हैदराबाद की यादें

हुसैन सागर लेक – हैदराबाद..इस शहर कि पहचान इससे भी है

हैदराबाद हमेशा से मेरे लिए खास शहर रहा है.वहां कि बात ही कुछ और है, शुरू से मेरी ख्वाहिश ये थी कि मैं नौकरी हैदराबाद में करूँ.अकरम, मैं और समित.. तीनो कि यही ख्वाहिश थी कि कॉलेज के बाद हम सब साथ ही रहेंगे, साथ ही काम करेंगे हैदराबाद में.लेकिन ख्वाहिशें जल्दी पूरी कहाँ होती हैं. अकरम पटना चला गया, मैं बैंगलोर और समित भुनेश्वर.जब कभी हम मिलते हैं या बात करते हैं, हैदराबाद का जिक्र जरुर आ जाता है..किसी न किसी बहाने से हम हैदराबाद को याद करते ही रहते हैं, और वहां जाने का भी कोई मौका नहीं छोड़ते. शायद हैदराबाद कि फिजा में कुछ जादू सा है.

हैदराबाद का मुख्य बस स्टैंड – इम्लिबन 
हैदराबाद से मेरी पहचान तब हुई जब ब्सवकल्याण इंजीनियरिंग कॉलेज(BKEC) में मैंने दाखिला लिया. ब्सवकल्याण कर्नाटक के बीदर जिले में आता है.ब्सवकल्याण जाने के लिए आपको ट्रेन से हैदराबाद आना होगा और फिर वहां से बस लेनी पड़ेगी.चार पांच घंटे लगते हैं हैदराबाद से ब्सवकल्याण जाने में..और यदि आप रात में बस पकड़ेंगे तो ३ घंटे हद से हद लगेंगे.पहली बार जब मैं हैदराबाद जा रहा था तो ट्रेन पे ही एक सहयात्री ने बता दिया था कि कहाँ से बस मिलेगी..साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि हैदराबाद का जो मुख्य बस स्टैंड हैं, जहाँ से हमें बस मिलेगी उसे इम्लिबन बस स्टैंड कहाँ जाता है.वैसे उस बस स्टैंड का नाम “महात्मा गांधी बस स्टैंड” है, लेकिन लोग उसे इम्लिबन के नाम से ही जानते हैं.३५ एकड़ में फैला इम्लिबन बस स्टैंड एशिया का पांचवा सबसे बड़ा बस स्टैंड है.इस बस स्टैंड में कुल 74 प्लेटफोर्म हैं..पहली बार मैं इतने बड़े बस स्टैंड में आया था और सफाई, व्यवस्था, दुकाने, सब देख के आँखें चौंधिया सी जा रही थी.हमें हर बार ब्सवकल्याण जाने के लिए यहीं से बस पकड़ना होता था, तो इम्लिबन को अच्छे तरह से जान भी गया था.ज्यादा मजा तब आता था जब हमारी ट्रेन हैदराबाद रात के आठ नौ बजे पहुँचती थी और डिनर कर के हम सब इम्लिबन बस स्टैंड पे ही जमा हो जाते थे.बस तो हर घंटे-आधे घंटे पे रहती ही थी, लेकिन हम लोग रात एक दो बजे वाले बस का टिकट लेते थे.हमें वहां वक्त बिताना बड़ा अच्छा लगता था.पिछले साल जब कुछ काम के सिलसिले में हैदराबाद गया था तो इम्लिबन फिर से जाना हुआ.काफी यादें ताजा हो गयी थी.अभी ये लिखते लिखते भी काफी नॉस्टैल्जिक हो रहा हूँ.          
टैंक बंड रोड – सड़क के एक तरफ हुसैन सागर और दूसरी तरफ पार्क
