बंद करें सचिन पर बेतुके आरोप लगाना

ये पोस्ट लिखने को मैं मजबूर हुआ हूँ, जब आज सुबह से फेसबुक पर सचिन पर लगे तरह तरह के बेतुके आरोप देख रहा हूँ.कल शाम जब मुझे पता चला की सचिन का सौंवा शतक पूरा हुआ, तो मैं समझ गया था की अब आलोचक अपने बेबुनियत और बेतुकी टिप्पणियों की बौछार शुर कर देंगे.सबसे पहले तो वे कहेंगे की सचिन सिर्फ कमज़ोर टीमों के खिलाफ शतक लगते हैं, फिर कहेंगे की सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप में ही सचिन चलते हैं..अगर इससे भी उन्हें संतोष न हुआ तो वो ये कहने से भी पीछे नहीं हटेंगे की सचिन तो सिर्फ खुद के लिए खेलते हैं, टीम के लिए नहीं.और अगर मैच में हार मिलती है तो सचिन पर ये भी इलज़ाम लगेगा की सचिन जब भी शतक बनाते हैं तो भारत मैच हार जाती है.

कल हुआ भी कुछ ऐसा ही.बांगलदेश ने हमें हरा दिया.आलोचक के साथ साथ बहुत से लोग(जिन्हें क्रिकेट की समझ बिलकुल नहीं है) ये आरोप लगाने लगे की सचिन ने धीमे खेला, सचिन के वजह से भारत मैच हार..हम ये मानने को तैयार ही नहीं की हमारे बॉलर ने खराब बॉलिंग की या बांगलदेश के बैट्समैन ने अच्छा प्रदर्शन किया.हम इस बात को भी ध्यान नहीं देते की बांगलदेश की टीम भी अच्छी टीम है और पाकिस्तान के खिलाफ भी वो जीतते जीतते रह गयी.तो फिर क्यों लोग बड़े आसानी से ये सचिन पर इलज़ाम लगाते हैं की हार के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार हैं?मेरे समझ से ये बाहर है की जिस खिलाड़ी ने शतक जमाया वो कैसे किसी टीम के हार का जिम्मेदार हो सकता है.क्या टीम में सिर्फ सचिन ही थे.गेंदबाज बस क्या मैदान में घूमने गए थे?

बहुत से लोग कल से ये बात कर रहे हैं की कल सचिन सिर्फ खुद के लिए खेल रहे थे.जबकि अगर कल सचिन के जगह कोई भी दूसरा बल्लेबाज होता जैसे सहवाग,द्रविड़,धोनी या गंभीर तो 77.55 के स्ट्राईक रेट से 114 रन बनाने पर कोई उनपर ये इलज़ाम नहीं लगाता की उन्होंने धीमे खेला या वो खुद के लिए खेल रहे हैं, टीम के लिए नहीं.ये लोग वही हैं जो ये भी अच्छी तरह से जानते थे की शुरुआत में पिच थोड़ी धीमी थी और बौल सही तरीके से बैट पर आ नहीं रही थी.शुरुआत से ही ये बात पक्की थी की इस पिच पर 275-290 के बीच का कोई भी स्कोर कम्पेटटिव होगा.हमारे गेंदबाजों ने अच्छी बॉलिंग नहीं की जिसके वजह से हम अपने 289 के स्कोर को डिफेंड
नहीं कर पायें.बंगलादेश के बैट्समैन ने अच्छा प्रदर्शन किया..लेकिन इस बात से कुछ ‘महा-ज्ञानी’ लोगों को क्या फर्क पड़ता है, उनके लिए तो सिर्फ और सिर्फ सचिन ही जिम्मेदार है हार के लिए.

