मॉल में एक दिन

मन्त्री मॉल, बैंगलोर का फ़ूडकोर्ट 

मुझे मॉल में घूमना बहुत पसंद है..मॉल ज्यादातर जाता हूँ तो उस जगह जाना पसंद करता हूँ जहाँ बिना ज्यादा पैसे खर्च किये कुछ देर बैठ सकूँ..फ़ूड कोर्ट या फिर कोई कोफ़ी शॉप.लोगों को देखना पसंद है मुझे.आप मॉल में हर किस्म के लोग को देख सकते हैं..माध्यम वर्गीय लोग, उच्च वर्गीय लोग या फिर वो लोग जो की मॉल में कुछ खरीदने की ताकत नहीं रखते लेकिन फिर भी मॉल में घूमने आते हैं, युहीं शौक के लिए या फिर दिल बहलाने के लिए.कभी किसी ने कहा था की चीज़ों को जो ओब्जर्व करता है वो बहुत ज्यादा सीखता भी है.लोगों को ऑब्जर्ब करने से भी काफी कुछ सीखने को मिलता है, जब मैंने ये बात पहली बार सुनी थी तो लगा कोई बेमानी बात है..लेकिन बात बिलकुल सही है.मॉल में इस ओबजर्वेंस के आपको कई उदाहरण मिलेंगे, एक से एक तरह के लोग दिखाई देंगे, कुछ लोगों या उनके व्यवहार को देख के आपको थोडा अच्छा भी लगेगा लेकिन कुछ लोगों या उनके व्यवहार को देख के आपको गुस्सा भी बहुत आएगा और दुःख भी होगा.

घर से थोड़े दूर की दुरी पे ही एक मॉल है “मन्त्री मॉल”.ये मेरे ऑफिस आने जाने के रास्ते पे ही पड़ता है.मैं यहाँ अक्सर जाते रहता हूँ.यहाँ के फ़ूड कोर्ट में शाम को बैठना मुझे अच्छा लगता है.ज्यादातर मैं मॉल या तो गुरुवार को जाता हूँ या फिर शुक्रवार को…ऑफिस से निकलने के बाद.शुक्रवार को अक्सर जल्दी निकल जाता हूँ ऑफिस से..तो सीधा मॉल चले जाता हूँ..घंटा दो घंटा वहां बैठता हूँ..कभी कभी तीन चार घंटे भी बैठ जाता हूँ..और वापस घर रात के दस बजे तक पहुँचता हूँ.मैं शनिवार या रविवार को मॉल नहीं जाता, काफी भीड़ सी लगी होती है, और मुझे उस भीड़ में घूमना बिलकुल भी पसंद नहीं.शनिवार या रविवार को या तो ज्यादातर घर पे ही रहता हूँ या फिर कहीं कोई पार्क या ऐसी जगह चला जाता हूँ जहाँ ज्यादा भीड़ न हो और कुछ देर सुकून से बैठ सकूँ.