रेलवे स्टेशन से इम्लिबन जाने के रास्ते में हुसैन सागर झील आता है.पहली नज़र में ही मुझे हुसैन सागर लेक से प्यार हो गया था.टैंक बंड रोड पे स्थित हुसैन सागर झील और बीचो बीच गौतम बुद्ध की प्रतिमा का नज़ारा अद्दुत लगता है.टैंक बंड रोड, जहाँ हुसैन सागर स्थित है उस सड़क से भी मुझे पहली नज़र में ही प्यार हो गया था.सड़क के एक तरफ झील और दूसरी तरफ गार्डन बने हुए हैं.अभी तक जितने भी जगह मैं गया हूँ, शायद ही कहीं ऐसा नज़ारा देखने को मिला हो.हुसैन सागर के पास शाम को देर तक खड़े रहना और झील को देखते रहना, बहुत अच्छा लगता है.अगर खड़े खड़े थक गए तो वहां लगे बेंचों पे बैठ जाईये या फिर सड़क के दूसरे किनारे पे बने लंबे पार्क में जाकर बैठ जाइए.चाय, कोल्ड ड्रिंक भी अगर पीनी हो तो कोई दिक्कत नहीं, सड़क के किनारे एक दो जगह दुकाने भी बनी हुई हैं. वैसे हुसैन सागर के आसपास कई चायवाले आपको चाय बेचते नज़र आयेंगे.टैंक बंड रोड, हुसैन सागर और नेकलेस रोड सही में हैदराबाद के लिए एक नेकलेस से कम नहीं.नेकलेस रोड पे टहलने का अलग ही मजा है.अगर आप हैदराबाद घूमने निकले और हुसैन सागर, या नेकलेस रोड आपने नहीं देखा तो आपका हैदराबाद घूमना व्यर्थ ही होगा. 
रात के समय बिरला मंदिर का यही नज़ारा रहता है
अगर आप मेरी माने तो हैदराबाद में बस तीन तरह के ही मौसम हैं – हॉट, हॉटर एंड हॉटेस्ट 🙂..असली सर्दी के मौसम(उत्तर भारत वाले सर्दियों) से तो यहाँ के लोग शायद ही वाकिफ होंगे…अजी, जनवरी में भी कभी कभी पंखे चल जाते हैं यहाँ ;)…गर्मी भयानक वाली पड़ती है लेकिन शाम को मस्त सुहानी, ठंडी हवा चलती है.और शाम को देर तक हुसैन सागर के किनारे खड़ा रहना बहुत अच्छा लगता है.हुसैन सागर के आसपास घूमने की जगह की कोई कमी नहीं है.लुम्बनी गार्डन,बिरला मंदिर, एन.टी.आर गार्डन और प्रसाद मल्टीप्लेक्स. इनमे से अगर लुम्बनी गार्डन को छोड़ दिया जाये तो बाकी तीनों जगहों से मेरा कुछ खास रिश्ता सा है.ऐसा शायद ही कभी हुआ हो की मैं हैदराबाद गया हूँ और बिरला मंदिर नहीं गया.बिरला मंदिर जाना, वहां बैठे रहने में मुझे एक अलग सुकून का अनुभव होता है.बिरला मंदिर को स्वामी रंगनाथनदा ने १९७६ में बनवाया था.इसे बनने में करीब १० साल लगे थे.बिरला मंदिर में बने खूबसूरत पार्क, मंदिर और नक्कासी को बस आप देखते ही रह जाएंगे.मंदिर के बाहर तरह तरह की दुकाने लगी हुई हैं, मोतियों, लड़ियों, खिलोनो से दुकाने सजी रहती हैं.मंदिर के सबसे ऊपर वाली मंजिल से आप टैंक बंड और आसपास के पुरे इलाके को देख सकते हैं.हैदराबाद का नज़ारा यहाँ से बेहद खूबसूरत दीखता है.मंदिर के इसी उपरी मंजिल के एक तरफ काफी बड़ा सा बैठने का जगह बना हुआ है..शाम की ठंडी हवा में यहाँ से उठने का मन शायद ही किसी को करे.
प्रसाद मल्टीप्लेक्स के सामने खड़े हमारे परम मित्र समित बाबू 

