यादें – दिल्ली विजिट

एक ब्लॉगर होने के कुछ नुकसान भी होते हैं..जो दोस्त हैं, वो ये तो जानते नहीं की लिखने में कितना सोचना पड़ता है, बस मुहं उठा के कह दिए – “भाई, मेरे बारे में भी कभी कुछ लिखना न ब्लॉग पे” :P..कभी किसी दोस्त से मिलना होता है, और अगर वो मेरे ब्लॉग से परिचित है, पढता है तो ये ज़रूर कह देता है की भाई, “तू तो हर चीज़ के बारे में लिखता है,आज अपनी मुलाक़ात के बारे में भी लिखेगा न”.दोस्त तो दोस्त, बहन भी नहीं छोड़ती, वो भी ब्लॉग पोस्ट की फरमाईश कर ही देती है, किसी न किसी बात पे.

कुछ दोस्त तो ऐसे हैं, जो ब्लॉग पढ़ने के थोड़े बहुत आदी हो गए हैं, पूछ ही लेते हैं कभी न कभी की यार, बहुत दिन से तुने कोई पोस्ट नहीं डाला अपने ब्लॉग पे..लिखना छोड़ दिया है क्या?..मेरी माँ भी अक्सर ये पूछ ही देती है की “कुछ नया लिखे हो ब्लॉग पे की नहीं”.आजकल जब कुछ लिख नहीं रहा हूँ, तो ऐसे सवाल बहुत से लोग कर देते हैं, और अधिकतर ‘नालायक दोस्तों’ का मकसद मुझे चिढ़ाने का रहता है :P.अब आज थोड़ा समय है, तो सोचा की कुछ लिख ही देता हूँ ब्लॉग पे, वैसे भी कई दिनों से ब्लॉग सुना सुना सा बना हुआ है..लिखने का तो बहुत कुछ दिमाग में चल रहा है, लेकिन फ़िलहाल शुरुआत करता हूँ, पिछले महीने के दिल्ली विजिट से..
दिल्ली विजिट
पहला दिन 
दिल्ली एक ऐसा शहर है, जहाँ मेरे दोस्तों या जान पहचान वालों की कोई कमी नहीं.इस बार दिल्ली आने का कोई इरादा नहीं था, कुछ काम के सिलसिले में एकाएक कार्यक्रम बना दिल्ली का.दिल्ली में रुकने का प्लान तो बस एक दिन का था, लेकिन कुछ कारणों के वजह से दूसरे दिन भी रुकना पड़ा.अधिकतर दोस्तों को अपने दिल्ली आने की खबर मैंने इसलिए नहीं दी, क्यूंकि सबसे मिलना मुमकिन नहीं था..लेकिन इतने बड़े शहर में किसी जान पहचान वाले से रास्ते में मुलाक़ात हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है.ऐसा ही एक खूबसूरत ‘इत्तेफाक’ मेरे साथ हुआ.मेट्रो स्टेशन पे अचानक मेरी मुलाकात मेरे कॉलेज के पुराने मित्र राहुल जी(राहुल रंजन झा) से हुई.मैंने यहाँ ‘इत्तेफाक’ शब्द पे इसलिए जोर डाला क्यूंकि राहुल जी ने ही मुझे पहले देखा और आवाज लगायी थी.जब मैंने उनके तरफ पलट के देखा तो वो यही शब्द जोर जोर से बोलते हुए मेरे तरफ आ रहे थे “अभिषेक जी इत्तेफाक..अभिषेक जी इत्तेफाक..”:).राहुल जी से पिछले कुछ समय से मेरी बातचीत नहीं हो रही थी, और मुझे ये मालूम था की वो मुंबई में कार्यरत हैं, लेकिन उनका दिल्ली में मिलना मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य से कम नहीं था.समय के आभाव के कारण, बस आधे घंटे ही हम साथ रह पाए.
प्रभा,अनिल,अती और रुचिका 
