ऋचा वेड्स अंशुमान : कुछ यादें

कभी कभी पता भी नहीं चलता की समय कैसे पंख लगा कर उड़ जाता है.अभी तो जैसे कल की ही बात थी की मेरी बहन की शादी हुई थी, और आज उसकी शादी हुए भी एक साल हो गए हैं.कायदे से तो मुझे अगर आज के दिन कुछ लिखना था तो सुबह लिखना चाहिए था, लेकिन सुबह कुछ भी लिखने का सोचा नहीं था.दिन भर दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए कुछ कुछ बातें याद आने लगी, शाम तक मन में यादों का ऐसा तूफ़ान उठा की बिना कुछ लिखे रह पाना संभव नहीं था.वैसे भी अपनी बहन की शादी की मैंने तीन पोस्ट लगाई थी और एक आखिरी पोस्ट लगाने का वादा भी किया था जिसे कुछ कारणवश पूरा न कर सका.वो तीनों पोस्ट भी मेरी बहन के लिए एक तोहफा जैसा ही था.शादी के बहुत दिन पहले उसने मुझसे युहीं कहा था -तुम इतना कुछ लिखते रहते हो मेरे बारे में भी अच्छा अच्छा लिखो न कभी…चलो मेरी शादी के बारे में ही लिख देना कभी’.ये बातें मेरे दिमाग में रह गयीं और तय किया की उसकी शादी के बारे में जरूर लिखूंगा(वो अगर ना भी कहती तो भी उसकी शादी के बारे में पक्के तौर पे लिखता).

मोना की शादी में बड़े नए नए अनुभव हुए मुझे.यूँ तो घर के बाकी शादियों में भी मैंने बहुत काम किया है लेकिन फिर भी अपनी बहन की शादी में काम करने का सुख अलग ही होता है.शादी के बारह दिन पहले मैं पटना पहुँच गया था.ठण्ड जबरदस्त थी.अधिकतर खरीदारी तो माँ-पापा पहले ही कर चुके थे लेकिन फिर भी बहुत कुछ खरीदना बाकी था.आलम ये हो गया था की ठण्ड के वजह से हम सब सुबह देर तक सोये रहते और उठते ही जल्दी जल्दी नहा-धो कर, नाश्ता कर के बाजार निकल जाते.मार्केटिंग ज्यादातर पटना की उन गलियों में होती थी जहाँ किसी ज़माने में मैं खूब घुमा करता था.कई बार तो ऐसा भी हुआ की माँ-पापा-मोना सभी खरीदारी में व्यस्त रहते और मुझे कभी कुछ याद आ जाता तो उसे चुपके से एक कागज़ पे लिख के अपनी जेब में रख लेता..एक दफे तो माँ ने मुझे ये करते पकड़ भी लिया.जब उन्होंने पूछा की क्या लिख रहे थे, तो मैंने बहाना सा बना दिया की समानों का हिसाब लिख रहा था.

मेरे लिए सबसे अच्छी बात ये थी की शादी के एक सप्ताह पहले से मोना हर तरह के पकवान घर पे बना रही थी.माँ से सीखे सभी रेसपी का रिविजन भी करना तो जरूरी था न.कहीं ससुराल में किसी ने कुछ बनाने को कह दिया तो उस वक्त वो माँ से पूछने तो नहीं आती न, तो इसलिए वो सभी रेसपी को एक बार फिर से बना के देख लेना चाह रही थी की वो बिना किसी की मदद(विशेषकर माँ)लिए अच्छे से सभी पकवान बना सकती है.मेरे पटना आने के पहले से माँ बता रही थी की आजकल घर में खाना मेरी बहन ही पका रही है और वो भी तरह तरह के व्यंजन.जैसे ही मैंने ये सुना वैसे ही शादी में घर आने की खुशी डर में तब्दील हो गयी.मुझे लगा की पटना जाकर अब बहन के हाथ का बना खाना पड़ेगा, पता नहीं किस किस तरह के वो एक्सपेरिमेंट कर रही है.लेकिन माँ ने उसे एकदम परफेक्टली ट्रेन किया था.कलाकंद से लेकर गुलाबजामुन, समोसे से लेकर पकौड़ियाँ और पनीर से लेकर चिकन तक सभी प्रकार के डिशेज मेरी बहन ने बनाए.वैसे तो मैं इसकी तारीफ़ करने में ज्यादा विश्वास रखता नहीं, लेकिन सभी डिसेज इसने वाकई लाजवाब बनाये थे.

