बैंगलोर और कुछ अच्छे लोगों का साथ


बैंगलोर डायरी : २ 

इस पोस्ट से पहले के एक पोस्ट से मैं बैंगलोर डायरी की शुरुआत कर रहा हूँ, इस शहर की कुछ ना भूलने वाली अपनी यादों को मैं यहाँ कभी कभी संजोता जाऊँगा, ताकि आप मेरा ये शहर मेरी नज़रों से देख सकें..आज के पोस्ट में मैंने शहर का नहीं बल्कि मेरे तीन दोस्तों का जिक्र किया है, और ये ‘लंबी सी पोस्ट’ उन्ही तीनो को समर्पित है, जिनकी वजह से बैंगलोर के कुछ दिन, कुछ पल सच में यादगार बन गए.

ये मेरे पहले जॉब का पहला दिन था और मैं आधे दिन की छुट्टी लेकर
फोरम मॉल आ गया था…:)
कई कारणों से ये शहर मुझे पसंद है..जहाँ एक तरफ बहुत कुछ सीखाया है इस शहर ने तो वहीँ दूसरी तरफ कुछ अच्छे लोगों से मुलाकात भी हुई.कॉलेज खत्म होने के बाद मैं यहाँ आया था, और कुछ समय तक अपने कॉलेज के ही दोस्तों के साथ रहा.थे तो वो सब भी अच्छे ही, लेकिन उनके साथ रहते हुए भी मैं बहुत अकेला महसूस करता था.अपने दो दोस्तों ‘अकरम और समित’ की याद बेतरह आती थी.जब मैं बहुत ज्यादा अकेला महसूस करता, तो शहर घूमने निकल जाता था.बैंगलोर में घुमक्कडी की आदत उन्ही दिनों की लगी हुई है.मेरे पास बस का मासिक पास रहता था और ‘मेजेस्टीक बस स्टैंड’ पर खड़े होकर ये तय करता था की आज किधर निकलना है, फिर जो इलाका पसंद आ जाता वहाँ घूमने निकल जाता था और देर शाम वापस आता..शुरू के तीन चार महीने तो यही सिलसिला बना रहा.लेकिन मुझे यहाँ बड़ी बोरियत सी महसूस होने लगी.फिर पता चला की मेरे एक कॉलेज के सीनिअर ‘मनीष सर’ भी इसी शहर में जॉब कर रहे हैं और वो ज्यादा दूर भी नहीं रहते.वे शुरू “दिसंबर” के दिन थे जब मुझे ये बात पता चली थी.कॉलेज में तो मनीष सर से एक बहुत अच्छा रिश्ता था,लेकिन यहाँ उनसे बहुत अच्छी दोस्ती हुई.उनके साथ बैंगलोर हद से ज्यादा घुमा हूँ.हर कोना, हर इलाका, हर मॉल और अपने इलाके के हर रेस्टुरेंट को हम दोनों रौंदे रहते थे.सिग्मा मॉल एक तरह से हम दोनों का दूसरा घर बन गया था.उन दिनों जिस इलाके में मनीष सर रहते थे, वहाँ से सिग्मा मॉल बेहद नजदीक था और हम जब-तब यहाँ आ धमकते थे.इस मॉल के फूडकोर्ट में काम करने वाले अधिकांश लोग हमें पहचान गए थे.कितनी बार तो मैं यहाँ के फूडकोर्ट में सोफे जैसे गद्देदार सीटों पर सो भी जाता था, लेकिन कोई भी फूडकोर्ट कर्मचारी हमें कुछ नहीं कहता.एक कॉफी आउटलेट भी था जहाँ से कभी कभार हम कॉफी ले लिया करते थे.जब भी हम कॉफी आर्डर करते तो कॉफी शॉप वाला हमें बड़ा मुस्कुराकर देखता, मानो जैसे मन ही मन कह रहा हो “शुक्र है आख़िरकार कॉफी तो लिया इन लोगों ने, नहीं तो हमेशा मुफ्त में यहाँ बैठे रहते हैं”.

