खेलें हम जी जान से – मेरी नज़र से

आजादी की लड़ाई के कई ऐसे गुमनाम शहीद रहे हैं, जिन्हें या तो हम भूल चुके हैं या फिर अधिकतर लोगों को उनके बारे में कुछ भी पता नहीं.ऐसे ही एक शहीद सूर्या सेन(मास्टर दा सुर्ज्या सेन) का नाम है जो चटगांव(चटटोग्राम) विद्रोह से जुड़े हुए थे और उस विद्रोह का उन्होंने नेतृत्व किया था. फिल्म खेलें हम जी जान से उन्ही सब शहीदों के ऊपर बनी है.फिल्म का निर्देशन किया है आशुतोष गोवारिकर ने और सुर्ज्या सेन की भूमिका में हैं अभिषेक बच्चन. मानिनी डे की किताब डू एंड डाई – द चटगांव अपराइजिंग पर आधारित यह फिल्म देश को उन भूले हुए शहीदों के बारे में  है जिन्होनें बस देश की आज़ादी को ही अपना एकमात्र मकसद समझा.


गांव के कुछ युवा जिस मैदान में फुटबाल खेलते थे, उसे अंग्रेजी हुकूमत ने छावनी बनाने के लिए अपने कब्ज़े में ले लिया.वो युवा इसी मैदान को छुड़ाने के लिए सुर्ज्या सेन के पास जाते हैं, लेकिन इसी बीच कुछ ऐसी घटना हो जाती है जिससे वो सारे युवा ये निर्णय लेते हैं की वो देश की आज़ादी के लिए लड़ेंगे..उन बच्चों का दृढ संकल्प, निडरता और कुछ कर दिखाने का जज्बा देख  सुर्ज्या सेन ने उन्हें अपने आंदोलन में शामिल कर लिया.इन बच्चों को उन्होंने हर तरह की ट्रेनिंग दी.इस आंदोलन में महिलाओं ने भी हिस्सा लिया.उस विद्रोह में कल्पना दत्त और प्रीतिलता वादेदार प्रमुख महिला क्रांतिकारी थीं. सुर्ज्या सेन के नेतृत्व में उनके पांच साथी(निर्मल सेन,अनंत सिंह, लोकेनाथ बाल,अम्बिका चक्रवर्ती, गणेश घोष) और पचास साठ युवा क्रांतिकारियों(बच्चे थे, लेकिन निडर और बहादुर) ने 18 अप्रैल 1930 की रात पांच अलग अलग अंग्रेजी ठिकानों पर हमला किया..आर्मरी,कैन्टान्मन्ट,यूरोपीयन क्लब और टेलीग्राफ ऑफिस पर 18 अप्रैल 1930 की रात एक साथ हमला हुआ.कम हथियारों के बावजूद एक अच्छी और सुझबुझ भरी योजना के मुताबिक चलते हुए सुर्ज्या सेन और उनके साथी क्रांतिकारियों ने चटगांव में अंग्रेजी ठिकानों को तहस नहस कर दिया.कई युवा क्रांतिकारी बच्चे शहीद हो गए.खेलने कूदने की उम्र में उन्होंने देश के लिए प्राण दे दिए.
फिल्म के शुरूआती सीन में दिखाया जाता है की सुर्ज्या सेन, जो की स्कूल में पढाते हैं, किस सहज उदाहरण से बच्चों को खुदीराम बोस के बारे में बताते हैं.मैं फिल्म के काफी सीन से काफी ज्यादा प्रभावित हुआ.चाहे वो सीन हो जब अम्बिका दा युवा बच्चों को अपने सामने जलते हुए देखते हैं, या फिर वो सीन जिसमे चार युवा बच्चे अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाना नहीं चाहते हैं और खुद को गोली मार देते हैं, या फिर फिल्म के आखिर वाला सीन जब बच्चे कोर्ट के कटघरे में खड़े होते हैं और उनके माँ-बाप ये कहते हैं की “हमें तुमपे गर्व है”.सच मानिए तो फिल्म में ऐसे काफी समय आते हैं जो काफी ज्यादा प्रभावित करते हैं.
