संयोग या मास्टरप्लान

(मेरे डायरी से, 4 अक्टूबर को लिखा गया था, आज पोस्ट कर रहा हूँ)

आप चाहे कितना भी ना मानने का इरादा कर लें, लेकिन कभी कभी कुछ ऐसी बातें हो जाती हैं जो ये यकीन दिला जाती है की हर दिन हमारे साथ जो कुछ भी होता है वो पहले से तय है..ऐसा कुछ की शायद किसी ने उसे लिख छोड़ा है, जिसे मिटाया या बदला नहीं जा सकता.आप कुछ भी कर लें वो होकर रहेगा.इसे आप डेस्टनी कह लें या कुछ और.मैंने कितनी बार इन बातों को अनदेखा करना चाहा लेकिन अक्सर मेरे साथ ऐसा होते रहता है जो मुझे ये यकीन दिला जाता है की हर कुछ पहले से लिखा जा चूका है जिसे काटा नहीं जा सकता.आज की बात अगर करूँ तो दिन भर की व्यस्तता थी.इस बीच जो कुछ हुआ उसे मैं क्या कहूँ??महज एक संयोग या ऐसा कुछ जो पहले से किसी ने हमारे लिए लिख छोड़ा है, जिसका होना तय था.

सुबह जिस कंपनी में मुझे काम के सिलसिले में जाना था, वहां मेरी उम्मीद से कुछ ज्यादा ही जल्दी मेरा काम निपट गया.एक भुला भटका दोस्त(सुमित) भी अचानक से उसी कैम्पस में मिल गया, जिसकी मुझे उम्मीद बिलकुल नहीं थी.उसकी छुट्टी थी उस दिन लेकिन किसी काम के सिलसिले में उसे दफ्तर आना पड़ा था.घर भी उसका पास में ही था.संयोग ऐसा देखिये की उसके पास मेरे दो नॉवेल थे अमृता प्रीतम की रशीदी टिकट और राष्ट्रकवि दिनकर जी की ‘कुरुक्षेत्र’.उसने ये किताबें मुझसे शायद पिछले साल होली के समय ली थी, जब मैं पटना में था.ये बात मैं पूरी तरह से भूल चूका था.मैं खोज जरूर रहा था इन दो नॉवेल को,लेकिन इसे मैंने अपने नॉवेल दिए थे, ये मुझे बिलकुल भी याद न था.पिछले सप्ताह ही जब एक माउस आर्डर किया था फ्लिप्कार्ट से तो इस किताब को मंगवाने की बात भी सोच रहा था, लेकिन मंगवाया नहीं.शाम में जब वापस घर के लिए आ रहा था तो पता नहीं किस सोच से मैंने तीन बसें छोड़ दी और वहीँ आसपास घूमता रहा.शाम साढ़े सात बजे के बस से मैं वापस आया.मेरे घर के पास चार बस-स्टैंड हैं..शादशिव नगर,रमैय्या हॉस्पिटल,आई.टी.आई और देवसनद्रा.देवसनद्रा स्टॉप मेरे घर से बिलकुल नज़दीक है, लेकिन शादशिव नगर स्टॉप लगभग दो किलोमीटर की दुरी पे है.मैं शादशिवनगर वाले स्टॉप पे बहुत कम ही उतरता हूँ, लेकिन आज पता नहीं किस ख्याल से मैं यहीं उतर गया.बस स्टैंड पे देखा की एक लड़का अपने सूटकेस के साथ खड़ा है..दाढ़ी बढ़ी हुई थी और लंबे बाल..मुझे वो कुछ जाना-पहचाना सा दिखा..वो भी मुझे कुछ वैसे ही देख रहा था की जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो.मैं आगे बढ़ा तो पीछे से उसने आवाज़ दी..
“इक्स्क्यूज़ मी..आपका नाम अभिषेक है क्या?”.. 
हाँ..मैंने कहा, और उसकी तरफ देख के उसे पहचानने की कोशिश करने लगा
“अरे पहचाने नहीं…रंजीत..एम्.के.सिंह के कोचिंग में तुम्हारे साथ थे..
“अरे हाँ यार..ये तुम्हारा लंबा बाल और दाढ़ी से पहचान नहीं पायें थे यार..और बोलो इधर कैसे?”

रंजीत के भैया यहाँ रहते हैं और वो उन्ही से मिलने बैंगलोर आया हुआ था..रंजीत से मेरी आखरी मुलाक़ात पटना में कुछ सात साल पहले हुई थी.रंजीत मेरे बहुत ही अच्छे दोस्तों में से तो उस वक्त भी नहीं था, लेकिन कुछ अच्छे मोमेंट्स इसके साथ भी रहे थे.इसका इस तरह मिलना एक सुखद आश्चर्य से कम नहीं था.पन्द्रह-बीस मिनट की ये मुलाक़ात अच्छी रही, और अगर मैं इस स्टॉप पे ना उतर अपने नजदीकी स्टॉप पे उतरा होता तो इससे मेरी इस तरह मुलाकात कहाँ हो पाती..इससे मिलने के बाद मैं अपने घर की तरफ बढ़ा, इस बात से बेखबर की चाय दुकान पर एक और संयोग मेरा पहले से इंतज़ार कर रहा है.चाय पीने की मेरी कोई खास ईच्छा तो नहीं थी लेकिन फिर भी चाय दूकान के तरफ बढ़ा.वहां मेरे उस मित्र से मुलाकात हुई जिससे आजकल बातचीत काफी कम है.चाय पी कर हम अपने अपने रूम के तरफ जाने को बढ़ ही रहे थे की पुरे इलाके की लाईट चली गयी, करीब एक घंटे लाईट नहीं थी और हम दोनों वहीँ बैठे रहे उतनी देर और बातें करते रहे.यह भी कैसा संयोग था की लाईट का ठीक उसी समय जाना जब हम अपने अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे.