शादी के विद जबसे शुरू हुए थे तब से हम सब भाई बहनों को कभी इतना वक्त नहीं मिल पाया की साथ बैठ के गप्पे कर सके.यूँ तो शादी से पहले हमने काफी सारे प्लान्स बनाये थे..लेकिन वो सारे प्लान्स ऐसे ही धरे के धरे रह गए.काम में सब मसरूफ थे.जिस दिन पहला विद था, शायद पूरी शादी में वो पहला और आखिरी ऐसा मौका था की हम सब भाई-बहन एक जगह एक साथ देर तक बैठे.अपनी आदत से लाचार मेरी सभी बहने मेरा मजाक उड़ाने से नहीं चूक रही थी.तरह तरह के बातों से वो हर कोशिश करते रहीं की मैं इरिटेट हो जाऊं.अपने इस मिशन में वो कामयाब भी हुई और मैं अंत में वहाँ से उठ के चला गया(किसी ने कुछ काम से बुला लिया था, अच्छा हुआ).ये मैं पक्के तौर पे कह सकता हूँ की तीनों में से किसी को भी ये याद नहीं होगा की उस दोपहर हमारे बीच क्या बातें हुई थी, और उन्होंने अपने कैसी कैसी बातों से मुझे इरिटेट और टॉर्चर किया था, लेकिन मुझे हर एक बात अच्छे तरह से याद है.कभी बदला लेने का मौका मिला तो मैं चुकने वाला हरगिज नहीं हूँ 😛

शादी के विद के बहाने ही लेकिन मोना ने भी एक मेरी वर्षों की तमन्ना आख़िरकार पूरी कर ही दी.मेरे पैर छू कर.वैसे तो ये मुझे इतना रिस्पेक्ट देने से रही, लेकिन कम से कम शादी के विद के बहाने ही मेरी ये वर्षों की तमन्ना आख़िरकार पूरी हो ही गयी.वैसे मोना की भी वर्षों की तमन्ना पूरी हो गयी होगी जब विदाई के वक्त निमिषा और सोना ने मोना के पैर छुए थे.मोना की विदाई के समय दोनों बहनों ने इसके पैर छुए, और मोना फ़िल्मी स्टाइल में रोते हुए कह रही थी “एट लास्ट..एट लास्ट तुम दोनों ने मेरे पैर छुए”.मुझे तो ये भी लगा था की फ़िल्मी स्टाइल में ही ये उन दोनों को गले भी लगा लेगी.लेकिन अफ़सोस ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.वैसे विदाई के समय मोना सही मायने में रो तो नहीं रही.वो कुछ ऐसा था की लोगों को लगे की वो रो रही है, अब हँसते हुए विदा होती तो थोडा अजीब लगता न.वैसे भी मेरी इस बहन पर फिल्मों का कुछ ज्यादा ही प्रभाव है, तो मैं ये पक्के तौर पे कह सकता हूँ की विदाई के वक्त मोना थोडा इसलिए भी रो रही थी की बाकी सभी रो रहे थे और थोडा सा विदाई का फील लेने के लिए भी वो रो रही थी.सच पूछिए तो मुझे उस दिन मोना से ज्यादा भावुक तो अंशुमन लग रहे थे.अगर मोना से ज्यादा नहीं भी तो मोना से कम भावुक भी वो नहीं थे.(मोना ये पढ़ने के बाद मेरा क्या हालत करने वाली है ये आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते).

