निर्मल सुख

(फिर से डायरी से निकला एक पन्ना, इस बार निर्मल वर्मा के किताबों से कुछ जो मैंने कभी नोट कर के रख लिया था..अलग अलग कहानियों से लिया गया कुछ जो मैंने यहाँ रख छोड़ा है…आप खुद जोड़ तोड़ कर पढ़ समझ लें.)


🙂


” हममें ऐसा कुछ होता है, जो न होकर भी संग-संग चलता है, जिसे याद नहीं किया जाता क्योंकि वह कभी भूलता नहीं. ”

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….नहीं जी, नाम वहीँ लिखे जाते हैं, जहाँ आदमी टिककर रहे-तभी घरों के नाम होते हैं, या फिर कब्रों के-हालांकि कभी-कभी मैं सोचती हूँ की कब्रों पर नाम भी न रहे, तो भी खास अंतर नहीं पड़ता.कोई जीता-जागता आदमी जान-बूझकर दूसरे की कब्र में घुसना पसंद नहीं करेगा.

..पार्क में यही एक मुश्किल है.इतने खुले में सब अपने-आप में बंद बैठे रहते हैं.आप किसी के पास जानकर सांत्वना के दो शब्द भी नहीं कह सकते.आप दूसरे को देखते हैं, दूसरे आपको.शायद इसमें भी कोई तस्सली मिलती होगी.यही कारण है,अकेले कमरे में जब तकलीफ दुशवार हो जाती है, तो अक्सर लोग बाहर चले आते हैं.सड़कों पे.पब्लिक पार्क में.किसी पब में.वहां कोई आपको तस्सली भी न दे, तो भी आपका दुःख एक जगह से मुड़कर दूसरी तरफ करवट ले लेता है.इससे तकलीफ का बोझ कम नहीं होता, लेकिन आप उसे कुली के सामान की तरह एक कंधे से उठाकर दूसरे कंधे पर रख देते हैं. यह क्या कम राहत है?

मुझे ये सोचकर काफी हैरानी होती है की जो चीज़ें हमेशा एक जैसी रहती हैं, उनसे उबने के बजाय आदमी सबसे ज्यादा उन्ही को देखना चाहता है.जैसे प्रेम में लेटे बच्चे या नव-विवाहित जोड़े की घोड़ा गाड़ी या मुर्दों की अर्थी.आपने देखा होगा, ऐसी चीज़ों के इर्द गिर्द हमेशा भीड़ जमा हो जाती है.अपना बस हो या न हो, पाँव खुद ब खुद उनके पास खींचे चले आते हैं.मुझे कभी कभी यह सोचकर बड़ा अचरज होता है की जो चीज़ें हमें अपनी जिंदगी को पकड़ने में मदद देती हैं, वे चीज़ें हमारी पकड़ के बाहर हैं.हम न उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरे को बता सकते हैं.मैं आपसे पूछती हूँ – क्या आप अपने जन्म की घडी के बारे में कुछ याद कर सकते हैं या अपनी मौत के बारे में किसी को कुछ बता सकते हैं?

मेरी शादी इसी गिरजे में हुई थी, लेकिन कभी कभी मैं सोचती हूँ की जो लोग आज खड़े हैं गिरजे के बाहर अगर मुझे देखें तो क्या पहचान सकेंगे की बेंच पर बैठी यह अकेली औरत वही है लड़की है, जो सफ़ेद पोशाक में पन्द्रह साल पहले गिरजे की तरफ जा रही थी?सच बताइए क्या पहचान सकेगा? आदमियों की बात तो मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है वह घोड़ा मुझे जरुर पहचान लेगा, जो उस दिन हमें खींचकर लाया था..जी हाँ, घोड़ों को देखकर मैं हमेशा हैरान रह जाती हूँ. कभी आपने उनकी आँखों में झांककर देखा है? लगता है, जैसे वे किसी बहुत ही आत्मीय चीज़ से अलग हो गए हैं, लेकिन अभी तक अपने अलगाव के आदी नहीं हो सके हैं. इसीलिए वे आदमियों की दुनिया में सबसे अधिक उदास रहते हैं.किसी चीज़ का आदी न हो पाना, इससे बड़ा और कोई दुर्भाग्य नहीं. वे लोग जो आखिर तक आदी नहीं हो पाते या तो घोड़ों की तरह उदासीन हो जाते हैं, या मेरी तरह धुप के एक टुकड़े की खोज में एक बेंच से दूसरी बेंच का चक्कर लगाते रहते हैं.

