कुछ पुरानी यादों के नशे में (पार्ट १३ )

सुधा मौसी(बड़ी मौसी),मेरी माँ,गीता मौसी(छोटी मौसी)

इस दफे जब मैं पटना आ रहा था तो रस्ते में ही मुझे ये खबर मिली की मेरी बड़ी मौसी भी पटना आई हुई हैं.उनके पटना आने की खबर मुझे पहले नहीं थी.मुझे ये जानकार खुशी हुई की मौसी पटना आ रही हैं.मैंने सोचा, चलो इस बार पटना आना थोड़ा सफल हुआ लगता है..बचपन के चार दोस्त एक अरसे के बाद पटना में मिल रहे हैं और अब मौसी भी पटना पहुँच गयी हैं.बचपन में हम दोनों भाई बहन ज्यादातर अपनी दोनों मौसियों के ही पास रहे, तो ऐसे में बड़ी मौसी और छोटी मौसी से ज्यादा लगाव होना लाजमी है..तो इसलिए जब मुझे पता चला की बड़ी मौसी पटना आ रही हैं, तो ज्यादा खुशी हुई.बड़ी मौसी(सुधा मौसी) से पिछले कुछ समय में जब भी मुलाक़ात हुई, तो हमेशा कोई न कोई खास मौके ही, जैसे पिछले डेढ़ दो सालों में सुधा मौसी से मुलाक़ात बस दो दफे ही अच्छे से हुई है.एक मेरी बहन की सगाई पे तो दूसरी बार बहन की शादी में.कूल मिलाकर ये कह सकते हैं की इत्मीनान से मौसी से बैठकर बात किये अच्छे खासे दिन हो गए थे.

कल दिन में नानी के घर पे ही सब लोग इक्कठे हुए.ये मैं पहले भी लिख चूका हूँ की मेरे बचपन की लगभग सभी यादें नानी घर से जुड़ी हुई है.कल शाम भी जब मौसी, मौसा और मामी के साठ बैठा हुआ था तो कई पुरानी यादों का पिटारा खुलते गया.कुछ ऐसी जगहें होती हैं, जो कई पुरानी बातों की याद दिलाती हैं.मेरे लिए ऐसी काफी जगहें हैं, जहाँ जब भी जाता हूँ, तन्हाई में कभी समय गुजारता हूँ तो पुरानी बातें, यादें एक फिल्म सी मेरे ज़हन में चलने लगती है.नानी घर का जो बरामदा और छत है, ये दो ऐसी जगहें हैं जहाँ अक्सर मुझे पुरानी बातें अनायास याद आ जाती हैं..और इस बार तो मौसी ने सब बचपन की बातें याद दिलानी शुरू कर दी.