फिल्म खेलें हम जी जान से इतिहास का वो पाठ, जो या तो हम भूल चुके हैं, या कभी पढ़े ही नहीं ..सब कुछ बहुत खूबसूरती से पेश किया गया है.यह एक पिरिअड फिल्म है, और इसलिए परिवेश को उन दिनों का लगना बेहद जरुरी था.और पूरी फिल्म में उसी परिवेश की झलक मिलती है जो उन दिनों हुआ करती होगी.आशुतोष गोवारीकर के बेहतरीन निर्देशन और बाकी कलाकारों के शशक्त अभिनय ने फिल्म में जान डाल दी है.अभिषेक बच्चन ने उम्दा अभिनय किया है, उनके बेहतरीन फिल्मों में ये फिल्म शायद सबसे ऊपर रखी जाये.दीपिका पादुकोण, विशाखा सिंह ने भी बहुत अच्छा अभिनय किया है. निर्मल सेन की भूमिका में सिकंदर खेर मुझे बहुत लगे .अनंत सिंह की भूमिका में मनिंदर सिंह, लोकेनाथ बाल की भूमिका में फिरोज खान, अम्बिका चक्रबोर्ती की भूमिका में श्रेयास पंडित और गणेश घोष की भूमिका में सम्राट मुखर्जी ने बेहतरीन अभिनय किया है..बच्चों ने खासकर के प्रभावित किया.हर लिहाज से ये फिल्म एक बेहतरीन फिल्म कही जायेगी.फिल्म का संगीत अच्छा है और आर्ट डाइरेकसन,सिनेमेटोग्रफी बेहतरीन.
मुझे खुद ये मालुम नहीं था की चटगांव विद्रोह आखिर था क्या.और मैंने वो किताब भी कभी नहीं पढ़ी.लेकिन फिल्म देखते वक्त ये महसूस हुआ की जो किरदार फिल्म में हैं वो ठीक वैसे ही बात करते हैं, चलते हैं जैसा उन दिनों वो क्रांतिकारी करते होंगे..फिल्म के शुरुआत में ही ये कह दिया जाता है की “ये एक सत्य घटना पे आधारित है”फिल्म में कोई भी किरदार काल्पनिक नहीं है.फिल्म के आखिर में सब किरदारों की तस्वीर और उन क्रांतिकारियों, बच्चों की तस्वीर साथ साथ दिखाई जाती है.उन सब बच्चों और बाकी क्रातिकारियों की तस्वीर देख मन बड़ा क्षुब्ध सा हो गया की इन लोगों ने अपने परिवार,अपनी जिंदगी की फ़िक्र न करते हुए देश के लिए शहीद हो गए और आज हमें उनका नाम तक मालुम नहीं.सुर्ज्या सेन का नाम भी मैंने पहली बार इसी फिल्म के जरिये सुना.सुर्ज्या सेन और बाकी क्रातिकारियों के बारे में आज के युवा कुछ भी नहीं जानते, युवा तो छोड़िये, बड़े भी ज्यादा नहीं जानते..शायद कारण ये है की हम अपने ही इतिहास से दूर होते जा रहे हैं, हम जानने की जरुरत ही नहीं समझते की हमारे आज़ादी का इतिहास क्या था.हम अपने इतिहास को लेकर किस कदर जागरूक हैं ये इसी बात से पता चलता है की चटगांव के बारे में हमने पढ़ा ही नहीं. अपने इस जागरूकता पे ताली बजाने का मन करता है मेरा.
खास रिक्वेस्ट – मसाला फिल्मों और शीला की जवानी के ज़माने में इस तरह की फ़िल्में बनना एक अच्छा और सुखद चेंज है.देश के उन शहीदों को तो लगभग सब भूल ही चुके हैं, कम से कम फिल्मों के जरिये आज के बच्चे उनके बारे में थोड़ा तो जाने.वो कैसा जज्बा होगा उन बच्चों में की उन्होंने पढ़ने लिखने और खेल कूद करने की उम्र में ये रास्ता चुना और देश के लिए शहीद हो गए.एक टी.वी शो में इस फिल्म के निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने कहा की “तेरह चौदह साल की उम्र में वो टीनएजर्स चाहे तो वो सब कर सकते थे जो हम करना चाहते हैं या करते हैं अपने टीनएज में..पर उन्होंने ऐसा नहीं किया..वो सुर्ज्या दा के वजह से मोटिवेट हुए और उस उम्र में उन्होंने तय किया की वो देश के लिए जान दे देंगे”.ऐसी फ़िल्में देखना चाहिए..आप जरुर देखें ये फिल्म, ये मेरी एक पर्सनल रिक्वेस्ट है. 
फिल्म के आखिर में एक सीन है जब सुर्ज्या सेन को फांसी दी जा रही होती है. फांसी का फंदा जब उनके गले में डाला जाता है तो उनकी नज़रें जाती हैं वहां जहाँ ब्रिटिश झंडा लहरा रहा होता है, और उसे देख अपने आखरी समय में सुर्ज्या सेन के आँखों में एक सपना चमकता है की यहाँ हिन्दुस्तानी झंडा लहराए..तिरंगा लहराए.उनका एकमात्र सपना था की हिन्दुस्तान खुली हवा में सांस लें. और आज हम उन्ही जैसे शहीदों को भूल गए हैं.वाह !