देखिये, कभी-कभी मैं सोचती हूँ की मरने से पहले हममे से हर एक को यह छुट मिलनी चाहिए की हम अपनी चीर-फाड़ खुद कर सकें. अपने अतीत की तहों को प्याज के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जाएँ..आपको हैरानी होगी की सब लोग अपना अपना हिस्सा लेने आ पहुंचेंगे, माँ-बाप, दोस्त, पति…सारे छिलके दूसरों के, आखिर की सूखी डंठल आपके हाथ में रह जायेगी, जो किसी काम की नहीं, जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता है, या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है.देखिये, अक्सर कहा जाता है की हर आदमी अकेला मरता है. मैं यह नहीं मानती. वह उन सब लोगों के साथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था. वह अपने भीतर पूरी एक दुनिया लेकर जाता है. इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुःख होता है, वह थोड़ा बहुत स्वार्थी किस्म का दुःख है, क्यूंकि हमें लगता है की इसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए खत्म हो गया है.

..लेकिन एक बात मुझे अब तक समझ में नहीं आती.भूचाल या बमबारी की ख़बरें अखबारों में छपती हैं.दूसरे दिन सबको पता चल जाता है की जहाँ बच्चों का स्कूल था,वहां खंडहर है, जहाँ खंडहर थे, वहां उड़ती धुल. लेकिन जब लोगों के साथ ऐसा होता है, तो किसी को कोई खबर नहीं होती…उस रात के बाद दूसरे दिन मैं सारे शहर में अकेली घुमती रही और किसी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं.

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विश्वास नहीं होता, मैं वही आदमी हूँ, जो चार महीने पहले था. उसके घर के बाहर अँधेरे में खड़ा था.फैटी, तुम, वही हो-सच! तुम वही हो और बिल्कुल नहीं बदले. मैं वही हूँ, जो पैंतीस साल पहले इस दुनिया में आया था. यदि वे जीवित होते, तो एकदम उसे पहचान जाते.यदि तुम बरसों बाद घर लौट कर आओ -तो वे एकदम पहचान लेते हैं – पर वे यह नहीं जानते, तुम कहाँ से लौट कर आए हो. वे कभी सोच भी नहीं सकते, कि इतनी यातना सह कर उन्होंने जिसे जन्म दिया है, वह बड़ा हो कर इतनी यातना बर्दाश्त कर सकता है – इसीलिए वे चले जाते हैं. अपने बच्चों से पहले ही उठ जाते हैं.खत्म हो जाते हैं… मर जाते हैं!

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मेरा यह अंधविश्वास था कि फोटो खिंचवाते ही मेरे भीतर का फुरना(यह माँ का शब्द था, जिसका मतलब शायद ‘आत्मा’ से रहा होगा.जब कभी मैं गुस्से में आ कर खाना नहीं खाता था,तो वे मुझे डराती थीं कि जब मैं सो जाऊँगा, मेरा फुरना मेरी देह से निकल कर रसोई में चला जाएगा – रात-भर भूखा-प्यासा मँडराता रहेगा) – हाँ, तो मेरा फुरना मुझे छोड़ कर फोटो पर चिपक जाएगा – जैसे कोई तितली अलबम के कागज पर चिपक जाती है, मर जाती है.मुझे डर था कि फोटो में आते ही मैं इस दुनिया से चला जाऊँगा, क्योंकि आदमी एक ही समय में दो जगह मौजूद नहीं रह सकता…यही कारण है कि मैं इस तरह आतंकित, बदहवास, गमगीन निगाहों से दुनिया को देख रहा हूँ. मेरी माँ कुर्सी पर बैठी है, बाबू पीछे खड़े हैं. मैं आगे हूँ, न पीछे – दोनों से अलग अपना हाथ कुर्सी के हत्थे पर टिका कर अपनी घातक नियति की तरफ घूर रहा हूँ.

