जगदम्बा स्थान और बैकटपुर मंदिर – भाग २

जगदम्बा स्थान और बैकटपुर मंदिर – पार्ट १ से आगे..

..फिर कई दिन हो गए, दो तीन साल बीत गए, वहां हम नहीं जा पाए.इस जनवरी में मेरी बहन की शादी थी,शादी के बाद युहीं एक दिन मैंने माँ से कहा की चलो चलते हैं जगदम्बा स्थान.लेकिन घर में शादी के बाद कुछ न कुछ काम लगे ही रहते हैं, फुर्सत ही नहीं मिल पायी हमें और फिर मैं वापस बैंगलोर आ गया.मई में फिर से घर जाना हुआ तो वहां जाने का प्लान फिर से बना.लेकिन इस बार वहां जाना मंदिर के दर्शन कम ऐड्वेन्चरस ज्यादा हो गया.

हुआ ये की जब हमने कार्यक्रम बनाया जगदम्बा स्थान जाने का, उसके एक दिन पहले से ही एन.एच 30 पे दो दिनों से भारी जाम लगा हुआ था.इस तरह का जाम अधिकांश लोगों ने ना पहले कभी सुना न देखा.हमें इस बात की हलकी सी भी खबर नहीं थी, लोकल न्यूज़ भी किसी ने ध्यान से सुना नहीं.सुबह करीब साढ़े पांच बजे मैं, माँ,पापा और नानी निकले मंदिर के लिए.सोचा तो था की हद से हद इग्यारह या बारह बजे तक वापस घर पहुँच जायेंगे.जैसे ही पटना बाईपास पे हमारी गाड़ी पहुंची, जाम के दर्शन शुरू हो गए.मुझे लगा बाईपास पे तो जाम हमेशा लगा ही रहता है, कोई खास बात नहीं.लेकिन जैसे जैसे आगे बढते गए वैसे वैसे जाम और बड़ा लगने लगा.वैसे आगे तो बस हम नाम के बढ़ रहे थे.गाड़ी दूसरे या हद से हद तीसरे गिअर में चल रही थी.फतुहा तक पहुँचते पहुँचते हमें ये लग गया की इस बार अच्छे खासे चक्कर में पड़ गए हैं.इधर से जाने वाले लेन में तो फिर भी गाड़ी थोड़ी बहुत आगे बढ़ रही थी और इसी तरह हम लोग फतुहा तक पहुंचे, लेकिन उधर से आने वाले लेन में तो ट्रक सब एकदम रुकी हुई थी, एक लाइन से लगी हुई.एकदम स्टैटिक.एक भी ट्रक आगे नहीं बढ़ रही थी.हम इतने बुरे फंसे हुए थे की आगे बढ़ने के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं था.चाह के भी गाड़ी पीछे नहीं मोड़ सकते थे.कोई ऑलटर्नेट रूट भी नहीं था की हम वापस घर पहुच सकते.बस एक ही रूट थी, बाईपास की, जिसपे इस तरह की भयानक जाम लगी हुई थी. उधर से आने वाले लेन में तो ट्रकें ही ट्रकें लगी हुई थी और सब बस लगी ही हुई थी, पटना बाईपास से लेकर लगभग बैकटपुर तक, ट्रकें एक लाइन से लगी हुई थी, खड़ी थीं.सड़कें भी इतनी कम चौड़ी थी की एक दो गाडियां आगे पीछे हो जाए तो जाम और गहरा जाता.लोग इधर उधर दायें बाएं कर के अपनी गाडियां निकाल रहे थे.मैंने भी जैसे तैसे गाड़ी निकाला.करौटा पहुँचने के करीब दस किलोमीटर पहले लगा की इधर से जाने वाली लेन क्लिअर हुई.लेकिन उधर से आने वाली लेन तो फिर भी थी , और ट्रक स्टैटिक लगे हुए.यह हम लोगों के लिए परेशानी की बात हो गयी थी.बैकटपुर के कुछ पहले, करीब करौटा से पांच-छः किलोमीटर पहले जाम क्लिअर हुआ, राहत मिली.लेकिन फिर भी ये चिंता बनी हुई थी की वापस में कहीं फिर जाम न मिले.  