बिरला मंदिर से थोड़े ही दुरी पे है प्रसाद मल्टीप्लेक्स. प्रसाद आई-मैक्स मल्टीप्लेक्स हैदराबाद में बना पहला मल्टीप्लेक्स है.मैं किसी भी मॉल/मल्टीप्लेक्स में सबसे पहले यहीं गया था, तो इस लिहाज से भी मेरे लिए प्रसाद मल्टीप्लेक्स बहुत खास है.यहाँ समय बिताना मुझे बहुत अच्छा लगता है.प्रसाद मल्टीप्लेक्स में एक आई-मैक्स 3D स्क्रीन और पांच सामान्य स्क्रीन है.प्रसाद आई-मैक्स दुनिया का सबसे बड़ा आई-मैक्स 3D स्क्रीन है.पहली बार हमने(मेरे दोस्त और मैंने) कोल्ड-कोफ़ी यहीं पिया था..पहली बार पिज्जा और बर्गर हमने यहीं खाया था..और पहली बार किसी मल्टीप्लेक्स में फिल्म हमने यहीं देखा था.अब भी याद है, जब पहली बार फिल्म देखने हम यहाँ पहुंचे तो बहुत देर तक ये तय नहीं कर पा रहे थे की टिकट कटाने कौन जाएगा?क्या बोलेंगे?सुना है काउंटर पर अंग्रेजी में बोलना होता है..सब कह रहे थे की भाई तुम जाओ, तुम जाओ..अंत में बेचारा अकरम ही गया टिकट कटाने के लिए और हम बच गए 😉.. सिर्फ ३५ रुपये में यहाँ कोल्ड कोफ़ी विद आइसक्रीम मिलती थी, और यकीन मानिए उससे बेहतर कोल्ड कोफ़ी किफायदी दाम में शायद ही और कहीं मिले आपको.ये हम लोगों का दस्तूर सा बन गया था की प्रसाद जाना है तो कोल्ड कोफ़ी पीना ही है..पिछले साल जब प्रसाद गया था तो देखा वहां से वो कोल्ड कोफ़ी का वो दूकान गायब है और वहां कोई दूसरा दूकान आ गया है…बहुत दुःख हुआ था मुझे.हम यहाँ दिन भर बैठे रहते,घूमते रहते, एक पल के लिए भी कभी हम बोर नहीं होते थे यहाँ.हालांकि अब प्रसाद से भी बड़े बड़े मल्टीप्लेक्सेज और मॉल खुल गए हैं हैदराबाद में, लेकिन आज तक हमने हैदराबाद में किसी और मॉल या मल्टीप्लेक्स के तरफ रुख नहीं किया.प्रसाद मल्टीप्लेक्स हमारे लिए उस समय भी खास था, अब भी है और हमेशा रहेगा.

एन.टी.आर गार्डन के अंदर का दृश्य 

प्रसाद के ही बगल में एन.टी.आर गार्डन है.55 एकड़ में फैला ये गार्डन १९९९ में बनाया गया था.इसे आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री “एन.टी.रामा राव” के याद में बनाया गया था. यह भी कम ही हुआ होगा की मैं हैदराबाद गया और ए.टी.आर नहीं गया.किसी भी बड़े गार्डन में मैं पहली बार यहीं गया था और यहाँ की खूबसूरती देख मैं चकित था.फूल और पेड़ों को क्या खूबसूरती से सजाया गया है..एक से बढ़कर एक खूबसूरत से फव्वारे हैं..रात के समय में तो इस पार्क का नज़ारा अद्दुत लगता है.इस पार्क का फ़ूड कोर्ट भी बेहतरीन और एकदम अलग सा है. आर्टिफिसीअल सी गाड़ियां रहती हैं जिसमे बैठने की जगह, टेबल कुर्सी बनाई गयी है. यहाँ के फ़ूड कोर्ट के दाम भी महंगे नहीं हैं, किफायती ही हैं…आपको अगर दस रूपए में चाय, पन्द्रह में कोफ़ी मिल रही है तो फिर आज के ज़माने में इसे किफायती ही कहेंगे न :). हम अक्सर शाम के समय एन.टी.आर घूमने आते थे.बीच में कुछ दिनों के लिए पार्क में एक बड़ा सा स्क्रीन लगाया गया था, जिसमे गाने दिखाए जाते थे..एक दफे मैं और आशीष भारती शाम से रात दस इग्यारह बजे तक पार्क में बैठे बस गाने देख रहे थे.ठंडी हवा चल रही हो, मौसम दिलकश हो और आपका मुड एकदम सेट हो तो ऐसे में इस पार्क से उठाना कुछ नामुमकिन सा ही काम है..समय होने पर(रात के ११:३० बजे शायद) पार्क बंद हो जाता है, और तब हमें लगता है की कितना अच्छा होता ये पार्क रात भर खुला रहता.