सचिन को खुदगर्ज लोग आज से नहीं, बहुत पहले से कहते आ रहे हैं, और उन्हें हर बार इस बेतुकी टिपण्णी को सहना पड़ता है की वो टीम के लिए नहीं, खुद के लिए खेल रहे हैं.लेकिन हर बार ये आरोप सिर्फ सचिन पर ही क्यों लगता है?एक उदाहरण देना चाहता हूँ.तेंदुलकर ने पाकिस्तान के खिलाफ 194 रनों की पारी खेली थी,और लोगों ने इलज़ाम लगाया की वो रिकॉर्ड बनाने के लिए खेल रहे हैं, उनका औसत बहुत कम था(54).लेकिन द्रविड़(वो टेस्ट के सबसे अच्छे खिलाड़ी हैं, फिर भी) जिन्होंने दक्षिण-अफीका के खिलाफ एक टेस्ट मैच मैं दोहरा शतक लगाया था 46 के औसत से, उस वक्त किसी ने ये नहीं कहा की द्रविड़ धीमा खेले हैं या सिर्फ अपने रिकॉर्ड(दोहरा शतक) के लिए वो खेल रहे हैं.तो फिर ये बर्ताव सिर्फ सचिन के ही साथ क्यों?

सचिन जब 60,70 रन बना कर आउट हो जाते हैं तो लोगों के नज़र में इस स्कोर की कोई अहमियत नहीं रहती.दिक्कत ये है की जब सहवाग,गंभीर,द्रविड़ और धोनी जैसे बल्लेबाज के रन बनाने के औसत कम रहते हैं तो वो सबको ठीक लगता है, कोई ऊँगली नहीं उठता, क्यूंकि सब कहते हैं की वे परिस्थिति के हिसाब से खेल रहे थे, लेकिन वहीँ जब सचिन के रन बनाने का औसत कम होता है तो लोग हमेशा ये सवाल उठाते हैं की वो सिर्फ खुद के लिए खेलते हैं.मैं अपनी बात इतने भर से ही खत्म नहीं करूँगा, आपके सामने कुछ और उदाहरण भी देना चाहूँगा..1999 वाला चेन्नई टेस्ट किसे याद नहीं होगा?सचिन को बहुत बैक-पेन था.वो आईस-क्यूब पीठ पे बांधे और पेन-किलर खा कर खेल रहे थे.मैच को जल्दी पूरा करने की कोशिश में वो आउट हो गए.उस वक्त भारत को जीत के लिए 16 रन चाहिए थे और तीन विकट हाथ में थे.लेकिन भारत वो मैच 12 रनों से हार गया.सचिन को मैन-ऑफ-द मैच मिला लेकिन वो उसे लेने तक नहीं आये.बाद में राज सिंह डूंगरपुर के द्वारा पता चला की वो ड्रेसिंग रूम में रो रहे थे..सच में आखिर वो एक खुदगर्ज खिलाड़ी जो ठहरे.

एक और उदाहरण देखिये..शारजाह कप, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच…भारत को मैच जीतने के लिए 276 रन चाहिए थे और फाईनल में क्वालीफाई करने के लिए 237 रन.सचिन ने शानदार 143 रन 113 गेंदों में बनाए थे.उन्होंने पहले ये निश्चित कर लिया की भारत फाईनल में क्वालीफाई कर गया है, और फिर वो जीत के लिए कोशिश कर रहे थे..लेकिन बैट का इनर-एज लग कर गेंद विकेटकीपर(गिलक्रिस्ट) के हाथों में गया.बॉलर ने अपील की..लेकिन अंपायर ने आउट नहीं दिया.सचिन को लगा की वो आउट हो गए हैं और वो बिना किसी के कहे खुद वापस पेवेलियन लौट गए.लोग स्तब्ध थे.दर्शकों ने उन्हें स्टैंडिंग-ओवेसन दिया..ऐसा तो बस एक खुदगर्ज खिलाड़ी ही कर सकता है न. एक और आप उदाहरण लीजिए..पिछले साल के वर्ल्ड-कप का एक मैच.वेस्ट-इंडीज के खिलाफ मैच में पहले ही ओवर में रवि रामपॉल की एक गेंद बैट का किनारा लेते हुए विकेट-कीपर के हाथों में चली गयी.रामपॉल ने अपील की लेकिन अंपायर ने आउट नहीं दिया.सचिन अंपायर के फैसले के लिए रुके भी नहीं और वापस पेवेलियन लौट गए.सच में कितने खुदगर्ज खिलाड़ी हैं सचिन.

