आप किस गाँव से हो?

जब पहली बार कर्नाटक आया था रहने के लिए, तब मन ही मन सोचता था की कैसे रह पाऊंगा इधर. लोगों से बहुत सुन रखा था की “साउथ इंडिया” में तो खाने की दिक्कत होती है, नोर्थ इंडियन से सही से पेश नहीं आते लोग..और भी न जाने क्या क्या अफवाहें. अब कर्नाटक में आठ साल रहने के बाद दिल करता है की जिन्होंने ये सब तरह की अफवाहें फैलाई थी उन्हें पकड़ के मारूं..क्यूंकि इन आठ सालों में मुझे किसी प्रकार की तकलीफ नहीं हुई..हाँ, बल्कि बहुत से मायनों में मुझे साउथ इंडिया से प्यार सा हो गया है.. वैसे साउथ इंडिया कहूँ तो पूरा साउथ इंडिया अभी तक घुमा नहीं…आंन्ध्रप्रदेश और कर्नाटक के कुछ शहरों तक ही घूमना सिमित रहा है.. हैदराबाद, बैंगलोर, गुलबर्गा, ब्सवाकल्याण,बीदर,बीजापुर, हुबली, बेलगाम, मैसूर,टुमकुर और धारवाड़ जैसे जगहों से परिचित हूँ. दिल किसी शहर से अगर सही मायनों में जुड़ा हुआ है तो वो है – ब्सवाकल्याण(जहाँ से मैंने अपनी पढ़ाई की), हैदराबाद(बिरयानियों का शहर :P) और बैंगलोर(जहाँ फ़िलहाल कार्यरत हूँ).

कॉलेज में दाखिला हो जाने के बाद, सबसे बड़ी परेशानी मेरी ये थी की बातचीत कैसे करूँगा लोकल लोगों से..मुझे ये डर था की सब तो कन्नड़ में ही बात करते होंगे, हिन्दी पता नहीं कोई समझता होगा या नहीं..इस डर को बढाने में मेरे कुछ नालायक दोस्तों का भी खूब हाथ था..लेकिन मुझे ये पहले दिन से ही अहसास हो गया की हिन्दी यहाँ के लोग ठीक वैसे ही समझते और बोलते हैं जैसे हमारे शहर के लोग..वैसे कभी कभी  ये झलक ही जाता की साउथ के लोग हैं.एकदम सही हिन्दी बोलने वाले थोड़े कम मिलते हैं यहाँ..और कभी कभी तो कुछ बातों पे हंसी भी आ जाती…जैसे की जब किसी को पूछना होता की कहाँ से हो तुम…ब्सवाकल्याण के लोगों को जब ये प्रश्न पूछना होता था तो पूछते थे “किस गाँव से हो तुम भाई?” ..शुरू शुरू में तो ये प्रश्न बड़ा अजीब लगता था..सोचता था की हम तो पटना के रहने वाले हैं, और पटना तो राजधानी है, ये लोग बेवकूफ ही हैं जो पूछते हैं की किस गाँव के रहने वाले हो.

कुछ लड़के इस सवाल पे बिफर भी जाते..स्वाभाविक भी है, अब कोई अगर हैदराबाद जैसे बड़े शहर का रहने वाला है और पूछने वाला ये जानता है की बन्दा हैदराबाद से है और फिर भी पूछ बैठे – “भई तुम्हारे गाँव में तो खाने की कोई दिक्कत नहीं है” 😛 .. हम धीरे धीरे ये समझने लगे की इनके “गाँव” कहने का मतलब वो “गाँव” से नहीं जो हम समझ रहे थे..बल्कि इनके बात करने का एक तरीका है. एक दफे की बात है, एक कैसेट और सी.डी का दूकान था..दो भाई चालते थे दूकान, उनसे मेरी अच्छी खासी मित्रता भी हो गयी थी.., बातों ही बातों में एक बार उसने पूछ लिया – “अभिषेक भाई, आपके गाँव में क्या रेट है सी.डी का?”..मैं कुछ जवाब देता इससे पहले मेरे दोस्त आशीष ने कहा – अरे भईया ये आप लोग गाँव क्यों कहते हैं…ये बड़ा शहर का रहने वाला है…गाँव का नहीं…हाँ, हम भले छोटे शहर(गिरीडीह) के रहने वाले हैं, लेकिन उसे भी आप गाँव नहीं कह सकते..” बेचारे अमर भाई(दुकानदार का नाम) आशीष के इस बात पे बस इतना कह के रह गए – अरे भैया हम तो बस युहीं पूछ रहे थे..गाँव कहने का वैसा उद्देश्य नहीं था मेरा. 🙂 शुरुआत के दिनों में ये प्रश्न थोड़ा अजीब लगता था, लेकिन अब आठ साल रहने के बाद इस प्रश्न की आदत सी हो गयी है 🙂

