अकेलापन – घबराना क्यों?

दो दिन पहले मेरी दोस्त कीर्ति का जन्मदिन था.फोन किया उसे जन्मदिन की मुबारकबाद देने के लिए तो पाया उसके आवाज़ में वो उत्साह नहीं था जो जन्मदिन के अवसर पे होना चाहिए.बड़े निराशा के साथ उसने कहा की उसे ये जन्मदिन अच्छा नहीं लग रहा,.कोई दोस्त, कोई साथी, परिवार वाले..कोई भी तो नहीं साथ में..ऐसे में जन्मदिन किसे सुहायेगा? कीर्ति हैदराबाद में रहती है और अभी कुछ समय पहले ही वो अपना मास्टर्स डिग्री खत्म कर जॉब में आई है.उसके बातों से साफ़ झलक रहा था की वो अपने कॉलेज के दोस्तों, घरवालों को किस कदर मिस कर रही थी..वो बोलती जा रही थी और मैं सुनते जा रहा था.प्रोफेसनल जिंदगी से एकदम अनजान वो शायद ऑफिस के लोगों में अपनापन खोजने लगी थी..कह रही “कोई भी नहीं साथ में जन्मदिन सेलिब्रेट करने, ऑफिस के एक दो लोगों को बुलाया तो बहाना बना गए..ऐसे में काफी अकेली महसूस कर रही हूँ खुद को”  .. इस लड़की के लिए जन्मदिन के क्या मायने हैं ये इसी बात से समझ लीजिए की पिछले साल मैं भूल गया था इसे जन्मदिन पे बधाई देना..तो ये फोन कर के मुझे कहती है – आज मेरा जन्मदिन है..चलो मुझे विश करो 🙂. और आज ये अपने जन्मदिन पे ही अकेली पड़ गयी.

कीर्ति ही नहीं, महानगर और प्रोफेसनल जिंदगी जीने वाले अधिकांश लोग इस अकेलेपन के चक्कर में पड़ चुके हैं. इस अकेलेपन के चक्कर में मैं भी पड़ा था..और अब भी हूँ. लेकिन बहुत सी बातें सीख चूका हूँ..कीर्ति को अभी वो सब बातें सीखना समझना होगा.पटना से जब इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था तो कॉलेज में कभी ये नहीं जान पाया की अकेला रहना किसे कहते हैं..दोस्त ऐसे मिले जिन्होंने कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया..दुःख में, सुख में मेरे साथ चलते रहे,कभी मुझे वो मुझे हौसला देते तो कभी मैं उन्हें. बैंगलोर आने के बाद भी पहला साल तो अच्छे से गुजर गया लेकिन 2008 काफी बुरा रहा, हर तरह की परेशानियाँ और मुसीबतें..दोस्त अलग अलग जगह चले गए..और मैं खुद को काफी अकेला महसूस करने लगा.. इंजीनियरिंग के दिनों में कंप्यूटर और इन्टरनेट एक तरह से मेरा पैशन था..लेकिन बैंगलोर में आकार मैंने इन्टरनेट और कम्पूटर को अपना अकेलापन दूर करने का साथी बना लिया. ऑरकुट, फेसबुक पे हमेशा ऑनलाइन रहने लगा..लोग इस आभासी दुनिया में रिश्ते बनाने से डरते हैं(पता नहीं क्यों, मैं ये बात समझ नहीं पाता हूँ)..जबकि इसी आभासी दुनिया में बने कुछ सच्चे और पक्के रिश्तों ने मेरा अकेलापन काफी हद तक दूर किया. उस वक्त मेरी बहन भी बैंगलोर में ही रहती थी, अक्सर उससे मिलने चला जाता तो अच्छा लगता था..आसपास के मित्रों में एक प्रफेशनलिज़म की साफ़ झलक थी..और मैं इस तरह के लोगों से चाह के भी सम्बन्ध नहीं बना पाता.कुछ कॉलेज के मित्र भी बैंगलोर में रहने आ गए थे लेकिन उनके और मेर विचार, व्यक्तिक्त्व बिलकुल अलग थे.. उनकी कुछ आदतों पे मुझे सख्त ऐतराज़ भी था.मैंने सोच लिया था की मैं यहाँ लोगों के बीच भी अकेला हूँ और अकेला ही अच्छा हूँ… मैंने अकेलेपन से निपटने का रास्ता भी खोज लिया था..खुद को काफी व्यस्त रखने लगा..काम में, पढ़ाई में, इन्टरनेट में, फ़िल्म देखने में, गानों और गज़लों में.

