर बात करते हैं और उन्हें अपने दोस्त की पल पल की खबर रहती है..अक्सर ये होता है की वो जब भी मिलते हैं तो उन्हें बात करने का कोई टॉपिक नहीं मिलता और कॉफी पीते वक्त दोनों एकदम शांत रहते हैं.ये अच्छा है की सोशल नेटवर्किंग एक ऐसा माध्यम है जहाँ से एक दोस्त को अपने दोस्त की पल पल की खबर मिलते रहती है..लेकिन मुझे वे दिन ज्यादा भाते थे जब दोस्तों को अपने दोस्त की खबर लेने के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी..अगर उसका दोस्त किसी दूसरे शहर में है तब तो खबर लेना और भी कठिन काम था, ऐसे में मिलने पर ही बात हो पाती थी.और जब महीनो बाद दो दोस्त मिलते, तो उस समय मिलने की असली खुशी को वे महसूस करते, और फिर चलता ना खत्म होने वाली बातों का सिलसिला...मैं समझता हूँ यह असली "सुख" है.

एक बेफिक्र और सुखद सुबह, आशीष भारती के साथ
मेरी ये आदत नहीं की दोस्तों को हमेशा फोन करूँ...मैं किसी को भी तभी फोन करता हूँ जब उसकी सबसे ज्यादा याद आती है.मेसेज करना मुझे पसंद नहीं(हाँ, शुरू शुरू में खूब मेसेज मैंने किये भी)..मेरे कुछ करीबी दोस्त ऐसे भी है की जिनका फोन नंबर मोबाइल में रहते हुए उनसे बात किये अरसा हो जाता है, कभी कभी तो दो-तीन महीने बीत जाते हैं..ये वैसे दोस्त हैं जो मेरे फेसबुक प्रोफाइल में भी एड हैं..लेकिन फेसबुक पर  भी उनसे किसी तरह का कोई इन्टरैक्शन नहीं होता.एक ऐसा ही मेरा मित्र है आशीष भारती.पिछले महीने वो दिल्ली आया था, और हम चार साल बाद मिल रहे थे.दो दिन वो मेरे साथ रहा..और पूरी रात, पुरे दिन हम बातें करते रहे..इन चार सालों में क्या क्या हुआ हमारे साथ...हर छोटी बड़ी बात,क्या अच्छा..क्या बुरा...सब कुछ हम एक दूसरे को बता रहे थे..और तब मुझे लगा की अगर इसके भी हर दिन के अपडेट मेरे पास रहते तो ये जो सुख मैं महसूस कर रहा हूँ वो मुझे कभी नहीं मिलता.


कुछ दिन पहले सलिल चचा से जब मिलने उनके घर गया था तो अचानक ही मुझे "मिडनाईट इन पैरिस" फिल्म याद आ गयी, और मैं उनसे उनके कॉलेज के दिनों के बारे में पूछने लगा..मैंने उनसे पूछा, की आप जब कॉलेज के दिनों में होंगे, तो उस समय का माहौल तो आज से एकदम अलग होगा..अच्छी फिल्मों का सिनेमा हॉल में लगने का इंतज़ार जो आप इतने बेसब्री से करते होंगे, उन्हें देखने का मजा ही कुछ अलग होता होगा..और फिर फिल्म देखने के बाद हफ़्तों तक उस फिल्म का जिक्र दोस्तों में होता होगा.आज तो नाही वैसी फिल्म बनती है और नाही वैसा दर्शक वर्ग है..और अगर अच्छी फ़िल्में और अच्छा दर्शक वर्ग है भी तो फिल्मों पर चर्चाएँ कहाँ होती हैं...लोगों के पास खाना खाने का वक्त ही नहीं, फिल्म के लिए वक्त कहाँ से निकालें?उस शाम सलिल चचा ने बहुत सी बातें बताई मुझे..लेकिन फिर भी मुझे और भी बहुत कुछ जानना था...पुराने दिनों की कहानियां हर की लगभग एक सी ही होती हैं, लेकिन फिर भी वे सुनी हुई कहानियों को मुझे फिर से सुनना था..और ढेरों बातें करनी थी..लेकिन समय की कमी थी.