अगर किसी को आपकी खैरियत पूछनी हो, तो ब्सवाकल्याण के लोग कुछ इस तरह पूछते हैं – “खाना खाया?” 🙂 
पहले ये बात भी अजीब ही लगती थी..शाम का वक्त हो या फिर सुबह का वक्त..अगर कोई लोकल परिचित दूकान वाला दिख जाये सड़क पे तो वो ये सवाल जरुर करता – “खाना खाया?” . वैसे ये सवाल लोग हाथ से इशारों में भी पूछते.कभी कभी तो हम इस पर चुटकी भी ले लेते थे..जब कोई शाम में ये सवाल पूछता तो हम कहते “अरे यार तुम लोग का भी अजब टाइमिंग है..खाना खाया या नहीं ये हर समय पूछते हो..अरे यार खाना खाने के समय या उसके आसपास पूछो तो बात समझ में आती है, लेकिन सुबह, शाम, रात के बारह बजे…ये सवाल..हद है यार” 😛 


ऐसे ही कई सारी छोटी बड़ी आदतें जो ब्सवाकल्याण के लोगों में थीं, अच्छी लगती थीं…अब अगर कोई मिलता है ब्सवाकल्याण का रहने वाला और वो इस तरह के ही कुछ सवाल करता है तो अच्छा लगता है.सबसे अच्छी बात जो मुझे लगती थी ब्सवाकल्याण के बार में की दुनिया का शोर शराबा नहीं था वहां…शांतिमय वातावरण था, हाँ लोग थोड़े अजीब किस्म के थे जरुर..लेकिन उनको जानने के बाद वो अच्छे लगने लगते थे 🙂




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चलते चलते एक छोटी सी बात, जो मेरे दोस्त अकरम को एक ब्सवाकल्याण के रहने वाले ने कहा – 
बात उस समय की है जब अकरम बाबू साहब कुछ काम के सन्दर्भ में बैंगलोर से ब्सवाकल्याण जा रहे थे..वोल्वो बस से जाना कभी कभी होता था उन दिनों.अकरम वोल्वो बस से ही सफर कर रहा था..रास्ते में जब एक ढाबे पे बस रुकी तो अकरम को फोटो क्लिक करने का दिल किया, अकरम जब बस के साथ फोटो खिंचा रहा था तो एक व्यक्ति ने बड़े गौर से देखा अकरम को और फिर अकरम के पास आकार मुस्कुराते हुए कहा “गुलबर्गा का बस है बोल के फोटो खिंचाते”   (बस बैंगलोर टू गुलबर्गा का था) 😛

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    गाँव से तात्पर्य अपने घर से है, इसलिये बुरा मानने की कोई बात ही नहीं है। हमने तो कभी नहीं माना..

  2. आप आठ साल से जहाँ है मैं वहां बीस साल से रह रहा हूँ ! कर्नाटक के लोग बड़े प्यारे होते हैं और मिल जुल कर रहते हैं ! किसी की तरक्की से खुश होते हैं ! आज जिस तेज़ी से इन्होने हिंदी बोलना सीखा है उससे इनके मन की उज्ज्वलता झलकती है !
    आपका अनुभव पढकर अच्छा लगा !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

  3. ज्ञानचंद जी, आपने सही कहा..ये मेरा भी अनुभव रहा है की कर्नाटक के लोग अच्छे होते हैं…मिल जुल कर रहने वाले.. 🙂

  4. मगर भाई एक बार हमें तो बंगलौर रेलवे स्टेशन के रेस्टोरेंट में बेयरे के साथ काफी मसक्कत करनी पड़ी थी अपनी बात समझाने के लिए…..हैदराबाद के बिरयानी के नाम पर पैराडाइस की बिरयानी याद आ गयी. जो शायद नार्थ मे वैसी कहीं न मिले.