एक बात जिसका जिक्र लोग अक्सर करते हैं, वो ये की सचिन सिर्फ कमज़ोर टीमों के खिलाफ ही चलते हैं.जबकि ये बात बिलकुल गलत है, कुछ लोग ये जानते भी हैं लेकिन फिर भी उनपर इस तरह के आरोप लगते रहते हैं.लोग ये तो याद रखते हैं की सचिन ने नामबिया के खिलाफ 152 रन बनाये थे लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ बनाये 98 रनों को बड़े आसानी से भूल जाते हैं.ठीक वैसे ही लोग ये अच्छी तरह याद रखते हैं की सचिन ने 248 रन बंगलादेश के खिलाफ बनाये लेकिन ये भूल जाते हैं की इसी सचिन ने 11 शतक ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ लगाये जिसमे सात टेस्ट-शतक तो ऑस्ट्रेलिया के ही पिचों पर थे.लेकिन फिर भी लोग कहते हैं की सचिन सिर्फ कमज़ोर टीमों के खिलाफ ही खेल कर अपना रिकॉर्ड बनाते हैं.मुझे अच्छे से पता है की मैं जितने भी तथ्य सामने रखूं, वैसे ‘ज्ञानी’ लोग ऐसे आरोप लगाना बंद नहीं करने वाले..लेकिन फिर भी आप इस स्टेट्स को देख कर खुद ही अदाज़ा लगा लीजिए की सचिन के कितने शतक कमज़ोर टीमों के खिलाफ है और कितने मज़बूत.

लोग तो ये भी कहने से नहीं चुकते की सचिन ने जिस मैच में शतक लगाया उस मैच में हमें हार मिली.इसतरह के बेतुके और बेहूदे इलज़ाम से मुझे गुस्सा नहीं आता बल्कि हंसी आती हैं की लोग इतने बेवकूफ कैसे हो सकते हैं.कैसे इस तरह की बेबुनियाद बातें कर सकते हैं.जबकी अधिकतर मैचों में सचिन के शतक से जीत मिली है.14 मैचों में हमें हार का सामना करना पड़ा है, लेकिन उन मैचों में भी मिली हार का क्या जिम्मेदार सिर्फ सचिन ही थे?बाकी के दस खिलाड़ी नहीं?सिर्फ एक सचिन को ही बैटिंग करना आता है टीम में?इस बात के लिए भी मैं एक तथ्य सामने रखना चाहूँगा जो की सच में मजेदार है.24 ऐसे मैच(टेस्ट+वन-डे) थे जिसमे सचिन ने शतक लगाये और हमें हार का सामना करना पड़ा.लेकिन इन 24 मैचों में सचिन के अलावा कोई भी दूसरा बल्लेबाज 50 रन तक नहीं बना पाया(गांगुली को छोड़कर, जिन्होंने अफ्रीका में 127 रनों की पारी खेली थी).इन 24 मैचों में 17 मैच ऐसे थे जिसमे सचिन ने पहली पारी में शतक लगाया.जिसका मतलब ये है की टीम की गेंदबाजी हार का मुख्य कारण थी.और 24 में से 16 शतक विदेशी पिचों पर इन्होने लगाया था.आप इन्ही स्टेट्स को यहाँ भी देख सकते हैं(ज्यादा जानकारी आपको ये फेसबुक नोट दे सकती है) :