मैं और मेरी बहन, सुधा मौसी के साथ 

सुधा मौसी शादी से पहले शिक्षिका थीं, और पास के ही मोडर्न स्कूल में वो पढाती थी.मेरा पहला स्कूल भी मोडर्न स्कूल ही था, जहाँ मुझे नर्सरी में दाखिला दिलवाया गया था.मैं इस बात से अनजान था, की मेरे स्कूल आने जाने के क्रम में ही मौसी को उस स्कूल में पढाने का प्रस्ताव मिला था.सुधा मौसी ने उस स्कूल में लंबे अरसे तक बच्चों को पढाया.मुझे उन दिनों की बातें याद है जब मौसी बच्चों के एंसर शीट घर लाती थी, चेक करने.उस समय मैं एंसर शीट देख बड़ा उत्साहित सा हो जाता था और अक्सर मौसी के जोड़े हुए नम्बर्स को फिर से जोड़ने लगता था.शायद तीसरी कक्षा में रहा हूँगा उस वक्त, याद नहीं.
कहते हैं न की अगर अच्छे टीचर्स मिले तो बच्चों को उन टीचर्स के नाम, शक्ल याद रह जाते हैं.ऐसा ही एक वाकया है.मैं इंजीनियरिंग पढ़ रहा था,छठे सेमेस्टर की बात है,एक दिन अपने रूम में बैठे बैठे एल्बम में पुरानी तस्वीरों को देख रहा था.मेरा एक मित्र सौरभ भी साथ में बैठा मेरे साथ तस्वीरें देख रहा था.एल्बम की एक तस्वीर में सुधा मौसी हम दोनों भाई बहनों को गोद में ली हुई है.वो तस्वीर देखते ही हमारे मित्र सौरभ बाबु कहने लगे – “अरे, ये तो सुधा मिस हैं..आप कैसे जानते हैं इनको?”.मैंने कहा – “अरे ये तो मेरी मौसी है, मेरी बड़ी मौसी”.फिर सौरभ बाबु अपने चीर परिचित अंदाज में एकदम इक्साइटड होके कहने लगे..”अरे वाह!सुधा मिस हीं तो हमको पढाती थी पहले”.फिर सौरभ ने बताया की उन्होंने भी मोडर्न स्कूल से ही शुरूआती पढ़ाई की.मैंने कहा उनसे, की जब मिलूँगा सुधा मौसी से तो आपके बारे में पूछ के देखूंगा.फिर जब छुट्टियों में घर आया और उस समय सुधा मौसी से मुलाक़ात हुई तो सोचा की देखता हूँ मौसी को अपने पुराने छात्रों के नाम याद हैं या नहीं.कमाल की बात ये है, की मौसी को जब बताया सौरभ के बारे में तो वो भी तुरंत पह्चा गयीं, और तो और उन्हें सौरभ की बहनों के भी नाम याद थे, जो उसी स्कूल में पढ़ने आती थी.खैर, इन सब बातों में एक बात मेरे काम की पता चली, की सौरभ बाबु बचपन से ही बहुत शरारती थे. 🙂

कल मौसी ने एक पते की बात भी कन्फर्म कर दी, की मैं बचपन में बड़ा डरपोक किस्म का बच्चा था.मौसी कहती हैं की, जब भी शाम में उनके साथ बाज़ार जाता और शाम गहराने लगती, अँधेरा होना शुरु हो जाता तो मैं मौसी को तंग करने लगता, उनसे चिपक जाता…कहता की “अब बहुत हो गया, वापस चलो…हमको डर लग रहा है :P” .यही बात एक दफे छोटी मौसी भी बता रही थी, लेकिन उस वक़्त मुझे लगा वो युहीं कह रही हैं ये बातें.मेरे स्कूल जाने के भी बड़े चटपटे किस्से रहे हैं, मैं स्कूल जाने से हद भागता था, और माँ-पापा-नानी-मौसी-मामा सब मुझे तरह तरह के लालच दे के स्कूल ले जाया करते थे.कभी पिकनिक ले जाने का बहाना बनाते तो कभी कुछ और तरह से फुसला के मुझे स्कूल ले जाते थे.अब सोचता हूँ की मैं बचपन में कितना बुद्धू था की सब की फुसलाहट भरी बातों में आ जाया करता था और स्कूल चला जाया करता था.लगता है की बचपन में सभी बच्चे ऐसे ही सीधे सादे होते हैं, इसलिए तो परिवार वाले उन्हें कितनी आसानी से बेवकूफ बना जाया करते हैं.बचपन में मेरे सभी बच्चे कोई न कोई शरारत करते ही हैं, लेकिन पता नहीं क्यों मेरे दो नासमझ मित्रों को ये लगता है की मैं बचपन में काफी शरारती रहा हूँगा.तो उन्हें ये बता दूँ की अभी तक जितने भी अपने बचपन के किस्से मैंने सुने हैं, जितनी भी बातें मौसियों ने और मामाओं ने बताई हैं मुझे, उनमे इस बात का बिलकुल भी प्रमाण नहीं मिलता की मैं शरारती बच्चा था, बल्कि बेहद शरीफ और शांत बच्चा था मैं..ये बात सिर्फ उन दो लोगों को टारगेट कर के लिखी जा रही है, जिनके मन में ये ग़लतफ़हमी थी.

