एक सपना पूरा हुआ..हमने इतिहास बनते देखा – क्रिकेट वर्ल्ड कप

ये किसी एक सपने के सच होने से कम नहीं.पांच विश्व कप से जिस पल का इंतज़ार था वो पल आ ही गया.कप्तान धोनी ने जब छक्का लगा के विश्व कप हमारे नाम किया,तो लगा इतने वर्षों का सपना इस खूबसूरती से आखिरकार पूरा हो ही गया.मेरे और पुरे देश के लिए वो एक ऐसा पल था जिसे हम हमेशा संजो के रखेंगे.जिसकी कहानियां हम आने वाले पीढ़ी को बड़े गर्व और फक्र के साथ सुनायेंगे.ये पल मेरे लिए मेरे जिंदगी का सबसे बड़ा, खूबसूरत और फक्र करने वाला पल है, और मुझे यकीन है की मेरे तरह पुरे देश के लिए भी ये वैसा ही पल है.

विश्व कप की याद साल 1992 के टूर्नामेंट से है.ऑस्ट्रेलिया में खेला गया था ये टूर्नामेंट.अधिकतर मैच सुबह तीन-चार बजे के आसपास शुरू होते थे.उस समय क्रिकेट की बस बुनियादी समझ ही थी, अब एक बच्चे से आप और क्या आशा कर सकते हैं.वो सचिन का पहला वर्ल्ड कप था…वो क्रिकेट में लगभग नए ही थे और कपिल देव उस समय के सबसे बड़े क्रिकेटिंग आइकोन.कपिल देव उस समय मेरे लिए सबसे बड़े खिलाड़ी थे.जो आजकल के बच्चों का क्रेज सचिन के लिए है, वो क्रेज उस समय मेरे लिए कपिल देव के लिए था.पाकिस्तान और भारत के बीच भी पहला विश्व कप मैच उसी साल खेला गया था, और कपिल देव ने भी कुछ चालीस रन बनाये थे.सचिन ने सबसे ज्यादा रन बनाये थे उस मैच में.वैसे तो इस मैच की रिकोर्डिंग कई बार देख चूका हूँ टी.वी पे, लेकिन मैच में मिले जीत के वो पल पता नहीं कैसे अब तक दिमाग में सही सलामत हैं.वहीँ, जहाँ पाकिस्तान से जीत की बात याद है, वहीँ ऑस्ट्रेलिया से मिली एक रन की हार भी अच्छे से याद है.ये दो मैच के अलावा एक और मैच जो मुझे लगभग लगभग याद है वो है जिम्बावे के ऊपर मिली जीत.मुझे सही से याद तो नहीं उस साल होली या होलिका दहन के दिन भी किसी मैच में अपनी जीत हुई थी.1992 में भले हम वर्ल्ड कप ना जीते हों, लेकिन मेरे जैसे बच्चे के दिल में वर्ल्ड कप जीतने की एक उम्मीद दिल में बंध गयी जो धीरे धीरे एक सपने में तब्दील होते चली गयी.