ऐसा हो सकता है क्या की हैदराबाद की बात हो और चारमीनार का नाम ना आये? हैदराबाद की पहचान है चारमीनार.चारमीनार को मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने 1591 में बनवाया था.चारमिनार के ही पास “मक्का मस्जिद है”, जो की हैदराबाद की सबसे पुरानी मस्जिद है और देश के सबसे बड़े मस्जिदों में से एक है. चारमीनार और उसके आसपास की तंग गलियों में घूमने का एक अलग ही अनुभव रहा है..कुछ रोचक किस्से भी हैं यहाँ के, जो मैं सार्वजनिक तौर पे नहीं बता सकता, मेरे दोस्त शायद समझ जाये मैं क्या कहना चाह रहा हूँ 🙂..किताबों में मैंने बहुत देखा था चारमीनार, जब पहली बार सामने से देखा तो एक पल विश्वास नहीं हुआ की ये वही चारमीनार है जिसे मैं किताबों और टी.वी में देखते आया हूँ.हैदराबाद मुख्य शहर से काफी दूर ये चारमीनार है.चारमीनार हम कम ही घूमने जाते थे, लेकिन जब भी जाते थे तो बहुत अच्छा लगता था.काफी देर हम वहां बैठे रहते.वहां से चारमीनार के आसपास की काफी व्यस्त सड़कों को युहीं देखते रहते..आसपास की दुकानों में भी कम दामों में बहुत कुछ आपको खाने के लिए मिल जाएंगे.अक्सर हम यहाँ दोपहर में पहुँचते और फिर शाम तक यहीं रहते थे.

अगर चारमीनार और हुसैन सागर के बिना हैदराबाद का जिक्र अधूरा है तो बिरयानी के बगैर भी हैदराबाद का जिक्र अधूरा ही है.हैदराबादी बिरयानी तो पुरे भारत और पुरे विश्व में मशहूर है.जिस तरह से हैदराबाद को चारमीनार से जाना जाता है उसी तरह से हैदराबाद की पहचान बावर्ची रेस्टरान्ट की वजह से भी है.बावर्ची रेस्टरान्ट मुख्य रूप से बिरयानी के लिए मशहूर है.देश विदेश से आर्डर आते हैं यहाँ. दो साल पहले “टाइम्स फ़ूड गाईड” ने बावर्ची रेस्टरान्ट को देश के सबसे अच्छे बिरयानी रेस्टरान्ट में पहला स्थान दिया था.आप एक दफे खा के देखिये बावर्ची में, अब तक की खायी सभी बिरयानी का स्वाद आप भूल जाएंगे.सबसे अच्छी बात ये है की उम्दा बिरयानी आपको बहुत ही अफोर्डेबल दाम पे मिलती है.१२० रूपए में अगर आपको एक प्लेट बिरयानी(आप पूरा खत्म शायद ही कर पायें, क्वान्टिटी इतनी रहती है) मिलती है तो आज के ज़माने के हिसाब से महंगे तो नहीं(पिछले साल की रेट बता रहा हूँ).अगर आप वीकेंड पे बावर्ची जा रहे हैं तो एक सलाह मान लीजिए की कम से कम एक दो घंटे का वक्त ले कर जाएँ.यहाँ इतनी भीड़ रहती है वीकेंड पे की आपको इन्तेज़ार करना पड़ता है.इन्तेज़ार करने वालों की भी कमी नहीं, लोग एक एक घंटे तक इन्तेज़ार करते हैं की कब उन्हें टेबल मिले..आखिर लोगों को सबसे उम्दा बिरयानी खानी होती है तो इन्तेज़ार करने में भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. बावर्ची के अलावा वैसे तो कई और बड़े रेस्टरान्ट हैं जो बिरयानी के लिए बहुत फेमस हैं जैसे “पैराडाइज”..लेकिन बावर्ची की बात सबसे अलग है.अगर आप हैदराबाद कभी आयें तो बिना बावर्ची की बिरयानी खाए वापस मत जाईयेगा.सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन से पास में ही है बावर्ची.ऑटो से गए तो हद से हद ३० रुपये का बिल आएगा.