सुबह साढ़े पांच बजे हम घर से निकले थे, और मंदिर पहुँचते पहुँचते हमें साढ़े बारह बज गए थे.थोडा सुकून मिला मंदिर पहुँच के.लेकिन मंदिर की खराब सफाई और रख रखाव देख बहुत गुस्सा भी आया, दुःख भी हुआ.मंदिर के एक हिस्से में लगे मार्बल पे इतनी ज्यादा फिसलन थी की सीढ़ियों से उतरने या चढ़ने में आपने हलकी सी भी असावधानी की तो फिसले.पिछली बार जब जाड़ों में गया था तो यहाँ की हालत ऐसी नहीं थी, उस वक्त साफ़ सुधरा हुआ करता था मंदिर.मंदिर के फर्श से लेकर कम्पाउंड तक, हर जगह पानी,  कीचड़ और गंदगी थी.छः सात घंटे जाम में फंस कर दिमाग वैसे ही अच्छा ख़ासा इरिटेट हो चूका था, और उसपे मंदिर की ऐसी व्यवस्था.पिछले बार जब गया था तो मंदिर के बगल में एक खूबसूरत गार्डन था, जो इस बार बंद था.और अंदर की दुर्दशा ऐसी की मुझे कहीं गुलाब दिखे ही नहीं.पिछली बार गार्डन बड़ा खूबसूरत दिख रहा था, और बीच में एक छोटा सा तालाब भी था.मैं तो सोच के गया था की इस बार जाऊँगा तो गार्डन के गुलाबों की तस्वीर निकालूँगा.पिछले बार तो अच्छा कैमरा भी पास नहीं था, मोबाइल से ही फोटो निकाले थे.लेकिन इस बार मंदिर वालों ने गार्डन भी बंद रखा था.वैसे अगर गार्डन खुला भी होता तो भी उसकी दुर्दशा ऐसी थी की मैं अंदर जाता भी नहीं.मंदिर के सामने ही एक मंदिर कान्ट्रब्यूशन ट्रस्ट का बोर्ड लगाए कुछ आदमी बैठते हैं, जहाँ आप अपनी इच्छा अनुसार दान कर सकते हैं.मंदिर में दान राशि भी अच्छी खासी मिलती होगी, लेकिन फिर भी मंदिर की ऐसी हालत, ये बात बहुत तकलीफ दे गयी.
मैं और पापा….[जिलेबी दिखा न आपको फोटो में :)]

इन सब कारणों के बावजूद मुझे यहाँ आकार बड़ा अच्छा लग रहा था.पक्के तौर पे कह सकता हूँ की ये जगह सम्मोहित करती है, नहीं तो इतनी खराब व्यवस्था के बाद भी आपको कोई जगह अच्छी लगे,ये कोई आसान बात नहीं.उस दिन गर्मी भी अच्छी खासी थी, केवल पसीने ही चल रहे थे.और उसी गर्मी में हम मंदिर के पास दूकान में बैठ के गरमा गर्म समोसे और जलेबियां खा रहे थे.अच्छी खासी भूख लगी हुई थी, और इस बात से कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था की इतनी गर्मी है..पसीने चल रहे हैं उसपर गर्म गर्म समोसे और जिलेबी.करीब दो ढाई घंटे के बाद हम वहां से चले..माँ ने कहा की इतने देर में तो जाम भी खत्म हो ही गया होगा, लेकिन मेरे मन में दुविधा अब भी थी.

