दुर्गानवमी का पर्व और एक व्यस्त सा दिन

कभी कभी कुछ ऐसा हो जाता है जो हमें पहले से आभास करा देता है कि आने वाला दिन कैसा बीतेगा. परसों का दिन व्यस्त कम और थका देने वाला ज्यादा रहा. शाम को घर पहुँचते बुरी तरह से थक गया था. सोने की तैयारी में ही था कि अचानक से मेरे मित्र रवि जी का फोन आया. मुझे पहले से पता था कि उनकी छुट्टी नहीं है और उनके बैंगलोर आने की कोई संभावनाएं नहीं हैं, लेकिन जब उन्होंने कॉल किया तभी मैं समझ गया कि हो न हो, ये कल बैंगलोर आ रहे हैं. फोन पे हमारी बात थोड़े अलग ढंग से होती है, तो जब उन्होंने परसों रात मुझे कॉल किया तो बातों के दौरान उन्होंने अचानक से पूछा :
‘अच्छा अभिषेक जी, क्या कल आप मुझे चाय पिला सकेंगे?’
‘चाय??सर, मेरे चार रुपये खर्च हो जायेंगे. सॉरी, मैं आपको चाय नहीं पिला सकता.’
उन्होंने फिर कहा ‘सर, आपने तो मेरा दिल तोड़ दिया, आप चार रुपये बचाने के लिए मेरा दिल तोड़ सकते हैं लेकिन चाय नहीं पिला सकते मुझे, ये मैंने तो सोचा भी नहीं था.’
मैंने कहा ‘सर, आजकल ज़माने में लाखों और करोड़ों रुपये बचाने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते, मैं तो बस आपका दिल तोड़ रहा हूँ.
रवि जी ने आगे कहा : अच्छा चलिए, आपके इस ज़ुल्म को भी मैं सह लूँगा.. लेकिन अगर आपके बदले मैं ही चार रुपये खर्च करने के लिए राजी हो जाऊँ तब तो आप इनकार नहीं करेंगे न?
मैंने कहा “तब तो इनकार करने का सवाल ही नहीं होता”
रवि जी ने आगे कहा “शुक्रिया सर…शुक्रिया..! तो फिर मिलिए कल सुबह साढ़े पांच बजे बी.ई.एल रोड पे.”