पिछले शुक्रवार की ही बात है..वीकडेज में मॉल लगभग खाली ही रहता है..मैं फ़ूड कोर्ट के एक कोने में जा कर बैठ गया और बैग में जो किताब थी, उसे निकाल के पढ़ने लगा..कभी कुछ एक दो बातें याद आ जाती या फिर किताब की कोई बात अच्छी लगती तो उसे अपने नोटबुक में लिख देता.सामने के टेबल पे नज़र जाती है, तो देखता हूँ की एक परिवार बैठा है.एक छोटा बच्चा है वो खेल रहा है..कपडे और बाहरी दिखावे से लग रहा था की वो परिवार ज्यादा समर्थ नहीं है मॉल में पैसे खर्च करने में..और शायद मॉल में भी पहली या दूसरी दफे ही आया होगा या फिर बहुत कम ही आता होगा..उस परिवार को देख मुझे अच्छा लग रहा था, शालीनता की एक झलक भी मिल रही थी..मैं उनके बच्चे को खेलते करीब पिछले आधे घंटे से देख रहा था की तभी एक फ़ूडकोर्ट का अटेंडेंट आता है और वहां बैठे सज्जन से तीखे अंदाज़ में कहता है की यहाँ पर आप ज्यादे देर नहीं बैठ सकते, अगर बैठना है तो कुछ खरीदना होगा वरना ऐसे आप यहाँ हरगिज नहीं बैठ सकते.. वो सज्जन भी बिना कोई विरोध या बहस किये वहां से चले जाते हैं…उनके जाने के बाद मुझे तुरंत ये ख्याल आया की मैं भी बिना कुछ लिए(फ़ूड आइटम) बैठा हूँ, कहीं मुझे भी वो उठा न दे. लेकिन मैंने देखा वो मेरा टेबल युहीं कपडे से साफ़ किया और एक हलकी बनावटी मुस्कान दे के चला गया.मैं समझता हूँ की वो मेरे ड्रेस को देख या फिर मेरे पास पड़े लैपटॉप बैग, टेबल पे रखे नोटबुक या हाथ में किताब को देख समझ रहा होगा की मैं कोई बड़ा या फिर पैसे वाला आदमी हूँ और इसलिए मुझे कुछ भी कहने की उसकी हिम्मत ही नहीं..जबकि असल में ना तो मैं कोई पैसे वाला व्यक्ति हूँ और ना कोई खास या बड़ा व्यक्ति हूँ..एक बेहद ही साधारण सा व्यक्ति हूँ, जिसे कुछ भी लेने के लिए पहले मेनू कार्ड पे लिखे रेट को देखना पड़ता हैं.मैं सोचने लगता हूँ की अगर ये सज्जन के पास अगर पैसा होता, हाईली क्वालिफाइड होते अगर ये या फिर जिस परिवार में हम लोग का जन्म हुआ, ऐसी भी किसी परिवार में इनका भी अगर जन्म हुआ होता तो क्या कभी एक अटेंडेंट इनकी सड़ेआम बेइजती कर सकता था?.मुझे एकाएक अपने कपडे, आउटलुक और अपने पढ़े लिखे होने पर शर्म आने लगती है.

वहीँ बैठे बैठे मुझे एक और किस्सा याद आता है, कुछ एक दो महीने पहले की बात है..शायद दशहरा के आसपास की बात होगी. मन्त्री मॉल में ही एक “अमिबा क्लब” है..जहाँ बोलिंग होती है.बोलिंग का रेट करीब १२० रुपये या १३० रुपये हैं..हमने कभी बोलिंग नहीं की, क्यूंकि १२० रुपये बोलिंग में खर्च करने से बेहतर मुझे लगता है की कोई किताब या फिर दो फिल्म की सी.डी खरीद लूँ…उस दिन भी हम बस टाईम पास करने के लिए वहां पहुँच गए.इंट्रेंस पे दो सेक्युरिटी गार्ड खड़े रहते हैं और इंट्रेंस के पास ही तीन और लोग रहते हैं जो की बाउंसर जैसे दीखते हैं.मैं, मनीष सर और निशांत पहुँच गए वहां..गार्ड ने भी स्वागत किया और हम अंदर गए..बस एक कोने में खड़े दूसरे लोगों के बोलिंग का मजा ले ही रहे थे की क्लब के इंट्रेंस पे कुछ बहस जैसी आवाज़ सुनाई दी.हम भी पहुँच गए वहां..एक शादीशुदा कपल, जिनके पहनावे से साफ़ ये बात झलक रही थी की इनके पास पैसे का आभाव है..उन्हें वो दोनों गार्ड अंदर आने से मन कर रहे थे..यहाँ ये सज्जन थोडा बहस करने लगे थे..कहने लगे की सब लोग अंदर जा रहे हैं तो वो क्यों नहीं?. सेक्युरिटी गार्ड वाले बस अपने बातों पे अड़े हुए थे की आप अंदर नहीं जा सकते..देखते ही देखते तीन लोग जो की बाउंसर जैसे दिख रहे थे, पहुँच गए और अंत में दोनों को वहां से जाना ही पड़ा..जबकि दोनों गार्ड और बाउंसर ये बात अच्छे से जान रहे थे की बहुत से लोग ऐसे ही आ जाते हैं, खेलना नहीं होता उन्हें और बस युहीं एक बार घूम के चले भी जाते हैं.लेकिन फिर भी उन दो लोगों को क्लब के अंदर उन्होंने कदम नहीं रखने दिया.मैं मनीष सर और निशांत खड़े सब देख रहे थे..तभी मैंने पुछा मनीष सर से – सर अगर ये लोग हमारे साथ ऐसा करते तो?..मनीष सर ने तुरंत कहा “कैसे कर देते रे?साले को तबाह नहीं कर देते हम..औकात है उसका हम लोग को मन करने का”.. मैं बस हम्म कह के रह गया.