करौटा से निकलने के बाद करीब दस किलोमीटर तक सड़कें एकदम खाली मिली..हम सब बड़े ही खुशी खुशी वापस आ रहे थे, की चलो जाम भी समाप्त हो गया और दर्शन भी हो गए.लेकिन फतुहा के ठीक कुछ पहले ही फिर से वही जाम, ट्रकों की वैसी ही लाइन.हमारी गाड़ी फिर वैसे ही रुक रुक के चलने लगी.रुक ज्यादा रही थी, और चल कम रही थी.हम लोगों ने ये मान लिया था की घर पहुँचते पहुँचते रात हो ही जायेगी.जब थोडा आगे बढे हम तो देखा की फतुहा मोड़ पे कुछ ट्रैफिक पुलिस वाले खड़े हैं जो किसी दूसरे रूट में गाड़ियों को डाइवर्ट कर रहे हैं.हम भी उनके बताये हुए डाइवर्जन पे चल दिए.वो दनियावां जाने वाला स्टेट हाइवे था.सब गाडियां इधर से ही जा रही थी, करीब तीन चार किलोमीटर तक जाने के बाद पापा को ये ख्याल आया की किसी से पूछ लेनी चाहिए  ये सड़क किधर निकलती है, वैसे पापा को मालुम तो था की ये स्टेट हाइवे किधर निकलती है लेकिन पटना तक यही रूट जाती भी है या नहीं ये कन्फर्म करना था..एक ऑटोरिक्शा वाले से पता करने पे मालुम हुआ की ये हिलसा के तरफ जाती है और पटना इस रूट से करीब 70 किलोमीटर पड़ेगा.फिर उसी ने हमें ये बताया की जिस तरफ से हम आ रहे हैं, वहीँ फतुहा मोड़ से एक कच्ची सड़क निकली है जो की बाद में पटना जीरो माईल में जाकर मिलती है.हम वापस उसी मोड़ पे पहुंचे, तो देखा की ट्रैफिक पुलिस वाले वहां खड़े थे और छोटी गाड़ियों को उस कच्ची सड़क के तरफ मोड़ रहे थे.हम भी उसी तरफ मुड गए.
वो कच्ची सड़क ऐसी थी की इधर गड्डा तो उधर…एकदम ऊँची नीची सड़क..कहीं कहीं अचानक से सड़क उठ जाती तो कहीं कहीं खाई सी एकदम नीचे जाती…उसी सड़क से जैसे तैसे लेकर गाड़ी निकाल ही रहा था की उसी बीच जबरदस्त जोरदार आंधी चलने लगी.एकदम धुल भरी आंधी.आंधी इतनी जोरदार थी की गाड़ी कुछ देर के लिए रोकनी पड़ी.कुछ भी दिखाई नहीं दे पा रहा था.गाड़ी की हालत तो ऐसी की हर कोने पे धुल ही धुल भरी हुई थी.उसी कच्ची सड़क पे दो तीन किलमीटर चलने के बाद पक्की सड़क मिली.हम लोग जिस कच्ची सड़क को पकड़ के चले थे, वो एकदम खेत खेत होते हुए जा रही थी.आदमी या किसी बस्ती का कोई नामोनिशान नहीं दिख रहा था.नज़र आ रहा था तो केवल वो गाडियां जो डाइवर्जन की वजह से इस रूट से जा रही थी.पक्की सड़क  बहुत अच्छे बने हुए थे.खेतों और समतल मैदानों से सड़क की उचाई कम से कम दस फीट रही होगी.
धुल भरी आंधी के बाद बारिश होने लगी थी.मौसम भी अच्छा हो गया था.और सही कहूँ तो इन सड़कों पे गाड़ी चलाना मुझे अच्छा लग रहा था.दूर दूर तक केवल मैदान और सड़क, ना कोई बस्ती न गाँव.कुछ दूर चलने पे एक बोर्ड दिखा की “चंडासी गाँव सत्रह किलोमीटर”.पूछने पे पता चला की चंडासी से ही सड़क पटना जीरो माईल में मिलती है.पुरे सत्रह किलोमीटर तक न कोई गाँव दिखा न कोई इंसान..आगे पीछे केवल गाडियां थी जो डाइवर्जन के वजह से इस रस्ते जा रही थी.सड़कें भी एकदम जिलेबी की तरह, घुमावदार.ऐसा लगता था की जहाँ से हम चले वहीँ पहुँच गए.अगर एक सीधा स्ट्रेच पे सड़कें रहती तो दुरी कम लगती और समय भी बचता.आगे उसी सड़क पे एक जगह एक बस नीचे मैदानों में गिरी दिखी.वहां पुलिस के दो जीप भी लगे थे(बाद में घर आने पे न्यूज़ में ये बस गिरने की खबर भी आई थी).सड़कें अच्छी थी लेकिन छोटी, केवल छोटी गाड़ियों को ही इस रस्ते आने की इजाजत थी, लेकिन बस वाले इधर भी जबरदस्ती बस घुसा के ला रहे थे.शायद इसी वजह से बस भी नीचे मैदानों में गिरी होगी.वो सड़क आगे जा कर गौरीचक इलाके में मिली.तब जाकर हमें सुकून आया, की चलो कम से कम पटना के किसी इलाके में तो पहुंचे.
गौरीचक पहुँचने के बाद भी रहत नहीं मिली.आगे चल के फिर से जाम में फंसना पड़ा.लेकिन इस बार ज्यादा देर के लिए नहीं.देखा की सड़कों के नीचे एक कच्ची सड़क फिर से जा रही थी, हम फिर से उसी कच्ची सड़क में गाड़ी उतार दिए.पूछने पे पता चला की ये सड़क “कृष्णा निकेतन” स्कूल में जा मिलती है.ये बहुत राहत वाली बात थी हमारे लिए.कृष्णा निकेतन स्कूल मतलब पटना मेन पहुँच जाना.खैर, इसी रस्ते आगे बढते रहे, कुछ बड़ी गाडियां से थोड़ी परेशानी और तकलीफ हुई लेकिन आख़िरकार हम पटना बाईपास पे पहुँच गए.जाम तो इधर भी लगा हुआ था और गाड़ी हम बाईपास से होते हुए कंकरबाग के इलाके से निकाल लिए.जब शहर में पहुंचे तब जाकर कहीं राहत मिली.
सुबह साढ़े पांच बजे का शुरू किया सफर हमने शाम चार बजे घर पहुँच के पूरा किया.नानी,पापा,माँ सबने कहा की ऐसा जाम उन्होंने जिंदगी में कभी नहीं देखा.घर जाकर पता लगा की वो विशाल जाम दो तीन दिन से लगा हुआ था.और जाम क्लिअर होने में कुछ 90 घंटे लगे थे.घर पहुच के दिमाग में ये बात तो जरुर आई थी की अगर हमें डाइवर्जन नहीं मिलता तो क्या होता.