सच मानिए तो अकेलेपन को एन्जॉय करना चाहिए..मैं तो ये मानता हूँ की सबसे अच्छा साथ खुद का ही होता है, क्यूंकि हम खुद को कभी धोखा नहीं दे सकते..मैं बैंगलोर में अकेले घूमने लगा.मॉल में बैठे बैठे बस लोगों को देखता, इसमें भी एक अलग ही मजा है. मुझे खुद का साथ अब सबसे अच्छा लगने लगा था.जब कभी दिन थोड़ा बोझिल सा लगता, मैं घूमने निकल जाता था.कभी मॉल, तो कभी कोफ़ी शॉप में बैठे रहना तो कभी पार्क या सडको पे चलना मुझे अच्छा लगने लगा. इसी बीच कुछ नए लोगों से दोस्ती भी हुई..वैसे तो ये मुझसे काफी जूनियर थे, लेकिन फिर भी दोस्ती हो गयी और मैं इनके साथ समय बिताने लगा. कॉलेज के एक दो सीनिअर जैसे मनीष सर, से भी दोस्ती हुई.कॉलेज में इन सिनिअर्स के साथ जान पहचान काफी सिमित थी, लेकिन यहाँ अच्छी दोस्ती हो गयी.कुल मिलाकर मुझे फिर से अपने पुराने दिन जैसा माहौल मिल गया..वक्त अच्छे से गुजरने लगा..और मैं फिर से भूल गया था की अकेलापन किसे कहते हैं.

समय या काम की मार कहिये, वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता. पिछले सात आठ महीनो से सब अपने अपने कामों और जिंदगी में व्यस्त हो गए..साथ घूमना फिरना तो बंद हुआ ही..बातचित भी काफी कम हो गयी.पहले काम और व्यस्तता के बावजूद हमारा “पीअर्स,क्लूनी और अर्नोल्ड” चलते रहता था, अब उसे भी बंद हुए महीनो हो गए.शायद इसलिए भी उस सीरीज को फिर से शुरू नहीं कर रहा हूँ(वैसे एक पोस्ट उसकी ड्राफ्ट में सेव है)..सुबह चाय के दूकान पे हमेशा सब से भेंट हो जाया करती थी, अब पिछले कुछ महीनो से सुबह अकेले ही चाय पी रहा हूँ.

कभी लगता है की समय जैसे फिर से वापस वहीँ चला गया जब मैं अकेलापन महसूस करता था..लेकिन उस समय में और अब एक फर्क जो है वो ये की मुझे इन सब बातों का कोई असर नहीं होता..कोई साथ है, नहीं है मुझे इस बात की चिंता नहीं रहती.,मुझे अब खास फर्क नहीं पड़ता..मुझे खुद पे इतना यकीन तो है ही की मैं कभी खुद को बोर होने नहीं दूँगा..दिल लगाने के लिए ही मैंने फिर से ब्लोगिंग का सहारा लिया था..शायद इसलिए भी पिछले आठ नौ महीनो से मैं ब्लोगिंग में ज्यादा सक्रिय हो गया हूँ..समय बिताने का और नयी बातें सीखने, समझने का ये एक बहुत अच्छा माध्यम है..दिल से शुक्रगुजार हूँ मैं उन सब लोगों का जिन्होंने मुझे इतना प्यार, स्नेह और अपनापन दिया.. इस ब्लॉग्गिंग के चलते ही तो कितने अच्छे, सच्चे और पक्के रिश्ते बने(यहाँ भी ध्यान रहे, की आभासी दुनिया के बावजूद रिश्ते ठोस,पक्के और दिल से बने हैं).

निशांत, संजय और मैं..रविवार के दिन.