मनीष सर – ये एक खूबसूरत शाम थी
मनीष सर एक अच्छे दोस्त के साथ साथ एक बहुत अच्छे कुक भी हैं और उनके हाथ का बना चिकन पर तो मैं किसी भी रेस्टुरेंट का कोई भी डिश खुशी खुशी कुर्बान कर दूँगा.मुझे लगता था की चिकन खाने के मामले में उनका कोई सानी नहीं लेकिन मेरा ये अंदाजा तब गलत निकला जब एक बार मनीष सर के दो दोस्त अमित और अरूप सर लंच पे आये थे.चौंकियेगा मत अगर मैं कहूँ की लगभग पौने चार किलो चिकन को तीन लोगों ने मिलकर खत्म किया था(चिकन या ग्रेवी का नामो-निसान तक नहीं बचा).उस दिन अपने सीनिअर को देखते हुए मुझे लगा की मनीष सर कितना कम खाते हैं.मनीष सर के साथ तो कई यादगार पल रहे हैं, लेकिन अगर मैं याद करने बैठूं तो मेरे लिए सबसे यादगार शाम वो थी जब सिग्मा मॉल के बाहर हम दोनों बहुत देर तक बैठे रहे, और मैं मनीष सर को किसी की चिट्ठियां पढ़ के सुना रहा था.मनीष सर से उस शाम जितनी आत्मीय बातें हुई थी, वैसी बातें उनसे फिर कभी नहीं हुई.उस चिट्ठी से सम्बंधित बातों का रुख जब अच्छा खासा गंभीर हो गया तो मनीष सर के एक मस्त कमेन्ट से हम दोनों हँस पड़े.उन्होंने कहा ‘यार बताओ तो ई उस समय भी इतना टाईट अंगरेजी में चिट्ठी लिखती थी, हमको तो अभियो बहुत सा वर्ड का माने समझने के लिए डिक्शनेरी खोलना पड़ेगा’. 
मनीष सर के साथ बिताए हर पल अनमोल थे.मनीष सर के अलावा राहुल के साथ भी अच्छा समय बिताया मैंने.मेरे लिए सबसे मजेदार पल तब होते थे जब राहुल मनीष सर और मैं एकसाथ होते थे.पता नहीं किसके दिमाग की ये उपज थी की हमने हमारे अलग अलग नाम रख लिए थे.मनीष सर का ‘अर्नोल्ड’, राहुल का ‘पिएर्स ब्रोसनन’,और मेरा ‘जोर्ज क्लूनी’.मैंने एक बार ‘पिएअर्स,क्लूनी और अर्नोल्ड’ के नाम से एक सीरीज भी शुरू की थी जिसकी तीन पोस्ट यहाँ डाली थी मैंने.इसी कड़ी की एक और पोस्ट शायद जल्द ही कभी लिखूं.
निशांत..स्टाइल देखिये, चश्मा
पहन कर पेस्ट्री खा रहे हैं  
मनीष सर के अलावा जिस लड़के के साथ मुझे शहर घूमने में मजा आया वो है -निशांत.इससे मेरी दोस्ती होने की दो वजहें थी..कार और फ़िल्में.हम दोनों गज़ब के ‘कार दीवाने’ और ‘मूवी-बफ’ हैं.मैं यहाँ अपनी कॉलेज की पढाई खत्म कर के आया था और निशांत की कॉलेज-लाईफ यहाँ शुरू हुई थी.शुरू शुरू में हमारी कुछ खास दोस्ती नहीं थी, सिर्फ औपचारिक मुलाकात होती थी.मुझे निशांत हमेशा एक रिजर्व लड़का लगता था,जो ज्यादा किसी से घुलता मिलता नहीं था.लेकिन धीरे धीरे जब निशांत से बात होती गयी, तो निशांत के प्रति मेरी पहली राय बिलकुल गलत साबित हुई.आसपास के लड़कों के साथ फ़ालतू की बातें करने से अच्छा मुझे लगता निशांत के साथ वक्त गुजारना.हम घंटों कारों पर चर्चा करते.’गौन इन सिक्सटी सेकण्ड’ और ‘फास्ट एंड फुरिअस’ पचासवां बार भी देखते समय दोनों का इक्साइट्मन्ट लेवल अपने चरम पे रहता.सड़कों पर चलते हुए जहाँ बाकी दोस्तों की नज़र ‘लड़कियों’ पर केंद्रित रहती,हमारी नज़रें नयी और आकर्षक गाड़ियों को खोजते रहती.एक दफे निशांत के इम्तिहान खत्म ही हुए थे और मेरी तबियत भी अचानक खराब हो गयी, जिसके वजह से दस दिनों तक मैं रेस्ट में रहा.इन दस दिनों में हमने जबरदस्त फ़िल्में देखीं.अपना रूटीन कुछ ऐसा हो गया था की निशांत सुबह ब्रेक-फास्ट लाने जाता बाजार तो वापस आते वक्त सी.डी लाइब्ररी से दो तीन फ़िल्में भी लेते आता जिसे हम दिन में ही देख कर शाम में वापस भी कर देते, और रात के लिए फिर से दो फ़िल्में लाते.बहुत ज्यादा फ़िल्में देखि थी हमने इन दस दिनों में.दस दिन का समय कैसे कट गया पता भी नहीं चला.