ऐसा नहीं की इस तरह की बातें मेरे साथ पहली बार हुई या कभी कभी होती हैं.मैं अक्सर ऐसे उदाहरण देख लेता हूँ..जैसे सुबह के तीन बजे अचानक से नींद टूट जाना और जी.टॉक पे ऑनलाइन आना, और ठीक उसी समय दुनिया के किसी दूसरे कोने में एक और दोस्त का ऑनलाइन रहना, और फिर सुबह सात बजे तक लगातार उससे चैटिंग करते रहना..ये भी एक तरह का संयोग हो सकता है, लेकिन एकाएक रात के तीन बजे बिना किसी कारण नींद टूट जाना और ठीक उसी समय किसी का ओनलाईन मिलना, ये एक संयोग से ज्यादा लगता है मुझे..ऐसा कुछ की सब किसी एक मास्टरप्लान के तहत हो रहा है,जिसका होना फिक्स्ड है.

मेरे एक मित्र हैं देव बाबू.उनसे एक दफे कुछ बातें हो रही थी जो इन्डाईरेक्ट्ली इसी से सम्बंधित थी.उनका कहना था की अगर हम किसी अच्छे कॉलेज या किसी महानगर से पढ़े होते तो हमारे कैरिअर में जो भी रुकावटें आ रही हैं वो न होती.छोटे जगहों से पढ़ने का,खराब टीचर्स और अच्छी सुविधाएँ न होना हमारे लिए काफी नुकसानदेह साबित हुआ.उनकी अधिकतर बातों से मेरी सहमति भी थी, लेकिन फिर मैंने उनसे एक छोटा सा प्रश्न किया : “देव बाबू एक बात बताइए..की अगर हम किसी अच्छे कॉलेज से पढ़े होते, मतलब की अगर बारहवीं में मुझे कुछ और नम्बर्स आ गये होते, तो मैं किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला ले लेता..संभवतः दिल्ली या बैंगलोर के किसी बड़े कॉलेज में, आपका अगर इंट्रेंस क्लिअर हो गया होता तो आपको भी किसी बड़े कॉलेज में दाखिला आसानी से मिल जाता…बहुत मुमकिन है की हमारा अच्छा प्लेसमेंट भी हो गया होता..हम किसी बड़ी कंपनी के लिए काम भी कर रहे होते.ये सब होता लेकिन फिर हमारी और आपकी मुलाकात कैसे हो पाती?आशीष,भारती,अकरम और समित जैसे दोस्तों से मेरी मुलाकात कैसे हो पाती?हमारा व्हाईट हाउस और उसके ऐड्वेन्चरस किस्सों का क्या होता?युसूफ चाय दूकान पर आपके खतरनाक जोक्स फिर हम कैसे सुन पाते?
देव बाबू मेरे इस प्रश्न पर कुछ भी नहीं कह सकें बस मुस्कुरा के रह गये.

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  1. आम संयोग हों या प्रबल संयोग, संयोग तो होते ही हैं। लेकिन संयोग ज्ञान/जानकारी के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। यदि आपको पहले से पता होता कि आपका पुराना परिचित आ रहा है तो आपकी मुलाकात संयोग न होकर पूर्वनियोजित कहलाती। इसी प्रकार यदि पुस्तकों व मित्र की स्थिति की जानकारी होने पर आप शायद फ़्लिपकार्ट के बारे में सोचने के बजाय मित्र से किताबें ले लेते … संयोग होते हैं, होते रहेंगे क्योंकि ज्ञान/जानकारी कभी पूर्ण नहीं हो सकते।

  2. आज तो एकदम 'बाबु मोशाये' टाइप का पोस्ट डालो हो भाई … वैसे यह सच है कि कोई है जो पहले से जानता है और तै करता है हमें कब, कहाँ और क्या करना है !

  3. कितना सही कहा है…

    हम सोचते कुछ हैं,होता कुछ और है…थोड़े समय के लिए कभी झुंझलाहट भी होती है.लेकिन बहुत समय बाद जब पीछे मुड कर देखो तो विस्मय के साथ एक मुस्कान तैर जाती है होठों पर…

    काफी जनि-पहचानी सी बात लगी.

  4. आपकी यह प्रस्तुति पढ़कर बहुत सोचा कि क्या कहूँ।:-)शायद इसका नाम जीवन है। या यूँ कहिए की संयोग है। कभी-कभी बहुत कुछ जो हम सोचते हैं और उसे पाने के लिए या हांसिल करने के लिए भरपूर प्रयास करने पर भी हंसिल कर पाने में नाकामयाब रहते हैं। कभी-कभी जिस बात की कल्पना हमने सपने में भी नहीं की होती वो इतनी आसानी से हमारे जीवन में हमको मिल जाती है, कि लाख चाहने पर भी हमको यकीन ही नहीं हो पाता कि ऐसा सचमुच हुआ है।

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