दिल्ली में कुछ ऐसे रिश्ते हैं, जिन्हें दोस्त कहना तो ठीक नहीं, वो अब मेरे परिवार का ही एक हिस्सा हैं.जिनके बारे में आप यहाँ पहले भी पढ़ चुके हैं.इनमे से जिनसे मिलना तय था वो थे प्रभा और वरुण.लेकिन ये देख एक सुखद आश्चर्य हुआ की लगभग सभी लोग कैसे भी वक्त निकाल के मुझसे मिलने आये थे. मुझे इस बात का ज़रा भी भनक नहीं लगा की सब के सब मिल पायेंगे मुझसे…वरुण,प्रभा,अती,रुचिका और अनिल.मिलने का जगह सबने ऐसा तय किया था जहाँ मुझे आने में कोई तकलीफ न हो, लेकिन फिर भी मैं आधा घंटा लेट से पहुंचा.मिलने का जगह एक मॉल तय हुआ था.दूर से ही मुझे प्रभा और अती इंतज़ार करते दिख गयी.अती को वहां देख बहुत अच्छा लगा, क्यूंकि मुझे डर था की कहीं वो मिलने न आ पाए.वरुण ने थोड़ा इंतज़ार करवाया, लेकिन जब वो आया तो रुचिका भी उसके साथ आई.रुचिका का आना मेरे लिए एक ‘सरप्राईज” जैसा था, क्यूंकि एक दिन पहले ही उसने कह दिया था की उसे उस दिन कोई जरूरी काम है और इसलिए वो मिलने नहीं आ पाएगी.वैसे मुझे सबसे ज्यादा खुशी रुचिका के आने पे ही थी(बाकी चारों : इस बात पे जलना नहीं तुमलोग).इन  एक दो सालों में जितनी बार भी मेरा दिल्ली जाने का प्लान बना,उतने बार अनिल जरूर मुझसे मिलता है.और हर बार मुझे लेने, सी-ऑफ करने के लिए कम से कम वो तो रहता ही है…इस बार लग रहा था की उससे मुलाक़ात नहीं हो पाएगी..लेकिन समय निकाल के किसी तरह अनिल भी मिलने पहुँच ही गया..🙂..प्रभा और वरुण ने तो ऑफिस में पता नहीं क्या क्या बहाने बना के आये थे..खैर मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की थी, की सबसे मैं एकसाथ मिल रहा था.  
प्रभा,अती,रुचिका,वरुण..और मैं 
इन पाँचों ने मुझे ऐसा बना के रख दिया था, जैसे की मैं कोई स्पेशल गेस्ट हूँ…जब भी मैं कुछ कहने के लिए ज़बान खोलता, तो सब एक दूसरे को ये बोल के चुप करा देते की “अरे पागल चुप हो जा..भैया बोल रहे हैं कुछ”.  मैंने जब कहा की मेरे साथ ऐसा तुम लोग जुल्म क्यों कर रहे हो..क्यों फ्री में इतना मान दे रहे हो, तो इनका जवाब होता की “अरे अब आप पता नहीं कब दिल्ली आयें फिर”..मैंने बेहतर यही समझा की खुद चुप हो के इन लोगों के हरकतों का मजा लूँ…:) सच कहूँ तो इन लोगों ने पूरी मेरी शाम बना दी थी..इन लोगों की हरकते तो इनसे भी क्यूट लग रहे थे उस दिन.एक खेल भी खेला इन्होने, की कौन  किसके बारे में क्या महसूस करता है,कितना ज्यादा जानता है…ये बताना था. मुझे सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब अती ने मेरे व्यग्तिगत स्वभाव के बारे में वो सब बातें बता दी, एकदम धड़ल्ले से, जो बातें बहुत कम लोग(शायद दो-तीन)बता पाते.मुझे एक पल लगा की अती कैसे मेरे बारे में इतना जान गयी. :).
दिल्ली कितने दफे जा चूका हूँ मैं, लेकिन इस दिन की ये शाम सबसे खास है, इन पाँचों ने मुझे वो शाम दी, जिसे भुला पाना बहुत मुश्किल है.वापस चलने वक्त, मुझे निजामुद्दीन स्टेशन जाना था, तो अती, और वरुण भी मेरे साथ ऑटो पे बैठ गए, उन्हें बीच में ही कहीं उतरना था.ऑटो पे आते वक्त, किसी बात पे मैंने अती और वरुण को ये कहा भी था की इस शाम के बारे में कुछ न कुछ कभी तो लिखूंगा जरूर.तो आज की ये पोस्ट लिखने पे उनको दिया एक छोटा सा वादा भी पूरा हुआ.अती, और वरुण से ऑटो पे मैंने न जाने कितनी बातें कह दी, जो जो मेरे दिल में आ रहा था, मैं सब कहे जा रहा था[पता नहीं अती,वरुण तुम्हे वो बातें याद है या नहीं, लेकिन मुझे वो सब बातें अच्छे से याद है 🙂].आज ही के दिन पिछले महीने इन लोग से मिला था, और संजोग देखिये आज ही के दिन पोस्ट भी लगा रहा हूँ.