मुझे कभी कभी लोगों के अक्ल पर सच में ताज्जुब होता है.लोग कितने आसानी से ये भूल जाते हैं की पिछले 22 साल से सचिन ईमानदार होकर क्रिकेट खेल रहे हैं और अन्य क्रिकेटरों से लगातार बेहतर खेल रहे हैं.उन्हें कितनी ही बार चोटें लगी,ओपेर्सन करवाना पड़ा..लेकिन आज भी वो सबसे ‘फिट’ खिलाडियों में गिने जाते हैं, और आज भी ‘रनिंग बिटवीन द विकट’ में उनका मुकाबला कोई नहीं कर सकता.लोग आसानी से ये भूल जाते हैं की 2003 के वर्ल्ड कप के सभी मैचों में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया था और भारत को फाईनल तक पहुँचाने का श्रेय सबसे ज्यादा उन्ही को जाता है.लेकिन फाईनल में उनके जल्दी आउट होते ही लोग तरह तरह की बातें करने लगे.कहने लगे की सचिन दबाव में नहीं खेल सकते और वो ‘मैच-विनिंग’ पारियां खेलने में नाकाम रहते हैं.ऐसे लोगों की बातों पर मुझे अफ़सोस होता है, और उनकी बुद्धि पर संदेह.यदि आपको भी ऐसा लगता है तो कृपया इस लिंक पर और इस लिंक पार जाकर अपना संदेह दूर कर सकते हैं.

सचिन को खुद कितना दुःख पहुंचा होगा की लोग उनके द्वारा बनाये गए बाकी 99 शतक की बात भी नहीं कर रहे और चर्चा है तो सिर्फ सौवें शतक की.सचिन के खुद भी यही कहा की “”मुझे ये बात परेसान कर रही थी की जहाँ भी मैं जाता था, जिधर भी लोग हमेशा मेरे सौवें शतक के बारे में पूछते थे, कोई मेरे बाकी 99 शतक के बारे में बात नहीं करता.रिकॉर्ड तोडना कभी मेरे मन में नहीं रहा, मैं सिर्फ क्रिकेट खेलता हूँ और यही एक बात मेरे दिमाग में रहती है..मेरे दिमाग में ये माइल्स्टोन नहीं था, इसे शुरू मिडिया ने किया.अगर सच कहूँ तो इस सौवें शतक को लेकर मैं कई बार हताश भी हुआ हूँ लेकिन मैंने कोशिश करना छोड़ा नहीं,कई बार मैं अच्छा खेलते हुए शतक लगाने के करीब पहुंचा लेकिन पता नहीं क्यों मैं शतक लगा नहीं सका.ये शतक शायद सबसे मेरे लिए सबसे कठिन रहा है’.

लोग अक्सर ये कहते हैं की युवाओं को टीम में जगह मिलनी चाहिए, और बहुत से युवाओं को बहुत से मौके मिलते भी हैं.पिछले साल की अगर बात करें तो पिछला साल भारतीय टेस्ट-क्रिकेट के लिए अच्छा साल नहीं रहा था.पिछले साल भारत के तरफ से तीन शीर्ष रन बनाने वाले बल्लेबाज थे राहुल द्रविड़,लक्ष्मण और सचिन.इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता.ऑस्ट्रेलिया का दौरा काफी निराशाजनक रहा लेकिन अगर आप गौर करें तो जब भी भारत की बैटिंग बुरी तरह लडखडाई है तब सचिन ही दूसरे सबसे बड़े स्कोरर थे.लेकिन फिर भी आलोचकों ने हार का जिम्मेदार सबसे ज्यादा सचिन को ठहराया.असल में सबसे बड़ी बात तो ये है की अभी भी सचिन टीम के सबसे अच्छे बल्लेबाज हैं, जो उनके सबसे बड़े आलोचक हैं शायद वे भी इस बात से आसानी से इनकार नहीं करेंगे.

पिछले दो सालों में भारतीय बल्लेबाज का रिकॉर्ड.