इस बार जब कुछ दिनों के लिए घर जाना हुआ तो पापा भी अपने समय की बहुत सी कहानियां बता रहे थे, और मैं सुन रहा था...उन दिनों को, उस सुख को महसूस कर रहा था, जिसके बारे में हम सिर्फ सोच सकते हैं, जबकि पापा और सलिल चचा जैसे लोग जो उस समय में जिए हैं, उस सुख का उन्हें अच्छे से अहसास होगा...अक्सर सोचता हूँ, की जब मैं आज के सो-काल्ड मॉडर्न समाज की तुलना नब्बे के दशक से करता हूँ, तो मुझे बड़ा अजीब लगता है और ये सोच बेहद दुःख होता है की आधुनिकता के नाम पर हमने क्या क्या गंवाया है..तो पापा, सलिल चचा और बाकी अन्य बड़ों को कितना दुःख होता होगा जब वे अपने समय से आज के मोडर्न सामाज की तुलना करते होंगे.

 .आपको शायद आश्चर्य होगा और कुछ लोग मुझे पागल भी समझें, लेकिन ऐसा कई दफा हुआ है की मैंने सपनों में देखा है की मैं अस्सी या सत्तर के दशक में घूम रहा हूँ..और मैं बहुत खुश और संतुष्ट हूँ..और फिर जब मेरी नींद खुलती है और मैं अपने आप को इसी दशक में पाता हूँ तो मैं बहुत निराश और दुखी हो जाता हूँ..


ये बातें मैं क्यों लिखते जा रहा हूँ, मुझे नहीं पता..और आप पढ़ कर क्या जवाब देंगे ये भी मैं नहीं जानता लेकिन फिर भी इसे पोस्ट कर रहा हूँ....बिना कुछ सोचे समझे...:)

2010 में गुलज़ार साहब ने बड़ी अच्छी कैलेंडर नज्में निकाली थी, जिसमे वही नॉस्टैल्जजिया है जिसका मैं यहाँ जिक्र कर रहा हूँ..अगर फुर्सत हो, तो वो भी इस लिंक पर जाकर देख लें..

Comments

  1. :(:( क्या क्या याद करा दिया.वैसे ज्यादातर, इंसान अपने बचपन और लड़कपन में ही वापस जाना चाहता है.उसे ही बार बार जीना चाहता है.
    पर मैं तो सदियों पुराने किसी एरा में जाना चाहती हूँ. मुझे इतिहास फेसिनेट करता है :).
    रोचक है तुम्हारी ये पोस्ट.
    कभी मिलेंगे... बैठेंगे... बातें करेंगे...:)

    ReplyDelete
  2. mujhe to 90s mein jaane ka dil karta hai rochak

    ReplyDelete
  3. आपकी पोस्ट पढ़कर मैं अपनी सुनहली यादों में खो गया।

    ReplyDelete
  4. waah , pahli baar aaya .. dil khush ho gaya ji

    ReplyDelete
  5. प्यारी पोस्ट है।

    सुनहरी यादें सभी को रोमांचित करती हैं। मैंने तो उन यादों को पल-पल फिर से जीने के मूड में एक ब्लॉग ही बना डाला और अभी तक 34 पोस्ट लिख डाली।:)

    ReplyDelete
  6. Is khoobsoorat post ne mujhe apna ateet yaad dila diya....achha bura sabkuchh...

    ReplyDelete
  7. एक बार मैंने नानाजी रविकांत नगाइच साहब को जादूगर कहा था.. आज वो खिताब तुमको देता हूँ.. शब्दों की जादूगरी नहीं भावों की जादूगरी.. चाहे कार की बातें हों या यार की.. डायरेक्ट दिल से!! कभी-कभी सच्च्मुच लगता है कि कैसे लिखना सीखूँ तुम्हारी तरह!! ईमान से!!