दूसरा दिन 
अब जब एक और दिन मेरे पास निकल आया था दिल्ली में, तो सबसे पहला प्राइआरिटी मेरा दोस्त अकरम और चाचा जी(सलिल वर्मा) थे.सुबह सुबह जब मेरी दोस्त निधि ने मुझे फोन किया.उसे लग रहा था की मैं वापस चला गया हूँगा.जब उसे ये मालूम चला की मैं उस दिन दिल्ली में हूँ, तो तुरत आधे घंटे में वो मेरे से मिलने आ पहुंची, और अपने साथ वो नॉवेल भी ले आई थी, जो वो मेरे से जबरदस्ती झीन ले गयी थी 😛.निधि और मैं बाराखम्बा रोड तक ऑटो से साथ आये, और फिर वो अपने ऑफिस चली गयी.यहाँ मुझे चाचा जी से मिलना था.
चचा जी (सलिल वर्मा)
चाचा जी को फोन लगा कर मैं उनके ऑफिस के बिल्डिंग के बाहर इंतज़ार कर रहा था..मैं तो आने जाने वाले सभी रास्तों को देख रहा था की पता नहीं कैसे एकाएक चचा पीछे से आ गए..वो भी इतना जल्दी..खैर, उनके ऑफिस के केबिन में बैठे हम दोनों..और जैसे ही बैठे वैसे ही चाय भी हाज़िर.हमको तो लगा की कहीं चचा मेरा कोई पोस्ट तो नहीं पढ़ लिए न जहाँ लिखा था की हमको चाय बहुत पसंद है 😛.मैं चचा से पहली बार मिल रहा था, और एकदम ऐसा नहीं लगा मुझे की मैं पहली बार इनसे मिल रहा हूँ.बात करते करते कैसे ढाई घंटे खत्म हो गए पता भी नहीं चला..चचा जी एकदम पूरा टसन में टाई वाई लगाकर बैठे हुए थे(सॉरी चचा जी…वेरी सॉरी :P)..एकदम कोई मल्टीनेशनल कम्पनी के सी.ई.ओ लग रहे थे ;).वो तो गलती हो गया की हम फोटो नहीं खींच पाए..याद नहीं रहा..वरना आप लोग को भी दिखा देते :).
एक मजेदार बात हुआ चचा जी के ऑफिस में..दो साल पहले इनके ऑफिस के इस ब्रांच में मैं आ चूका था, और तब चचा जी भी इसी  ब्रांच में पोस्टेड थे.मेरे एक दोस्त को यहाँ के कोई स्टाफ से कुछ काम था, तो मैं उसी के साथ आया था.उस समय हो सकता है मैंने चचा को देखा भी हो और इन्होने मुझे, लेकिन उस समय ये न तो उन्हें पता था और न मुझे की हमारी मुलाकात ब्लॉग के जरिये होने वाली है :).बहुत सी बातें हुई चचा जी के साथ, और बहुत सी बात जो इनके बारे में हमको पता नहीं था, वो इनकी बात से पता चला.इस बीच सैंडविच और कोफ़ी का एक राउंड भी चला..वो सैंडविच बहुत टेस्टी था, और अब लगता है की फिर से जल्द ही मुझे सैंडविच,कोफ़ी और चाय के लिए चचा जी से मिलना पड़ेगा 😛.
अपने दोस्त अकरम को भी मैंने वहीँ बुला रखा था.कनॉट प्लेस में.अकरम भी समय पे ही पहुँच गया.कुछ वैसी बातें हैं, जो मैं किसी से नहीं कह पाता हूँ सिवाय अकरम और प्रभात के.हम कनॉट प्लेस में कोई ऐसी जगह खोज रहे थे जहाँ आराम से बैठ के गप्पे कर सके..लेकिन जब ये देखा की वैसी कोई भी जगह जाने के लिए अच्छा ख़ासा माल-मुद्रा खर्च हो सकता है, तो हमने सोचा सबसे अच्छा है की सामने वाले सेन्ट्रल पार्क में बैठा जाए.रात के आठ बजे मेरी ट्रेन थी..और हमारे पास करीब पांच छः घंटे का वक्त था.कुछ ऐसी पुरानी बात रहती हैं, जो एक रहस्य सी जान पड़ती हैं.वैसी ही एक बात थी जिसके बारे में साफ़ साफ़ मुझे कुछ पता नहीं था…मेरे लिए किसी रहस्य से कम नहीं थी वो बात.इस बार दिल्ली के सेन्ट्रल पार्क में ही बातों बातों में उस बात से पर्दा उठा.और वो बात जानने के बाद अपने एक दोस्त के लिए दिल में इज्जत और बढ़ गयी.
सुबह ऑफिस जाते वक्त निधि ने मुझसे कहा था की वो शाम को भी आएगी स्टेशन पे, मुझे सी-ऑफ करने..रात के आठ बजे मेरी ट्रेन थी..और निधि ट्रेन खुलने के आधे घंटे पहले ही पहुँच गयी..मैंने तो उसे मन कर दिया था की रात का समय है, आने की कोई जरूरत नहीं…लेकिन आजकल की लड़कियां..अपने मर्जी की मालिक हैं 😛 आ गयी मुझे सी-ऑफ करने..और साथ में कुछ डिनर भी पैक करवा के लेते आई..मुझे लग रहा था की किसी अच्छे रेस्टुरेंट से कुछ पैक करवाई होगी, जब पुछा तो कहने लगी की ऑफिस के कैंटीन से सैंडविच पैक करवा के लायी हूँ 😛..नालायक लड़की :D.
जिनसे नहीं मिल सका वैसे तो बहुत लोग हैं, लेकिन अजय भैया और मती(मेरा दोस्त) से मिलना तय था, इन्होने कहा था की मिलने के लिए स्टेशन पे ही आ जायेंगे..लेकिन एकाएक अजय भैया की तबियत खराब हो जाने के कारण से और मती के ऑफिस में कुछ अर्जेंट काम निकल आने के वजह से मुलाकात नहीं हो पायी.अगली बार दोनों से मिलना तो तय ही है.