1996 के वर्ल्ड कप तक तो क्रिकेट एक जूनून की तरह सर पे कब्ज़ा किये हुआ था.सचिन जबरदस्त फॉर्म में थे, और मैंने लगभग ये सोच लिया था की इस साल तो वर्ल्ड कप पे बस हमारा ही हक है.भारत-पाकिस्तान के क्वार्टर फाईनल मैच में जिस तरह से हमारी टीम ने जीत हासिल की, उससे ये लग रहा था की अबकी विश्व विजेता हम ही बनेगे.वर्ल्ड कप से सिर्फ हम दो कदम दूर थे, लेकिन इडेन गार्डन के उस सेमी-फाइनल मुकाबले ने करोड़ों लोगों का सपना चूर चूर कर दिया.उस मैच को मैं कैसे भूल सकता हूँ.श्रीनाथ ने पहले ही ओवर में श्रीलंका के दो विकेट झटक करोड़ों क्रिकेटप्रेमियों को ये सूचित कर दिया की इस बार विश्व विजेता हम ही बनेंगे.सचिन भी जिस तरह से क्रीज पे खेल रहे थे, लग रहा था की फाईनल में हमारा प्रवेश तो लगभग तय ही है.लेकिन सचिन के आउट होते ही,सारी टीम ऐसे लड़खड़ाई की जैसे ताश के पत्तों का महल.वाईड जाती हुई स्पिन करती गेंद पे सचिन स्टंप हो गए(ये भी नोट किया जाए की सचिन गिन चुन के कुछ ही बार स्टंप आउट हुए हैं).बहुत से लोगों ने मैदान के पिच को दोष दिया, मुझे ज्यादा तकनिकी बात तो उस समय पता नहीं थी, लेकिन जिस सहजता के साथ सचिन खेल रहे थे, मुझे तो यही लगा की पिच में थोड़ा स्पिन तो है, लेकिन फिर भी ऐसी पिच नहीं की हम हार जाएँ.आठ विकेट गिरते गिरते इडेन गार्डन में वो शर्मनाक हादसा हुआ, जो की भारत जैसे क्रिकेट प्रेमी देश के लिए एक शर्मनाक पल ही कहलायगा.इस साल हमारी टीम शायद सबसे मजबूत टीम थी और वर्ल्ड कप जीतने की सबसे बड़ी दावेदार.लेकिन श्रीलंका के साथ हुए उस सेमी-फाइनल मुकाबले ने टीम की धज्जियाँ उड़ा दी.इस वर्ल्ड कप के हर मैच में सबसे ज्यादा रन सचिन ने ही बनाये थे, बाकी सभी तो जैसे ये भूल ही गए थे की रन उन्हें भी बनाने हैं.

1999 के विश्व में उम्मीद फिर से बंधी.लेकिन शुरुआती दो(या शायद तीन) मुकाबले में मिली हार के बाद मैंने ये आस छोड़ दी थी की विश्व कप हम जीत पायेंगे.फिर आया वो मैच जिसने मेरे साथ साथ सभी लोगों को ये यकीन दिलाया की हमारी विश्व कप की दावेदारी कमज़ोर नहीं.श्रीलंका से हुए एक मुकाबले में हमने एकतरफा जीत हासिल की थी.सौरभ गांगुली ने धमाकेदार 183 रन बनाये थे.गांगुली और द्रविड ने मैदान में छक्कों-चौकों की बारिश कर दी थी.श्रीलंका के बाद इंग्लैंड को भी हमने लगभग एकतरफा मुकाबले में हराया था.जहाँ एक तरफ सचिन,द्रविड और गांगुली जैसे बल्लेबाज थे वहीँ दूसरी तरफ कुंबले,श्रीनाथ और प्रसाद जैसे गेंदबाज.इन खिलाड़ियों के कुछ प्रदर्शन इतने शानदार रहे की मेरे में ये आस फिर से जग गयी की इस बार विश्व कप तो हमरा ही हुआ.क्वार्टर फाइनल के जगह इस साल सुपर सिक्स मुकाबले थे.पाकिस्तान को फिर से वर्ल्ड कप के सुपर सिक्स मुकाबले में हमने सिकस्त दी और अपनी दावेदारी थोड़ी और मजबूत की, लेकिन सुपर सिक्स में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के हाथों मिली हार के कारण हमें विश्व कप से बाहर होना पड़ा.