निशांत से लगभग मैं हर बात शेयर करने लगा था.मुझे ऐसा लगने लगा की निशांत मेरी जिंदगी में समित की कमी को पूरा कर रहा है.मुझे जो बात सबसे ज्यादा उसकी पसंद आई वो उसका हंसमुख स्वाभाव था.समित के जैसे ही निशांत भी बड़ा हंसमुख लड़का है और अपने आसपास के लोगों को भी हमेशा खुश रखता है.2009 के आखिरी कुछ दिन मुझे हमेशा याद रहेंगे.24 दिसंबर से ही जो घूमने का मूड बना वो तीन चार जनवरी तक बरकार रहा.और हम लगभग हर शाम घूमने निकलते थे.अपनी पसंदीदा जगह थी कनिग्हम रोड पर स्थित रिलाएंस डिजिट के कॉफी शॉप में बैठना..वहाँ से पुरे रोड का नज़ारा दिखाई देता था, और हम हर शाम यहीं बैठते थे.एक टेबल खास हमारे लिए फिक्स्ड रहता था. 
सुबह सुबह बाईक टेस्टिंग 🙂
हम दोनों कम पागल नहीं थे,एक दफे जब एक दोस्त ने नयी बाईक खरीदी तब निशांत और मैं मैं निकल पड़े सुबह चार बजे ही बैंगलोर की खाली सड़कों पर बाईक दौड़ाने[बाईक टेस्टिंग यु नो :)] और सुबह आठ बजे हम वापस आये. मुझे जब भी मेरे पुराने ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी चाहिए होती थी,तब मैं अक्सर मैनेजर से कहता, सर निशांत मेरा छोटा भाई है, उसके कॉलेज जाना है, या फिर वो बीमार है या उसे किताबें खरीदनी है वैगरह वैगरह.निशांत मेरे से कहता, आप मेरे नाम का अपने ऑफिस में इतना यूज कर चुके हैं की अगर मैं कभी वहाँ जॉब करने गया तो आपका मैनेजर मेरा नाम सुनते ही मुझे लात मार के बाहर करेगा”.
निशांत 2010 के शुरुआत में दो तीन महीनो के लिए घर चला गया था, उसके कॉलेज खत्म हो गए थे, और ठीक यही वो समय था जब मैं फिर से उसके जाने के बाद एकाएक अकेला महसूस करने लगा था(जिसके बहुत से और कारण भी थे,निशांत साथ था तो वो बातें भी ज्यादा परेसान नहीं करती थीं).2010 के “दिसंबर” में निशांत दूसरी बार घर गया, और इस बार घर से वापस आते ही वो बैंगलोर के कोरमंगला इलाके में शिफ्ट हो गया.उसने फिल्म-मेकिंग से सम्बंधित एक कोर्स ज्वाइन कर लिया था.निशांत के शिफ्ट होने से मुझे थोडा दुःख हुआ.मुझे लगा जैसे यहाँ आसपास मेरा एकमात्र दोस्त यही था जो अब किसी दूसरे इलाके में जा रहा है.आज भी उसके घर जाने का दिन याद है , 3 “दिसंबर” और ये भी की उसके घर जाने के ठीक एक दिन पहले हमने बड़ी अच्छी शाम बिताई थी.अभी इस “दिसंबर”(2012) का भी एक दिन याद है जब निशांत और मैं, मेरे स्टाइल से शहर घुमे थे.ये निशांत के लिए एक अनोखा इक्स्पिरिएंस, जो उसे बहुत पसंद भी आया था और दिन बेहद खूबसूरत गुज़रा था.