मैं सोचने लगा की फ़ूड कोर्ट का वो अटेंडेंट या फिर यहाँ का ये सेक्युरिटी गार्ड भी कोई खास पैसे वाले तो नहीं होंगे न, तो फिर ये लोग ऐसा बर्ताव कैसे कर सकते हैं?कम सामर्थ्य वाले लोगों को देख इनकी विनम्रता कहाँ मर जाती है? या फिर ऐसा कहें की उस समय इन लोगों को अपने पावर पे गुरुर होता है और उसे ये लोग इस तरह इन लोगों पे इस्तेमाल करते हैं..ये सब सोचते हुए मेरी नज़र अपनी घड़ी पे जाती है तो देखता हूँ की मुझे यहाँ बैठे दो घंटे से ज्यादा हो रहे हैं और अब तक मैंने कुछ आर्डर नहीं किया है, एक चाय तक नहीं…लेकिन फिर भी आसपास करीब पांच छः अटेंडेंट है और मुझे किसी ने एक बार भी उठने के लिए नहीं कहा..कुछ देर बाद मैं अपनी जगह से उठता हूँ, एक चाय ले के फिर उसी टेबल पे बैठ जाता हूँ.चाय पीते हुए फिर से किताब पढ़ने लगता हूँ.थोड़ी देर बाद वही अटेंडेंट टेबल के पास आता है और चाय की खाली कप देख बड़े ही विनम्रता से कहता है “साफ़ कर दूँ सर इसे?”..मैं हाँ में सर हिला देता हूँ और सोचने लगता हूँ की अभी तो ये ऐसे बर्ताव कर रहा है जैसे दुनिया की सारी विनम्रता इसी ने घोल के पी ली है.

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  1. बहुत बढ़िया समाज विवेचना रही अभि !

    हमारे समाज का घटिया चेहरा है यह …अगर और कडवाहट महसूस करनी है तो एक दिन १० साल पुराने कपडे और जूते पहना कर, एक चक्कर लगा आओ, कुछ रेस्तौरेंट अथवा माल की बड़ी दुकानों में ! पता चला जाएगा !

    मैं अपने परिवार के बच्चों से अक्सर कहता हूँ कि जैसे ही अच्छा पैसा कमाना शुरू करोगे चेहरा भी सुंदर लगने लगेगा ! भरे पूरे परिवार में सबसे अधिक इज्ज़त तुम्हारी ही होगी चाहे किसी के साथ कुछ भी खर्च न करना ! बस सामने वाले को अहसास रहे कि इसकी जेब भारी है !

    अब मैं भी आगे से तुम्हारी तरह बिना लैपटॉप माल नहीं जाऊँगा ..

  2. बड़े जैसे लग रहे हो.. या बड़े जैसे लिखने लग गए हो??
    पता नहीं.. शायद..

  3. मन्त्री मॉल मेरी भी आवारगी की जगह है। फूडकोर्ट में बैठना अच्छा लगता है निश्चिन्त भाव से। आपका अवलोकन उन निगाहों के बारे में, जो कपड़ों और चेहरों के माध्यम से यह निर्धारित करते हैं कि किसको बैठाना है किसको नहीं, बहुत हद तक ठीक है। सम्मान जब जेब की क्षमता पर आधारित हो, दुख होता है।

  4. तुम्हारी पोस्ट का एक-एक शब्द सही है….पास में पैसे हों तब भी वेश-भूषा सही होनी चाहिए बस…स्टाफ को ट्रेनिंग ही ऐसी दी जाती है….

    कुछ इस तरह का वाकया यहाँ के 'ताज होटल' में हुआ. दो पोते-पोती बड़े प्यार से अपनी दादी को 'ताज' में खाना खिलाने ले गए. दादी ने पैरो में साधारण सी चप्पल पहनी थी. बाहर ही उन्हें रोक दिया गया. ये लोग बहस कर के रिसेप्शन तक गए…वहाँ भी रोक दिया गया. काफी बहस के बाद भी उन्हें अंदर जाने की इजाज़त नहीं मिली.