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  1. वैसे तो मेरे परिवार में कोई नहीं जानता कि मैं ब्लॉग लिखता हूँ, आधे तो ये भी नहीं जानते कि ब्लॉग होता क्या है…:D
    एक आध दोस्त ही ब्लॉग पढ़ते हैं, तो कुल मिलाके मेरे जो पाठक हैं वो इसी ब्लॉग की दुनिया के ही हैं… तो ऐसे फरमाईश मुझसे किसी ने नहीं की आज तक… 🙂
    आपका ये दिल्ली visit का संस्मरण अच्छा लगा …
    कभी कुछ मेरे बारे में भी लिखियेगा….:P 😀

  2. ई तो तुम पिछलका बार बिना मिले चले जाने का मुआवजा चुकाए.. अऊर असली बतवे गोल कर गए.. भाभी जो हमरे लिये बुँदिया भेजी थीं सो काहे नहीं लिखे.. जब घरे पहूँचे सब अईसे लूट लिया हमसे (तुमरी चाची,दादी अऊर भतीजी)जईसे सुदामा का चावल… बिस्वास करो, जमाना बाद बिआह का बुँदिया खाकर देस माटी याद आ गया!

  3. अगली बार आओ तो हमें भी याद रखना तुम्हारे साथ, तुम्हारे चाचा की चाय पीने को तो मिल ही जायेगी ! शुभकामनायें अभि !

  4. ये दिल्ली दास्तान तो बड़ी प्यारी रही…वैसे ही प्यारे-प्यारे तुम्हारे दोस्त हैं….इतने सारे दोस्त समय निकाल कर मिलने आए… lucky guy
    और तुम सलिल जी से भी मिल लिए…क्या बात है
    मुंबई कब आ रहे हो…:)

  5. ओहो बढियां संस्मरण …लेकिन ई का बात हुई इतने दिन बाद लिखे इसको…चलिए अब जल्दी से लिखना चाह्लू कीजिये …

  6. अपका संस्मरण लिखने का अन्दाज बहुत अच्छा है छोटी सी बात को भी इतना रोचक बना देते हो। मै भी बहुत जगह जाती हूँ लेकि संस्मरण नही लिख पाती। ये भी एक कला है। बधाई और शुभकामनायें।

  7. bht bht bht bht bht bht bht bht bht bht bht achaaaaaaaaaa likhaaaaaaaa!!!!! 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂

    next tym aaaoge.. toh orrrrrr hungaaaaaamaaaa karenge.. 😛 😛 😛

  8. bht bht bht bht bht bht bht bht bht bht bht achaaaaaaaaaa likhaaaaaaaa!!!!! 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂 🙂

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  9. I don't have words to say. But what i love about this post is that we have become a family and i don't think time can erase the memories we all have. and abhi bhaiya i still remember what you said that day. i m glad you are here for us. :)….

    Hindi translation..:D
    मैं कहने के लिए शब्द नहीं है. लेकिन क्या मैं इस पोस्ट के बारे में प्यार है कि हम एक परिवार है और मैं बन गया है यादें हम सभी को मिटा सकते हैं समय लगता है कि नहीं. और अभी मैं अभी भी याद है भैया आप क्या उस दिन कहा था. मैं मी खुशी है कि तुम हमारे लिए यहाँ हैं. :)….

  10. @सतीश अंकल – पक्का 🙂
    और,
    @रश्मि दी – आप रिटर्न टिकट भेजिए और फिर देखिये कैसे मैं मुंबई पहुँचता हूँ 🙂

  11. @रुचिका – अरे अरे, इतना अच्छा लगा रे तुमको 🙂 🙂

    @अती – हिंदी में ट्रांसलेट मस्त किया है तुमने…तुमने नहीं…गूगल ने..है न 🙂

  12. लोग तुमको अच्छे दोस्त मिलने के कारण `lucky guy' कहते हैं, पर असल में तुम जिनके दोस्त हो वो lucky हैं…:)
    तुम्हारे जैसे लोगों की वजह से दुनिया की अच्छाई पर भरोसा अब भी ज़िंदा है…| बस खुश रहो…|

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