रवि जी , 31st दिसंबर की शाम 
जहाँ एक तरफ निशांत शहर घुम्मकड़ी का मेरा साथी था तो वहीँ मेरी बातों को झेलते थे ‘रवि जी’.रवि जी के बारे में मैं क्या कहूँ, मेरे पास सच में शब्द नहीं हैं.बचपन से ही बहुत संघर्षमय जीवन रहा इनका.बहुत ठोकरें खायीं हैं इन्होने, बहुत दर्द, तकलीफ झेला और बहुत मुसीबतों से गुजरने के बाद आज इस मुकाम पे हैं.बहुत ही कम उम्र में जीवन की क्रूरता को देखा है इन्होने.इनके जीवन में आई कठिनाइयों के बारे में जानकार और उन कठिनाइयों का कैसे सामना किया इन्होने, वो सही में अद्दुत है.जब से मैंने इनकी जिंदगी को करीब से जाना है, तब से इनके प्रति इज्ज़त दिल में और बढ़ गयी है.मेरे से तीन साल बड़े हैं और हम दोनों एक दूसरे को ‘सर’ कह कर संबोधित करते हैं.रवि जी फ़िलहाल एक मेडिकल सेक्टर में काम करते हैं.बायलोजी के ऐसे विद्वान की अच्छे अच्छे डॉक्टरों को भी चैलेन्ज कर दे.इन्हें दुनिया में सबसे ज्यादा प्रिय है पढ़ाई करना.अच्छी खासी जॉब है इनकी लेकिन फिर भी बायलोजी के पुस्तकों के प्रति अटूट प्रेम है.ये मुझे अक्सर बायलोजी के नए नए फंडे सिखाते रहते हैं, कुछ तो बड़े रोचक रहते हैं और अधिकतर मेरे सर के ऊपर से जाते हैं.इनसे जान पहचान तो बहुत समय से थी लेकिन इनके करीब आने का भी एक दिलचस्प वाकया है.एक जनवरी का दिन था..सुबह से मैं बहुत खुश था.माँ-पापा से, बहन से बातें हुई, एक दोस्त का विदेश से फोन भी आया था और दिन बड़ा खूबसूरत लग रहा था.मैं अपने हॉस्टल के टेरेस पे जाकर बैठ गया और डायरी में लिखी कुछ नज्मों को पढ़ने लगा.रवि जी पास आये और कुछ देर मेरे पास खड़े रहे, फिर मेरे से पूछा ‘अभिषेक जी, क्या पढ़ रहे हैं आप?’. मैंने कहा: ‘कुछ नहीं रवि जी, बस कुछ नज्में हैं और कुछ फराज़ साहब, बशीर बद्र साहब की शायरी’.मुझे मालुम नहीं था की रवि जी को भी शायरी से प्रेम है.उन्होंने शायरी सुनने की फरमाइश कर दी.एक घंटे तक मैं सुनाता रहा, वो सुनते रहे.फिर अंत में उन्होंने मेरी वो डायरी अपने पास रख ली, ये कहकर की इत्मीनान से रात में पढूंगा.
शायरी के बाद बारी थी नए साल के पहले दिन चाय की.हम चाय पीने निकले, तो राहुल भी चाय दूकान पर मौजूद थे.एक जनवरी को राहुल का जन्मदिन है, तो उन्हें हमने विश किया और फिर वहीँ चाय दूकान पर ही कुछ शेर और ठोके गए.शायरी के बहाने जो बात शुरू हुई तो बहुत दूर तक गयी.रवि जी और मैं बहुत देर तक रवि जी के रूम पे बातें करते रहे.ज्यादतर बचपन की बातें.बातें इतनी आत्मीय थी की थम ही नहीं रही थी.रात में भी बहुत देर तक हम गप्पे करते रहे,अगले दिन काम पे जाने की मजबूरी न होती तो हम सारी रात बातें करते रहते.उस दिन हमारी बातों का केन्द्र अधिकतर पारिवारिक ही था.घर-परिवार की इतनी बातें उस शाम और रात इतने आत्मीय ढंग से हुई थी की आखिर में रवि जी काफी भावुक होकर कहने लगे “ये तो मैंने निश्चय किया हुआ है की फिर से एक बार उन दिनों को जियूँगा..कभी फिर से कुछ समय के लिए ही सही,गाँव घर में जाकर रहने का आनंद उठाऊंगा…इतना तो पक्का है”.
