लहू है की तब भी गाता है – पाश

पाश (9.9.50-23.03.88)

पाश के बारे में पढ़ा हूँ लेकिन कभी ज्यादा पढ़ने का मौका नहीं मिला.करीब दो साल पहले प्रशांत ने शहीद भगत सिंह से सम्बंधित एक पोस्ट में बहुत ही अच्छी एक टिप्पणी की थी, और उसी टिप्पणी में उसने एक दो ब्लॉग के लिंक दिए थे जहाँ मुझे पाश के बारे में काफी कुछ पढ़ने को मिला था. पाश की चार कवितायेँ मैंने अपने ब्लॉग पर पहले भी पोस्ट की है. आज फिर उनकी कविता लगा रहा हूँ.

***२३ मार्च
उसकी शहादत के बाद बाकी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झांकी की
देश सारा बच रहा बाकी

उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिडकी में

लोगों की आवाजें जम गयीं
उसकी शहादत के बाद 
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने 
अपने चेहरे से आंसू नहीं,नाक पोंछी 
गला साफ़ कर बोलने की 
बोलते ही जाने की मशक की 
उससे सम्बंधित अपनी उस शाहदत के बाद 
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए 
कपड़ों की महक की तरह बिखर गया

शहीद होने की घडी में वह अकेला था इश्वर की तरह 
लेकिन इश्वर की तरह वह निस्तेज न था 

***
सपने
हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोई आग को सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुई
हथेली के पसीने को सपने नहीं आते
शेल्फों में पड़े
इतिहास-ग्रंथों को सपने नहीं आते

सपनों के लिए लाजमी है
झेलनेवाले दिलों का होना
सपनों के लिए
नींद की नज़र होनी लाजमी है
सपने इसलिए
हर किसी को नहीं आते

***
जिन्होंने उम्र भर तलवार का गीत गया है
उनके शब्द लहू के होते हैं
लहू लोहे का होता है
जो मौत के किनारे जीते हैं
उनकी मौत से जिंदगी का सफर शुरू होता है
जिनका लहू और पसीना मिटटी में गिर जाता है
वे मिट्टी में दब कर उग आते हैं

***
हमारे लहू को आदत है
मौसम नहीं देखता,महफ़िल नहीं देखता
जिंदगी के जश्न शुरू कर लेता है
सूली के गीत छेड़ लेता है

शब्द हैं की पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं
लहू है की तब भी गाता है
ज़रा सोचें की रूठी सर्द रातों को कौन मनाए?
निर्मोही पलों को हथेलियों पर कौन खिलाए?
लहू ही है जो रोज धाराओं के होंठ चूमता है
लहू तारीख की दीवारों को उलांघ आता है
यह जश्न यह गीत किसी को बहुत हैं-
जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में
तैरने का अभ्यास करते थे.

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