2003 के वर्ल्ड कप में भारत टीम की कमान सौरभ गांगुली के हाथ में थी.ये भारतीय क्रिकेट के लगभग दूसरे युग की शुरुआत थी.यही वो दौर था जब गांगुली के नेतृत्व में हमारी टीम को “टीम इंडिया’, ‘मेन इन ब्लू’ के नाम से जाना गया और यह वो समय था जब हमारी टीम अलग दिख रही थी, कुछ बेहतर कर गुजरने वाली, टीम को एक नया चेहरा मिल गया था.एक ऐसा कप्तान जो पहले के “कूल” कप्तान के जैसे कूल न हो कर बेहद आक्रामक कप्तान थे-सौरभ गांगुली.इन्होने कितने ही नय खिलाड़ियों को टीम में जगह दी, हर तरह के रिस्क लेते रहते और खिलाड़ियों का जबरदस्त प्रोत्साहन भी करते.2002 में जब नैटवेस्ट ट्राफी जीत हमने इतिहास रचा था, तब लगभग सभी लोगों ने अगले साल(2003) विश्वकप का सबसे बड़ा दावेदार हमें ही घोषित कर दिया.लेकिन विश्व कप के बस एक महीने पहले ही न्यूजीलैंड के दौरे पे गयी टीम इंडिया की निराशाजनक प्रदर्शंत के बाद और वर्ल्ड कप के पहले मैच में ऑस्ट्रेलिया से मिली हार के बाद आलोचकों के मुहं खुलने शुरू हो गए और सबने हमें ये कह के विश्वकप की दावेदारी से अलग कर दिया की हम ये टूर्नामेंट किसी कीमत पे जीत नहीं पायेंगे.शायद उन आलोचकों को अपनी बात कहने के समय इस बात का गुमान तक नहीं होगा की सचिन कुछ अलग करने के मुड में हैं..ऐसा कुछ जो क्रिकेट इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जाएगा.सचिन के एक के बाद एक शानदार इनिंग्स के बदौलत हमने फाइनल तक का रास्ता तय किया.इस बार पाकिस्तान से हमारी टक्कर फिर से चौथे बार हुई, और सचिन ने उनके पुरे पेस-अटैक की धज्जियाँ उड़ा दी थी.उन्हें इस बार भी हमने वर्ल्ड कप में हराया.श्रीलंका को 1999 के ही तरह इस वर्ल्ड कप के सुपर सिक्स मुकाबले में हमने करारी शिकश्त दी.सुपर सिक्स मुकाबले में न्यूजीलैंड से भी हमने भरपूर बदला लिया और एक करारी हार सौंप दी उन्हें.सेमी-फाइनल में केन्या को हरा जब हमने फाइनल में जगह निश्चित की, तो मेरा यकीन और बढ़ गया की इस बार तो जीत अपनी पक्की है..कोई सवाल ही नहीं उठता की हम हार जाए.खिलाड़ी इतने अच्छे फॉर्म में है, कैसे हारेंगे? लेकिन इस बार भी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, ऑस्ट्रेलिया से फाइनल में हमें हार का सामना करना पड़ा.मैं इतना निराश हो गया था की चार विकेट गिरने के बाद मैंने मैच देखना बंद कर दिया..यहाँ तक की फाइनल सेरमोनी भी मैंने नहीं देखा.सचिन ने इस विश्व कप में सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकोर्ड स्थापित किया और 643 रन बनाये.उन्हें मैन ऑफ द टूर्नामेंट का अवार्ड दिया मिला.जहाँ एक तरफ सचिन ने हमें फाइनल तक पहुचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई वहीँ श्रीनाथ ने पुरे टूर्नामेंट में बेहतरीन गेंदबाजी की.बदकिस्मती से फाइनल के दिन वो अच्छी गेंदबाजी करने में असफल रहे.श्रीनाथ ने इस टूर्नामेंट के बाद क्रिकेट से संन्यास ले लिया था.

2003 के विश्व कप फाइनल के बाद मेरे दिमाग में एक बात बैठ गयी थी की अगले विश्व कप में जो भी हो..हम फाइनल तक तो पहुचेंगे ही.लेकिन बदकिस्मती कहिये की ऐसी ऐसी बातें/घटनाये हुईं की 2007 के विश्व कप से हमें बाहर होना पड़ा.उस वर्ल्ड कप की बात ना ही करे तो बेहतर होगा.काफी परेशानियों,गलतियों,मुसीबतों से जूझ रही टीम इंडिया लीग मुकाबले में ही बाहर हो गयी थी.जहाँ एक तरफ हार की वजह आई.सी.सी के अजीब तरह के ग्रुपिंग थे वहीँ दूसरी सबसे बड़ी वजह थी टीम में अनिश्चिताएं.खिलाड़ियों की जगह टीम में निश्चित नहीं थी और ना ही खिलाड़ी और टीम-मैनेजमेंट में किसी भी किस्म का तालमेल था.किसी भी खिलाड़ी को ये तक नहीं मालुम था की टीम में उनकी भूमिका क्या होगी.खैर, वो एक इंडियन टीम का बुरा दौर था, जो की खत्म हुआ.

