किताबों का खोता अस्तित्व

बहुत पहले की बात है, किसी अखबार या पत्रिका में पढ़ा था एक पुराने गुमनाम उर्दू शायर के बारे में(नाम नहीं याद)..किताबों से इतना लगाव था उन्हें की उनके मौत की वजह भी वही बनी.अपना पूरा जीवन किताबों को समर्पित कर दिया उन्होंने.जहाँ भी जाते, किताबों के साथ.दिन लाइब्ररी में गुजारते और रात अपने पुस्तैनी घर में, तन्हाई में..किताबों के साथ.अपने अत्यधिक गरीबी के दिन में भी, जब वो लाइब्ररी नहीं जा पाते तो उन्होंने किताबें खरीदना शुरू कर दिया.घर के हर सामान को धीरे धीरे बेचते रहे और किताब खरीदते रहे.धीरे धीरे किताबों का खज़ाना हो गया था उनके पास.घर की सारी चीज़ें हट गयी, और उनके जगह सिर्फ और सिर्फ किताबें आ गयीं.उनके एक अच्छे दोस्त जब सलाह देते की ये पुस्तैनी मकान किसी को बेच दो और इतनी किताबें हैं, किसी लाइब्ररी में दे दो, अच्छे दाम मिल जायेंगे.उनका जवाब होता..जब तक मैं जिंदा हूँ, किताबें और मकान दोनों बेच नहीं सकता..दोनों मेरे जिंदगी का एक हिस्सा हैं.हाँ, अगर मैं मर जाऊं तो बेशक मकान तुम बेच देना और किताबें लाइब्ररी को दे देना..जो पैसे मिले उसे गरीब बच्चों के किसी स्कूल में दान दे देना.अंत में बेहद गरीबी और भुखमरी में उनकी मौत हुई.उनके दोस्त ने किताबें लाइब्ररी को सौंप दी..उन्ही किताबों में उनकी लिखी कुछ शायरी थी, जो शायद बाद में छपी भी.अपने अंत समय तक लेकिन उस शायर ने किताबों के प्रति अपना मोह नहीं छोड़ा.

ये थी एक कहानी.अब ज़रा कुछ दिनों पहले के टाईम्स ऑफ इंडिया, संडे स्पेशल में निकले एक आर्टिकल की तरफ जाएँ तो उसके मुताबिक आने वाले दस सालों में बुकशेल्फ अतीत की बात होगी..बुकशेल्फ की जगह बहुत तेजी से ई-बुक्स और ई-रीडर ले रहे हैं..इसका सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है ई-बुक की लोकप्रियता और विभिन्न कंपनियों द्वारा तरह तरह के ई-बुक रीडर/एप्लिकेसन निकालना, जो की लोगों को किताब पढ़ने के साथ साथ इन्टरनेट भीं इस्तेमाल करने की सुविधा देती हैं.एक सर्वे के द्वारा ये बात पता चली है की लोग अब अपने लैपटॉप या आई-पैड पे ताजा ख़बरें पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं..पिछले दो तीन सालों में अखबारों के पाठकों में अच्छी खासी कमी भी देखने को मिली है.बहुत से पब्लिशिंग हाउस अब किताबों के साथ साथ उसके ई-बुक भी उपलब्ध करवा रहे हैं.और धीरे धीरे किताबों का अस्तित्व शायद खत्म हो हो जाए, हमेशा के लिए.

Amazon Kindle और Sony Reader ने ई-बुक पढ़ना और भी आसान कर दिया है.दूसरे शब्दों में कहें तो इन्होने किताबों के अस्तित्व को खत्म करने में एक ट्रिगर का काम शुरू कर दिया है.Amazon.com के वेबसाईट पर करीब 360,000 किताब/मैगजीन्स/ न्यूज़पपेर्स उपलब्ध हैं जिसे आप आसानी से जब चाहे अपने किन्डल ई-रीडर या सोनी ई-रीडर पे डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.Amazon.com वालों का मानना है की किताबें पढ़ना इतना आसान पहले कभी नहीं था.जो भी किताबें आपको पढ़ने का मन करे बस कुछ ही सेकंड्स में आप उसे डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.वो इसे एक नयी तरह की क्रान्ति मान रहे हैं.