मैं खुश हो गया था रवि जी से बात कर के. वो कल बैंगलोर आ रहे थे और मैं आश्वस्त हो कर सो गया कि कल की सुबह निश्चित ही अच्छी होगी. इन कुछ सालों में रवि जी उन गिने चुने लोगों में से आते हैं जिनकी मैं दिल से इज्ज़त करता हूँ और वो जब भी बैंगलोर आते हैं(लगभग हर वीकेंड), मैं खुश ही रहता हूँ.
सुबह फिर रवि जी से मुलाक़ात हुई, चाय भी उन्होंने ही पिलाया. फिर दो-तीन घंटे बहुत ही अच्छी बातचीत हुई. अक्सर हमारे बीच बातें बहुत होती हैं, लगभग हर टॉपिक पर, तरह तरह की, और मुख्यतः गंभीर बातें. दिन लंबा होने वाला था ये मैं पहले से ही जानता था. वैसे तो दुर्गा नवमी की पूजा कल थी, लेकिन फिर भी इधर अधिकतर ऑफिस खुले थे. मुझे सुबह एक जरूरी काम से निकलना था और ये भी पता था की अब सीधा देर शाम ही वापस घर आऊंगा. जिस जगह मुझे जाना था वो बैंगलोर के कोरमंगला इलाके में आता है, और ‘फोरम मॉल’ के ठीक पास. बैंगलोर में जिन जगहों से मेरा एक रिश्ता सा है उनमें फोरम मॉल भी एक है. जब बैंगलोर में नया था, तो ये मॉल ही हमरा अड्डा हुआ करता था. मेरी बहन जब तक बैंगलोर में थी, हम दोनों फिल्म देखने या जब भी मिलना होता था, कहीं घूमना होता था तो यहीं आते थे. फोरम मॉल के इतने करीब आ कर मॉल में कुछ देर न बिताऊं, ये मुमकिन नहीं था. दिन के बारह-एक बजे मैं अपने काम से निश्चिंत होकर मॉल पहुँचा. करीब एक घंटे तक वहां बैठा, इस बीच फ्री में मिल रही कॉफी भी दो बार पी ली मैंने(सनराईज कॉफी वालों का स्टाल लगा था जो फ्री में कॉफी पिला रहे थे). एक दो मित्र जो उसी इलाके में रहते हैं, उन्हें भी कॉल मिलाया लेकिन सभी व्यस्त थे, तो मैं भी वहां से वापस चला आया. दिन भर घूमने का इरादा मैं कर चूका था, तो इसी क्रम में मेरा अगला डेस्टिनैशन था पैलेस ग्राउंड.
बैंगलोर की सबसे अच्छी बातों में से एक बात ये है कि यहाँ वोल्वो ए.सी बसों की फ्रीक्वेंसी बहुत है(देश में सबसे ज्यादा वोल्वो बसें यहीं चलती हैं). अगर मुझे कहीं दूर जाना होता है तो मैं अक्सर वोल्वो का पास लेता हूँ. कल भी मैंने वोल्वो का ही पास लिया था, और कल शायद कई कम्पनियाँ बंद थी और कई खुली भी, तो इसलिए वोल्वो की फ्रीक्वेंसी बहुत कम थी. मैं खड़ा था कोरमंगला के बस स्टॉप के पास लेकिन एक भी वोल्वो बसों के दर्शन नहीं हो पा रहे थे. आम बसें तो हर तीन चार मिनट में तो गुज़र रही थी, लेकिन वोल्वो बसें दिखाई ही नहीं दे रही थी. वैसे तो वोल्वो बस के ‘पास’ को आप किसी भी बसों में इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन वोल्वो का पास लेकर आम बस में जाना, मुझे गंवारा नहीं था. जब कभी सोचता कि चलो साधारण बस में ही चले जाते हैं, ठीक उसी समय अंदर से एक और आवाज़ आती कि साधारण बसों में पास का दाम वसुलायेगा नहीं, और फिर मैं वॉल्वो के इंतजार में वहीं खड़ा रहता. तीस-चालीस मिनट के इंतज़ार के बाद एक वोल्वो आई. बस पर चढ़ते ही मेरा कंडक्टर से सबसे पहला सवाल यही था कि आज इतनी कम बसें क्यों नज़र आ रही हैं सड़कों पर? उसने भी वही कहा जो मैंने अंदाज़ा लगाया था, की छुट्टी है, शायद इसी वजह से.

फोरम मॉल के बाहर खड़े ये दो पहरेदार

करीब चार बजे के आसपास मैं पैलेस ग्राउंड पहुँचा. यहाँ दो आयोजन थे. एक तो बिहार भवन के तरफ से सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति ने दुर्गा पूजा का आयोजन किया था और दूसरा आयोजन था बंगाल असोसीऐशन के तरफ से. दोनों के आयोजन में ज़मीन आसमान का फर्क था. शायद इसलिए भी कि बिहार के सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति के पास फंड का आभाव था. और बंगाल असोसीऐशन के पास बहुत से स्पोंसर थे, उनका आयोजन बड़ा भव्य था. विशाल पंडाल लगा था और पंडाल में एक तरफ दुर्गा माँ की प्रतिमा और बैठने के लिए कुर्सियां लगी थी, वहीं एक तरफ संगीत कार्यक्रम के लिए स्टेज बना हुआ था. मैं जब पहुंचा तो देखा कि कार्यक्रम चल रहा था लेकिन लोग काफी कम थे. कुर्सियां खाली थी. बंगाल के गीतों का कार्यक्रम था, जिसमे पुराने बंगला गीत मुख्यतः एस.डी.बर्मन के गाये जा रहे थे. मुझे बंगला बहुत ज्यादा अच्छे से तो नहीं लेकिन फिर भी समझ में आ जाती है. जो भी गीत वहाँ गाये गए, मुझे काफी मधुर लगे. कुछ देर वहां बैठा रहा. फ़ूड कोर्ट भी बने हुए थे, खाने-पीने के स्टॉल भी काफी थे, लेकिन अधिकतर स्टॉल महंगे थे(ना भी हो तो मेरे लिए तो महँगे थे ही).भीड़ भी अच्छी खासी थी. कभी कभी तो लगता ये भी था कि हम बैंगलोर में न होकर बिहार या बंगाल के किसी दुर्गा पूजा समारोह में आये हुए हैं. जितनी देर तक मैं वहाँ था पटना के दुर्गा पूजा की याद भी बेइंतहा आई.