एक नयी युवा टीम के साथ भारतीय क्रिकेट का फिर से उदय हुआ.युवा कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व में टीम इंडिया ने जब 2007 का टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप जीत इतिहास रचा, तो भारतीय टीम के एक नए नायक का चेहरा सबके सामने आया.सेलेक्टर्स ने भी देर नहीं लगाईं और राहुल द्रविड के कप्तानी से इस्तीफा देते ही टीम की कमान धोनी के हाथ में सौंप दी.कैप्टन कूल धोनी और एक ऐसी टीम जिसमे अधिकतर युवा खिलाड़ी और सीनिअर खिलाड़ी मौजूद थे, एक के बाद एक सीरीज और ट्रोफी अपने नाम करते गए.धोनी की नयी “टीम इंडिया” ने टेस्ट में नंबर वन का मुकाम हासिल किया..वन डे में भी एक के बाद एक अच्छी अच्छी टीमों को ये लगातार शिकश्त देते चले गए.पहले की भारतीय टीम की एक धारणा को भी नयी टीम इंडिया ने बदला..पहले ये कहा जाता था की सचिन अगर आउट हो गए तो भारतीय टीम आउट हो गयी, काफी हद तक हम सचिन पे निर्भर रहते थे.नयी टीम इंडिया के हर युवा खिलाड़ी ने अपने प्रदर्शन से ये सन्देश दिया सबको की बदकिस्मती से सचिन अगर जल्दी आउट भी हो गए, तो भी और बाकी खिलाड़ी हैं मैच जीतने के लिए, और टीम मैच जीतती भी रही.

फिर भी टीम इंडिया का सबसे बड़ा एंकर अब तक एक वो शख्स बना हुआ है जो पिछले २२ सालों से लगातार अच्छा क्रिकेट खेलते आ रहा है.एक वैसा शख्स जिसका जन्म क्रिकेट खेलने के लिए हुआ है और जिसे लोग क्रिकेट का खुदा कहते और मानते हैं – सचिन तेंदुलकर.पिछले साल जब सचिन ने दोहरा शतक लगा इतिहास रचा था, तब मुझे ऐसा लगा की अगले साल के विश्व कप पे हमारा हक पक्का है.इस साल विश्व कप से कुछ महीने पहले जब एक ऐसी भारतीय टीम ने न्यूजीलैंड को 5-0 से हराया जिसमे सभी युवा खिलाड़ी थे और सभी सिनिअर्स को रेस्ट दिया गया था, तब मेरा यकीन और दृढ हो गया की इस बार वर्ल्ड कप बस अपने नाम ही होगा.