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दो गलियारों के बीच सड़कें आतीं-और उन्हें पार करते हुए वह उसका हाथ पकड़ लेती-तब तक पकड़े रहती-जब तक वे दोबारा अँधेरे कॉरिडोर में नहीं चले जाते.पहली बार उन्होंने एक दुसरे को इसी तरह छुआ था-डर में-रास्ते पर, सड़क पार करते हुए.यह ठीक नहीं था.यह एक तरह का अपशकुन था जो छाया की तरह आखिर तक मंडराता रहता है.बाद में, जब हम अकेले सड़क पार करते हैं, तो खाली हाथ हवा में डोलता है-पुरानी छुअन की याद में-उस अपाहिज की तरह जिसे मौके-बेमौके अपने कटे अंग की याद आ जाती है-यह एक छोटी सी मृत्यु है.लोग बहुत धीरे मरते हैं.
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…अगले दिन खुलकर धुप निकली थी, मैं अधिक देर तक लाइब्ररी में नहीं बैठ सका. दोपहर होते ही मैं बाहर निकल पड़ा और घूमता हुआ उस सस्ते यहूदी रेस्तराँ में चला आया जहाँ मैं रोज खाना खाया करता था. काउंटर पर एक कैश-बॉक्स रखा रहता और उसके नीचे एक सफ़ेद सियामी बिल्ली ग्राहकों को घूरती रहती.मुझे शायद वो थोड़ा बहुत पहचानने लगी थी, क्यूंकि जितनी देर मैं खाता रहता, उतनी देर वह अपनी हरी आँखों से मेरी तरफ टुकुर टुकुर ताकती रहती.गरीबी और ठंड और अकेलेपन के दिनों में बिल्ली का सहारा भी बहुत होता है, यह मैं उन दिनों सोचा करता था.

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…फिर जंगल का टुकड़ा आया और निहालचंद्र को लगा, जैसे वे धुप की सफेदी से उतरकर एक लंबी छांह में आ गए हैं.आँखों को राहत मिली.पत्तों पर पैर आसानी से पड़ते जाते, कभी कभी कोई झाड़ी उनके कोट से अटक जाती, तो वह खड़े हो जातें बहुत कोमलता से अपने को रिहा करते, एक अजीब सा भ्रम होता, जैसे कोई दबे पाँव उनके पीछे आ रहा है.वे मुड़कर पीछे देखते तो कोई दिखाई नहीं देता- सर उठाये पेड, नीचे झुकी झाडियाँ…बीच में नाचते धुप के छल्ले.उन्हें लगता, मानो ऐसा कभी पहले भी हुआ है…मुद्दत पहले-जब वो उनके पीछे गायब हो जाती थी और वे अपने घर के बाग में अकेले चक्कर लगाते थे.

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…आज भी शाम के धुंधलके में अपने कमरे में अकेला उबा-सा, खिडकी के बाहर मकानों की छतों पर उतरती धुप को देखता हूँ, तो एक क्षण के लिए ऐसा भ्रम हो जाता है की समय के अंतराल के परे कुछ ऐसा शेष रह गया है, जो बीता नहीं है, जो काल की डोरी से नहीं बंध पाया, जो वर्षों से टूटी पतंग सा शुन्य में डगमगाता-सा रह गया है-न कहीं गिरता है, न कहीं पकड़ में आता है..

..उस रात रह रहकर नींद टूट जाती थी. यह मैं लेता हूँ, संज्ञाहीन नहीं, फिर भी विचार-शुन्य, चेतना की अंधी गली पर चिमगादड के मनहूस डैनों से फड़फड़ाते प्राणों को लिए, बिस्तरे से चिपका हुआ, नींद की नीले झील पर कुहरा-सा तिरता, डूबता, प्रतीक्षा करता हुआ, उस अशरीरी रहस्मय चमत्कार का, जो लावा-सा भीतर-ही भीतर घुलता है-जिसका विस्भोटन नहीं होता, होने-न होने के बीच अनिश्चित टंगा है..

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“अक्सर कहा जाता है कि प्रेम में किसी तरह का दुराव-छिपाव नहीं होता, वह आईने की तरह साफ होता है. मैं सोचता हूँ इससे बढ़ कर भ्रान्ति कोई दूसरी नहीं. प्रेम करने का अर्थ अपने को खोलना ही नहीं है, बहुत कुछ अपने को छिपाना भी है ताकि दूसरे को हम अपने निजी ‘खतरों’ से मुक्त रख सकें..हर स्त्री इस बात को समझती है और चूँकि वह पुरुष से कहीं अधिक प्रेम करने की क्षमता रखती है, उसमें अपने को छिपाने का भी साहस होता है.”