कुछ पब्लिशिंग हॉउस का भी मानना है की ये एक अच्छी और नयी शुरुआत है.उनका तर्क है की माध्यम बदलते रहते हैं.प्राचीन समय में तो कहानियां और साहित्य जबानी कही जाती थी..फिर उसके बाद समय आया हस्तलिखित साहित्य का..फिर धीरे धीरे प्रिंटिंग प्रेस का समय आया और अब प्रिंटिग प्रेस से लोग ई-बुक की तरफ रुख कर रहे हैं.इसमें साहित्य की कोई हानि नहीं, बल्कि बस माध्यम बदल रहा है.हमारे देश में कुछ समय पहले तक ई-बुक का बिलकुल भी प्रचलन नहीं था, लेकिन अब तेजी से ई-बुक और किन्डल/सोनी रीडर्स लोकप्रिय होते जा रहे हैं.पिछले कुछ दिनों में मैंने खुद कई जगह लोगों को किन्डल रीडर पे नॉवेल पढते देखा है..कुछ लोगों का ये कहना होता है की उन्हें हमेशा सफर करना पड़ता है, और उन्हें समय काटने के लिए किताबों का सहारा लेना पड़ता है.किताबों को लेकर अगर वो घूमते रहेंगे तो उसे उन्हें कैरी करने में दिक्कत आएगी, वहीँ ई-रीडर वो कहीं भी आसानी से लेकर जा सकते हैं.इन बातों का मतलब साफ़ है की लोग भी तेजी से इन माध्यम को अपना रहे हैं.

ये तो बात रही नॉवेल वैगरह की और वयस्कों की..बच्चों की दुनिया से भी किताबों का अस्तित्व घटता जा रहा है.मेरा खुद का इक्स्पीरीअन्स भी रहा है.कुछ दिनों तक एक बुक पब्लिशिंग कंपनी में मैंने मार्केटिंग का काम किया था.उस समय वहां के जो डोर-टू-डोर सेल्सबॉय रहते थे वो इस चीज़ की शिकायत जरूर करते थे की किताबें अब लोग नहीं खरीदते..एक दिन जब हम कुछ घरों में सर्वे करने गए की वो अपने बच्चों को कौन सी किताबें(मैग्जीन वैगरह) पढवाते हैं तो अधिकतर का जवाब ये आया की अब किताबें कौन पढता है.सभी इन्टरनेट से ही सीखते हैं.दो तीन बुकस्टोर जहाँ हमारी किताबें जाती थी, वहां से भी वही जवाब हमें मिलता था की लोग अब ज्यादा इंटरेक्टिव मटेरिअल खोजते हैं,इन्साइक्लपीडीया डी.वि.डी लोग ज्यादा पसंद करते हैं, भारी किताबों के मुकाबले.लोगों का तर्क रहता है की इसे कैरी करना ज्यादा आसान होता है.उसी सर्वे में एक बात और देखने को मिली, बहुत से माता-पिता अब बच्चों को मिनी लैपटॉप दे रखते हैं, और उनके सारे कोर्स मटेरिअल उसी में सेव रहते हैं.उनका कहना होता है की अब उनके बच्चों को किताबों से भरा बैग उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, जो भी चाहिए वो बस एक लैपटॉप में उपलब्ध है.