बातों के सिलसिले में कुछ पुरानी बातें भी उठी, की कैसे एक दफे जब पटना में भूकंप की अफवाह फैली थी, तो  सब लोग आधी रात को घर से बाहर सड़कों पे निकल आये थे, और जब एक दफे घर में बिजली के मेन स्विच में एकाएक शोर्ट सर्किट की वजह से आग पकड़ गयी तो कैसे मेरी छोटी मौसी(जो अभी दिल्ली में रह रही हैं), तुरत पीछे वाले गेट से दीवाल फांद के बाहर से ‘बालू’ लेते आ गयी.जब तक सब लोग बाहर मेन गेट खोलते, तब तक छोटी मौसी बालू भी लेते आई थी, जिसके वजह से आग पे काबू पाया जा सका.उस रात जहाँ तक मुझे याद है वी.सी.पी पे कोई फिल्म चल रही थी.शायद ‘चांदनी’..याद नहीं है सही से.
उन्ही दिनों एक बार जोर शोर से एक चोर की अफवाहें फैली थी, जिसके वजह से पुरे मोहल्ले के लोग कुछ खास सतर्कता से रहने लगे.और हर दिन कोई न कोई ये बात उठा ही देता था की उसने चोर को देखा है.

ऐसी पता नहीं कितनी ही बातें हैं, जो कभी कभी याद आ ही जाते हैं, या कभी परिवार वालों के बीच रहता हूँ तो ये बात रिपीट होते रहते हैं.अब जब तक पटना में हूँ, शायद पुरानी बातों को ब्लॉग पे लिखता चलूँ, एक और पोस्ट इस पोस्ट के साथ लिख चूका हूँ, जिसमे मेरे एक पुराने दोस्त(टेप रिकॉर्डर) का जिक्र है.करता हूँ कभी समय निकाल के उसे पोस्ट.

(इस कड़ी के बाकी की पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लीक करें  – कुछ पुरानी यादों के नशे में )

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    तुम्हारी लिखी बातें अपनी सी लगती हैं. और चिंता की कोई बात नहीं है बचपन में मैं भी बहुत सीधी थी 🙂

  2. कितने प्यार से सिलसिलेवार यादों को समेटते हो…
    हम भी साथ बह जाते हैं….एक चलचित्र सा पैरेलल भी कुछ चलने लगता है….ये सब पढ़ते हुए.

  3. "मेरे बचपन की लगभग सभी यादें नानी घर से जुड़ी हुई है." मेरे बचपन की यादें भी ननिहाल से जुड़ी है..आधा अधूरा सा लिखा है…मेरा यादों का पिटारा भी खुल गया….यही यादें तो अपनी धरोहर है..

  4. शाम होते ही मेरे घर में लगता है यादों का डेरा…
    शाम और मौसी नानी के साथ..किस्से तो पुराने याद आयेंगे ही….

  5. अभिषेक जी, बहुत अच्छा लगा आपके संस्मरण को पढकर. आगे भी लिखते रहिये, आपको पढ़ना अच्छा लगता है. जी प्रणाम!

  6. @स्तुति,
    आसपास कोई डॉक्टर है तो तुरत दिखलाओ बिना देरी किये…इमरजेंसी केस है तुम्हारा 😛

  7. हा हा हा हा हा ….अजय भईया गलतियो से देख लिए न ता कहेंगे की ई दुन्नो यहाँ भी चालू…

    "जी प्रणाम" 😀 :D:D:D:D:D:D:DD:D:D

  8. वत्स आज तो राही मासूम याद आ रहे हैं:
    यादें बादलों की तरह हल्की फुल्की नहीं होतीं कि आहिस्ता से गुजार जाएँ.. यादें एक पूरा ज़माना होती हैं और ज़माना कभी हल्का नहीं होता..

  9. नानी के घर से जुडी मेरी भी अनगिनत यादें हैं…तो एक बार फिर हमेशा की तरह अपने साथ बड़ी सहजता और खूबसूरती से तुम अपनी यादों की दुनिया में सैर करा लाए…|
    कैसे लिख लेते हो इतना अच्छा…???

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