Recent Articles

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर : शिक्षक दिवस पर खास

सुदर्शन पटनायक द्वारा बनाया गया, चित्र उनके ट्विटर से लिया गया आज शिक्षक दिवस है, यह दिन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ....

तीज की कुछ यादें, कुछ अभी की बातें और एक आधुनिक समस्या

इस साल के तीज पर बने पेड़कियेबचपन से ही तीज का पर्व मेरे लिए एक ख़ास पर्व रहा है. सच कहूँ तो उन दिनों इस...

एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना..

बारिश हो रही हो, मौसम सुहाना हो गया हो और ऐसे में अगर कुछ पुराना याद आ जाए तो जाने क्या हो जाता है...

बंद हो गयी भारत की सबसे आइकोनिक कार, जानिये क्यों थी खास और क्या था इतिहास

Photo: CarToqपिछले सप्ताह, अचानक एक खबर आँखों के सामने आई, कि मारुती अपनी गाड़ी जिप्सी का प्रोडक्शन बंद कर रही है. एक लम्बे समय...

आईये, बंद दरवाजों का शहर से एक मुलाकात कीजिये

यूँ तो साल का सबसे खूबसूरत महिना होता है फरवरी, लेकिन जाने क्यों अजीब व्यस्तताओं और उलझनों में ये महिना बीता. पुस्तक मेला जो...

Related Stories

  1. ये मेरी पहली फिल्म समीक्षा है.
    वैसे ये कहना गलत नहीं होगा की कोई भी इस तरह की फिल्मों को देख मैं काफी दिनों तक प्रभावित रहता हूँ..

  2. अभिसेक, देखो हम बिना पोस्ट पढे कमेंट कर रहे हैं..काहे कि सइनेमा देखना है.. इसका दू कारन है, एक तो ई बंगाल के पृस्ठभूमि पर है अउर दोसरा आसुतोस का सिनेमा है! देखना त्नी ई फिलिम का डायलॉग हमरे गुरू जी का होगा!!

  3. वाकई बेहतरीन फ़िल्म है अभी तक खैर आधी ही देख पाया हूँ, जल्दी ही पूरी कर लूँगा।

    पर जितनी देखी उतने में ही यह कहना पड़ेगा कि हटकर फ़िल्म बनायी है।

    फ़िल्म समीक्षा बेहतरीन की है।

  4. अच्छी समीक्षा की है अभि!!
    देखती हूँ अगर इस वीकेंड समय मिला तो जरुर देखूंगी ये फिल्म.

  5. true
    movie is excellent..
    i olwz love aashutosh gowarikar kindaa cinema..swadesh is my ol tyme fave movie..

    khelen hum je jaan se is a great film..abhishek is too good..

    good review!!

  6. अभी, बड़ी अच्छी जानकारी दी..फिल्म के बारे में भी और उस विद्रोह के बारे में भी..जिसके बारे में बहुत सारे लोगो को पता नहीं है…कई जगह पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो गए…आशुतोष गवारीकर की तो ऐसे ही फैन हूँ..उस पर ऐसा विषय..और पसंदीदा कलाकार भी…बस अबतक देखी कैसे नहीं…यही सोच रही हूँ

  7. @चचा जी और रश्मि दी..
    देख लीजिए फिल्म…वैसे ही ये फिल्म नहीं चली है…सिनेमा हॉल में शायद ही ज्यादे दिन ये फिल्म लगी रहे..

    वैसे भी आजकल तो देख ही रहा हूँ की अच्छी फ़िल्में फ्लॉप होते जा रही हैं…कुछ दिन पहले आई एक बहुत ही खूबसूरत और भव्य फिल्म "गुज़ारिश" भी फ्लॉप हो चुकी है…इसलिए देख लीजिए इससे पहले की फिल्म हॉल से उतर जाये…

  8. ये फिल्म जब देखी थी…कई दिन तक नहीं उबार पाई थी…| बहुत गहरे तक झिंझोड़ कर रख देती है ये फिल्म…| सच में, शायद कभी इस घटना या इससे जुड़े लोगों के बारे में कहीं नहीं पढ़ा-सुना था इससे पहले…| दीपिका ऐसे रोल भी कर सकती है, देख कर अच्छा लगा था…| फिल्म शायद इसलिए फ्लॉप हुई, क्योंकि आज की पीढ़ी रिलेट नहीं कर पा रही इससे…या शायद करना ही नहीं चाहती…| शीला की जवानी टाइप चीजे ज्यादा आकर्षित करने लगी हैं उनको…|
    पर एक बार इस फिल्म को ज़रूर देखना चाहिए…शायद कुछ चीज़ों की असल कीमत पता चल सके…|
    बहुत अच्छा लिखा है…:) दिल से…:)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

नयी प्रकाशित पोस्ट और आलेखों को ईमेल के द्वारा प्राप्त करें