  5. @उपेन्द्र जी,
    पैराडाईज की बिरयानी और बावर्ची की बिरयानी….इन दोनों से बेहतर बिरयानी शायद ही और कहीं मिलती हो…मैंने तो खाया नहीं अब तक…और यकीन ये भी है की हैदराबाद से अच्छी बिरयानी और कहीं बनती नहीं….शायद लखनऊ की बिरयानी टक्कर दे सके हैदराबाद की बिरयानी को…लेकिन जीत हैदराबाद की ही होगी 🙂 🙂

  6. हमरा हेड ऑफिसवे बेंगलुरू में है… कर्णाटक का लोग अच्छा होता है कि बुरा ई त बाद में कभी..मगर बाबू जो तुम लिखे हो उसका उल्टा सोचो.. बेचारा एगो कण्णडिगा पटना में पोस्टेड था हमरे साथ. एक दिन उसको सूजी खरीदना था.. घण्टा भर दिमाग खाया समझाने में अऊर लास्ट में हद कर दिया…
    एगो सादा कागज़ पर डॉट पेन से बुंदा बुंदा बना दिया ढेर सा अऊर बोला हमको ई चाहिए, इसका कलर व्हाइट होता है वर्मा जी!!
    ऊ बेचारा त खाली बोलिए के फोटो खिंकखिंचाने के लिए कहा.. मगर हमरे लिए त पहचानो सुज्जी डाइग्राम से!

  7. @प्रीती दीदी..
    उसी गाँव के रहने वाले हैं जहाँ की आप रहनेवाली हैं 🙂

  8. पिछले साल जब हम मुम्बई गये अपनी बुआ के पास, तो वहां फ़ूफ़ाजी के कुछ मित्र आये, जिनसे उन्होंने हमारा परिचय कराते हुए कहा- मेरा भतीजा और बहू है, हमारे गांव से आये हैं :):)

  9. हे भगवान……. जब तक आपकी पोस्ट पर टीप करता, उस से पहले सलील जी की टीप पढ़ ली "हंसी नहीं रुक रही."

    हाँ तो मैं ये कह रहा था……. कि आपका गाँव कौन सा है.

    बढिया पोस्ट, प्रथम आगमन हुवा है आपके ब्लॉग पर….. दस्तूर कायम रहेगा.

  10. खाना खाया? …यह रिवाज़ चीनी भाषा में भी है वहां भी पूछना हो कि कैसे हो तो यही कहा जाता है..खाना खाया? .जब हमारी टीचर ने हमें बताया तो हमें भी बहुत ही अजीब लगा था.
    बहुत मजेदार लिखा है .

  11. bahut acche post hai, aaj bhi aise battein hoti hai. maine bhi yeh sab sun rakha hai, ki khane ki problem, etc etc in south india.

    achha hua aapne yeh post likhkaar, iss sab ko galat sabit kiya and mere jaise logo ki help ki 😛

  12. Apka ye post padh k mujhe v kuch yaad agya…
    7-8 yrs pehle main Ahmedabad gayi thi, kuch mahine waha rahi thi. waha v sab aise hi poochte hain "आप किस गाँव से हो?" shuru mein main v sabko explain krti thi ki main गाँव se nahi hu.aur ek dadiji ne to mujhse badi hairani se poocha… "kya tum LALU k गाँव se ayi ho?" ha ha ha
    Baad me unse meri dosti ho gayi thi:)
    Us samay ye Lalu ka Bihar tha lekin ab ye Nitish ka Bihar hai:)

  13. रोचक!
    हम यहाँ ३६ साल से रह रहे हैं।
    हम भी outsider ही हैं लेकिन अब तो insider बन गए हैं।
    १९७४ में यहाँ पहली बार आया था।
    कंपनी ने मेरी पोस्टिंग यहाँ करवाई।
    कुछ ही साल में हमने निश्चय कर लिया कि, हो न हो, हमें यहीं बसना है। १९८५-८६ में अपना घर बना लिया।
    मेरी मातृभाषा कन्नड नहीं है और मुझे भी पहले कुछ महीनों के लिए परेशानी हुई थी पर अब मैं खुश हूँ।

    हर प्रदेश के रिवाज अलग होते हैं।
    यहाँ के लोग आपसे आपके "गाँव" नहीं पूछ रहे थे।
    कन्नड में लोगों ने पूछा होगा "निम्म ऊरु यावदु"?
    कन्नड शब्द "ऊरु" का मतलब आपका मूल निवास स्थान, (यानी Native place), गाँव नहीं।

    जब कोइ एक राज्य से किसी दूसरे राजय में रहने के लिए चला जाता है तो अक्सर ऐसी कहानियाँ और अनुभव सुनने को मिलते हैं
    कभी हम भी आपको ऐसे ही किस्से सुनाएंगे।
    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

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