कुछ फोटो पुराने दिनों से 

ये एन.टी.आर गार्डन का वही फ़ूड कोर्ट है जिसके बारे में मैंने बताया था.साल 2007,जनवरी का फोटो जब पापा मम्मी हैदराबाद घूमने आये थे.

मम्मी के साथ – एन.टी.आर गार्डन 
माँ-पापा — चारमिनार, हैदराबाद 

पापा-मम्मी, – बिरला मंदिर, हैदराबाद

पिछले साल की तस्वीर, जब अपनी बहन के साथ गया था हैदराबाद.मेरी बहुत कम ही तस्वीरें रही हैं हैदराबाद की क्यूंकि जब तक कॉलेज में था, मेरे पास ना तो कैमरा था और ना ही उस समय कैमरा वाला मोबाइल ज्यादा उपलब्ध था.
बिरला मंदिर के सामने 
एन.टी.आर गार्डन में 

(हैदराबाद में बहुत खास और घूमने लायक जगह हैं, लेकिन जिनका जिक्र मैंने यहाँ किया है, वो मेरे लिए बहुत खास हैं.बाकी जगहों का जिक्र हो सके तो अगले पोस्ट में करूँगा, अगर हैदराबाद के बारे में एक और पोस्ट लिखा तो)

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  1. Hyd…no wrdss ! juss can't xplain itzz beauty.. !
    dose dayzz wr golden wen i spent 12 dayzz dere ! 🙂 🙂

    hussain sagar n wo bagal wali road……lukss lyk ki v r in london ! 😛 😀

    Hyd fort bhi hai bhaiyaa…apne miss kar diya shayd 😛 sari yaadein taaza ho gyi….1 more thing bro….wo 1flyovr bi hainaa….dat mehendipattnam wala flyovr….suna tha sbse lamba flyovr hai…

    bht bht mast city hai hyd…specially for single guyss…hehehe 😀

    in ol….a golden part of our incredible india ! 🙂 🙂 🙂 🙂

  2. एकदम सही भाई…लेकिन इस पोस्ट में मैंने उन्ही सब जगहों का जिक्र किया है जो मेरे दिल के काफी करीब हैं 🙂

    मुझे पता है वो बारह दिनों का ट्रिप तुम्हे हमेशा याद रहेगा 🙂

  3. अभी जी , हैदराबाद के इतने नज़ारे देख फिर से यादें ताज़ा हो गयी….. वाकई हैदराबाद के के जिन जगहों का आपने वर्णन किया वो लाजबाब है. नेकलस रोड की छटा रात में देखते ही बनती है..बहुत ही सुंदर संस्मरण…. बस रामोजी फिल्म सिटी के बारे में कुछ अगली पोस्ट में जरूर प्रकाश डालियेगा.

    .