फिर से मैं अकेला घूमने लगा हूँ और यकीन मानिए खुद की कंपनी को मैं बहुत अच्छे से एन्जॉय कर रहा हूँ..किताबें बहुत सी पढ़ रहा हूँ आजकल..अमृता प्रीतम,कमलेश्वर,बशीर बद्र,निर्मल वर्मा की किताबें शेल्फ पे रखी हैं.दस पन्द्रह हिन्दी अंग्रेजी फ़िल्में भी टोरेन्ट पे डाउनलोड होने रखी हुई हैं. किताबें, ब्लोगिंग,फिल्मों और काम में वक्त गुजारने लगा हूँ.कभी कभी तो पता भी नहीं चलता , वक्त कैसे गुजर जा रहा है. हाँ, छुट्टी के दिन थोड़ी बोरियत सी महसूस होती है. कभी कभी इस अकेलेपन में भी थोड़ी मस्ती हो जाती है, जैसे पिछले रविवार के दिन.एक अरसे बाद दो दोस्त(मेरे जुनिअर्स ही) के साथ घूमने निकला था..ऐसा लग रहा था की ज़माने बाद किसी के साथ घूम रहा हूँ. काफी अच्छा वक्त बीता..बहुत दिन के बाद थोड़ी मस्ती हुई. अच्छा लगा..लेकिन अफ़सोस ऐसे मौके कम ही मिल पाते हैं मुझे. वैसे मुझे दुःख नहीं, मैं हूँ न खुद को कंपनी देने के लिए 🙂

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  1. "एक अकेला इस शहर में..रात में और दोपहर में" है न अभि?? ही ही

    jokes apart

    बहुत सही कहा है तुमने..अकेलेपन को enjoy करना चाहिए. 🙂

  2. हा हा हा निधि…
    अरे वही गाना गाने के लिए कितनी बार सोचा..एकदम फिट बैठता है अपने पे…लेकिन मेरा आवाज़ तो तुम जानती ही है न रे..एकदम खराब है…इसलिए नहीं गाते 🙂
    हा हा

  3. अकेलापन तो एक दरिया है, जिसमे सबको एक बार तो डूबना ही है.जो तैरना जानते है उनके लिए कोई समस्या नहीं है, जिन्हें नहीं आता, जो पहली बार इस में उतरे हैं , धीरे -धीरे वो भी तैरना सीख जाते है, अगर सीखना चाहे तो. कभी-कभी किसी और का सहारा मिल जाता है तो वो बिना सीखे इस अकेलेपन से उबर जाता है. कुछ बहुत कमज़ोर होते है, डर का हव्वा इस कदर रहता है, कि तैरना कभी सीख नहीं पाते.वो वक्त के किसी लहर से साथ गुम हो जाते है. कहना ये है कि डूबने का मौका कभी मिले या नहीं, तैरना पहले से सीख लीजिए. वरना पेट में जब कुछ वक्त का खारा पानी चले जाता है, तो मेरे जैसा प्राणी ब्लॉग्गिंग करने लगता है. हे हे हे joking only!

  4. बहुत समझदार हो गए हो अभी, वक्त बहुत कुछ सीखा देता है..अगर हम अच्छी तरह सीखना चाहें…बहुत ही अच्छा लगा,जानकर तुमने अकेलेपन को positively लिया और डिप्रेशन में नहीं गए.

    समय लगता है पर समान रूचि वाले लोंग ज़िन्दगी में मिल ही जाते हैं..चाहे जिस रास्ते मिलें…ऑफिस..कॉलेज..कॉलोनी या फिर अंतर्जाल के रास्ते …कीर्ति भी अकेलेपन को अच्छी तरह जीना सीख जायेगी…बस थोड़ा वक्त लगेगा.

    कीर्ति को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं

  5. bahut sahi ikha hai aapne. apna saath he sabse behtaar hai, khud ko aap dhokha nhi de sakte.

    mujhe bhi akele ghumna bahut pasand hai. aaj kal ke zamane main sab ko akele rehne ke aadat daal lene chaheye!