उस दिन से हमारे बीच काफी गंभीर बातें होने लगीं, ज्यादातर पारिवारिक और घर की बातें.कभी कभी हमारी बातें इतनी संजीदा हो जाती थीं, की मेरे लिए विश्वास करना मुश्किल होता की मैं भी इतनी गंभीरता से किसी बात को एनालाइज़ कर किसी नतीजे पे पहुँच सकता हूँ.जब से रवि जी से करीबी दोस्ती हुई है, तब से उनका तबादला चेन्नई हो गया है, लेकिन फिर भी वो हर सप्ताहांत यहाँ आते रहते हैं.पिछले दिनों जब मैं काफी परेसान रहता था, तो अक्सर ये सोचता, चलो इस सप्ताहांत तो रवि जी आ ही रहे हैं, कम से कम दो दिन तो  खूबसूरत गुजरेंगे ही.एक वीकेंड याद आ रहा है, जब मैं कुछ कारणों से थोडा परेसान था.रवि जी शुक्रवार शाम को ही बैंगलोर पहुँच गए थे जो मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था(वो शनिवार सुबह पहुँचते हैं).रात डिनर के बाद जो बातों का सिलसिला चला तो सुबह के चाय तक जारी रहा.इस दौरान मैंने और रवि जी ने अपनी कुछ विशेष बातों को एक दूसरे के सामने रखा, उन बातों से सम्बंधित परेशानियों पर हमने रात भर चर्चा की, और लगभग एक नतीजे पर हम पहुंचे भी.
रवि जी और मेरे से सम्बंधित एक दिलचस्प और मजेदार फैक्ट भी है.पिछले दो महीनो से रवि जी का बैंगलोर आना काफी कम हो गया है, ऐसे में जब भी ये बैंगलोर आते हैं या बैंगलोर से जाते हैं या फिर जिस दिन भी मेरी इनसे लंबी बात होती है तो उस दिन मैं अपनी डायरी में बड़ी खूबसूरत खूबसूरत बातें दर्ज करता हूँ( बाई द वे इत्तेफाक देखिये, कल वो आ रहे हैं और आज रात दो बजे मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ).वैसे ये भी दिलचस्प है की वो खूबसूरत बातें कहीं से भी रवि से सम्बंधित नहीं होती हैं, किसी दूसरे के लिए लिखी गयी होती हैं, जिन्हें मैं सिर्फ और सिर्फ खुद के लिए डायरी में लिखता हूँ.एक दफे मैंने रवि जी को एक्सेप्सन में डाला और डायरी में से एक खास नोट पढ़ के उन्हें सुनाया.बड़े खुश हुए वो, मुझे बड़ी वाह-वाही मिली और अगले सुबह की मुफ्त चाय भी.
इन्हें मैं अक्सर अपनी पोस्ट और मेरी लिखी कुछ बेतुकी और महा-बेकार कवितायों को पढ़ा कर बोर करता रहता हूँ.और ये बेचारे इतने शरीफ हैं की उफ़ तक नहीं करते.चुप चाप मुझे सुनते रहते हैं.संवेदनशील इतना की अभी एक दिन पहले ही इनका बुखार उतरा है और ये मेरे से मिलने कल बैंगलोर आने के लिए तैयार भी हैं.कहते हैं “सर आप जा रहे हैं बैंगलोर से, और मैं आपसे मिलने भी नहीं आऊं, ऐसा हो सकता है क्या?”.कभी कभी ये मुझे भी भावुक कर देते हैं और मैं एकदम निशब्द हो जाता हूँ.परसों रात फोन पर ऐसा ही कुछ हुआ था.रवि जी अक्सर बैंगलोर शनिवार के सुबह पहुँचते हैं और मुझे हर शनिवार एकदम सुबह ही जागना पड़ता है.इनकी बस बैंगलोर सुबह साढ़े चार बजे के आसपास पहुँचती है और ठीक पांच-सवा पांच में इनका मेसेज आता है, की चाय पीने बाहर नुक्कड़ तक आइये.सुबह सुबह की वो चाय बड़ी अच्छी लगती है मुझे, जिसे मैं दिल्ली में बेतरह मिस करने वाला हूँ.
बैंगलोर में यूँ तो बहुत नए लोगों से दोस्ती हुई, लेकिन निशांत और रवि जी, दो ऐसे दोस्त मिले जिनसे एक अलग तरह का बड़ा ही आत्मीय रिश्ता बन गया है.बड़े अच्छे और सच्चे इंसान हैं ये दोनों, ऐसे लोग आज की दुनिया में ‘रेअर स्पीशीज़’ के वर्ग में आते हैं. 

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  1. WOW !!!
    kitney dino baad tumhara blog padh rahi hu main 😛 😛 😛
    and u have written this so well..
    photoz to mast hai

    and plz tell manish sir that isabella is still single 😀 😀 and she's using a different fb acc 😛

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