    सृजन शिखर पर " हम सबके नाम एक शहीद की कविता "

  4. करीब १५ साल पहले गए थे हेदराबाद बाकी सब तो देखा पर तुम्हारा प्रसाद मल्टीप्लेक्स और एन टी आर गार्डन तब वहां नहीं था ,वह देखने फिर से जाना होगा 🙂 वैसे बिरयानी से लेकर हुसैन सागर तक सब कुछ बहुत बढ़िया याद दिलाया तुमने पर हैदरावादी मोती तो भूल गए 🙂

  5. arre waah bahut khoob and behaad acche photos. mera bhi mann hai Hyderabad jaane ka. agar kabhi gye to aapke btaye hue jagaho paar zaroor jaugi..!

    waise kab ki hai yeh tasveere?? kab gye thae aap?

  6. @स्नेहा
    मैं चार साल जाता रहा हूँ हैदराबाद..
    मेरा कॉलेज हैदराबाद से चार घंटे के सफर पर था..अब भी जाता रहता हूँ कभी कभी..
    फोटोस सब 2005, 2007,2008, 2009 के हैं..

  7. हमको तो मजबूरी में जाना पड़ा था.. कलकत्ता से बेंगलुरु का टिकट नहीं मिला और जाना ज़रुरी था.. इसलिए वाया हैदराबाद जाना पड़ा.. पुरे एक दिन रुके और उसमें भी बस पुराने बिछड़े हुए लोगों से मिलना हुआ. हुसैनसागर देखा और चार मीनार भी.. वहीँ मेरा ऑफिस था इसलिए पत्थरघटी से मोतियों की खरीदारी की.
    अच्छा लगा पूरा जर्नी… भैया भाभी का फोटो शायद पहले भी देखा हुआ है!!
    सलिल चाचा

  8. अरे वाह! बढ़िया संस्मरण… चलिए इस बहाने हैदराबाद के बारे में भी जानने का मौका मिला… धन्यवाद!

  9. बाह का घुमाईस हो बच्चा लाल । एक दम टूरिया दिए हो ..हम भी चार पांच मर्तबे जा चुके हैं अरे और काहे के लिए रेलवे का परीक्षा देने सिकंदराबाद रेलवे भर्ती बोर्ड का दफ़्तर ,,,उउ भी बहुत दर्शनीय था उन दिनों ..हम लोग के लिए हा हा हा

  10. ये तो बहुत सुन्दर शहर है? मेरे दामाद यहाँ माइक्रोसाफ्ट कम्पनी मे थे तो कहा करते थे कि मुझे हैदराबाद बिलकुल अच्छा नही लगता उन्हों ने बैंगलोर अपना तबादला करवा लिया था तब से मेरी कल्पना मे ये शह्र कुछ अच्छा सा नही लगता । लेकिन तस्वीरें देख कर तो लगता है कि हम किसी विकसित देश को देख रहे हैं। सुन्दर विवरण। धन्यवाद।

  11. अरे वाह..ये तो एकदम पर्यटक वाली पोस्ट है….तस्वीरें भी क्या खूब लगाई हैं….मजा आ गया पढ़कर

  12. बहुत ही बढ़िया संस्मरण!
    बावर्ची की बिरयानी सच में आज भी याद आती है, पता नहीं फिर कब जाना होगा. बिरला मंदिर तो नहीं जा पाए, कुछ एक जगहों पर ही गए है. फुर्सत में बाकि बताये गए जगहों पर भी जरूर जाऊँगी.

  13. मैं तो कभी नहीं गयी हैदराबाद लेकिन रमेश भैया दो साल रहे हैं हैदराबाद में.वो भी बताते हैं की हैदराबाद बहुत अच्छा शहर है.
    तस्वीरें सभी बहुत अच्छी हैं.

  14. remember abhi
    tum kitni baatein karte the hyd k baare men phone pe :-))
    n main to gai nahi lekin i know hyd mast city hai.
    really touristic post hai ye toh..
    pics are too gud :))))

  15. अब तो हमारा भी जाने का मन कर रहा…पर गाइड के रूप में तुम्हे चलना पडेगा अभि…:)

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