और आखिरकार वो मौका आ ही गया था.वर्ल्ड कप मुकाबले शुरू हो गए थे.टीम इंडिया ने लीग मैच में बस एक ही मैच हार था, वो मैच दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध थी.लीग मैच के बाद बारी थी बड़ी बड़ी टक्करों की, क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया और सेमीफाइनल में पाकिस्तान जैसी बेहद ही मजबूत और जबरदस्त फॉर्म वाली टीमों को हरा हम फाइनल में पहुंचे.फाइनल में पहले दस ओवर के खेल के बाद जैसे महेला जयवर्दन ने श्रीलंकाई पारी को संभाला, तब मैंने मजाक मजाक में एक दोस्त को ये कहा की यार ये तो 1996 वाली कहानी दोहराई जा रही है, जहाँ पहले तीन विकेट गिरने के बाद अरविन्द डीसिल्व और महानामा ने पारी को संभाला था.जब श्रीलंका ने 270 रनों का लक्ष्य दिया हमें तो मुझे लगा की वैसे तो ये लक्ष्य कोई विशाल लक्ष्य नहीं, लेकिन वर्ल्ड कप फाइनल जैसे बड़े और प्रेसर मुकाबले में ये लक्ष्य काफी बड़ा लक्ष्य माना जाएगा..वैसे ये बात भी है की जिस टीम में सचिन, सहवाग जैसे ओपनिंग बल्लेबाज हों वहां कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं लगता.खैर, अपनी इनिंग्स जब शुरू हुई और सचिन, सहवाग जब जल्दी आउट हो गए, तो मैं एकदम से बेहद हताश और निराश हो गया.सचिन के आउट होने के बाद तो मैं स्तब्ध हो गया..एकदम स्तब्ध..बीस-बाईस लड़के जहाँ एक कमरे में पूरा शोरगुल करते मैच का लुत्फ़ ले रहे थे, वहां एकदम सन्नाटा छा गया.ये सन्नाटा तब टुटा जब किसी ने कहा – “यार सचिन आउट हो गया, किसी को इस बात का विश्वास क्यों नहीं हो रहा..”.मैं एकदम हताश, स्तब्ध सा बैठा हुआ सोचने लगा की कहीं मजाक मजाक में कही गयी बात सच न हो जाए.तुरंत उसी वक्त मैच देखना बंद कर बाहर थोड़ा मुड सही करने आ गया.मेरी ये आदत रही है, की अपनी टीम को मैच हारते मैं देख नहीं सकता, कम से कम टी.वी से तो दूर चला ही जाता हूँ, और जिस दिन हम कोई मैच हारते हैं, उसके अगले दिन किसी भी तरह के खेल समाचार ना तो मैं पढता हूँ और नाही देखता.लेकिन इस बार मैंने निश्चय किया जो भी हो,मैच देखूंगा.ये भी सोच लिया था की अगर बदकिस्मती रही तो चुप चाप जाकर सो जाऊँगा और अगले तीन चार दिन तक किसी भी तरह के न्यूज़,सोसल नेटवर्किंग,अखबार से बिलकुल दूर रहूँगा.लेकिन कल के ऐतिहासिक दिन जब गौतम गंभीर स्टंप पे उतरे तो वो कुछ और ही करने के इरादे से उतरे थे…जिस ख़ूबसूरती से उसने और विराट कोहली ने भारतीय टीम को शक्ल दी वो देखने लायक थी -क्लासिक और खूबसूरत.हालांकि कोहली ज्यादा लंबी पारी नहीं खेल पाए, लेकिन फिर भी उन्होंने एक बहुत ही ठोस आधार दे दिया था भारतीय टीम को.धोनी, हमारे कैप्टन कूल शायद अपने सभी गुण आज के लिए ही बचाए रखे थे.धोनी ने एक ऐसी स्पेशल पारी खेली वर्ल्ड कप फाइनल में,ऐसी मैच विनिंग पारी जो की क्रिकेट इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जाएगा.जब धोनी ने वो ऐतिहासिक छक्का लगाया, तो एक झन के लिए ऐसा लगा की जैसे वर्षों की प्यास बुझ गयी हो.इस वर्ल्ड कप में भी सचिन ने सबसे ज्यादा रन बनाये, और सबसे बेहतरीन खेल का प्रदर्शन दिया युवराज सिंह ने.वैसे तो पूरी टीम ने ही अच्छा खेला..कप्तान धोनी, जो की किसी भी मैच में एक बड़े स्कोर के लिए तरस गए थे, आख़िरकार फाइनल में उसने भी अपनी प्यास बुझाई.

मेरे लिए तो वो अब तक के मेरे जीवन का सबसे पड़ा और गौरवान्वित पल था.एक ऐसा पल जिसका इंतज़ार मैं तब से कर रहा था जब से मुझमे क्रिकेट की समझ आई थी.एक ऐसा पल जिसे मैं हमेशा हमेशा सहेज के रखूँगा.