सचिन के आलोचक एक और तथ्य को बड़े आसानी से नज़रअंदाज कर देते हैं की सचिन ने पिछले एक साल में शतक ना लगाने के बावजूद एक हज़ार रन पुरे किये.तो क्या सिर्फ शतक का ही महत्त्व है, रनों का नहीं..35,50,65,80,90 रनों की पारियां क्या महत्वपूर्ण नहीं है, पारियां क्या तभी महत्वपूर्ण होती हैं जब 100 रनों की हो?पिछले साल दिल्ली में और फिर मुंबई में वेस्ट-इंडीज के खिलाफ उन्होंने बेहद आकर्षक पारियां खेली लेकिन शतक बनाने से चूक गए.लोग इन पारियों पर गर्व करने के बजाये सचिन को शतक न बनाने के लिए इस तरह से जिम्मेदार ठहरा रहे थे जैसे उन्होंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो.लोगों ने सिर्फ सचिन के शतक ना लगा पाने की वजह से ये कहना शुरू कर दिया की उन्हें क्रिकेट से सन्यास ले लेना चाहिए..लोगों की इस मानसिकता पर मुझे बेहद अफ़सोस भी होता है और गुस्सा भी आता है, की क्या सिर्फ शतक ना लगा पाने के वजह से किसी को खेल से सन्यास ले लेना चाहिए? हाँ, मैं खुद भी मानता हूँ की उन्हें अब सन्यास ले लेना चाहिए, लेकिन एक प्रश्न ये है की सचिन का हमारे पास क्या वाकई कोई विकल्प है?इतने सालों में हम अब तक सौरव गांगुली का कोई विकल्प नहीं ढूँढ पाए हैं और पिछले दिनों राहुल द्रविड़ ने भी सन्यास ले लिया.माने या न माने, राहुल द्रविड़ के सन्यास लेने से बहुत बड़ा झटका लगा है भारतीय टेस्ट टीम को, और ऐसे में सचिन का भी अभी सन्यास ले लेना क्या टीम के लिए सही होगा?बात तो तब होती जब सचिन से अच्छा प्रदर्शन करने वालों की कमी नहीं होती टीम में, लेकिन मौजूदा हालत में तो सचिन फिर भी सभी से बेहतर परफोर्म कर रहे हैं..क्या सच में हमारे पास सचिन का विकल्प मौजूद है?

सचिन ने इतने साल इमानदारी पूर्वक क्रिकेट खेला है और भारतीय क्रिकेट को बहुत कुछ दिया है,हमें अपने देश पर, क्रिकेट पर गर्व करने के बहुत से क्षण सचिन ने दिए हैं और उन्हें खेल की समझ, क्रिकेट की समझ हमसे, आपसे कहीं ज्यादा है..वो हमारे और आपके ही तरह एक इंसान हैं और अच्छा-बुरा निर्णय लेने की भी वो अच्छी काबिलियत रखते हैं.वो हमसे बेहतर क्रिकेट भी जानते हैं, और क्रिकेट को वो कब अलविदा कहे, ये एक निर्णय अगर हम उन्ही पर छोड़ दें तो क्या ये सही नहीं होगा?क्या हमें उनपर फ़ालतू के इलज़ाम लगाने के बजाय उन्हें बधाई नहीं देनी चाहिए सौवें शतक की?क्या हमें बेतुके, बेहूदे और बेबुनियाद बातों को छोड़कर सचिन का साथ नहीं देना चाहिए, उनपर गर्व नहीं करना चाहिए?

(Fact source :Sachin and critics website, Sachinist website)

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  1. यही तो आजादी मिली है हमें, कुछ भी बोलने की। जिन्हें बल्ला पकड़ना भी नहीं आता होगा वो भी एक्सपर्ट बने हैं।
    मेहनत करके दिल से लिखी पोस्ट,पसंद आई।

  2. बहुत ही बढ़िया विश्लेषण…आरोपों में कोई तथ्य हो तो ध्यान भी दिया जाए…

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