    यह सारा किस्सा पोती ने अपनी एक पत्रकार मित्र को सुनाया और उस पत्रकार ने एक फैशनेबल स्कर्ट पहनी..सुन्दर टॉप..बढ़िया मेकअप…कीमती पर्स और पैरो में हवाई चप्पल पहन अपने एक मित्र के साथ 'ताज' पहुँच गयी…किसी ने कहीं भी जाने से नहीं टोका. होटल के हर कोने में उसने बैठ कर फोटो खिंचवाए…..जिसमे उसकी हवाई चप्पल साफ़ दिख रही थी. उसने लिखा था बस एकाध गेस्ट ने घूर कर उसकी चप्पलों की तरफ देखा पर ताज के किसी कर्मचारी ने कोई आपत्ति नहीं की.

    ताज के अधिकारियों से भी पूछा गया था पर उन्हीने सारी जिम्मेवारी निचले कर्मचारियों पर डाल दी…जबकि निर्देश तो उनके ही होते हैं….ये बेचारे पूरी ना करें तो इनकी नौकरी ही चली जाए.

  5. बहुत सही लिखा आपने…और प्रवीन जी की बात ही दुहराना चाहूंगी….अत्यंत दुःख की बात है आज सम्मान जेब की क्षमता पर ही आधारित हो कर रह गया है….

  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (23/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

  7. हम्म दिख रहा है .मॉल में बैठकर काफी कुछ सिखा जा रहा है 🙂
    जबर्दस्त्त विवेचना की है.सम्मान जेब की क्षमता पर …दुखद है पर सच है

  8. kitna sahi likha hai aapne. yeh aadat shayaad bharat ke har ek kone main hai, logo ko kapdo ki nazar se dekhna.

    dono kisse jo aapne likhe hai bahut sache aur sahi hai, haar jagah yahi toh hota hai!

    kissi ki iss tarah insult karna sach main bahut buri baat hai!

  9. बहुत सही चीज़ तुमने देखी. जेब देख के लोगो की बदलती नज़र एक संकीर्ण मानसिकता का परिचय ही दे सकती है. मुझे याद है जब मेरी सहेली ने एक बार मुझसे कहा था कि जब भी कपड़े खरीदने जाओ तो अच्छे कपड़े पहन के जाना नहीं तो दुकानदार ठीक से कपड़े नहीं दिखाता है. और यह बात सच भी है.
    एक गाना याद आ रहा है तुम्हारे इस पोस्ट के ऊपर, bluffmaster ka…..
    "Na Biwi Na Bachha Na Baap Bada Na Maiyan
    The Whole Thing Is That Ke Bhaiya Sabse Bada Rupaiya……………"

  10. जो लोग कमेन्ट करने आयें कृपया यहाँ भी जाएँ – विंटेज कार .. ये मेरा कार वाला ब्लॉग है…कम से कम अपने ब्लॉग पे अपने दूसरे ब्लॉग का प्रचार तो कर ही सकता हूँ न 😀 😀

  11. @रश्मि दी
    सही में आजकल लोग आउटलुक पे ध्यान देते हैं…

    सतीश अंकल की भी बातें बहुत अच्छी लगी 🙂

    @प्रशांत
    बड़े जैसे मतलब?४०?५०?या उससे भी बड़ा 🙂

  12. मॉल को लेकर हम दोनों दोस्तों ने एक बार काफी हंगामा किया था. तब नोएडा में बिजली की बड़ी समस्या थी..गर्मियों में छुट्टी के दिन बिजली चली जाए तो हम मॉल में जाकर ठंडी हवा का आनंद उठाते थे. एक बार हमने बहका दिया कुछ गरीब लोगों कोऔर सब ने धावा बोल दिया ठंडी हवा के झोंके पर. बाद में किसी बहाने से उनको बाहर निकाला गया.
    इसी मॉल के कारण हमारे दोस्त चैतन्य को पायाती बाबू मिले. ज्ञान के भण्डार! उनके कपडे से भी धोका खा गए थे चैतन्य.
    और रही बात उन वेटरों या बाउन्सर्स कि तो वे बेचारे अपनी ड्यूटी बजा रहे थे.
    अच्छा ऑबज़र्वेशन!!

  13. सतीश अन्कल की बात से सहमत नहीं..मैं मॉल में हमेशा फटी जींस और कुर्ता पहनकर जाता हूँ..और हाँ मेरी दाढ़ी भी बढ़ी होती है.
    मगर बिना लैपटॉप के भी मुझे किसी ने बेईज्ज़त नहीं किया. कुछ लोगों कि शक्ल नूरानी होती है. और कर्मचारियों को शकल पढाना आता है!!