वैसे मेरे सभी बहनों में तो शादी के समय जबरदस्त प्यार उमड़ आया था.एक दफे तो मैंने भी देखा की कैसे सोना अपनी बड़ी बहन को बड़े प्यार से अपने हाथों से खाना खिला रही थी.मुझे हंसी भी आ गयी, और मैंने उस परफेक्ट बहन टाईप सीन को कैमरे में कैद भी कर लिया.निमिषा और मोना को तो शादी में गले मिलते देखना  एक आम बात हो गयी थी, और मोना के विदाई के समय जिन तीन लोगों ने सबसे ज्यादा आंसू बहाए थे वो थे मेरी माँ,मौसी और निमिषा.निमिषा को तो चुप कराने में मुझे पुरे एक घंटे का वक्त लग गया.इतनी बड़ी हो गयी वो लेकिन उसे चुप कराने में मुझे ऐसा लग रहा था की जैसे वो कोई बहुत छोटी बच्ची हो और मैं उसे परियों की कहानी सुना कर चुप करा रहा हूँ.

मोना की शादी में ही मेरे अंदर वर्षों से सोया हुआ एक पेंटर जागा.बर्तनों पर चित्रकारी करनी थी और वर्षों पहले जो मैंने पेंटिंग ब्रश छोड़ा था उसे फिर से पकड़ने का मौका भी मिला.एक दो लोगों ने थोड़ी तारीफ़ भी की मेरी, तो दिल को थोडा अच्छा भी लगा(तारीफ़ किसे पसंद नहीं).शादी के बर्तन और बाकी के सामन जहाँ रखे थे वहीँ पर एक पोटली में बंद मेरी कुछ पुरानी यादें पड़ी हुई थी.ये यादें मेरे बहुत से स्कूल के प्रोजेक्ट्स के रूप में थीं जिसे मेरी माँ ने संभाल कर एक जगह रख दिया था और जिसकी खबर मुझे भी नहीं थी..अच्छे से याद है, जिस दिन शादी में इस्तेमाल होने वाले सभी बर्तन मैं निकाल रहा था तो उसी दिन इस पोटली पर भी नज़र गयी और मैं सब काम छोड़कर बहुत देर तक इनको लिए बैठा रहा.

मोना की शादी में अनगिनत ऐसे पल थे जो मेरे दिल में हमेशा के लिए कैद हो कर रह गए हैं.उन यादों को कभी कभी इस ब्लॉग पे लिखते रहने की कोशिश करूँगा.मोना की शादी में कार्ड बांटना भी एक ऐसा ही नोस्टालजिक अनुभव जैसा कुछ था.कितने ऐसे रिश्तेदारों के घर मैं गया था जहाँ वर्षों पहले गया था.उन सभी रास्तों में, गलियों में जाना, पुरानी यादों में टहलने जैसा ही कुछ था.ऐसे कितने ही पल हैं, सभी को लिखना यहाँ मुमकिन नहीं है.कभी कभी सभी यादों को यहाँ लिखते रहूँगा, ठीक वैसे ही जैसे अपनी बहनों की बातों को लिखते रहता हूँ.

और अंत में एक और फोटो :

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  1. थैंक गॉड!
    बारह बजने से ठीक सात मिनट पहले ये पोस्ट तैयार हुआ और आख़िरकार पब्लिशड!!! 😛

  2. बधाई, और ये पोस्ट पढ़ने के बाद क्या क्या हुआ इसपर भी एक पोस्ट का इंतजार है 🙂 (उम्मीद है अच्छी खिंचाई होने वाली है)

    विदाई के समय दुल्हन को रोना आये या ना आये, दूल्हा जरूर रूआँसा हो जाता है, दूल्हे को इतने सेंटी दौर से गुजरने का अनुभव नहीं होता है, जब तुम्हारी शादी होगी तब तुम्हें इस बात का अनुभव होगा।

  3. Wow abhishek. Aapki behan isko padh ke bahut khush hue hoge!

    Appki post padh ke yeh samaj ata hai ki zindagi main har choti choti cheez ki kitni zada importance hote hai.

  4. यादों का सुंदर एलबम।

    बहन को विवाह की वर्षगांठ की बधाई।

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं….

    जय हिंद… वंदे मातरम्।

  5. मोना की शादी की सालगिरह फिर आ रही है भाई…तो लगे हाथों यादों की पिटारी फिर खोल डालो और 22 की रात को १२ की सुई पर जाने से पहले उसे फिर से लगा दो यहाँ…:)
    बाकी तो पोस्ट कैसी है, ये बार-बार कहने की कोई ज़रूरत नहीं हमें…:)

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