    ReplyDelete
  8. इतने सारे खयाल एक साथ घूमने लगे है दिमाग में आपकी यह पोस्ट पढ़कर की एक टिप्पणी एमएन सब कुछ लिखना संभव नहीं लग रहा है अभी जी :-) आपकी और मेरी पसंद की फिल्में लगभग एक सी है जो list आपने दी है उसमें से शायद ही कोई फिल्म ऐसी हो जो मुझे पसंद ना हो मैं कौन से दशक में जाना चाहूंगी यह मुझे नहीं पता अभी कुछ सोचा भी नहीं लेकिन हाँ आपकी यह पोस्ट पढ़ने के बाद इतना जरू कह सकती हूँ कि पूरने ज़माना इसलिए अच्छा लगता है क्यूँ तब लोग दिमाग से कम दिल से ज्यादा सोचा करते थे एक तरह का emotional वर्ल्ड के जैसा था वो समय इसलिए अपने आस पास के किसी भी रिश्ते में गुड़ सी मिठास हुआ करती थी फिर वो यारी दोस्ती हो या दूर दर्ज़ कि रिश्तेदारी मार आज के सो कॉल्ड आधुनिक युग में सब कुछ material स्टिक होगया है जहां सब को केवल अपनी-अपनी पड़ी है जो देखो बस अपने बारे में ही सोचता मिलता है। इसलिए अपने आप में ही गुम रहा करता है। ऐसे में यदि facebook और twitter जैसी social networking सीटेस मौजयद भी है दोस्तों कि खबर और updates रखने के लिए तो उसके लिए भी तो इस रिश्तों में रुचि होना ज़रूर है न अपने अलावा लोगों के विषय में सोचना ज़रूर है न मगर कोई सोचना चाहे तब ना....खैर इस टॉपिक पर तो बातों का सिलसिला ख़त्म होने से रहा। वैसे ही बहुत कुछ लिख दिया मैंने, कभी आपसे मुलाक़ात हुई तो ज़रूर बात करेंगे इस टॉपिक पर वैसे एक बात कहूँ आपकी इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपसे मिलने का मन हो रहा है। :):) face to face....

    ReplyDelete
  9. आपने बहुत सारी फिल्में याद दिला दीं...
    पुनः देखते हैं उन्हें और चल देते हैं उसी दौर में जहां यह पोस्ट ले जा रही है:)
    The nostalgic peep into those golden days has been recreated magically...
    Lovely post!

    ReplyDelete
  10. Arrey waah! Though I was never really a part of this era but it still fascinates me to no end!

    ReplyDelete
  11. mujhe to 80 aur 90 dono he dashak bahut pyare hai. jindagi ka best part the yeh dashak. jo kuch bura tha bhi, to us waqt ki simplicity aur apno ke beech hone ke ehsas ne use kam kar diya. Meri beti aksar puchti hai ki agar hamare paas time machine hoti to mummy tum kahan jana pasand karogi ? tab mera jawab hamesha yahi hota hai, ki 80's aur 90's ki life ek bar firse jeena chahungi.ab yeh movie to dekhni he padegi. thanks for taking me down the memory lane Abhishek ji.

    ReplyDelete
  12. जीवन का अटूट हिस्सा बनी रहती हैं ये स्मृतियाँ ..... प्रवाहमयी लेखन में कितना कुछ समेट लिया

    ReplyDelete
  13. अब से नहीं आएंगे बे तुम्हारे ब्लॉग पर ... एक तो साला तुम्हारा लिखा पढ़ कर सेंटी हो जाते है ... दूसरा सलिल दादा सही बोले है ... का समझे !


    इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - दा शो मस्ट गो ऑन ... ब्लॉग बुलेटिन

    ReplyDelete
  14. तुम्हारी पोस्ट पढ़कर एक विचार आया... शायद हम संवाद-अतिरेक के दौर में हैं, जहाँ बातें तो बहुत कुछ है, लेकिन 'कहा' कुछ नहीं जाता है। अजनबियों से बातें होती है, लेकिन अपने कहीं छूट जाते हैं।
    कुछ तो बेफिक्री के दौर का भी मामला है... मुझे भी 80 का दशक सूट करता है, क्योंकि उस दशक में कोई बोझ, दौड़, तनाव और दबाव नहीं हुआ करते थे... बस बेफिक्री हुअ करती थी, क्योंकि उस वक्त कोई-कोई ही 'कुछ' हुआ करता था, इसलिए आप पर भी 'कुछ' हो पाने का वैसा दबाव नहीं हुआ करता था।
    मस्त ब्लॉग....keep this continue... :-)

    ReplyDelete
  15. अमिता जी,
    ये आपने कितने पते की बात की है -

    क्योंकि उस वक्त कोई-कोई ही 'कुछ' हुआ करता था, इसलिए आप पर भी 'कुछ' हो पाने का वैसा दबाव नहीं हुआ करता था।

    ReplyDelete
  16. फ़िल्म की कथा भी पसन्द आई और आपकी भी। हममें से अनेक लोग शायद कमोबेश ऐसा महसूस करते हैं लेकिन बीते हुए दिन कहाँ फिरते हैं, यदि वापस आते तो फिर उनका आकर्षण ही कहाँ रहता?

    ReplyDelete
  17. प्रिय अभि,
    हमेशा की तरह ही यह पोस्ट भी तुमने दिल से ही लिखी है, जो दिल को सीधे छूती है...। सच है, शायद हम में से ज्यादातर लोग किसी न किसी काल में जाना चाहते होंगे...। बहुत बढ़िया, ऐसा ही लिखते रहो...।

    सच कहूँ, तो बचपन में जब-जब देवकीनन्दन खत्री की चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता सन्तति या भूतनाथ पढ़ती थी, तब उसी युग में जाना चाहती थी...जब आज की तरह इतना प्रदूषण, शोर-शराबा नहीं था...। प्रकृति के बीच इंसान कहीं तो मन की शान्ति पाता ही होगा...। ऐसा प्राचीन काल मुझे आज भी अपनी ओर खींचता है...।

    ReplyDelete
  18. माने न 80 का जादू!..... इसीलिए तो कहते है कि 80 के होते तो आज मुझे तुम्हें बूद्धू नहीं कहना पड़ता...... फिलहाल एक गाना याद आ रहा है......'जब छाए मेरा जादू, कोई बच न पाये....'----- समझ लो 80 का जादू तुम्हें कुछ कह रहा हो.....

    ReplyDelete
  19. अभि बेट्टा, बैठे ठाले अभी अभी हम ये पोस्ट दुबारा पढ़ गए...वैसे भी मेरा फेवरेट टाइमपास...:P
    तुमको कोई पागल क्यों समझेगा रे...? इसमें समझने जैसा का है ? :O
    रही बात फोन या मैसेज न करने की आदत...तो हम इस बात पर तुमको publically गरिया के काहे तुम्हरा बैंड बजाए :P

    ReplyDelete
  20. अभि बेट्टा, बैठे ठाले अभी अभी हम ये पोस्ट दुबारा पढ़ गए...वैसे भी मेरा फेवरेट टाइमपास...:P
    तुमको कोई पागल क्यों समझेगा रे...? इसमें समझने जैसा का है ? :O
    रही बात फोन या मैसेज न करने की आदत...तो हम इस बात पर तुमको publically गरिया के काहे तुम्हरा बैंड बजाए :P

    ReplyDelete

Post a Comment

आप सब का तहे दिल से शुक्रिया मेरे ब्लॉग पे आने के लिए और टिप्पणियां देने के लिए..कृपया जो कमी है मेरे इस ब्लॉग में मुझे बताएं..आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा...टिप्पणी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद..शुक्रिया