  14. शुक्रिया प्रियंका जी..
    बहन की शादी जनवरी में है..आपकी शुभकामनाएं पहुँच जायेंगी 🙂


  15. बेहतरीन पोस्ट लेखन के लिए बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है – पधारें – पराजित होती भावनाएं और जीतते तर्क – सब बदल गए – ब्लॉग 4 वार्ता – शिवम् मिश्रा

  16. अभी जी अच्छा संस्मरण है….वैसे गरीब बेचारा को तो कोई भी दुत्कार दे, ऐसे में छोटे लोग अपने जैसे को दुत्कारते है तो उन्हें भी बड़े का बोध पल भर के लिए हो जाता है.शायद पल भर के लिए भी बड़ा बनने की उनमे कुंठा हो …..

  17. @अभिषेक,
    सतीश अंकल कहाँ हैं ? कौन हैं… ? अभिषेक …यह जरूर सतीश पंचम होंगे ….
    हा..हा…हा….
    पहले मैं समझा तुमने मुझे देख कर कहा है ..

  18. "समस हिंदी" ब्लॉग की तरफ से सभी मित्रो और पाठको को
    "मेर्री क्रिसमस" की बहुत बहुत शुभकामनाये !

    ()”"”() ,*
    ( ‘o’ ) ,***
    =(,,)=(”‘)<-***
    (”"),,,(”") “**

    Roses 4 u…
    MERRY CHRISTMAS to U…

    मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है

  19. आपकी रचना वाकई तारीफ के काबिल है .

    * किसी ने मुझसे पूछा क्या बढ़ते हुए भ्रस्टाचार पर नियंत्रण लाया जा सकता है ?

    हाँ ! क्यों नहीं !

    कोई भी आदमी भ्रस्टाचारी क्यों बनता है? पहले इसके कारण को जानना पड़ेगा.

    सुख वैभव की परम इच्छा ही आदमी को कपट भ्रस्टाचार की ओर ले जाने का कारण है.

    इसमें भी एक अच्छी बात है.

    अमुक व्यक्ति को सुख पाने की इच्छा है ?

    सुख पाने कि इच्छा करना गलत नहीं.

    पर गलत यहाँ हो रहा है कि सुख क्या है उसकी अनुभूति क्या है वास्तव में वो व्यक्ति जान नहीं पाया.

    सुख की वास्विक अनुभूति उसे करा देने से, उस व्यक्ति के जीवन में, उसी तरह परिवर्तन आ सकता है. जैसे अंगुलिमाल और बाल्मीकि के जीवन में आया था.

    आज भी ठाकुर जी के पास, ऐसे अनगिनत अंगुलीमॉल हैं, जिन्होंने अपने अपराधी जीवन को, उनके प्रेम और स्नेह भरी दृष्टी पाकर, न केवल अच्छा बनाया, बल्कि वे आज अनेकोनेक व्यक्तियों के मंगल के लिए चल पा रहे हैं.

  20. अभि भाई, समाज के विद्रूप को आपने बहुत ही सटीक ढंग से उजागर किया है। अच्‍छा लगा आपकी पारखी द़ष्टि से होकर गुजरना।

    ———
    अंधविश्‍वासी तथा मूर्ख में फर्क।
    मासिक धर्म : एक कुदरती प्रक्रिया।

  21. पता नहीं माल में क्या है…….. पर ऐसा कुछ तिल्सिम जरूर है जो मुझे वहाँ जाने के रोकता है…….. सची….. कभी नहीं गया….. पैर डगमगाने लग जाते हैं.

  22. मंत्री मॉल गयी नहीं कभी तो कह नहीं सकती हूँ कि उधर स्टाफ कैसे हैं. पर अच्छी अच्छी जगहों पर भी अच्छे कपडे होने के बावजूद…अगर आप वीकेंड पर गए हैं तो भीड़ रहती है और ज्यादा देर बिना आर्डर किये बैठे तो पूछ लिया जाता है…विल यू लाईक टू आर्डर समथिंग एल्स? समझदार लोग इशारा समझ के उठ जाते हैं 🙂 मेरे कई दोस्तों के साथ हुआ है.

  23. भाई, अफ़सोस होता है जब सिर्फ कम पैसे होने के कारण किसी के साथ ऐसा बर्ताव होता है…| कितनी तकलीफ होती होगी…आखिर आत्मसम्मान तो हर किसी का होता है न…?
    एक सार्थक बात उठाई है तुमने…|

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