ये सब बातें/आंकड़े ये तो साफ तौर पे बताते हैं की किताबों के ऊपर अब ई-बुक बहुत तेजी से अपना अधिकार ज़मा रही है.हाँ, अधिकतर लोग इस नयी क्रान्ति के पक्ष में ही हैं..लेकिन मेरा खुद का मानना है की किताबे पढ़ने में जो सुकून मिलता है, वो ई-बुक्स में कभी भी नहीं मिल सकता.मैं बहुत ही असहज महसूस करता हूँ ई-बुक पढ़ने में.कॉलेज के दिनों में भी और अब भी, मेरे लैपटॉप/कंप्यूटर में बहुत से ई-बुक्स रखे रहते थे,लेकिन कभी भी मैंने उन्हें पढ़ा नहीं.हाँ, कोशिश बहुत बार की पढ़ने की, लेकिन एक दो पेज से आगे कभी बढ़ नहीं पाया.मेरी बहन वहीँ किताबें भी उतनी ही आसानी से पढ़ती है, और ई-बुक्स भी.अभी के जो बच्चे स्कूल या कॉलेज में हैं, वो ई-बुक्स पढ़ना ज्यादा अच्छा समझते हैं.उनका भी अपना एक तर्क रहता है की ई-बुक पढते पढते साथ ही साथ वो लैपटॉप पे गाने सुन सकते हैं, फेसबुक/ट्विट्टर चेक कर सकते हैं.वो इसे मल्टीटास्किंग का नाम देते हैं.

कहीं आज से बीस तीस साल बाद ऐसा न हो की किताबों का अस्तित्व सच में ही खत्म हो जाए.कहीं ऐसा न आने वाले सालों में बच्चे बड़ी हैरानी से ये बात सुने की हम कभी किताबें पढ़ा करते थे.कहीं ऐसा न हो की किताबें एक अजूबा चीज़ मालुम होने लगें आने वाले पीढ़ी को.इस बात की भी गारंटी है की आने वाली पीढ़ी उस उर्दू शायर को निहायत ही बेवकूफ और पागल इंसान समझें, जिसकी जान चली गयी, लेकिन किताबों का मोह नहीं गया उसका.

गुलज़ार साहब ने तो किताबों का दर्द कुछ इस तरह ज़ाहिर किया था एक बार –

किताबें झाँकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाक़ातें नही होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के परदे पर
बड़ी बैचेन रहती है किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

जो ग़ज़लें वो सुनाती थी कि जिनके शल कभी गिरते नही थे
जो रिश्तें वो सुनाती थी वो सारे उधड़े-उधड़े है
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े है
बिना पत्तों के सूखे टूँड लगते है वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नही है

जबाँ पर ज़ायका आता था सफ़्हे पलटने का
अब उँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुज़रती है
बहोत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था वो कट-सा गया है

कभी सीनें पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे
छूते थे जंबीं से

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रूक्के
क़िताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा…!!

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  1. हम १५,००० का मोबाइल खरीदते हैं , ६०,००० का लैपटॉप …. हज़ारों के कपड़े और न जाने क्या क्या …लिखने – पढ़ने का हवाला भी हम देते हैं , पर बात जब किताबों की आती है तो २०० रूपये की किताब भी महँगी नज़र आती है तो …. इस समस्या की जड़ हम हैं

  2. विदेशो में इ-रीडर की डिमांड ज्यादा हो गयी है ! भारत में अभी भी एक दशक लगेंगे !

  3. किताबों की तो अच्छी कही .पर दूसरों की क्या कहूँ…जब से ब्लॉग्गिंग शुरू की है…पढना बहुत कम हो गया है…:(

  4. my husband got me a Kindle last year, ek do books padhne ke baad I was back to regular paper books. Inme padhne ka wo maja nahi jo paper books ka hota hai. Aajkal mera kindle kahin kisi drawer mein pada hai.

  5. किताबों की बात हुई तो फौरन इधर आए…बताना ज़रूरी लगा कि कुछ लोग आज भी किताबों के बिना नहीं रह सकते…टॉयलेट में भी खास जगह है किताबें और म्यूज़िक सिस्टम रखने का…बच्चों ने बचपन की 25 साल पुरानी किताबें भी सँभाल कर रखी हैं..और नई किताब खरीदने के लिए खाने पीने की कटौती होती है..किसी को भी ई किताब पढ़ने का शौक नहीं हाँ सुनने का ज़रूर है..