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पैलेस ग्राउंड के ही दूसरी तरफ सिद्धार्थ समिति वाले लोगों ने दुर्गा पूजा आयोजन किया था.यहाँ मैं परसों शाम भी आया था और काफी देर तक पंडाल में बैठा रहा था.वैसे तो इनका आयोजन बंगाल समिति वालों की तुलना में बहुत ही सादा और साधारण सा था, लेकिन शाम में रौनक यहाँ की भी बढ़ गयी थी.खाने पीने के अच्छे खासे स्टॉल यहाँ भी लगे हुए थे और अच्छी बात ये थी की सारे स्टॉल महंगे बिलकुल भी नहीं थे.कल शाम मैं चाह रहा था की वहां थोड़ी देर बैठ सकूँ, लेकिन एक तो दिन भर का थका हुआ और फिर एक दो जगह और जाना था मुझे, मैं वहां ज्यादा देर रुक न सका.

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शाम में ही मेरे एक साथी ने मुझे फोन कर के यु.बी.सिटी बुलाया था.उसके दफ्तर में एक छोटी सी पूजा का आयोजन था.मुझे तो लगा कि मेरा जाना शायद संभव ना हो पाए, लेकिन ठीक मौके पे मेरा एक और मित्र पैलेस ग्राउंड पहुँच गया और उसी के साथ मैं यु.बी.सिटी चला गया. शाम साढ़े सात बजे के आसपास हम यु.बी.सिटी पहुंचे.यु.बी.सिटी मेरे पसंदीदा जगहों में से एक है.यहाँ के खुले ऐम्फिथीअटर में बैठना मुझे काफी पसंद है.दोस्त के दफ्तर में पूजा हो चुकी थी, और हम लोग प्रसाद खा कर कुछ देर वहां के ऐम्फिथीअटर में ही बैठे रहे.फिर जिस दोस्त के साथ मैं यहाँ आया था,उसी के साथ मैं वापस लौट गया.वो मुझे आर.टी.नगर छोड़ के अपने घर चला गया और मैं बिहार भवन के तरफ बढ़ गया.

यु.बी.सिटी के फ़ूड कोर्ट एरिया का दृश्य

जब से मुझे आर.टी.नगर में बिहार भवन द्वारा आयोजित पूजा के बारे में पता चला है, तब से मैं हर साल आर.टी.नगर जाता रहा हूँ.यु.बी.सिटी से निकलते मैं बुरी तरह थक गया था, लेकिन फिर भी आर.टी.नगर तक गया. वहाँ जाना जरूरी था. इन कुछ सालों में ये एक आदत सी बन गयी थी, कि रात में आर.टी.नगर के बिहार भवन में होने वाले कार्यक्रम को देखकर ही वापस घर जाऊँ मैं. बाकी सालों की तुलना में इस बार का आयोजन थोड़ा फीका लगा मुझे. न सड़कों पर सजावट और लाइटें लगी हुई थी, न उस किस्म की भीड़ थी, जो पिछले साल तक यहाँ देखने को मिलती थी.मैं यहाँ करीब साढ़े आठ बजे पहुंचा था, और ठीक नौ बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होने का समय था.मैंने तो निश्चय किया था कि बस माँ के दर्शन कर वापस चला जाऊँगा.लेकिन जब उन्होंने समारोह शुरू होने की अनाउन्स्मेन्ट की, खुद ब खुद मेरे कदम नीचे हॉल की तरफ बढ़ गए,जहाँ ये सांस्कृतिक कार्यक्रम होने वाले थे.संयोगवश एक दो कुर्सियां भी खाली थी.ठीक नौ बजे कार्यक्रम शुरू हुआ.शुरुआती नृत्य बैंगलोर के ही किसी नृत्य-कला स्कूल के नौ लड़कियों ने नवदुर्गा का नृत्य किया.शानदार परफोर्मेंस था उनका.फिर और भी कई परफोर्मेंस हुए, लेकिन मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आये वे थे नवदुर्गा नृत्य और दो लड़कियों ने अपने दोनों हाथों और सर पे दिया रख के एक नृत्य किया था, वो. इनके अलावा दो बच्चियों ने ‘ओ रे पिया’ गाने पे डांस किया.वो भी बहुत पसंद आया.मैं बुरी तरह थका हुआ था, और कार्यक्रम रात के इग्यारह बजे तक चलने वाला था.मैं साढ़े दस बजे वहां से वापस अपने घर आ गया.

