अकबर-बीरबल –एक माइक्रो पोस्ट

अकबर – बीरबल, आज तुम्हारा इम्तिहान लेंगे हम..देखेंगे तुम नवरत्नों में शामिल होने लायक हो या नहीं..
बीरबल – जैसा आप उचित समझें जहाँपनाह.
अकबर – ठीक है, तो मुझे कुछ ऐसा कहो की जिसे याद करते ही चाहे कितने भी सुख में हूँ, मुझे क्रोध आ जाए, और यदि दुःख के दिन आये तो उसे याद करते ही मन शांत हो जाए.

बीरबल ने अकबर को एक कागज़ पे कुछ लिख के दिया और कहा की “हुजुर, इसे आप तब ही खोलियेगा जब आप कभी गहरे दुःख में हो या फिर जब आपका बहुत अच्छा वक्त चल रहा हो.

इस बात को गुजरे काफी दिन हो गए, बादशाह अकबर ने उस कागज़ के टुकड़े को खोल के देखा नहीं था.फिर एक दिन जब बादशाह बड़े उदास, चिंतित और परेसान थे, तो उन्होंने सोचा की बीरबल के दिए कागज़ को खोल के देखा जाए, की उसमे क्या लिखा है.

अकबर ने कागज खोल के देखा , उसमे लिखा था –

“यह वक्त भी गुजर जाएगा”

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  2. अच्छे वक्त की एक बुरी आदत होती है की वो, गुज़र जाता है, लेकिन बुरे वक्त की भी एक अच्छी आदत होती है की वो भी गुज़र ही जाता है …. 🙂

  3. शिखा दी के कमेन्ट को आगे बढाते हुए…हो सके तो इसमें..जिंदगी बिता दो..पल जो ये जाने वाला है… 🙂

  4. हम्म बीरबल की कहानी की एक मोटी सी किताब हुआ करती थी मेरे घर में. अब कहाँ है पता नहीं. लेकिन यहाँ पर भी देखकर अच्छा लगा…..मेरा भी यही मानना है कि ये वक्त भी गुज़र जायेगा. वैसे शिखा जी, पल्लवीजी के कमेंट्स अच्छे लगे…..
    @शेखर: कौन-सी वंदना जी….??

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