  6. अकेलापन तब लगता है जब आप इस बारे में सोचो … यकीन करिये, जिंदगी के कई साल मैंने घर से दूर अकेले गुज़ारा है … मेरा स्वभाव ऐसा कि किसीसे भी जल्दी दोस्ती नहीं होती है … ऐसे में किताबें, गाने, फिल्में यही मेरे टाईमपास थे …
    और आजकल तो इन्टरनेट आ गया है …

  7. दूसरों को क्या कहूँ, मैं खुद ही अपने जन्मदिन पर अवसाद में ही रह रहा हूँ पिछले पांच-छः सालों से..

  8. क्या बात है 🙂 अकेलेपन में अभिव्यक्ति निखर रही है :)सच कहा है अकेलेपन से घबराना नहीं चाहिए बल्कि उसे जीना सीखना चाहिए.
    और किर्ती को बोलो ये आभासी दुनिया भी बुरी नहीं है.जन्मदिन मनाने के लिए 🙂 ऐसा लगता है पूरा संसार हैप्पी बर्थडे गा रहा है 🙂 .

  9. वैसे एक बता कहूँ दोस्त? अब तक अकेलेपन की इस कदर आदत हो चुकी है की इसमें आने वाली थोड़ी भी खलल पेशानी में बल डाल जाती है..

  10. @प्रशान्त…
    भाई तुमसे मैं ऐसा ही कुछ कमेन्ट की आशा कर रहा था….मैं जो भी तुम्हारे बारे में तय कर लेता हूँ या जो सोचता हूँ वो सच निकलता है…:)

    और दूसरा वाला कमेन्ट क्या कहूँ ..अपने भाषा में "कातिल कमेन्ट" कहूँगा…
    एकदम सौ फीसदी सच है….

  11. aअकेलेपन से आदमी जितना सीखता है उतना परिवार मे रह कर नही चिन्तन से मन की गाँठें खुलती है और सामने दिखता है खुला आसमां। ब्लागैन्ग तो अकेलों के लिये बरदान बन कर आया है हम जैसे बूढे भी खुद को बच्चा समझने लगे हैं — आनन्द ही आनन्द। खुशी से जीओ। बहुत बहुत शुभकामनायें, आशीर्वाद।

  12. अभी जी, अकेलापन को अपना दोस्त बना लेना चाहिए. बेशक मैं तो सोंचता हूँ की कैसे अकेलापन मिल सके. अगर मुझे किसी पहाड़ पे भी कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया जाय तो भी मै खुश हूँ बस साथ में कुछ साहित्य की बुक चाहिए. मै अपने पढाई के दिनों मे इतना सीधा और शर्मीला था की लड़के मुझसे दोस्ती नहीं करते, ऐसे में मेरा साथ देती थी हंस ( हिंदी साहित्य की मंथली पत्रिका ), मै आज जो कुछ हूँ इस हंस के ज्ञान की वजह से क्योंकि इसने मुझे साहित्य को जीना शिखाया , और मेरे दोस्त वही गावं मे लफंगा गिरी करते हुए आज भी रह गयें . ………

    .

    उपेन्द्र

    सृजन – शिखर पर ( राजीव दीक्षित जी का जाना )

  13. @abhi bhaiya
    i m readng 1st tym ur blog nd felt so fascinatd dat kai piche k post v padh av padh daale maine.apni bhasa ki sugandh lekar fir se mere jubaan ko mara lakwa thik ho gaya h.warna ye khari boli bol bol kr to tedhi ho chuki thi 😉 i felt ur post first inspirationl than havng a gr8 soft touch of love……….इहेले कहेँगे – लगल रहिए।

  14. वो गाना याद नहीं क्या…अकेले हैं तो क्या गम है…:)
    वैसे तुम्हारी खुद की कंपनी बहुत अच्छी है…लगे रहो…|
    और हाँ…सौ फीसदी सहमत हूँ इस आभासी दुनिया में भी मिल जाने वाले कुछ बेहद सच्चे, पक्के और अच्छे रिश्तों की बात से…| कई बार ये रिश्ते असल ज़िंदगी में मिले रिश्तों से लाख गुना बेहतर साबित होते हैं…|

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