ये सफर एक यादगार सफर बन गया हमारे लिए. 🙂

नानी, मैं और माँ 

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  1. ek baar main panshi thi trafic jam men.while going to hyderabad. 🙁 bhot irritating hota hai. i knw :/

    newaiz itz kind of a exp you will neva forget. 😛 dh pics are nice..esp d last one :-))

  2. दिल में आस्था हो तो बाधाये स्वतः दूर हो जाती है !यह माँ की अनुकम्पा ही थी ! जो समय से निकल कर समय से घर वापस आ गएँ ! बहुत सुन्दर गर्मी का अनुभव

  3. लगता है जलेबी काफी फेमस हो गए हैं पोस्ट में….:) कमेंट्स में केवल जलेबी ही जलेबी…अब तो मुझे भी फिर से मन करने लगा जलेबी खाने का 😛

  4. @स्नेहा, जिन्होंने भी देखा है मेरे पापा की और मेरी तस्वीर, सब ऐसा ही कहते हैं 🙂

  5. ऐसा लगा जैसे हम भी हो आये जगदम्बा स्थान…पटना में थी तो एक बार दशहरे में जाना हुआ था…अब याद नहीं है…बहुत साल हो गए. हाँ ये पोस्ट पढ़ कर ऐसा जैसे पटना को छू आये हैं, सालों की यादों के धीरे धीरे चलने वाले जाम से गुजरकर.

    हाँ…जलेबी हमारे भी मन में अटक गया 🙂

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