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” कुछ लोग एक साथ दो ज़िंदगियाँ जीते हैं, एक वह जो बीत गई है, दूसरी वह जो वे बिता रहे हैं..लेकिन कोई तीसरी ज़िन्दगी भी होती है, जिसकी सिर्फ़ आहाट सुनाई देती है, जो अपने में कुछ नहीं होती, लेकिन जिसका खटका हमेशा लगा रहता है, दरवाज़े पर बजती सांकल की तरह, जिसे कोई दूसरा नहीं सुन पाता. ”

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वह मेरी ओर देख रही है-निंदी, तुम….उसने आगे कुछ कहा, जो बहुत धीमा था.मैंने उसकी ओर देखा.उसने अपनी दो उँगलियों में रुमाल कसकर लपेट लिया था-निंदी, सच, तुम पागल हो! मैंने कभी ऐसे नहीं सोचा. नॉट इन दैट वे!

 नॉट इन दैट वे,
ये चार शब्द बहुत ही छोटे हैं, आसान हैं, और मैं अचानक खाली-सा हो गया हूँ, और सोचता हूँ, ज़िन्दगी कितनी हल्की है !

मैंने उसकी ओर देखा. उसकी आंखों में बड़े-बड़े आँसू थे, जैसे बच्चों की आंखों में होते हैं. किंतु उन आँसुओं का उसके चेहरे से कोई संबंध नहीं है, वे भूले से निकल आए हैं, और कुछ देर में, ढुलकने से पहले, ख़ुद-ब-ख़ुद सूख जाएंगें, और उसे पता भी नहीं चलेगा.

लेकिन शायद कुछ है, जो नहीं सूखेगा. मैं कल रात यही सोचता रहा था कि वह ‘न’ कह देगी, तो क्या होगा ? अब उसने कह दिया है, और मैं वैसा ही हूँ. कुछ भी नहीं बदला. जो बचा रह गया है, वह पहले भी था…वह सिर्फ़ है, जो उम्र के संग बढ़ता जाएगा…बढ़ता जाएगा और खामोश रहेगा…बन्द दरवाज़े की तरह, उड़ते पत्तों और पुराने पत्थरों की तरह…और मैं जीता रहूँगा. ”

                                                                 —–x——

‘ जब हम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते हैं, तो न केवल वर्तमान में उसके साथ रहना चाहते हैं, बल्कि उसके अतीत को भी निगलना चाहते हैं, जब वह हमारे साथ नहीं था ! हम इतने लालची और ईर्ष्यालु हो जाते हैं कि हमें यह सोचना भी असहनीय लगता है कि कभी ऐसा समय रहा होगा, जब वह हमारे बगैर जीता था, प्यार करता था, सोता-जागता था। ”

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  1. बहुत खूबसूरत है ये डायरी का पन्ना :):):)
    और भी ऐसे पन्नों को ब्लॉग पे डालो 🙂

  2. अच्छी चीजों को सहेजना कोई आपसे सीखे. बहुत अच्छा लगा इन्हें पढ़कर! आज आपके लिए बल्कि यूँ कहिये कि आपकी डायरी के लिए एक दुआ मांगती हूँ कि आपकी डायरी भानुमती का पिटारा जैसा कुछ बन जाये. इसमें लिखा हुआ कभी खतम न हो. हर रोज कुछ न कुछ नया पढ़ने को मिले.

  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (29/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

  4. अभिषेक भाई,
    डायरी में हम सब बहुत कुछ दर्ज करते रहते हैं…मनुष्य है ही एक चिंतनशील प्राणी।

    कई बार जब वर्षों के बाद वे पन्ने खोले जाते हैं, तब स्मृतियों का पूरा एक संसार कौंध जाता है, आँखों के सामने।

    एक अनामंत्रित सलाह देने की धृष्टता कर रहा हूँ। यह कि : यदि पोस्ट को ज़्यादा बड़ा न करें, तो सही रहता है।

  5. अब तक का सबसे बढिया पोस्ट! इधर उधर से जोड़ा हुआ कोटेशन,ऊ भी निर्मल वर्मा जैसे महान कथाकार का..मन सच्चो निर्मल आनंद से सराबोर हो गया!
    एही नहीं, ई सब कोटेशन तुमरा संबेदनसीलता का अईना है! बनाए रखो!!

  6. निर्मल वर्मा जी का मैंने नाम सुना था पर उनको पढ़ा नहीं था,आज आपने उनके बारे में उत्सुकता जगा दी.
    आपकी डायरी का ये पन्ना बहुत कीमती है.

  7. .

    इस डायरी के कुछ पन्ने मेरी डायरी के पन्नों से मिलते जुलते हैं।

    .

  8. हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक के बारे में और जानने को मिला ..बढ़िया प्रयास है आपका ..निरंतरता बनाये रखिये …शुभकामनायें
    चलते -चलते पर आपका स्वागत है

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