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कुल मिलाकर दिन बहुत लंबा और थकावट से भरा तो जरुर था लेकिन ये दिन एक यादगार दिन बन गया.एक खास दिन, जिसमे कुछ बहुत ही अच्छे अच्छे से मोमेंट्स थे.रवि जी भी शाम की गाड़ी से वापस चेन्नई चले गए थे, और सुबह के बाद हमारी मुलाकात नहीं हो पायी.शायद संभावना ये भी है कि इस सप्ताहांत वो फिर से बैंगलोर आये, और मुझे डर है की कहीं फिर से शुक्रवार के रात वो फोन कर के मुझे ये न कहें की ‘अभिषेक जी, चाय पिलायेंगे क्या कल?’

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  1. आपकी पोस्ट पढ़कर और उसमें लगी तस्वीरें देखकर मुझे भी आपने मोहल्ले का दुर्गा उत्सव याद आगया बढ़िया पोस्ट….

  2. @प्रवीण भैया
    मैंने सोचा ही था की कल सुबह कॉल कर के आपको भी उधर बुलाता हूँ, फिर भूल गया.वहां पहुँचने के बाद दिमाग में एक बार ख्याल आया था की हो सकता है इस मेले में आपसे भी मुलाकात हो जाए. 🙂

  3. काफी घूम लिए अभि ! और रिपोर्ट भी बढ़िया और विस्तृत दी है.पर हाँ हम चाय नहीं पीते तो हम कॉफी के लिए पूछेंगे ..वो भी चार रु वाली नहीं कोस्टा वाली. होगी न उस मॉल में जिसका जिक्र तुमने किया है.:):)

  4. इतना कुछ देखा तो थकना तो था ही, उस पर से पास के पैसे वसूलने की जिद्द , साल का त्यौहार है कोई रोज रोज थोड़े ही आता है बिलकुल टिपिकल बहाना |

  5. काहे जलाते हो!! ई सब देखला के बाद पटना बहुते याद आने लगता है.. खजांची रोड से लेकर दुरुक्खीगाली, दरियापुर गोला, इस्तेसन रोड (बीना सिनेमा के बाहर, गोरिया टोली, डाकबंगला चौराहा, आर.ब्लाक… भर रात घूमते थे तइयो मन नहीं भरता था..
    चलो तुमरे साथ बेंगलुरु का भी दुर्गा पूजा देख लिए!!

  6. सारा विवरण…सारी फोटो सुन्दर-सजीव..
    पर वो गोलगप्पे की स्टॉल वाली फोटो क्यूँ लगाई…

    अब इतनी रात में कहाँ खाने जाऊं??….नॉट फेयर 🙁

    आज सपने में भी गोलगप्पे ही दिखेंगे…:)

  7. नवरात्रि चल रही और देखो…फिर से इधर आ गए हम…|
    सलिल चचा की बात से सहमत हैं हम भी…सच्ची बहुते जलाते हो अपनी ऐसी यादें सुना सुना कर….:P
    अभी फिलहाल सिर्फ पढ़ रहे हैं…कभी बैंगलोर जाना हुआ न हमारा, तो सीधे से चलना साथ…वरना जो जो जगहें बताते हो…घुमाएगा कौन…??? 🙂 😛
    btw…चाय भले हम पिला दें…कॉफ़ी तो तुम्हारे मत्थे ही पड़ने वाली है…उधार जो है तुम पर…:)

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