-यहाँ के हम सिकंदर- 

– आख़िरकार सपना पूरा हुआ – 

मैं ये कहते हुए बिलकुल भी शर्माऊंगा नहीं की जीत के बाद सभी खिलाड़ी को एक दूसरे से लिपटते, सचिन को कंधे पे बिठा पुरे स्टेडिम का चक्कर लगाते देख मेरे भी आँख में खुशी के आँसू आ गए थे.अब भी जितने बार देखता हूँ अपनी जीत की तस्वीरें या फिर विडियो, तो आँखें नम हो ही जाती है.

– ये पल खुशी के हैं….एक अविस्मरणीय पल…खुशी के आँसू – 

शायद ये खुमारी आने वाले कुछ दिनों, महीनो या फिर हो सकता है सालों तक रहेगी.मुझे इस बात पे भी फक्र है  और मैं अपने आप को खुशकिस्मत भी मानता हूँ की मैंने सचिन को उसके हर (6)विश्व कप में खेलते देखा है.

– ये कप तुम्हारे लिए सचिन – 
इस विडियो को शायद आप बार बार देखना पसंद करें – 

(नोट : फ़िलहाल ये हो सकता है की आने वाली एक दो पोस्ट भी आपको क्रिकेट से ही सम्बंधित दिखे, अब इसके बारे में मैं कुछ नहीं कर सकता…खुमारी इतनी जल्दी जाने वाली नहीं है)

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    किसकी आँखों में नहीं आए थे …..ये पूछो :)And these emotions make You a complete man वो बातें पुरानी हुईं ,जब कहा जाता था….Big boys dont cry धोनी कैमरे से नज़रें छुपाते रहे सर नीचा और कैप आगे तक खींचा हुआ था…पर शर्ट की बाहँ से आँखें और नाक पोंछते उन्हें भी नोटिस करना मुश्किल नहीं था.
    पूरे वर्ल्ड कप की दास्तान लिख डाली….. बहुsssssssssssssत बधाईssssssssss

  2. ओह!…… पढते पढ़ते कहाँ खो गयी मैं……तुम ऐसा धाराप्रवाह में लिखते हो कि ६ विश्व कप का अंतराल कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. एक -दो पोस्ट और तो होनी ही चाहिए इस टोपिक पर……वैसे एक बात बताओ तो ये जो ब्लॉग के टॉप में जो फोटो है, ये कहाँ का है? न जाने क्यूँ मुझे BITS goa रह-रह के याद आ रहा है….?

  3. एक बार पढ चुका हूं जल्दी जल्दी ..स्वाद से शाम को पढ के फ़िर टीपूंगा ..तुमने catalyst का काम कर दिया है ….अब मैं भी द्सर छोर से बैटिंग करनी को तैयार हूं । चलो शाम को फ़िर आता हूं । पोस्ट तो कमाल हईये है ..आता हूं ।

  4. भैया…हम दोनों मिलकर अच्छा ओपनिंग पार्टनरशिप कर देंगे…;)

  5. @वन्दना
    कौन वाला??वो जो ब्लॉग हेडर फोटो है वो?
    वैसे मैंने उसे नेट से लिया था…किसी वालपेपर से क्रॉप किया हुआ है वो.

  6. आपने तो सारे विश्व कप एक ही झंडे तले ला दिए … आँखों देखा हाल सुन रहे हो जैसे … मज़ा आ गया आपकी फोटोस और पोस्ट पढ़ कर अभी जी ….

  7. इतिहास बनते हमने भी देखा और युवराज के साथ आँखें हमने भी पोंछीं 🙂
    बढ़िया पोस्ट.
    बधाई ई ई ई ई ई ई ई ……….

  8. सारे अविस्मरणीय क्षण पुनर्जीवित हो गये…शायद ही कोई भारतीय हो जिसकी आँख से खुशी न छलकी हो…

    बधाईयाँ..

  9. mjhe to yaad hai 1999 se..uske pahle ka sahi se yaad nahi 🙁
    but i loved this post!!
    it was such a proud moment for us to lift the cup after 28years.
    a moment of a lifetime!!!!!

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