  6. हम तो आज भी पुस्तक ही पढ़ना पसंद करते हैं, परंतु हम तकनीक में बहुत पीछे हैं, हालांकि दुनिया के नंबर वन देशों को हम ही सेवा देते हैं और यूँ भी कह सकते हैं कि वे हमारे दम पर नंबर वन हैं, हमारी किताबों को क्वालिटी के साथ डिजिटाईज करने में अभी बहुत समय लगेगा, भले ही सुविधा उपलब्ध है ई रीडर की, परंतु हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की ई-पुस्तकों को आना बहुत जरूरी है।

  7. इंटरनेट की ये सुविधाएं केवल बड़े श्‍ाहरों तक ही सीमित है। इसे अभी गांव गांव पहुंचने में बहुत समय लगेगा।
    *
    मैं स्‍वयं जिस टीचर्स ऑफ इंडिया पोर्टल में काम करता हूं, उसके बारे में जब सुदूर गांव के शिक्षक को बताते हैं तो वह कहता है-ये सब तो ठीक है, आप इसकी सामग्री हमें छापकर दे दो। कारण वही कि वहां अगर इंटरनेट होगा तो भी खुलने में इतनी देर लगाएगा कि पाठक उकताकर ही भाग खड़ा होगा।
    *
    खैर किताबों का अपना नशा है। वे हैं और रहेंगी।

  8. हमें तो आज भी सीने पर किताबें रखकर सोने की आदत है.. लगता है अपनी प्यारी बिटिया, को जब वो बहुत छोटी थी, सीने से लगाकर लोरी गाकर सुला रहा हूँ.. ये बात और है कि किताबें मुझे माँ की तरह सुलाती हैं!!आज भी!!

  9. ये तो होना ही था। समय बदलता है तो शिक्षा, सूचना आदि के माध्यम भी बदलते हैं – कभी श्रुतियाँ, कभी शिलालेख, कभी ताम्रपत्र, कभी रेडियो, टीवी और कभी ई-बुक्स।

  10. मैं किताबों के बिना नहीं रह सकती…इधर हाल में घूमने गयी तो लगा कि खूबसूरत जगह जा रही हूँ वहाँ किताबों का क्या काम…मगर इतना अफ़सोस हुआ, ट्रेन पर हमेशा से किताब पढ़ने की आदत रही है. नेट पर कितना भी पढ़ लें, संतोष नहीं होता. वापस आते ही पहला काम किया कि हैरी पोटर पढ़ा…तब जा के चैन मिला. कमसे कम हमारा जेनरेशन जो किताबों के साथ बड़ा हुआ है उनके लिए शायद किताबों की जगह कोई नहीं ले सकता…नहीं पीढ़ी हमेशा बदलावों के प्रति ज्यादा फ्लेक्सिबल होती है इसलिए युवा आज इ-बुक पसंद करेंगे.

  11. बहुत बढ़िया और सटीक पोस्ट (अभी जी)… आज कल की तो सारी दुनिया चाहे बच्चों की हो या बाढ़ों की सब tablets और और कोंपुटर्स लप्पटोप और इंटरनेट पर ही निर्भर है किताबों का मजा तो लोग लगभग भूल ही गए हैं ….

  12. बहुत बढ़िया और सामयिक पोस्ट है…। पर मुझे लगता है कि किताबों का अस्तित्व इतनी आसानी से खत्म होने वाला नहीं…। मेरे पास ई- रीडर तो नहीं, पर मेरे मोबाइल में ही ई-बुक पढ़ने का सॉफ़्टवेयर है और मैं उसका भी भरपूर उपयोग कर रही हूं…पारम्परिक तरीके से पुस्तक पढ़ने के साथ…। सो मेरे विचार से जब तक तुम्हारी बहन और मेरे जैसे दोनो तरीकों का आनन्द लेने वाले पाठक रहेंगे, तब तक दोनो तरीके समानान्तर रूप से चलेंगे…। हाँ, यह ज़रूर है कि ई-बुक्स जितनी अच्छी अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं, वह अभी हमारी हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में नहीं है। तो शायद अभी इतनी चिन्ता की बात नहीं…। वैसे सबसे अच्छी बात यह है कि माध्यम चाहे जो भी हो, बस साहित्य ज़िन्दा रहना चाहिए…।
    प्रियंका गुप्ता

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